भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 347

परिशिष्ट ३५५ आसन ४६. आत्मा - द्र०- ज्ञानखण्ड -आत्मा-जीवात्मा। ४७. आत्मा-परमात्मा - द्र०-ज्ञानखण्ड -आत्मा-जीवात्मा। ४८. आनन्द-द्र०- ज्ञानखण्ड -आनन्द-परमानन्द । ४९. आपः- द्र०- ज्ञानखण्ड। ५०. आवागमन - द्र०-ज्ञानखण्ड -आवागमन चक्र। ५१. आसन- हठ योग के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की मुद्राओं, बन्ध तथा आसनों द्वारा यौगिक क्रियाएँ सम्पन्न की जाती हैं, जिनके द्वारा नस-नाड़ियों का शोधन करके शरीर को स्वस्थ, चित्त को प्रसन्न और एकाग्र किया जाता है। पातञ्जल योग में 'आसन' इन शब्दों में परिभाषित है- 'स्थिरसुखमासनम् (पातं०यो० सा० पा० सूत्र-४६)' अर्थात् जो स्थिर और सुखदायी हो, वही आसन है। जिस प्रकार स्थिर होकर, अविचल होकर, कष्ट रहित होकर, सुखपूर्वक लम्बे समय तक बैठा जा सके, वह आसन है। स्थिति के अनुरूप विभिन्न साधकों के लिए पृथक्-पृथक् आसन ग्रहणीय होते हैं। वैसे तो विभिन्न प्रकार के आसनों का वर्णन पृथक्-पृथक् ग्रन्थों में मिलता है; किन्तु नौ प्रकार के आसन ही प्रमुख हैं। जो इस प्रकार हैं-स्वस्तिकं गोमुखं पद्मं वीरंसिंहासने तथा। भद्रं मुक्तासनं चैव मयूरासनमेव च॥ सुखासनसमाख्यं च नवमं मुनिपुङ्गव (जां०दर्शनो० ३.१-२) अर्थात् स्वस्तिक, गोमुख, पद्म, वीर, सिंह, भद्र, मुक्त, मयूर और सुख ये नौ प्रकार के आसन हैं। क. स्वस्तिकासन - स्वस्तिक आसन का वर्णन करते हुए उपनिषदकार ने लिखा है- जानूर्वोरन्तरे कृत्वा सम्यक् पादतले उभे। समग्रीवशिरःकायः स्वस्तिकं नित्यमभ्यसेत् (जा०दर्शनो० ३.२) अर्थात् जिसमें घुटनों और जंघाओं के बीच दोनों पैरों को सम्यक् प्रकार से रखकर ग्रीवा, मस्तक और शरीर को समान भाव से धारण कर (अथवा एक सीध में रखकर) अभ्यास किया जाता है, वह स्वस्तिकासन कहलाता है। ख. गोमुखासन- गोमुख आसन की स्थिति इस प्रकार वर्णित है- सव्ये दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठपार्श्वे नियोजयेत्। दक्षिणेऽपि तथा सव्यं गोमुखं तत्प्रचक्षते (जा० दर्शनो० ३.३) अर्थात् दाहिने पैर के गुल्फ (टखने) को बायीं ओर के पृष्ठ पार्श्व (नितम्ब) के नीचे ले जाये और बायें पैर के गुल्फ को दायीं ओर के पृष्ठ पार्श्व के नीचे ले जाकर बैठे-यह गोमुखासन कहलाता है। कुछ ग्रन्थों में गोमुखासन में उपर्युक्त स्थिति के अतिरिक्त दायें हाथ को सिर को तरफ से तथा बायें हाथ को नीचे होकर पीठ पर ले जाकर दायें हाथ की तर्जनी अँगुली से बायें हाथ की तर्जनी अँगुली को मजबूती से पकड़ने का भी उल्लेख मिलता है। ग. पद्मासन- जाबालदर्शन उपनिषद् ३.४-५ में पद्मासन इस प्रकार परिभाषित है-अङ्गुष्ठावधि गृह्णीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण तु ।। ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्र कृत्वा पादतलद्वयम्। पद्मासनं भवेत्प्राज्ञ सर्वरोगभयापहम् अर्थात् जंघाओं के ऊपर दोनों पाद तलों को स्थिर करके(रखकर)दोनों हाथों से (पीछे होकर) पैरों के अँगूठों को पकड़कर स्थिरता से बैठना पद्मासन कहलाता है। कुछ ग्रन्थों में इस स्थिति में दृष्टि को नासाग्र पर स्थिर रखना तथा चिबुक (ठोड़ी) को हृदय के पास सटाकर रखने का भी उल्लेख मिलता है। यह आसन समस्त रोगों के भय से मुक्ति दिलाने वाला है। घ. वीरासन- वीरासन की स्थिति इस प्रकार है-दक्षिणेतरपादं तु दक्षिणोरुणि विन्यसेत्। ऋजुकायः समासीनो वीरासनमुदाहृतम् (जा० दर्शनो० ३.६)। जाबालदर्शन उपनिषद् में वीरासन की स्थिति संक्षेप में वर्णित है; किन्तु हठयोग प्रदीपिका में इसका उल्लेख अधिक स्पष्ट है- यथा-एकं पादं तथैकस्मिन्विन्यसेदूरुणि स्थितम्। इतरस्मिंस्तथा चोरुं वीरासनमितीरितम् (हठ०प्र० १.२१) अर्थात् दक्षिण पाद वाम ऊरु पर और वाम पाद दक्षिण ऊरु (जंघा) पर रखकर शरीर को सीधा रखने से वीरासन की स्थिति बनती है। ङ. सिंहासन - सिंहासन का स्वरूप इस प्रकार है-गुल्फौ च वृषणस्याधः सीविन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत्। दक्षिणं सव्यगुल्फेन दक्षिणेन तथेतरत् ॥ हस्तौ जानौ ...............योगिभिः सदा (जा० दर्शनो० ३.६.१-३) अर्थात् दक्षिण टखने (गुल्फ) को बायीं ओर वृषण के नीचे सीवन के बगल में रखे, इसी प्रकार बायें टखने को दायीं ओर वृषण के नीचे सीवन के बगल में रखे, तत्पश्चात् दोनों हाथों को दोनों घुटनों पर जमाकर तथा अँगुलियाँ फैलाकर मुख को भी खोलकर फैलाए तथा दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर केन्द्रित करे। यह सिंह नामक आसन सदैव योगियों द्वारा पूजित है। कुछ ग्रन्थों में उपर्युक्त स्थिति में जीभ को बाहर निकाल कर ठोड़ी पर लगाने तथा सिंह को तरह आवाज निकालने का भी उल्लेख प्राप्त होता है।