भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३६१ कैवल्य विवेक मार्तण्ड में कुण्डलिनी शक्ति का स्वरूप इस प्रकार विवेचित है कि वह कुण्डलिनी देदीप्यमान सर्पाकार कमल नाल के समान शुभ प्रतिफल प्रदान करने वाली है, जो योगविद्या के जानकारों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाली तथा इस विद्या से अनभिज्ञ व्यक्तियों के लिए बन्धन का कारण है। मानवी काया में कन्दस्थल (उपस्थ के ऊपर और नाभि से नीचे स्थित नाड़ियों का गुच्छक) के ऊपर अष्टप्रकृति वाली कुण्डलिनी शक्ति वलयाकार में ब्रह्मरंध्र के द्वार को अपने मुख से आच्छादित किए (रोके) हुए प्रसुप्तावस्था में है। साधक हठयोग, प्राण साधना द्वारा उस कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत् करके मानो मोक्ष प्राप्ति के द्वार ब्रह्मरंध्र में लगे ताले को ताली (चाभी) द्वारा खोलता है-प्रस्फुरद् भुजगाकारा पद्मतन्तुनिभा शुभा। मूढानां बन्धिनी सास्ति योगिनां मोक्षदायिनी ॥ कन्दोर्ध्वं कुण्डली शक्तिरष्टधा कुटिलाकृतिः । ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठति ॥ येन मार्गेण .......................मोक्षद्वारं प्रभेदयेत् (वि०मार्त० ५२-५६)। जाबाल दर्शनोपनिषद् में कुण्डलिनी का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है- नाभिकन्दादधः स्थानं कुण्डल्या द्वयङ्गुलं मुने । अष्टप्रकृतिरूपा सा कुण्डली मुनिसत्तम (जा०दर्शनो० ४.११) अर्थात् नाभि स्थल से दो अंगुल नीचे अष्ट प्रकृति (पृथिवी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) से युक्त वह कुण्डलिनी शक्ति निवास करती है। कुण्डलिनी शक्ति के सन्दर्भ में महायोग विज्ञान में उल्लेख है कि जिसकी मूलाधार शक्ति प्रसुप्त है, उसका सारा संसार प्रसुप्त है; जिसकी कुण्डलिनी जगी, समझना चाहिए कि उसका भाग्योदय हो गया है। योगिनी तंत्र के अनुसार कुण्डलिनी के जागते ही अन्तराल में छिपा वैभव अनायास ही दृष्टिगोचर होने लगता है। कुण्डलिनी जाग्रत् कर लेने वाले साधक के लिए जगत् में कुछ भी असंभव नहीं। ९०. कूटस्थ — द्र०-ज्ञानखण्ड। ९१. कृच्छ्र चान्द्रायण — कृच्छ्र शब्द का सामान्य अर्थ कष्टसाध्य या कठिनाई से प्राप्त होने वाला है। शारीरिक तप या प्रायश्चित्त के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है। चन्द्रमा की कलाओं के साथ जो कष्टसाध्य प्रायश्चित्त तप किया जाता है, उसे कृच्छ्र चान्द्रायण कहते हैं। प्रायश्चित्त के अतिरिक्त यह व्रत धर्म संचय के लिए भी किया जाता है। चान्द्रायण व्रत में चन्द्र कलाओं के बढ़ने एवं घटने के अनुरूप भोजन ग्रहण किया जाता है। प्राचीन काल से ही चान्द्रायण व्रत दो प्रकार से किए जाते हैं, यवमध्य (जौ के समान बीच में मोटा एवं दोनों छोरों में पतला) एवं पिपीलिका मध्य (चींटी के समान बीच में पतला एवं दोनों छोरों में मोटा) मनु० (११.२७), याज्ञ० स्मृ० (३.३२३), वसिष्ठ स्मृ० (२७.२१), बौधा० ध०सू०(४.५.१८) आदि में चान्द्रायण व्रत (यवमध्यप्रकार) की परिभाषा इस प्रकार दी है- मास के शुक्ल पक्ष से प्रथम दिन एक ग्रास (कौर) भोजन किया जाता है, दूसरी तिथि को दो ग्रास, तीसरी तिथि को तीन ग्रास और इसी प्रकार बढ़ते-बढ़ते पूर्णिमा के दिन १५ ग्रास भोजन ग्रहण किया जाता है। तत्पश्चात् कृष्ण पक्ष के प्रथम दिन १४ ग्रास, दूसरे दिन १३ ग्रास, इस प्रकार एक-एक ग्रास कम करते-करते कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को एक ग्रास खाया जाता है और अमावस्या के दिन निराहार रहकर पूर्ण उपवास किया जाता है। दूसरी विधि (पिपीलिका मध्य) में यदि कोई कृष्ण पक्ष की प्रथम तिथि को व्रत आरम्भ करता है, तो वह एक- एक ग्रास कम करते हुए प्रथम दिन में केवल १४ ग्रास, फिर १३ ग्रास, फिर बारह ग्रास खाता है, इसी प्रकार ग्रासों में कमी करते हुए कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को केवल एक ग्रास खाता है तथा अमावस्या को एक ग्रास भी नहीं लेता। इसके उपरान्त शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन एक ग्रास लेता है और इस प्रकार बढ़ाता-बढ़ाता पूर्णमासी के दिन १५ ग्रास खाता है। इस प्रकार ये दो प्रकार के कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत होते हैं। कृच्छ्र चान्द्रायण के सन्दर्भ में आश्रमोपनिषद् में संन्यासियों की आचार संहिता के क्रम में हंस (संन्यासियों का एक प्रकार) के विषय में उल्लेख है कि वह एक दण्ड धारण करने वाले, शिखा विहीन, यज्ञोपवीतधारी, हाथ में शिक्य (छींका) और कमण्डलु धारण करने वाले, ग्राम व शहर में निर्धारित रात्रियों तक ही विश्राम करने वाले होते हैं। वे कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रत सम्पन्न करके आत्मा की प्रार्थना अर्थात् आत्म दर्शन का प्रयास करते हैं- हंसा एक दण्डधराः शिखा वर्जिता ... कृच्छ्र चान्द्रायणादि चरन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ४)। ९२. कैवल्य — हिन्दी विश्वकोश में कैवल्य शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार विवेचित है- केवलस्य औपाधिक सुखदुःखादि रहितस्य चित्स्वरूपस्य भावः अर्थात् उपाधि रूप सुख-दुःख रहित चैतन्य स्वरूप स्थिति कैवल्य है। जब व्यक्ति को विवेक का साक्षात्कार हो जाता है, तो अहंकार स्वतः ही मिट जाता है। फिर ऐसा नहीं लगता कि मैं कर्त्ता, सुखी व दुःखी हूँ। अहंकार विनष्ट हो जाने पर उसके कार्यरूप राग-द्वेष, धर्म और अधर्म आदि भी उत्पन्न नहीं हो सकते। प्रारब्ध कर्म धीरे-धीरे मिट जाते हैं और अविद्या न रहने से फिर नया संस्कार नहीं बनता तथा संस्कार के अभाव में पुनर्जन्म नहीं