भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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क्षेत्रपाल ३६२ परिशिष्ट होता। वर्तमान शरीर का अवसान होने पर आत्मा चित् स्वरूप में अवस्थित हो जाती है। इसी अवस्था को कैवल्य कहते हैं। पातञ्जल योग सूत्र के अनुसार पुरुषार्थ से शून्य हुए गुण, जब अपने कारण में विलीन हो जाते हैं, तब उस स्थिति को कैवल्य कहते हैं अथवा चिति-शक्ति का अपने वास्तविक स्वरूप (चैतन्य स्वरूप) में प्रतिष्ठित हो जाना ही कैवल्य है। व्यक्ति त्रिगुणातीत हो जाता है, उसकी यही स्थिति कैवल्य है- पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति (पातं० यो० सू० ४/३४)। सांख्य दर्शन के अनुसार दुःख की ऐकान्तिक और आत्यन्तिक निवृत्ति ही कैवल्य है- आत्यन्तिको दुःख त्रयाभावः कैवल्यम्। हिन्दी विश्वकोश में वर्णित जैन मान्यता के अनुसार कैवल्य अवस्था मुक्ति से पूर्व होती है। ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय-ये चार कर्म विनष्ट हो जाने पर आत्मा का 'केवल' (विशुद्ध) ज्ञान प्राप्त होता है, तब समस्त पदार्थों के सभी पर्यायों को यह जीव जान जाता है (तत्त्वार्थ सूत्र टीका)। अध्यात्मोपनिषद् (१६) में कैवल्यावस्था इन शब्दों में निरूपित है- जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहोऽपि स केवलः। समाधिनिष्ठतामेत्य निर्विकल्पो भवानघ अर्थात् जो जीवित स्थिति में ही कैवल्य-स्थिति (ब्रह्मनिष्ठा) प्राप्त कर चुका हो, वह विदेह (देहरहित) हो जाने पर ब्रह्मरूप हो जायेगा। इसलिए हे पापरहित ! समाधिनिष्ठ होकर निर्विकल्प बनो। इस प्रकार जीवित रहते हुए समस्त संकल्प-विकल्पों एवं गुणों से रहित होकर केवल ब्रह्म में ही समाहित हो जाना (ब्रह्मनिष्ठ हो जाना) कैवल्यावस्था को प्राप्त कर लेना है। ९३. क्षेत्रपाल— तैंतीस कोटि देवों में क्षेत्रपाल देवता को भी परिगणित किया जाता है। सामान्यतः क्षेत्रपाल से तात्पर्य क्षेत्ररक्षक अथवा खेत का रखवाला होता है- क्षेत्रं पालयति रक्षति (हि०वि०को० खंड ५ पृ० ६२५)। प्रयोग सार में क्षेत्रपाल के ४९ भेद वर्णित हैं। जैसे-अजर, आपकुन्त, इन्द्रस्तुति, ईड़ाचार, उक्त, उन्माद और ऋषिसूदन आदि। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार-'क्षेत्रपाल शिव के अनुचर हैं।' कार्तवीर्य को भी क्षेत्रपाल कहते हैं (मत्स्य पु० ४३.२७, वा०पु० ९४.२४)। शास्त्रों में यज्ञादि देव कार्यों में भी यज्ञ की रक्षार्थ क्षेत्रपालों को आबाहित करने का विधान है-क्षेत्रपालाग्नमस्यामि सर्वारिष्टनिवारकान्। अस्य यागस्य सिद्धयर्थं पूजयाराधितान् मया (कर्म०भा०)। क्षेत्रपाल के तीन नेत्रों का उल्लेख मिलता है। इनका वर्ण नीलगिरि की तरह है। उनके मस्तक पर शुभ्र चन्द्र और सिर पर जटायें हैं। इनके चार हाथ हैं, जिनमें गदा, कपाल, रक्तवर्ण की पुष्पमाला और गन्धवस्त्र हैं। उनके कानों में सर्पकुण्डल हैं। क्षेत्रपाल की अर्चना से कान्ति, मेधा, बल, आरोग्य, तेज, पुष्टि, यश और सम्पत्ति आदि की वृद्धि होती है। समस्त प्रमुख पुण्य क्षेत्रों में एक-एक क्षेत्रपाल होते हैं, उनकी विधिवत् पूजा सम्पन्न होती है। कुमायूँ क्षेत्र में क्षेत्रपाल को कहीं भूमिया और कहीं स्वयम्भू कहते हैं। ९४. खेचरी मुद्रा— द्र०-मुद्रा। ९५. गायत्र— द्र०- ब्रह्मचारी। ९६. गार्हपत्य— द्र०- आहवनीय। ९७. गुरु— द्र०- ज्ञानखण्ड- गुरु-शिष्य। ९८. गुरुकुल— द्र०- ज्ञानखण्ड-गुरु-शिष्य। ९९. गृहस्थ— आश्रम धर्म के अनुसार चार आश्रमों में ब्रह्मचर्य के बाद दूसरा आश्रम गृहस्थ कहलाता है। लक्ष्य की दृष्टि से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से इस आश्रम में अर्थ और काम (कामनाओं) की प्राप्ति (पूर्ति) की जाती है। इसे भी २५ वर्ष का माना गया है। इसमें व्यक्ति घर में रहकर पत्नी समेत अपने कुटुम्ब का पालन-पोषण करता है। गरुड़ पुराण के अनुसार परिवार का नियमपूर्वक पालन-पोषण करता हुआ गृहस्थ साधक स्वाध्याय द्वारा ऋषि ऋण, यज्ञादि द्वारा देव ऋण और सन्तानोत्पादन (अथवा आश्रितों के परिपालन) द्वारा पितृऋण से मुक्त होता है। गृहस्थों के चार भेद हैं- वार्ताकवृत्ति, शालीनवृत्ति, यायावर और घोर संन्यासिरु। आश्रमोपनिषद् में इसका उल्लेख इन शब्दों में उपलब्ध है- गृहस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वार्त्ताकवृत्तयः शालीनवृत्तयो यायावरा घोर- संन्यासिकाश्चेति। वार्त्ताकवृत्ति गृहस्थ वे कहलाते हैं, जो कृषि एवं पशुपालन आदि आनन्दित व्यापार करते हुए सौ वर्ष तक यज्ञादि (जीवन यज्ञ) करते हुए आत्म उपासना (जीवन देवता की साधना-आराधना) करते हैं-तत्र वार्त्ताकवृत्तयः