भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३५७ उपरति ५४. इड़ा — द्र०-ज्ञानखण्ड-सुषुम्ना नाड़ी। ५५. इन्द्रयोनि-वेदयेानि —द्र०-कपालाष्टक। ५६. इन्द्रियाँ — द्र०-ज्ञानखण्ड- अन्तःकरण चतुष्टय। ५७. इष्ट— भारतीय धर्म ग्रन्थों में इष्ट एक बहुप्रचलित शब्द है। जिसका सामान्य अर्थ है-अभिलषित, चाहा हुआ अथवा वाञ्छनीय। वाचस्पत्यम् पृ० १९० में इष्ट की व्युत्पत्ति इस प्रकार विवेचित है- इष्ट त्रि० इष कर्मणि क्त। अभिलषिते, प्रिये ........। यज्ञ, संस्कार तथा एरण्ड वृक्ष आदि शब्दों के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है। अपने पूजित देव के लिए भी इष्ट शब्द प्रयुक्त होता है। जैसे-किसी के इष्ट देव हनुमान् जी हैं, तो किसी के गणपति और किसी के राम और कृष्ण। इच्छा के विषय में भी इस शब्द का प्रयोग कई जगह होता है, जैसे- सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् (गी०-३.१०)। ५८. ईशान—द्र०- त्र्यम्बक। ५९. ईश्वर पूजन—द्र०- नियम। ६०. उञ्छवृत्ति — द्र०- गृहस्थ। ६१. उड़्डियान बन्ध—द्र०- बन्ध। ६२. उत्तरायण — ज्योतिर्विदों ने सम्पूर्ण आकाश मण्डल को दो भागों में विभक्त किया है- १. विषुवत् (मध्य) रेखा का उत्तरीभाग, २. विषुवत् रेखा का दक्षिणी भाग। सूर्य वर्षभर में छः माह उत्तरी भाग और छः माह दक्षिणी भाग में दृश्यमान होता है। जब सूर्य मकर रेखा से उत्तर (कर्क रेखा) की ओर जाता है, तो उसे उत्तरायण कहा जाता है तथा जब सूर्य कर्क रेखा से दक्षिण (मकर रेखा) की ओर जाता है, तो उसे दक्षिणायन कहा जाता है। यह ६-६ मास का समय होता है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार-भानोर्मकरसंक्रान्तेः षण्मासा उत्तरायणम्। सूर्य मकर संक्रान्ति से छः मास तक उत्तर की ओर रहता है, इस काल को उत्तरायण कहा जाता है। उत्तरायण में शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतुएँ परिगणित की जाती हैं। “शिशिरश्च वसन्तोऽपि ग्रीष्मः स्यादुत्तरायणे' (हारीत)। ६३. उदुम्बर—द्र०-वानप्रस्थ। ६४. उन्मनी अवस्था—द्र० - अमनस्क स्थिति। ६५. उन्मनी भाव—द्र०- अमनस्क स्थिति। ६६. उपदेष्टा — सामान्यतः उपदेष्टा धर्म का उपदेश करने वाले को कहते हैं, इसीलिए इसके लिए धर्मोपदेशक या उपदेशक शब्द भी प्रयुक्त होता है। वाचस्पत्यम् के अनुसार उपदेष्टा शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- उपदेष्टृ-पु० उप+दिश-तृच्। १. गुरौ कर्मोपदेशके २. आचार्ये अर्थात् कर्मोपदेशक और गुरु तथा आचार्य के अर्थ में उपदेष्टा शब्द का प्रयोग किया जाता है। आचार्य के अर्थ में ऋत्विजों को भी परिगणित किया गया है; क्योंकि वे यज्ञादि कर्मों में प्रत्यक्ष मार्गदर्शन (उपदेश) देते हैं। शास्त्र मान्यता है कि आचार्यों, ऋत्विजों के रूप में स्वयं भगवान् हरि ही कर्म का उपदेश प्रदान करते हैं- चत्वारो वयमृत्विजः स भगवान् कर्मोपदेष्टा हरिः" वेणी० (वाच०पृ० १२११)। भारतीय संस्कृति में उपदेष्टा की बहुत महत्ता है; क्योंकि वह जो कुछ उपदेश करता है, उसे पहले अपने जीवन में उतारता है, इसलिए वह आचरणीय होता है। इसी कारण उपदेष्टा का दूसरा नाम आचार्य है। वैसे तो गुरु को गोविन्द (ब्रह्म) से भी बड़ा बताया गया है तथा प्रणाम-अभिवादन के क्रम में गोविन्द से पहले गुरु को प्रणाम करने का परामर्श दिया गया है- गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय (कबीर); किन्तु उपदेशक की अर्चना गुरु से भी पूर्व करने का शास्त्रीय विधान मिलता है- तस्योपदेष्टारमपि पूजयेच्च ततो गुरुम् (वाच०पृ० १२११)। ६७. उपनयन—द्र०-अनुपवीत। ६८. उपरति — जीवन के चार लक्ष्यों में मोक्ष प्राप्ति अन्तिम लक्ष्य है। इसकी प्राप्ति के लिए साधक को षट्सम्पत्तियों का आश्रय लेना पड़ता है। ये षट्सम्पत्तियाँ- शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान कहलाती हैं। इनमें उपरति का

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