भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३५१ तुरीयातीत मैं तो चेतन तत्त्व हूँ तथा काल से कवलित और शीघ्र नष्ट होने वाला नहीं हूँ- अवधूतस्त्वनियमः पतिताभिशस्तवर्जनपूर्वकं सर्ववर्णेष्वजगरवृत्त्याहारपरः स्वरूपानुसंधानपरः । ............नाहमचेतनः (संन्यासो० २.२९-३०)। संन्यासो के अन्य भेद इस प्रकार हैं- (क) कुटीचक- कुटीचक (जिसे कुटीचर भी कहते हैं) शिखा और यज्ञोपवीतधारी होता है, जो दण्ड, कमण्डलु, लँगोटी, चादर और कन्था (गुदड़ी) धारण करता है। वह माता-पिता और गुरु की आराधना में तन्मय रहते हुए पिठर (बटलोई), खनित्र (फावड़ा) और शिक्य (छींका) धारण करके मन्त्र साधन परायण रहकर एक ही स्थान पर अन्नग्रहण करने वाला, श्वेत और ऊर्ध्वमुखी त्रिपुण्ड्र धारण करने वाला तथा तीन दण्ड रखने वाला होता है-कुटीचकः शिखायज्ञोपवीती दण्डकमण्डलुधरः कौपीनशाटीकन्थाधरः पितृमातृगुर्वाराधनपरःपिठरखनित्रशिक्यादिमन्त्रसाधनपर एकत्रान्नादनपरः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः (संन्यासो० २.२४)। (ख) बहूदक- बहूदक शिखा आदि तथा कन्था, त्रिपुण्ड्रधारी होकर सब प्रकार कुटीचक के समान आचरण वाला होता है तथा मधुकरी वृत्ति से केवल अष्टग्रास भोजनग्राही होता है-बहूदकः शिखादिकन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी कुटीचकवत्सर्वसमो मधुकरवृत्त्याष्टकबलाशी (संन्यासो० २.२५)। (ग) हंस- हंस का रूप इस प्रकार विवेचित है- हंसो जटाधारी त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्ड्रधार्यसंकॢप्तमाधूकरानाशी कौपीनखण्डतुण्डधारी (संन्यासो० २.२६) अर्थात् हंस प्रवृत्ति वाला संन्यासो जटाधारण करने वाला त्रिपुण्ड्र और ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करने वाला, अनिश्चित स्थान पर भिक्षाटन करके भोजन ग्रहण करने वाला और शरीर पर मात्र कौपीन धारण करने वाला होता है। (घ) परमहंस- परमहंस की वृत्ति बताते हुए उपनिषद्कार ने लिखा है- परमहंसः शिखायज्ञोपवीतरहितः पञ्चगृहेषु करपात्र्येककौपीनधारी शाटीमेकामेकं वैणवं दण्डमेकशाटीधरो वा भस्मोद्धूलनपरः सर्वत्यागी (संन्यासो० २.२७) अर्थात् परमहंस वृत्तिवाला संन्यासी शिखा और यज्ञोपवीत धारण न करके करपात्री होकर मात्र पाँच घरों से ही भिक्षा ग्रहण करता है, जो मात्र एक कौपीन, एक चादर और एक दण्ड धारण करने वाला होता है अथवा शरीर पर केवल भस्म लगाकर मात्र चादर धारण करता है, इसके अतिरिक्त सर्वत्यागी होता है। परमहंस को ही भिक्षु कहते हैं। सामान्यतः भिक्षु शब्द से तात्पर्य भिक्षा माँगने वाला प्रतीत होता है; पर इस वृत्ति की निन्दा करते हुए परमहंसोपनिषद में लिखा है कि जो काष्ठ दण्ड धारण करके सब आशाओं से युक्त है तथा ज्ञान, क्षमा, वैराग्य आदि गुणों से शून्य होकर मात्र भिक्षावृत्ति से ही जीवनयापन करता है, वह पापी यतिवृत्ति का विनाशक है और रौरव नामक नरक में जाता है। सच्चा भिक्षु वह है, जो आशाम्बर है तथा नमस्कार, स्वाहा, स्वधा से रहित, स्वर्ण आदि का संग्रह न करके, राग-द्वेष से रहित होकर अपने आत्मतत्त्व में ही स्थित रहता है- आशाम्बरो न नमस्कारो न स्वाहाकारो.......... स भिक्षुस्सौवर्णादीनां नैव परिग्रहेन्न लोकनं ........... आत्मन्येवावस्थीयते (परमहंसो० ४)। (ङ) तुरीयातीत- तुरीयातीत को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है- तुरीयातीतो गोमुखवृत्त्या फलाहारी, अन्नाहारी चेद्गृहत्रये, देहमात्रावशिष्टो दिगम्बरः कुणपवच्छरीरवृत्तिकः (संन्यासो० २.२८) अर्थात् तुरीयातीत संन्यासो गोमुखवृत्ति से केवल तीन घरों से फल अथवा अन्नाहार ग्रहण करता है। वह भोजन देह धारण करने मात्र के लिए ही ग्रहण करता है तथा यह मानता है कि मैं तो चेतन आत्मा हूँ, शरीर तो मृतक के समान है। इस प्रकार संन्यासियों की छः श्रेणियाँ हैं, जो स्वरूप भेद से अलग-अलग नाम वाली हैं। इनके अतिरिक्त संन्यासोपनिषद् ने संन्यासियों की चार अन्य श्रेणियों का भी उल्लेख किया है। ये हैं-वैराग्य संन्यासी, ज्ञान-संन्यासी, ज्ञान वैराग्य संन्यासो और कर्म संन्यासो। इनमें वैराग्य संन्यासो वह है, जो दृश्य-श्रव्य विषयों के प्रति निःस्पृह है और पूर्वार्जित पुण्यों के फलस्वरूप वैराग्य होने के कारण जिसने संन्यास धर्म ग्रहण किया है- तद्यथेति। दृष्टानुश्रविक .......... वैराग्य संन्यासी (संन्यासो० २.१९)। ज्ञान संन्यासो वह है, जो शास्त्रज्ञान पाकर, सांसारिक सद्गुणों एवं दुर्गुणों का अनुभव करके प्रपञ्च से उपराम होकर शरीर, शास्त्र और लोक वासनाओं का परित्याग करके, संसार की समस्त प्रवृत्तियों को वमनान्न मानकर चारों साधनों से मुक्त होकर संन्यास धर्म स्वीकार करता है-- शास्त्रज्ञानात्यापपुण्य ....... ज्ञानसंन्यासी (संन्यासो० २.२०)। ज्ञान वैराग्य संन्यासो उसे कहा गया है, जो क्रमशः सभी का अभ्यास करके, समस्त अनुभव प्राप्त करके, ज्ञान और वैराग्य के तत्त्व को भलीभाँति समझकर, देह मात्र की अवशिष्ट मानकर संन्यासधर्म ग्रहण करता है- क्रमेण सर्वमभ्यस्य .........ज्ञानवैराग्य संन्यासी (संन्यासो० २.२१)। इसी प्रकार कर्म संन्यासो वह है, जो ब्रह्मचर्य,

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