१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआस्तिकता ३५६ परिशिष्ट
च. भद्रासन— भद्रासन इस प्रकार है-गुल्फौ तु वृषणस्याधः सीविन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत्। पार्श्वपादौ च पाणिभ्यां दृढं बद्ध्वा सुनिश्चलम्॥ भद्रासनं भवेदेतद्विषरोगविनाशनम् (जा०दर्शनो० ३.७) अर्थात् इस आसन में दोनों पैरों के गुल्फों (टखनों) को वृषण के नीचे सीवन के दोनों पार्श्व भागों में इस प्रकार रखा जाता है कि बायाँ टखना सीवन के वाम पार्श्व में और दायाँ टखना सीवन के दक्षिण पार्श्व भाग में स्थिर हो जाए। इसके बाद सीवन के पार्श्व भागों में स्थित पैरों का हाथों द्वारा दृढ़तापूर्वक पकड़कर स्थिर हुआ जाता है। भद्रासन विष से उत्पन्न रोगों का विनाशक है। छ. मुक्तासन— मुक्तासन की स्थिति इस प्रकार है-निपीड्य सीविनीं सूक्ष्मां दक्षिणेतरगुल्फतः। वामं याम्येन गुल्फेन मुक्तासनमिदं भवेत् (जा०दर्शनो०३.८-९) अर्थात् सीवन को सूक्ष्म रेखा को बायें टखने से दबाकर, बायें टखने को दायें टखने से दबाकर बैठने की स्थिति मुक्तासन कहलाती है। इसकी दूसरी विधि इस प्रकार बतायी गई है-मेढ्रादुपरि निक्षिप्य सव्यं गुल्फं ततोपरि। गुल्फान्तरं च संक्षिप्य मुक्तासनमिदं मुने (जा० दर्शनो० ३.९) अर्थात् उपस्थ (लिङ्ग) के ऊपर बायें टखने को स्थिर करके, बायें टखने पर दायें टखने को स्थिर करके बैठने की स्थिति भी मुक्तासन कहलाती है। ज. मयूरासन—मयूरासन की परिभाषा इस प्रकार विवेचित है-कूर्पराग्रं मुनिश्रेष्ठ निक्षिपेत्राभिपाश्वयोः॥ भूम्यां पाणितलद्वन्द्वं निक्षिप्यैकाग्रमानसः। समुन्नताशिरः पादो दण्डवद्व्योम्नि संस्थितः॥ मयूरासनमेतत्स्या-त्सर्वपापप्रणाशनम् (जा० दर्शनो० ३.१०-१२) अर्थात् दोनों हथेलियों को भूमि पर टिकाकर, कोहनियों के आगे के भाग को नाभि के दोनों पाश्वों में स्पर्श करके स्थिर चित्त होकर सिर और पादों को ऊँचा करके आकाश में दण्डवत् (पृथिवी के समानान्तर) होकर स्थित हो जाये। यह मयूर नामक आसन समस्त पापों का विनाश करने वाला है। झ. सुखासन— सुखासन का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है-येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते॥ तत्सुखासनमित्यु- क्तमशक्तस्तत्समाश्रयेत् (जा० दर्शनो० ३.१२-१३) अर्थात् जिस प्रकार भी बैठने से सुख और धैर्य बना रहे, वही सुखासन कहलाता है। अशक्त साधकों को इसी आसन का आश्रय लेना चाहिए। ञ. सिद्धासन— उपर्युक्त नौ आसनों के अतिरिक्त एक अन्य आसन 'सिद्धासन' भी प्रचलित है। उसकी स्थिति इस प्रकार वर्णित है-बायें पैर की एड़ी को सीवन के मध्य में मजबूती पूर्वक इस प्रकार स्थिर करके कि उसका तलवा दायें पैर की ऊरु (जंघा) को छूता हुआ हो। इसी प्रकार दायें पैर को लिङ्ग की जड़ के ऊपर इस तरह स्थापित करे कि उसका तलवा बायें पैर को जंघा का स्पर्श करे। तदुपरान्त बायें पैर के अँगुठे और तर्जनी को दायें पैर की जंघा और पिण्डली के बीच में ले ले तथा इसी तरह दायें पैर के अँगुठे और तर्जनी को बायें पैर को जंघा और पिण्डली के बीच में ले ले, यह सिद्धासन कहलाता है। कुछ ग्रन्थों में इस स्थिति में ठोड़ी को हृदय के समीप रखकर दृष्टि को भृकुटि के मध्य में स्थिर करने का वर्णन भी मिलता है। यह आसन मोक्ष कपाट का भेदन करने वाला कहा गया है-योनिस्यानकमंघ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेन्मेढे पादमथैकमेव हृदये कृत्वा हनुं सुस्थिरम्॥ ......सिद्धासनं प्रोच्यते (हठ० प्र० १.३५)। ५२. आस्तिकता - द्र०-ज्ञानखण्ड। ५३. आहवनीय — वैदिक ग्रन्थों में अग्नियों के अनेक प्रकार वर्णित हैं। जैसे-आहवनीय अग्नि, गार्हपत्य अग्नि और दक्षिणाग्नि आदि। अथर्ववेद ९.७.१३ में इन तीनों अग्नियों की संक्षिप्त परिभाषा इस प्रकार दी गई है- योऽतिथीनां स आहवनीयो यो वेश्मनि स गार्हपत्यो यस्मिन् पचन्ति स दक्षिणाग्निः अर्थात् जिस अग्नि से अतिथियों (देवों) का आवाहन किया जाता है, वह आहवनीय, गृहस्थित अग्नि गृहपति तथा अन्नपाचन करने वाली अग्नि को दक्षिणाग्नि कहते हैं। इन्हें श्रौत अग्नियां भी कहते हैं। महाराज मनु ने गार्हपत्य अग्नि को पिता, दक्षिणाग्नि को माता तथा आहवनीयाग्नि को गुरु की संज्ञा प्रदान की है-'पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः। गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी' (मनु० २.२३१)। कात्यायन यज्ञ पद्धति विमर्श में पारिभाषिक शब्दकोश के अन्तर्गत आहवनीय कुण्ड का भी नाम है। जिसमें आहवनीयाग्नि द्वारा देवों का आवाहन किया जाता है, उसे आहवनीय खर (कुण्ड) कहते हैं, जिसका स्थान यज्ञशाला में पूर्व की ओर होता है- आहूयन्तेऽस्मिन्नाहुतयइत्याहवनीयः। गार्हपत्याग्नि का स्वरूप सात्विक है, यज्ञशाला में गार्हपत्य खर (कुण्ड) का स्थान पश्चिम की ओर होता है। दक्षिणाग्नि का स्वरूप रजोगुणी है, यज्ञशाला में इसका स्थान दक्षिण की ओर होता है। कठरुद्रोपनिषद् में भी आहवनीय, दक्षिणाग्नि और गार्हपत्य अग्नियों का उल्लेख हुआ है- ......गार्हपत्यदक्षिणा- ग्न्याहवनीयेषु अरण्यिदेशाद्भस्ममुष्टिं पिबेदित्येके (कठरुद्रो० ३)। आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और सभ्य-ये श्रौत अग्नियों तथा आवसथ्य अग्नि स्मार्त कही जाती है।