भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३५९ कला कपालाष्टक भी कहते हैं। कपालाष्टक की व्याख्या करते हुए उपनिषद् व्याख्याकार ब्रह्मयोगी ने लिखा है-'कं परमसुखमसुखकामादिवृत्तिभ्यः पृथक् कृत्य पालयन्तीति कपालानि योगाङ्गानि (परब्रह्मो० २ टीका) अर्थात् 'क' से तात्पर्य परमसुख प्रदाता और कामादिवृत्तियों से उत्पन्न होने वाले असुख (कष्ट) को पृथक् करके पाल अर्थात् साधक का पालन-पोषण करने वाले कृत्य कपाल (योगाङ्ग) कहलाते हैं। इनके अष्टक की ही कपालाष्टक कहते हैं, जो कि योगदर्शन में आसन-प्राणायाम आदि आठ अङ्ग प्रख्यात हैं-तेषामष्टकं यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहा- रधारणाध्यानसमाध्यात्मकं कपालाष्टकमष्टाङ्गयोगमनुसन्धाय यथावदभ्यस्य तद्बलेन चित्तगतमालिन्यं संक्षाल्य निर्विशेषज्ञानमवाप्य कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः (परब्रह्मो० २ टीका) अर्थात् यम नियमादि अष्टाङ्ग योग अथवा कपालाष्टक का यथावत् अभ्यास करने से उत्पन्न ऊर्जा द्वारा चित्तगत मलिनता धुल जाती है, जिससे साधक निर्विशेष ज्ञान को प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाता है। इसी प्रक्रिया (कपालाष्टक-अष्टांगयोग) द्वारा हृदय स्थल में जो स्तन या कदली पुष्पवत् लटका रहता है और योग के समय ऊपर उठता हुआ विकसित होता है। इसी में वह ईश्वर जाग्रत् रहता है। इस प्रकार अपने हृदय कमल में ध्यान करने वाला शुभाशुभ से परे होकर कर्मों से निर्लिप्त हो जाता है-तदैवं कपालाष्टकं संधाय य एव स्तन इवावलम्बते। सेन्द्रयोनिः वेदयानिरिति। ......कर्मभिर्न लिप्यते (परब्रह्मो० २)। ८२. कर्मफल - द्र० - ज्ञानखण्ड। ८३. कर्म संन्यासी-द्र- अवधूत । ८४. कर्मेन्द्रियाँ- द्र०- ज्ञानखण्ड-अन्तःकरण चतुष्टय। ८५. कला - कला एक व्यापक अर्थवाला तथा बहुप्रचलित शब्द है। वाचस्पत्यम् पृष्ठ १७८३ में कला की व्युत्पत्ति इन शब्दों में विवेचित है-कलयति कलते वा कर्त्तरि अच्, कल्यते ज्ञायते कर्मणि अच् वा अर्थात् जो किसी के कर्म अथवा स्थिति को द्योतित करती है,वह कला है। जैसे चन्द्रमा के सोलहवें भाग की उसकी एक कला कहते हैं- चन्द्रमण्डलस्य षोडशे भागे यथा च चन्द्रस्य षोडशभागस्य कला शब्द वाच्यत्वम् (वाच० पृ०१७८३)। यों तो तिथियाँ पन्द्रह होती हैं; किन्तु प्रतिपदा से चतुर्दशी तक १४ तिथियाँ दोनों पक्षों (शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष) में उभयनिष्ठ हैं। इनमें चन्द्रमा के घटने-बढ़ने की १४ कलाएँ होती हैं। अमावस्या और पूर्णिमा में, एक में चन्द्रमा बिल्कुल नहीं दीखता व दूसरे में पूरा दीखता है, अतः ये भी दो कलाएँ होने से १४+२=१६ कलाएँ कहलाती हैं। चन्द्रमा की सोलह कलाओं के नाम इस प्रकार हैं-अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीतिरङ्गा, पूर्णा तथा स्वरजा। इसी प्रकार सूर्य की भी द्वादश कलाएँ वर्णित हैं। इन्हें द्वादशादित्य भी कहते हैं। सूर्य की कलाएँ इस प्रकार हैं-तपिनी, तापिनी, धूम्रा, मरीचि, ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्ना, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी और क्षमा। वैसे कुल चौंसठ कलाएँ बतायी गई हैं; जो पूर्णतया परब्रह्म में मानी जाती हैं। वैदिक मान्यतानुसार परब्रह्म का त्रिपाद ऊर्ध्वलोकों में और एक पाद (चतुर्थांश) भूलोक (विश्व ब्रह्माण्ड के रूप में) व्याप्त है (त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहा भवत्पुनः - ऋ० १०.९०.४)। इसी कारण भूलोक पर १६ कलाएँ ही विद्यमान हैं और इन्हें 'पूर्ण कला' कहा जाता है। अवतारों के विषय में भी उनकी दस कलाओं, बारह कलाओं, सोलह कलाओं का उल्लेख मिलता है, जो उनकी विशेषताओं, शक्ति व स्थिति का बोध कराती हैं। जैसे राम बारह कला के और कृष्ण सोलह कला के अवतार माने जाते हैं। वस्तुतः जीव मात्र में एक-दो कलाएँ होती हैं और जैसे-जैसे वह अपने को विकसित करता जाता है; वैसे-वैसे उसको कलाएँ भी बढ़ती जाती हैं। जैसे उद्भिज्जों-वृक्ष, लता, गुल्म आदि में एक (अन्नमय) कला होती है अर्थात् ये भोजन ग्रहण करते व विकसित होते हैं; इसी प्रकार स्वेदजों (मक्खी, मच्छर, जूँ, लीख आदि) में दो (अन्नमय व प्राणमय) कलाएँ होती हैं। अण्डजों (कबूतर, चिड़िया, तोता, मयूर आदि) में तीन (अन्नमय, प्राणमय व मनोमय) कलाएँ होती हैं। जरायुजों (घोड़ों, कुत्तों, हाथियों व गाय-भैंस आदि) में चार (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय) कलाएँ होती हैं। मानव श्रेणी उपर्युक्त जीवों के बाद की सृष्टि में गिनी जाती है। मानवों में अन्नमय, प्राणयम, मनोमय, विज्ञानमय के अतिरिक्त आनन्दमय कला भी पायी जाती है। कुछ विशिष्ट मनुष्यों में उपर्युक्त पाँच कलाओं (पंचकोशों) के अतिरिक्त तीन अन्य कलाएँ भी देखी जाती हैं। जो इस प्रकार हैं- १. अतिशायिनी कला २. विपरिणामिनी कला ३. संक्रामिणी कला। प्रथम अतिशायिनी कला के कारण ही आद्यशंकराचार्य ने दस-बारह वर्ष की अवस्था में वह कार्य कर लिया था, जो सामान्य व्यक्ति के लिए कल्पनातीत होते थे। द्वितीय विपरिणामिनी कला के द्वारा साधक अणिमा आदि आठ सिद्धियों के माध्यम से शरीर को हल्का-भारी,