भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 414 में से

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परिशिष्ट ३५३ आग्नेयी इष्टि करते हुए लिखा है, जो साधक को जन्म के हेतुभूत काम्य धर्मों से निवर्तित कर मोक्ष के हेतुभूत निष्काम धर्म में बाँध देते हैं, उन्हें नियम कहा जाता है। नियम पाँच प्रकार के हैं- शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार शरीर जिस स्थिति में स्थिर एवं सुखपूर्वक रहे, उसे आसन कहा जाता है। जिसे आसन की सिद्धि हो जाती है, उसे शीतोष्णादि द्वन्द्व अभिभूत नहीं करते हैं। पातञ्जल योग प्रदीप के अनुसार प्राणों को वश में करने का नाम प्राणायाम है। प्राणों को अपने अधिकार में चलाने वाले मनुष्य का अधिकार अपने शरीर, इन्द्रियों तथा मन पर हो जाता है। प्राणायाम के मुख्यतः तीन भेद हैं- रेचक, पूरक और कुम्भक । प्रत्याहार में चित्तवृत्तियों को या इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर चित्त को हर स्थिति में शान्त रखा जाता है। अपने चिन्तन को अनात्म पदार्थों से हटाकर आत्मा में लगाये रहना प्रत्याहार है। चित्तवृत्तियों को चारों ओर से हटाकर एक स्थान या विषय में लगाना धारणा है। योग सूत्र के अनुसार चित्त को एक स्थान पर दृढ़ करना धारणा है- 'देशबन्धश्चित्तस्य धारणा' (यो०द० ३.१)। चित्त को चारों ओर से हटाकर किसी एक विषय पर सतत स्थिर करना ध्यान कहलाता है। उपनिषद् में कहा गया है- मन का विकारों से मुक्त होना ही ध्यान है- "ध्यानं निर्विषयं मनः" (मैत्रे० २.३)। योग के आठ अंगों में अन्तिम अंग समाधि है। ध्यान की पराकाष्ठा को समाधि कहा गया है। इसे योग का चरम फल भी कहते हैं। इसमें साधक अपने चित्त को बाह्य जगत् से मोड़कर आत्मा में स्थिर कर लेता है, ऐसी अवस्था में वह विविध शक्तियों को धारण करने में समर्थ हो जाता है और अन्त में कैवल्य पद को प्राप्त होता है। समाधि के प्रायः दो भेदों का निरूपण किया जाता है- १. सविकल्पक समाधि और २. निर्विकल्पक समाधि। ३४. असूया - अध्यात्म के पथ पर अग्रसर होने वाले साधक के अन्दर अनेक प्रकार के विकार भी प्रायः उत्पन्न होते रहते हैं, जैसे- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य। इन पर विजय प्राप्त कर साधक जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य प्राप्त करता है। इसी प्रकार का एक दोष 'असूया' है। असूया का अर्थ किसी के गुणों में भी दोष देखने की प्रवृत्ति से है-असूया परगुणेषु दोषाविष्करणम् (वाच० पृ० ५५८)। अमरकोश भी इसी तथ्य को पुष्टि करता है-असूया तु दोषारोपो गुणेष्वपि। यह किसी के प्रति क्रोध-द्रोह के फलस्वरूप उत्पन्न होती है। काव्यकारों ने इसे एक प्रकार का संचारी भाव माना है। योग दर्शन में मनोगत कालुष्य के भेदों में असूया भी वर्णित है। उसके अनुसार अपने से श्रेष्ठ पुरुष के सद्गुणों में भी दोषदर्शन-दोषारोपण करना 'असूया' कहा जाता है। न्याय दर्शन के अनुसार दूसरे के गुणों को सहन न करना (उनसे ईर्ष्या रखना) असूया कहलाता है-ईर्ष्याऽसूया.... (वात्स्या० ४.१.३) ३५. अस्तेय - द्र०-यम। ३६. अहंकार - द्र०- ज्ञानखण्ड-अन्तःकरण चतुष्टय । ३७. अहिंसा - द्र०-यम-नियम। ३८. आग्नेय - सामान्यतः आग्नेय शब्द का अर्थ अग्नि से सम्बन्धित है। यह शब्द विभिन्न शब्दों के विशेषण के रूप में भी प्रयुक्त होता है। अग्नि में दी जाने वाली विशेष प्रकार को आहुति 'पुरोडाश' को भी आग्नेय कहा गया है- "आग्नेयः पुरोडाशो भवति" (वाच०पृ० ६२०)। अठारह पुराणों में अग्निपुराण को भी अग्नि से सम्बन्धित होने के कारण आग्नेय पुराण कहते हैं- "आग्नेयं वेदसम्मितम्।" इत्युक्ते अग्निप्रोक्ते महापुराणभेदे अग्निपुराणशब्दे विवृतिः (वाच०पृ० ६२०)। दक्षिण और पूर्व के मध्यवर्ती दिशा को भी आग्नेय दिशा कहते हैं; क्योंकि उसके देवता अग्नि होते हैं। स्वर्ण को भी आग्नेय कहते हैं; क्योंकि उसका आविर्भाव अग्नि के वीर्य से ही हुआ है। जैमिनीय उपनिषद् के अनुसार यह पृथिवी भी आग्नेय है; क्योकि प्रारम्भ में यह अग्नि का गोला मात्र थी। बदलते-बदलते इस वर्तमान रूप में आ गई है। ३९. आग्नेय यज्ञ - द्र०-आग्नेयी इष्टि। ४०. आग्नेयी इष्टि - श्रौत सूत्रों में कामनाओं को पूर्ति के लिए विभिन्न इष्टियों का विधान है। सामान्यतः इष्टि शब्द- कामना, कामना की गई वस्तु, दान संग्रह तथा यज्ञ के अर्थ में प्रयुक्त होता है; किन्तु श्रौत ग्रन्थों में इसे विशेष प्रयोजनों के लिए किया जाने वाला याग (यज्ञ) माना गया है। कात्यायन यज्ञ पद्धति विमर्श पृ० ४६८ में इष्टि इन शब्दों में परिभाषित है "आहिताग्नि (नियमित रूप से यज्ञ करने वाले) के द्वारा दर्श (अमावस्या) तथा पूर्णिमा को सम्पन्न किया जाने वाला याग इष्टि है।" प्रयोजन भेद से इष्टियो के कई प्रकार हैं। जैसे-मित्रविन्देष्टि, आग्नेयी इष्टि, अधिक श्रीकामेष्टि, चित्रेष्टि, प्रजा कामेष्टि, प्राजापत्येष्टि, त्रैधातवी इष्टि, वैमृधीष्टि, अन्वारम्भणीय इष्टि तथा अन्त्येष्टि आदि। इष्टियाँ असंख्य हैं;

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