१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकल्पान्त ३६० परिशिष्ट छोटा-बड़ा करके परकाया प्रवेश भी कर सकते हैं। तृतीय संक्रामिणी कला के द्वारा साधक अपनी शक्ति दूसरों में भी प्रविष्ट कर सकते हैं, जैसे रामकृष्ण परमहंस जी ने स्वामी विवेकानन्द में शक्तिपात किया था और योगेश्वर कृष्ण ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। उपर्युक्त कलाएं मानवों तक सीमित हैं, इसके ऊपर की ९ से १६ तक की कलाएँ देवों व अवतारों में होती हैं। पूर्णकलाएँ १६ मानी गई हैं अर्थात् पूर्ण अवतार षोडश कलायुक्त होता है। देवों-अवतारों की ८ कलाएँ इस प्रकार हैं- १. प्रभ्वी २. कुण्ठिनी ३. विकासिनी ४. मर्यादिनी ५. संहादिनी ६. आह्लादिनी ७. परिपूर्ण ८. स्वरूपावस्थिति। इनमें प्रभ्वी का अर्थ ईश्वर की उस परिभाषा से सम्बन्धित है, जिसमे उन्हें 'कर्तुं अकर्तुं अन्यथाकर्तुं समर्थं प्रभु' कहा गया है अर्थात् असम्भव को भी संभव कर दिखाना-जैसे खम्भे में से नृसिंह अवतार। कुण्ठिनी कला से पंचमहाभूत या विषादि को प्रभावरहित किया जा सकता है, जैसे शिव ने विष प्रभाव कम करके ही हलाहल पान किया था। विकासिनी कला के द्वारा ही भगवान् वामन ने तीन पगों में समूचे ब्रह्माण्ड को नाप लिया था। मर्यादिनी कला के द्वारा श्रीराम सर्वशक्ति सम्पन्न होते हुए भी मर्यादाओं में बँधे रहे व मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। संहादिनी कला से भगवान् कृष्ण ने अनृतु में फूल-फल आदि उत्पन्न करके प्रकृति के नियम में हस्तक्षेप कर दिया था। आह्लादिनी कला से ही राधिका ने नित्य कृष्ण जी के साथ रहकर उनका अनुरञ्जन किया था। स्वरूपावस्थिति कला के द्वारा सम्पूर्ण कलाओं की समेट कर अपने मूलरूप में अवस्थित हुआ जा सकता है, जैसे-द्वापर में श्री कृष्ण जी ने अपनी सभी कलाओं को समेटकर मूल रूप में धारण किया था, जिससे उन्हें पूर्ण अवतार माना जाता है। उपर्युक्त कलाओं के अतिरिक्त अन्य भी लौकिक कलाएँ हैं, जैसे-वास्तुकला, चित्रकला, हस्तकला, काष्ठकला, स्थापत्यकला, वक्तृताकला, संगीतकला, नृत्यकला आदि। ८६. कल्पान्त - भारतीय कालगणना के क्रम में 'कल्प' का उल्लेख किया जाता है। यह एक बहुत लम्बी अवधि होती है। सृष्टि का कालचक्र चार युगों में विभक्त है। सतयुग (कृतयुग), त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। इनमें सतयुग की अवधि १७,२८,००० वर्ष, त्रेतायुग की १२,९६,००० वर्ष, द्वापरयुग की ८,६४,००० वर्ष तथा कलियुग की अवधि ४,३२,००० वर्ष मानी गई है। चारों युगों की सम्मिलित अवधि ४३,२०,००० वर्ष की एक चतुर्युगी कहते हैं। इस प्रकार की एक सहस्र चतुर्युगी का ब्रह्माजी का एक दिन और इतनी ही बड़ी एक रात्रि होती है। एक हजार चतुर्युगी अथवा ब्रह्मा का एक दिन 'कल्प' कहलाता है। तदुपरान्त प्रलय की स्थिति आती है, जिसमें सब कुछ विनष्ट हो जाता है। इस अवधि को कल्पान्त कहते हैं। इस प्रकार कल्प का साधारण अर्थ हुआ सृष्टि रचना से लेकर उसके विनाश तक का समय। विद्वानों का कहना है कि अब तक ब्रह्माजी के ५० वर्ष बीत चुके हैं, ५१ वाँ वर्ष चल रहा है, जिसके तीन युग बीत चुके हैं, चौथा चल रहा है। युगों की काल-गणना के अनुसार एक कल्प की अवधि चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष मानी जाती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार कलियुग की आयु १२०० वर्ष, द्वापर २४०० वर्ष, त्रेता की ३६०० वर्ष और सतयुग की आयु ४८०० वर्ष है। इस प्रकार एक चतुर्युगी १२००० वर्षों की हुई तथा ७१ चतुर्युगी का एक मन्वन्तर तथा १४ मन्वन्तरों का एक कल्प होता है। अस्तु, १४ मन्वन्तरों के समापन की अवधि कल्पान्त कहलाती है। ८७. कामना - द्र०-ज्ञानखण्ड-षड्रिपु-षड्वर्ग। ८८. कुटीचक - द्र० - अवधूत। ८९. कुण्डलिनी- भारतीय योग शास्त्रों में कुण्डलिनी महाशक्ति का बहुत महत्त्व है। कहते हैं कि यदि किसी साधक की कुण्डलिनी जाग जाये, तो वह सभी ऋद्धियों-सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। तांत्रिक मतानुसार इसे परमेश्वर की वह पराशक्ति कहा गया है, जो प्रत्येक जीव के शरीर में प्रसुप्तावस्था में रहती है। यह मनुष्य देह में मेरुदण्ड से नीचे मूलाधार (गुदा और उपस्थ के मध्य स्थित चक्र) में कुण्डली मारकर सर्पिणी की तरह स्थित है, इसीलिए इसका नाम कुण्डलिनी पड़ा है। तन्त्रसार में इसे एक देवी माना गया है, जो षट्चक्रों के अन्तर्गत मूलाधार में सूक्ष्म रूप से निवास करती है। कुण्डलिनी के सन्दर्भ में उल्लेख है कि वह स्वयम्भू लिङ्ग में साढ़े तीन चक्कर लगाये देवी रूप (सर्पिणी रूप) में प्रतिष्ठित है। करोड़ों विद्युतप्रभा के प्रकाश की तरह देदीप्यमान तथा उदीयमान सूर्य की कान्ति वाली उस कुण्डलिनी का ध्यान करते हुए साधक दृढ़ासन पर बैठकर श्वासोच्छ्वास प्रक्रिया (प्राणायाम) द्वारा प्राण मन्त्र (गायत्री मन्त्र) से उसे उठाकर (जाग्रत् करके) मन की एकाग्रता तथा सम्पूर्ण शुभ-शान्ति प्राप्त करते हैं-ध्यायेत् कुण्डलिनीं सूक्ष्मां मूलाधारनि- वासिनीम्। तामिष्टदेवतारूपां सार्द्धत्रिवलयान्विताम् ॥ कोटिसौदामिनीभासां स्वयम्भूल्लिङ्गवेष्टिनीम्। तामुत्थाप्य महादेवीं प्राणमन्त्रेण साधकः ॥ उद्यद्दिनकरद्योतां ..... चिन्तयेत् (श०क० खण्ड २, पृ० १४०) !