भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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उपराम ३५८ परिशिष्ट

बहुत महत्त्व है। प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् के अनुसार 'उपरति' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- उप+रम+क्तिन्। जिसके कई अर्थ होते हैं, जैसे-विरति (विरक्ति), मृत्यु, प्राप्त विषयों के प्रति इन्द्रियों की उदासीनता तथा विहित कर्म विधान का संन्यास की स्थिति में परित्याग (विहित कर्मणाम् विधानतस्त्यागरूपे संन्यासे "पुमर्थः कर्मणा नेति धीर्या सोपरतिर्भवेत्"-वाच०पृ० १२८३); किन्तु विषयों से वैराग्य या उनके प्रति उदासीनता के भावार्थ में ही उपरति का अधिक प्रचलन है। अध्यात्मोपनिषद् मंत्र २८ में उपरति का उल्लेख इस रूप में आया है- वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम् । स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम् (अध्यात्मो० २८) अर्थात् वैराग्य का प्रतिफल बोध (आत्मज्ञान) है और बोध (ज्ञान) का फल उपरति अर्थात् विषयों से विरक्ति है। (उपरति के फलस्वरूप) आत्मानन्द से जो शान्ति प्राप्त होती है, वह उस उपरति का ही फल है। अतः आसक्ति ही अशान्ति और उपरति ही शान्ति का कारण है। उपरति धारण करने वाले साधक को उपराम कहते हैं। ६९. उपराम - द्र०-उपरति। ७०. उपवीत - द्र०-अनुपवीत । ७१. उपाधि - द्र०-ज्ञानखण्ड । ७२. ऊर्ध्वपुण्ड्र - द्र०-त्रिदण्ड-त्रिपुण्ड्र। ७३. ऊर्ध्वरेता - ऊर्ध्वरेता शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-ऊर्ध्वमूर्ध्वंगं नाधः पतत् रेतो यस्य अर्थात् जिसका रेतस् (वीर्य) अधोगामी न होकर ऊर्ध्वगामी हो गया हो, उसे ऊर्ध्वरेता कहा जाता है। रेतस्, पौरुष का प्रतीक है। अधिकांश लोगों का रेतस् अधोगामी होता है; किन्तु जिसके वीर्य को गति नीचे को ओर जाने से रुककर ऊर्ध्वगामी हो जाती है, वह ऊर्ध्वरेता कहलाता है-रेतो हि पुंचिह्नेन प्रायः सर्वेषामधो गच्छति यस्तस्य अधोगतिं संरुणद्धि स ऊर्ध्वरेता इत्युच्यते (वाच० पृ० १३९२)। इसलिए अखण्ड ब्रह्मचारी को भी ऊर्ध्वरेता कहा जाता है। जैसे- भीष्म, हनुमान्, सनकादिमुनि, भगवान् महादेव आदि। भीष्म (देवव्रत) ने अपने पिता शान्तनु के अभीष्ट विवाह के लिए स्वयं विवाह नहीं किया। अतः वे आजीवन ब्रह्मचारी रहने के कारण ऊर्ध्वरेता नाम से प्रख्यात हो गये। शंकर का भी एक नाम ऊर्ध्वरेता है- ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशायी नभस्थलः (वाच० १३९२)। जाबाल दर्शनोपनिषद् के नवें खण्ड में भी भगवान् शंकर की स्तुति में ऊर्ध्वरेता शब्द आया है-ऊर्ध्वरेतं विश्वरूपं विरूपाक्षं महेश्वरम्। सोऽहमित्यादरेणैव ध्यायेद्योगीश्वरेश्वरम् (जा० दर्शनो० ९.२)। इस प्रकार शास्त्रों में ऊर्ध्वरेता की बहुत महिमा गायी गई है; क्योंकि अधोगामी रेतस् जहाँ कुछ ही सृजनात्मक कार्य कर पाता है, वही ऊर्ध्वगामी रेतस् से चित्त के एकाग्र होने, चिन्तन परिष्कृत होने से लेकर विभिन्न महत्त्वपूर्ण ऋद्धियों-सिद्धियों का स्वामी बना देता है। हनुमान् जैसे भक्त इसी शक्ति के सहारे 'अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता' बन गये थे। ७४. ऋचा - ऋचा शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- ऋच्यते स्तूयतेऽनया (वाच०) अर्थात् जिससे देवों की स्तुति या अर्चना की जाती है, वह ऋचा है। सामान्य रूप से ऋचा का अर्थ स्तुति या पूजा से लिया जाता है। वैदिक मंत्रों के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है; किन्तु विशेष रूप से ऋग्वेद के मंत्रों को ऋचा कहा जाता है। डॉ० राजबली पाण्डेय ने भी हिन्दू धर्मकोश में लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में देवताओं के सम्मानार्थ उनकी जो स्तुति को जाती थी, उन्हें ऋक् या ऋचा कहते थे। ऋग्वेद ऐसी ही ऋचाओं का संग्रह है, इसीलिए उसका नाम ऋग्वेद पड़ा। ७५. ऋत - द्र०-ज्ञानखण्ड-ऋत-सत्य। ७६. ऋत्विक् - द्र०-ज्ञानखण्ड- ऋत्विज्। ७७. ऋषि-द्र०-ज्ञानखण्ड । ७८. एकत्व-द्र०-ज्ञानखण्ड-एकत्व-ऐक्य। ७९. एषणात्रय - द्र०-ज्ञानखण्ड । ८०. ओंकार - द्र०-ज्ञानखण्ड । ८१. कपालाष्टक - प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में योग विषयक विवेचन में कपालाष्टक शब्द का उल्लेख मिलता है। योग के आठ अंग बताये गये हैं। इन्हीं आठ अङ्गों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) को