भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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अविद्या ३५२ परिशिष्ट गृहस्थ एवं वानप्रस्थ आश्रमों में विधिवत् रहने के पश्चात् भी वैराग्य उत्पन्न न होने पर नियमानुसार संन्यास ग्रहण करता है- ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भूत्वा ........... स कर्मसंन्यासी (संन्यासो० २.२२)। यहाँ यह ध्यातव्य है कि संन्यास के पूर्वोक्त छः भेद इसी कर्म संन्यास के भेद कहे गये हैं। २९. अविद्या - द्र० - ज्ञानखण्ड । ३०. अविमुक्त - अविमुक्त का शाब्दिक अर्थ है, जो मुक्त न हो अर्थात् मुक्ति लाभ न कर सके। हिन्दी विश्वकोश के अनुसार कनपटी को 'अविमुक्त' कहते हैं। जाबाल उपनिषद् (१.१) के अनुसार यह ब्रह्म का स्थान है। मूर्द्धा (ब्रह्मरन्ध्र) और चिबुक (दाढ़ी) का मध्यवर्ती स्थान भी अविमुक्त कहलाता है। अन्यत्र उल्लेख पाया जाता है कि भौंहों एवं घ्राण का मध्य स्थान अविमुक्त क्षेत्र है-अविमुक्तं नाम ......वक्ष्यमाण आत्मविदां काशीनगरस्थानीयो ध्रुवोध्राणस्य च सन्धिः (जाबालो०-अड्यार माइनर उपनिषद् पृ० ४०१)। काशी क्षेत्र भी अविमुक्त कहा जाता है। स्कन्दपुराण के काशी खण्ड में लिखा है- ‘‘न विमुक्तं शिवाभ्यां यदविमुक्तं ततो विदुः’’ अर्थात् शिव और शिवा के परित्याग न करने से काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहते हैं। कुछ लोग काशी के निकट गंगातट से पाँच कोश दूर स्थान को भी अविमुक्त क्षेत्र कहते हैं। ३१. अष्टग्रह- ग्रह के सन्दर्भ में सामान्य अवधारणा नवग्रहों की है, जिन्हें सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु नाम से जाना जाता है। बाद में हुई खोजों के अनुसार नेप्च्यून, प्लूटो और यूरेनस ग्रहों को भी सम्मिलित कर लेने पर यह संख्या बारह मानी जाने लगी है, किन्तु आध्यात्मिक सन्दर्भ में कुछ उपनिषदों में ग्रह शब्द का अर्थ व संख्या इस अवधारणा से भिन्न है, जैसे-अथर्वशिर उपनिषद् में भगवान् रुद्र को स्तुति करते हुए देवों द्वारा उन्हें अष्टग्रह रूप कहा गया है-यो वै रुद्रः स भगवान्ये चाष्टौ ग्रहास्तस्मै वै नमो नमः (अथर्वशिर० ४)। बृहदारण्यक उपनिषद् में अष्टग्रह और अष्ट अतिग्रहों का संकेत इन शब्दों में उपन्यस्त है- इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ............. कतमे त इति (बृह० उ० ३.२.१)। ये अष्टग्रह प्राण, वाक्, जिह्वा, चक्षु, श्रोत्र, मन, हस्त और त्वचा नाम से वर्णित हैं। इसी प्रकार इन ग्रहों (पंच ज्ञान इन्द्रियों, एक कर्मेन्द्रिय तथा मन, प्राण) के विषयों को अतिग्रह कहा गया है। जैसे प्राण ग्रह का अतिग्रह अपान है और अपान अतिग्रह द्वारा वह गृहीत है, इससे ही प्राण ग्रह गन्धों को सूँघने का कार्य सम्पन्न करता है-प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति (बृह०उ० ३.२.३)। इसी प्रकार वाक् शक्ति ग्रह है, नाम रूपी अतिग्रह से वह गृहीत है, इसीलिए वाणी से उच्चारण सम्पन्न ही पाता है- वाग्वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति (बृह०उ० ३.२.३)। इसी प्रकार जिह्वा को ग्रह, रस को उसका अतिग्रह; श्रोत्र को ग्रह, शब्द को उसका अतिग्रह; मन को ग्रह, कामना को उसका अतिग्रह; हाथों को ग्रह, कर्म को उसका अतिग्रह तथा त्वचा को ग्रह और स्पर्श को उसका अतिग्रह निरूपित करके इन ग्रहों की सक्रियता अतिग्रहों के माध्यम से ही बताई गई है। ३२. अष्टदलकमल - उपनिषदों में शरीरगत चक्रों का आलंकारिक वर्णन है। जैसे-कुण्डलिनी को सर्पिणी, सहस्रार चक्र के स्थल को क्षीर सागर, इसी प्रकार अनाहत चक्र को अष्टदल कमल अथवा हृदय कमल भी कहते हैं। प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में अष्टदलकमल इन शब्दों में परिभाषित है- अष्टौ दलानि यस्य। अष्टपत्रकमले अर्थात् जिसमें आठ दल या पत्ते हों ऐसा कमल। अष्टदलकमल हृदय कमल को कहा जाता है। इसी को ब्रह्मपुर की संज्ञा भी प्रदान की गई है। इसका स्थान हृदय के पास है। क्षुरिकोपनिषदकार ने प्रत्याहार प्रकरण में हृदय स्थित रक्तोत्पल (लाल कमल) जैसे प्रतीत होने वाले को 'दहर पुण्डरीक' कहा है, वेदान्त में भी इसे दहर पुण्डरीक ही कहा गया है- ततो रक्तोत्पलाभासं हृदायतनं महत्। दहरं पुण्डरीकं तत् वेदान्तेषु निगद्यते (क्षुरिको० १०)। इसे ही अनाहत चक्र भी कहा जाता है। इसकी साधना करने से यह (अनाहतं चक्र) जाग्रत् ही जाता है। इसका लक्षण इन्द्रियों पर अधिकार प्राप्त हो जाना है। इससे वाक्पतित्व, कवित्वशक्ति भी प्राप्त होती है। शिवसार तन्त्र में कहा गया है कि इस स्थान में उत्पन्न होने वाली अनाहत ध्वनि ही सदाशिव है और त्रिगुणमय ओंकार इसी स्थान में अभिव्यक्त होता है, यथा-शब्दं ब्रह्मेति तं प्राह साक्षाद्देवः सदाशिवः । अनाहतेषु चक्रेषु स शब्दः परिकीर्त्यते ॥ ३३. अष्टाङ्ग योग- चित्तवृत्ति के निरोध के लिए को जाने वाली योग क्रिया के आठ उपाय या अंग माने जाते हैं। इनमें से पाँच बहिरंग कहलाते हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार। तीन अन्तरंग कहलाते हैं- धारणा, ध्यान और समाधि। इन्हीं को अष्टांग योग कहते हैं। पातञ्जल योग में मन और इन्द्रियों को विषयों को ओर जाने से रोकने को यम कहा जाता है। यम के पाँच भेद हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। वेदान्तसार में नियम को विवेचना

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