भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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किन्तु स्थानाभाव से यहाँ कुछ प्रमुख इष्टियों की चर्चा की जा रही है। महर्षि कात्यायन के अनुसार किसी भी कामना की सिद्धि के लिए आग्नेयी इष्टि करनी चाहिए-आग्नेयं प्रतिकाममाहरेत् (का० श्रौ० सू० ४.५.१५)। आग्नेयी इष्टि में अग्निदेव के निमित्त आठ कपाल [कपाल मिट्टी का एक पात्र होता है, जिसमें पुरोडाश (हव्य विशेष) पकाया जाता है] पुरोडाश पूर्वक याग सम्पन्न होता है। आग्नेयी इष्टि को ही आग्नेय यज्ञ भी कहते हैं। आग्नेयी इष्टि के अधिष्ठाता अग्निदेव होते हैं। जाबालोपनिषद् में आहिताग्नि संन्यास विधि प्रकरण में आग्नेयी इष्टि करके ही संन्यास लेने का विधान बताया गया है -...... तदु तथा न कुर्यात्। आग्नेयीमेव कुर्यात्। अग्निहिं वै प्राणः' (जाबालो० ४.२) अर्थात् आहिताग्नि यदि संन्यास ले, तो उसे आग्नेयी इष्टि ही करनी चाहिए; क्योंकि अग्नि ही प्राण है। इस इष्टि से प्राण को वृद्धि होती है। कुछ विद्वानों का मत है कि संन्यास धारण करने के पूर्व द्विज (चाहे वह गृहस्थ हो या वानस्थ) को चाहिए कि वह सर्वस्व दक्षिणा देकर प्रजापति का यज्ञ (प्राजापत्य यज्ञ) करे अर्थात् इस इष्टि. के अधिष्ठाता प्रजापति के लिए पुरोडाशपूर्वक आहुतियाँ समर्पित करके प्राजापत्य इष्टि करे तथा अग्नियों (ज्ञानाग्नि) को अपने आत्मा में स्थापित करे। याज्ञवल्क्य स्मृति में इस तथ्य का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-वनाद् गृहाद्वा कृत्वेष्टिं सर्ववेद सदक्षिणाम्। प्राजापत्यां तदन्ते तानग्नीनारोप्य चात्मनि (याज्ञ० स्मृ० ३.५६)। प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् पृ० ४५०७ में प्राजापत्य इष्टि को सर्ववेद दक्षिणा कोटि की इष्टि विवेचित करते हुए ग्रन्थकार ने उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि की है-"प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेद सदक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् ।।' पाठ भेद से यह श्लोक शंख स्मृति ७.१ में भी मिलता है। जाबालोपनिषद् में भी कुछ आचार्यों का मन्तव्य विवेचित है कि वे संन्यास धारण करते समय आग्नेयी इष्टि के स्थान पर प्राजापत्य इष्टि करते हैं-'..........केचन आचार्याः प्रजापतिदेवताकां प्राजापत्यामेवेष्टिं कुर्वन्ति ....... (जाबालो० ४.२ टीका)।' प्राजापत्य इष्टि के पुरोडाश के सम्बन्ध में कपाल संख्या का विवरण प्राप्त नहीं होता। त्रैधातवी इष्टि काम्य इष्टि है, जिसका अनुष्ठान गवामयन सत्र (जिसका दूसरा नाम संवत्सर सत्र है), जो एक वर्ष तक होता है, के अन्त में किया जाता है। इसके प्रमुख देव इन्द्र और विष्णु हैं; क्योंकि वृत्र से युद्ध करके इन्होंने वीर्यरूप यजु, ऋक् और सामवेद प्राप्त किये थे। इन्हीं तीनों वेदों (त्रिधातु वाली विद्या) से क्रमशः इष्टि करते हैं, इसीलिए इसे त्रैधातवी इष्टि कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण में इसका वर्णन इन शब्दों में मिलता है-तमनुपरामृश्य संलुप्याच्छिन्नत्सैषेष्टिरभवत्तद्यदेतस्मिन्नाशये त्रिधातुरिवैषा विद्याऽऽशेत तस्मात्त्रैधातवी नाम (शत० ब्रा० ५.५.५.६)। जाबालोपनिषद् में भी त्रैधातवी इष्टि का उल्लेख मिलता है; किन्तु वहाँ इसे त्रैधातवी इसलिए माना गया है कि इसमें प्रयुक्त अग्नि तीन रूप शुक्ल, रोहित (लोहित) और कृष्ण वर्ण वाली होती है, जो क्रमशः तीन धातुओं सत, रज और तम से युक्त होती है-.........ततस्त्रैधातवीयामेवेन्द्रदेवता .............कुर्यात्। तत्रोपपत्तिः। एतयैवेश्च्या त्रयो धातवो यदुताग्नेयं रूपत्रयं सत्त्वं शुक्लं रजो रोहितं तमः कृष्णम् (जाबालो० ४.२ टीका)। इस इष्टि में बारह कपाल हवि विशेष से (त्रैधातवी इष्टि के लिए चावल और जौ से निर्मित की जाती है) यजन किया जाता है; क्योंकि यह वर्षभर (बारह महीने) की इष्टि होती है। कात्यायन श्रौत सूत्र में इसे उदवसानीया इष्टि भी कहा गया है-'त्रैधातव्युदवसानीया सर्वत्र' (का०श्रौ०सू० १३.४.७)। ४१. आत्मज्ञान - द्र०-ज्ञानखण्ड-आत्मा-जीवात्मा। ४२. आत्मतत्त्व - द्र०- ज्ञानखण्ड-आत्मा-जीवात्मा। ४३. आत्मविद्या - द्र०- ज्ञानखण्ड- श्रेय-प्रेय मार्ग, आत्मा-जीवात्मा। ४४. आत्मश्राद्ध - स्वर्गस्थ देवों, ऋषियों, देवमानवों आदि की आत्माओं की शान्ति के लिए श्राद्ध कर्म का विधान है। श्राद्ध प्रायः आठ प्रकार के होते हैं-देवश्राद्ध, ऋषिश्राद्ध, दिव्यश्राद्ध, मनुष्यश्राद्ध, भूतश्राद्ध, पितृश्राद्ध, मातृश्राद्ध और आत्मश्राद्ध। जब व्यक्ति अपनी आत्मा की शान्ति के लिए स्वयं श्राद्ध करे, तो उसे आत्मश्राद्ध कहा जाता है। जब कोई क्रमिक अथवा आतुर संन्यास धारण करता है, तो वह प्रायश्चित स्वरूप कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रत सम्पन्न करके अष्ट श्राद्ध करता है, जिसके अन्तर्गत आत्मश्राद्ध में अपना, पिता का और पितामह का श्राद्ध किया जाता है; परन्तु पिता जीवित हों, तो उनका श्राद्ध न करके अपना, पितामह का और प्रपितामह का श्राद्ध किया जाता है। नारद परिव्राजकोपनिषद् में इसका उल्लेख इन शब्दों में संप्राप्य है- प्रथमं ......आत्मश्राद्धे आत्मपितृ पितामहान् जीवत्पितृ कश्चेत्पितरं त्यक्त्वा आत्मपितामहप्रपितामहानिति (ना० परि० ४.३७)। ४५. आत्म साक्षात्कार - द्र०-ज्ञानखण्ड-साक्षात्कार।