१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
परिशिष्ट ३४९ अमानित्वगुण २१. अपरिग्रह - द्र०- यम। २२. अपरिग्रही - भारतीय योग दर्शन में यम-नियम के अन्तर्गत अपरिग्रह का बहुत महत्त्व है। योग दर्शन में यम के पाँच भेद निरूपित किये गये हैं- अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (अधिक संग्रह न करना)-ये यम कहलाते हैं। इसी प्रकार गायत्री उपासक-यज्ञोपवीतधारी को शास्त्र वर्णित जिन नौ गुणों से युक्त होना अनिवार्य है, उनमें भी अपरिग्रह महत्त्वपूर्ण गुण है- अहिंसा सत्यमस्तेयं तितिक्षा चापरिग्रहः। आस्तिक्यं संयमं शान्तिः शुचिश्च नवसंख्यकाः। जो साधक आवश्यकता मे अधिक वस्तुओं का संग्रह करता है, वह परिग्रही तथा जो ऐसा नहीं करता वह अपरिग्रही कहलाता है। जैन धर्म के अनुसार मोह का परित्याग कर देना ही अपरिग्रह है। विषय वस्तुओं को अस्वीकार कर देना भी अपरिग्रह की श्रेणी में माना जाता है। महर्षि व्यास का कथन है कि विषयों में विविध दोष दर्शन कर, उन्हें ग्रहण न करना अपरिग्रह है- विषयाणामर्जनरक्षण- क्षयसंगहिंसादोषदर्शनादस्वीकरणमपरिग्रहः (सां०यो०द०व्या०भा०)। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि अपरिग्रह स्थिर हो जाने पर साधक को जन्म-जन्मान्तरों के विषय में सम्पूर्ण ज्ञान हो जाता है- अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्ता-सम्बोधः (यो०द० २.३९)। समाज में अपरिग्रह धर्म का पालन करना सभी के लिए आवश्यक है। इस व्रत का समुचित रूप से पालन न होने से समाज में असमानता दिखाई देती है। यदि समाज के व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक धन-साधन अपने पास न रखें (अपरिग्रही बनें), तो उससे अनेक अभावग्रस्तों की पूर्ति हो सकती है और सम्पूर्ण समाज सुखी- समुन्नत बन सकता है। २३. अपान - पाँचों प्राणों में से यह एक है। वेदान्तसार के अनुसार ये प्राणादिवायु निम्नलिखित है- प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान- वायवः प्राणापानव्यानोदानसमानाः (वे०सा०, खण्ड १३)। ऊर्ध्वगमनशील नासाग्रवर्ती वायु को प्राण कहा जाता है। अपान मलादि का निःसरण करके जीवन प्रदान करता है, जैसा कि हलायुध कोश में कहा गया है- 'अपानयति मलादिनिःसारणेन जीवयति।' अपान वायु की अवस्थिति गुदा और उपस्थ में होती है। नाभि से नीचे की ओर जाना इसका स्वभाव है। अतः इसे अधोगमनशील कहा गया है। योग दर्शन के अनुसार मूत्र, पुरीष (मल), गर्भादि के बहिर्निःसरण को प्रक्रिया जिसके द्वारा सम्पन्न होती है, उसे अपान कहा जाता है (यो०सू० ३.३९)। योगी लोग मलद्वार से जल को ऊपर खींचकर आँतों का शोधन कर लेते हैं, इसी से इसका नाम अपान है। इस प्रक्रिया के लिए आधुनिक योगियों में श्री देवरहा बाबा विशेष ख्याति-सिद्ध थे। २४. अमनस्क स्थिति - योग को विभिन्न स्थितियों में एक उन्मनी अवस्था या उन्मनी भाव का भी वर्णन मिलता है। मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् में उल्लेख है कि साधक जब ब्रह्म से एकाकार हो जाता है, तब उन्मनी अवस्था प्राप्त होती है। उन्मनी अवस्था अर्थात् तत्त्वज्ञान पूर्ण स्थिति-उन्मनी नाम तत्त्वज्ञानम् (मं०ब्रा०उ० २.२.४ टीका)। उन्मनी अवस्था के द्वारा मनरहित स्थिति हो जाती है, जिसे अमनस्क स्थिति कहते हैं- उन्मन्या अमनस्कं भवति (मं०ब्रा०उ० २.२.४) अर्थात् मन संकल्प-विकल्प से रहित हो जाता है। मन का प्रमुख कार्य इच्छा करना, संकल्प-विकल्प करना है; किन्तु अमनस्क स्थिति में साधक इन से रहित हो जाता है। संस्कृत के प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में उल्लेख है- नास्ति कार्यक्षमं मनो यस्य। ........मनोवृत्तिहीने योगिनि च। सर्वथा मनःशून्य (वाच०पृ० ३१८)। इस अमनस्क स्थिति वाले साधक के लिए स्थूल पूजा-उपचार का कोई महत्त्व नहीं रहता, फिर तो निश्चिन्त (चिन्ता रहित) अवस्था ही उसका ध्यान है, सर्वकर्म निराकरण ही आवाहन है, निश्चयात्मक ज्ञान ही आसन है, उन्मनी भाव ही पाद्य है, अमनस्क स्थिति अर्घ्य है, सदैव दीप्ति और अमृतवृत्ति ही स्नान है, सबमें ब्रह्म भावना ही गन्ध है, दर्शन के स्वरूप में स्थित होना ही अक्षत है। ............मौन ही स्तुति है तथा सभी प्रकार से हर स्थिति में सन्तोष ही विसर्जन है- तस्य निश्चिन्ता ध्यानम्। सर्वकर्मनिराकरणमावाहनम् .....सर्वसंतोषो विसर्जनमिति ... (मं०ब्रा०उ० २.२.५)। इस प्रकार ब्रह्म-अनुसन्धान करने वाला साधक ब्रह्मरूप ही हो जाता है। २५. अमरोली मुद्रा - द्र०-मुद्रा। २६. अमानित्वगुण - अनेक सद्गुणों में अमानित्व गुण का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसे एक प्रकार से लज्जाशीलता का गुण भी कह सकते हैं। निरहंकारिता या दम्भ शून्यता भी अमानित्व है। वाचस्पत्यम् पृ० ३२१ में उल्लेख है- अभिमानशून्ये "अमानित्वमदम्भित्वम्" गीता। निरहंकारी या अमानित्व गुण सम्पन्न व्यक्ति सबके हृदय में अपना
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स्थान बना लेता है तथा कठोर से कठोर व्यक्ति से वह अपना कार्य अपनी विनम्रता द्वारा सम्पन्न करा लेता है। इस गुण का कोई मूल्य नहीं; किन्तु इससे सब कुछ क्रय किया जा सकता है। यह संत वचन है कि शालीनता बिना मोल मिलती है; किन्तु उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है। सामान्य स्थिति में जहाँ अपनी थोड़ी सी निन्दा सुनकर व्यक्ति उत्तेजित हो जाते हैं, वहीं अमानित्व सम्पन्न व्यक्ति उसे (निन्दक को) अपनी साधना में सहायक मानते हुए उसका उपकार मानते हैं। एक सूफी संत ने लिखा है- 'निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।' संन्यासी व्यक्ति को मान-अपमान से अलग रहना चाहिए। नारद परिव्राजकोपनिषद् के अनुसार दूसरों के द्वारा प्राप्त आदर साधक के तप-उपार्जन में बाधक है एवं दूसरों के द्वारा किया गया अपमान उसके तप-उपार्जन में सहायक है। इसी तथ्य की पुष्टि करते हुए संन्यासी के गुणों के सन्दर्भ में उपनिषद्कार ने लिखा है- न सुखं न दुःखं न निद्रा न मानापमाने च षडूर्मिवर्जितः, निन्दाहंकारमत्सरग-र्वादम्भेभ्यां.... निन्दास्तुतिर्यादृच्छिको भवेत् (ना०परि० ३.९०)। २७. अवधारणा- अवधारणा शब्द का उपयोग प्रायः किसी विषय में मन में उत्पन्न कल्पना, धारणा या विचार के उदय होने, बनने या स्थिर होने के सन्दर्भ में किया जाता है। कुछ कोश ग्रन्थों में इसका अर्थ किसी तथ्य के सम्बन्ध में निश्चय, पुष्टिकरण, (विषय की) सीमा निश्चित करना आदि किया गया है। संस्कृत हिन्दी कोश में इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार निर्दिष्ट है — अवधारणा-अव+धृ+णिच्+ल्युट्, जिसके उपर्युक्त कई अर्थ बताये गये हैं। उपनिषदों में अन्तःकरण चतुष्टय के नियमों के सन्दर्भ में अवधारणा का उल्लेख हुआ है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ये अन्तःकरण चतुष्टय के अन्तर्गत आते हैं। शारीरकोपनिषद् में सङ्कल्प-विकल्प को मन का विषय, अध्यवसाय (निश्चित होने की प्रक्रिया) को बुद्धि का विषय, अभिमान को अहंकार का विषय तथा अवधारणा (किसी विषय का तथ्य निश्चित हो जाने) को चित्त का विषय कहा गया है- मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तमित्यन्तःकरणचतुष्टयम्। तेषां क्रमेण संकल्पविकल्पाध्यवसा- याभिमानावधारणास्वरूपाश्चैते विषयाः (शारीरको० ४)। इसी उपनिषद् में मन का स्थान गलान्त (गले का अन्तिम भाग), बुद्धि का स्थान मुख, अहंकार का हृदय तथा चित्त का स्थान नाभि कहा गया है- मनः स्थानं गलान्तं बुद्धेर्वद- नमहंकारस्य हृदयं चित्तस्य नाभिरिति (शारीरको० ४)। २८. अवधूत- सनातन धर्म के अनुसार चार आश्रम माने जाते हैं, जिनमें जीवनावधि को चार भागों में विभक्त कर दिया गया है। ये हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। इनमें अन्तिम आश्रम संन्यास है। इसे प्रव्रज्या आश्रम भी कहते हैं, क्योंकि इसमें परिव्राजक (संन्यासी) लोकमंगल और आत्म कल्याण के निमित्त निरन्तर परि+व्रज्या (परिभ्रमण) करता रहता है। संन्यासी व्यक्ति उसे कहते हैं, जिसने अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके संसार के समस्त आकर्षणों का परित्याग कर दिया हो, साथ ही वह एक मात्र मोक्ष के उपाय में लगा हो। संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होने वाले के लिए पञ्चमात्राएँ धारण करने का निर्देश दिया गया है- अथाश्रमं चरमं संप्रविश्य यथोपपत्तिं पञ्चमात्रां दधानः (शाट्यायनी० ६)। त्रिदण्ड, उपवीत, वस्त्र-कौपीन (उत्तरीय-लंगोटी), शिक्य (छींका) और पवित्रि ये ही स्थितिभेद से संन्यासियों के लिए निर्धारित पञ्चमात्राएँ कहलाती हैं। इन्हें स्थिति के अनुरूप यथा-शास्त्र-निर्देश यति को आजीवन धारण करना चाहिए-त्रिदण्डमुपवीतं च वासः कौपीनवेष्टनम्। शिक्यं पवित्रमित्येतद्विभृयाद्यावदायुषम् (शाट्यायनी० ७)। यति की इन पंचमात्राओं को ब्रह्म (ॐकार) में समाहित माना गया है- पञ्चैतास्तु यतेर्मात्रास्ता मात्रा ब्रह्मण्ये श्रुताः (शाट्यायनी० ८)। संन्यासोपनिषद् में संन्यासियों के छः प्रकार वर्णित हैं- कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत और अवधूत-संन्यासः षड्विधो भवति कुटीचकबहूदकहंसपरमहंसतुरीयातीतावधूताश्चेति (संन्यासो० २.२३)। अवधूत संन्यास की सर्वोच्च श्रेणी है। अवधूतोपनिषद् के मन्त्र २ में अवधूत को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है- अक्षरत्वाद्धरेण्यत्वाद्वधूतसंसारबन्धनात्। तत्त्वमस्यादिलक्ष्यत्वादवधूत इतीर्यते अर्थात् जो अक्षर (अविनाशी), वरेण्य (श्रेष्ठ) तथा संसार के बन्धन से मुक्त हो गया हो, साथ ही तत्त्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्य का अर्थरूप हो उसे अवधूत कहते हैं। इसी प्रकार संन्यासोपनिषद् में अवधूत की स्थिति का विवेचन करते हुए उपनिषद्कार ने लिखा है कि अवधूत अनियम वाला होता है (अर्थात् उसके लिए जप, यज्ञादि का कोई नियम अनिवार्य नहीं है)। वह पतित और निन्दित व्यक्ति के अतिरिक्त सभी वर्णों में अजगर वृत्ति (जो कुछ अपने आप प्राप्त हो जाए) से भोजन ग्रहण करता है। अवधूत सतत आत्मानुसंधान में निरत रहता हुआ पर्वत, वृक्ष, घास, तृणादि जड़ पदार्थों से अपने को पृथक् मानता है कि
परिशिष्ट ३५१ तुरीयातीत मैं तो चेतन तत्त्व हूँ तथा काल से कवलित और शीघ्र नष्ट होने वाला नहीं हूँ- अवधूतस्त्वनियमः पतिताभिशस्तवर्जनपूर्वकं सर्ववर्णेष्वजगरवृत्त्याहारपरः स्वरूपानुसंधानपरः । ............नाहमचेतनः (संन्यासो० २.२९-३०)। संन्यासो के अन्य भेद इस प्रकार हैं- (क) कुटीचक- कुटीचक (जिसे कुटीचर भी कहते हैं) शिखा और यज्ञोपवीतधारी होता है, जो दण्ड, कमण्डलु, लँगोटी, चादर और कन्था (गुदड़ी) धारण करता है। वह माता-पिता और गुरु की आराधना में तन्मय रहते हुए पिठर (बटलोई), खनित्र (फावड़ा) और शिक्य (छींका) धारण करके मन्त्र साधन परायण रहकर एक ही स्थान पर अन्नग्रहण करने वाला, श्वेत और ऊर्ध्वमुखी त्रिपुण्ड्र धारण करने वाला तथा तीन दण्ड रखने वाला होता है-कुटीचकः शिखायज्ञोपवीती दण्डकमण्डलुधरः कौपीनशाटीकन्थाधरः पितृमातृगुर्वाराधनपरःपिठरखनित्रशिक्यादिमन्त्रसाधनपर एकत्रान्नादनपरः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः (संन्यासो० २.२४)। (ख) बहूदक- बहूदक शिखा आदि तथा कन्था, त्रिपुण्ड्रधारी होकर सब प्रकार कुटीचक के समान आचरण वाला होता है तथा मधुकरी वृत्ति से केवल अष्टग्रास भोजनग्राही होता है-बहूदकः शिखादिकन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी कुटीचकवत्सर्वसमो मधुकरवृत्त्याष्टकबलाशी (संन्यासो० २.२५)। (ग) हंस- हंस का रूप इस प्रकार विवेचित है- हंसो जटाधारी त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्ड्रधार्यसंकॢप्तमाधूकरानाशी कौपीनखण्डतुण्डधारी (संन्यासो० २.२६) अर्थात् हंस प्रवृत्ति वाला संन्यासो जटाधारण करने वाला त्रिपुण्ड्र और ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करने वाला, अनिश्चित स्थान पर भिक्षाटन करके भोजन ग्रहण करने वाला और शरीर पर मात्र कौपीन धारण करने वाला होता है। (घ) परमहंस- परमहंस की वृत्ति बताते हुए उपनिषद्कार ने लिखा है- परमहंसः शिखायज्ञोपवीतरहितः पञ्चगृहेषु करपात्र्येककौपीनधारी शाटीमेकामेकं वैणवं दण्डमेकशाटीधरो वा भस्मोद्धूलनपरः सर्वत्यागी (संन्यासो० २.२७) अर्थात् परमहंस वृत्तिवाला संन्यासी शिखा और यज्ञोपवीत धारण न करके करपात्री होकर मात्र पाँच घरों से ही भिक्षा ग्रहण करता है, जो मात्र एक कौपीन, एक चादर और एक दण्ड धारण करने वाला होता है अथवा शरीर पर केवल भस्म लगाकर मात्र चादर धारण करता है, इसके अतिरिक्त सर्वत्यागी होता है। परमहंस को ही भिक्षु कहते हैं। सामान्यतः भिक्षु शब्द से तात्पर्य भिक्षा माँगने वाला प्रतीत होता है; पर इस वृत्ति की निन्दा करते हुए परमहंसोपनिषद में लिखा है कि जो काष्ठ दण्ड धारण करके सब आशाओं से युक्त है तथा ज्ञान, क्षमा, वैराग्य आदि गुणों से शून्य होकर मात्र भिक्षावृत्ति से ही जीवनयापन करता है, वह पापी यतिवृत्ति का विनाशक है और रौरव नामक नरक में जाता है। सच्चा भिक्षु वह है, जो आशाम्बर है तथा नमस्कार, स्वाहा, स्वधा से रहित, स्वर्ण आदि का संग्रह न करके, राग-द्वेष से रहित होकर अपने आत्मतत्त्व में ही स्थित रहता है- आशाम्बरो न नमस्कारो न स्वाहाकारो.......... स भिक्षुस्सौवर्णादीनां नैव परिग्रहेन्न लोकनं ........... आत्मन्येवावस्थीयते (परमहंसो० ४)। (ङ) तुरीयातीत- तुरीयातीत को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है- तुरीयातीतो गोमुखवृत्त्या फलाहारी, अन्नाहारी चेद्गृहत्रये, देहमात्रावशिष्टो दिगम्बरः कुणपवच्छरीरवृत्तिकः (संन्यासो० २.२८) अर्थात् तुरीयातीत संन्यासो गोमुखवृत्ति से केवल तीन घरों से फल अथवा अन्नाहार ग्रहण करता है। वह भोजन देह धारण करने मात्र के लिए ही ग्रहण करता है तथा यह मानता है कि मैं तो चेतन आत्मा हूँ, शरीर तो मृतक के समान है। इस प्रकार संन्यासियों की छः श्रेणियाँ हैं, जो स्वरूप भेद से अलग-अलग नाम वाली हैं। इनके अतिरिक्त संन्यासोपनिषद् ने संन्यासियों की चार अन्य श्रेणियों का भी उल्लेख किया है। ये हैं-वैराग्य संन्यासी, ज्ञान-संन्यासी, ज्ञान वैराग्य संन्यासो और कर्म संन्यासो। इनमें वैराग्य संन्यासो वह है, जो दृश्य-श्रव्य विषयों के प्रति निःस्पृह है और पूर्वार्जित पुण्यों के फलस्वरूप वैराग्य होने के कारण जिसने संन्यास धर्म ग्रहण किया है- तद्यथेति। दृष्टानुश्रविक .......... वैराग्य संन्यासी (संन्यासो० २.१९)। ज्ञान संन्यासो वह है, जो शास्त्रज्ञान पाकर, सांसारिक सद्गुणों एवं दुर्गुणों का अनुभव करके प्रपञ्च से उपराम होकर शरीर, शास्त्र और लोक वासनाओं का परित्याग करके, संसार की समस्त प्रवृत्तियों को वमनान्न मानकर चारों साधनों से मुक्त होकर संन्यास धर्म स्वीकार करता है-- शास्त्रज्ञानात्यापपुण्य ....... ज्ञानसंन्यासी (संन्यासो० २.२०)। ज्ञान वैराग्य संन्यासो उसे कहा गया है, जो क्रमशः सभी का अभ्यास करके, समस्त अनुभव प्राप्त करके, ज्ञान और वैराग्य के तत्त्व को भलीभाँति समझकर, देह मात्र की अवशिष्ट मानकर संन्यासधर्म ग्रहण करता है- क्रमेण सर्वमभ्यस्य .........ज्ञानवैराग्य संन्यासी (संन्यासो० २.२१)। इसी प्रकार कर्म संन्यासो वह है, जो ब्रह्मचर्य,
Here is the line-by-line transcription of the Hindi and Sanskrit text from the image:
अविद्या ३५२ परिशिष्ट गृहस्थ एवं वानप्रस्थ आश्रमों में विधिवत् रहने के पश्चात् भी वैराग्य उत्पन्न न होने पर नियमानुसार संन्यास ग्रहण करता है- ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भूत्वा ........... स कर्मसंन्यासी (संन्यासो० २.२२)। यहाँ यह ध्यातव्य है कि संन्यास के पूर्वोक्त छः भेद इसी कर्म संन्यास के भेद कहे गये हैं। २९. अविद्या - द्र० - ज्ञानखण्ड । ३०. अविमुक्त - अविमुक्त का शाब्दिक अर्थ है, जो मुक्त न हो अर्थात् मुक्ति लाभ न कर सके। हिन्दी विश्वकोश के अनुसार कनपटी को 'अविमुक्त' कहते हैं। जाबाल उपनिषद् (१.१) के अनुसार यह ब्रह्म का स्थान है। मूर्द्धा (ब्रह्मरन्ध्र) और चिबुक (दाढ़ी) का मध्यवर्ती स्थान भी अविमुक्त कहलाता है। अन्यत्र उल्लेख पाया जाता है कि भौंहों एवं घ्राण का मध्य स्थान अविमुक्त क्षेत्र है-अविमुक्तं नाम ......वक्ष्यमाण आत्मविदां काशीनगरस्थानीयो ध्रुवोध्राणस्य च सन्धिः (जाबालो०-अड्यार माइनर उपनिषद् पृ० ४०१)। काशी क्षेत्र भी अविमुक्त कहा जाता है। स्कन्दपुराण के काशी खण्ड में लिखा है- ‘‘न विमुक्तं शिवाभ्यां यदविमुक्तं ततो विदुः’’ अर्थात् शिव और शिवा के परित्याग न करने से काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहते हैं। कुछ लोग काशी के निकट गंगातट से पाँच कोश दूर स्थान को भी अविमुक्त क्षेत्र कहते हैं। ३१. अष्टग्रह- ग्रह के सन्दर्भ में सामान्य अवधारणा नवग्रहों की है, जिन्हें सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु नाम से जाना जाता है। बाद में हुई खोजों के अनुसार नेप्च्यून, प्लूटो और यूरेनस ग्रहों को भी सम्मिलित कर लेने पर यह संख्या बारह मानी जाने लगी है, किन्तु आध्यात्मिक सन्दर्भ में कुछ उपनिषदों में ग्रह शब्द का अर्थ व संख्या इस अवधारणा से भिन्न है, जैसे-अथर्वशिर उपनिषद् में भगवान् रुद्र को स्तुति करते हुए देवों द्वारा उन्हें अष्टग्रह रूप कहा गया है-यो वै रुद्रः स भगवान्ये चाष्टौ ग्रहास्तस्मै वै नमो नमः (अथर्वशिर० ४)। बृहदारण्यक उपनिषद् में अष्टग्रह और अष्ट अतिग्रहों का संकेत इन शब्दों में उपन्यस्त है- इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ............. कतमे त इति (बृह० उ० ३.२.१)। ये अष्टग्रह प्राण, वाक्, जिह्वा, चक्षु, श्रोत्र, मन, हस्त और त्वचा नाम से वर्णित हैं। इसी प्रकार इन ग्रहों (पंच ज्ञान इन्द्रियों, एक कर्मेन्द्रिय तथा मन, प्राण) के विषयों को अतिग्रह कहा गया है। जैसे प्राण ग्रह का अतिग्रह अपान है और अपान अतिग्रह द्वारा वह गृहीत है, इससे ही प्राण ग्रह गन्धों को सूँघने का कार्य सम्पन्न करता है-प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति (बृह०उ० ३.२.३)। इसी प्रकार वाक् शक्ति ग्रह है, नाम रूपी अतिग्रह से वह गृहीत है, इसीलिए वाणी से उच्चारण सम्पन्न ही पाता है- वाग्वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति (बृह०उ० ३.२.३)। इसी प्रकार जिह्वा को ग्रह, रस को उसका अतिग्रह; श्रोत्र को ग्रह, शब्द को उसका अतिग्रह; मन को ग्रह, कामना को उसका अतिग्रह; हाथों को ग्रह, कर्म को उसका अतिग्रह तथा त्वचा को ग्रह और स्पर्श को उसका अतिग्रह निरूपित करके इन ग्रहों की सक्रियता अतिग्रहों के माध्यम से ही बताई गई है। ३२. अष्टदलकमल - उपनिषदों में शरीरगत चक्रों का आलंकारिक वर्णन है। जैसे-कुण्डलिनी को सर्पिणी, सहस्रार चक्र के स्थल को क्षीर सागर, इसी प्रकार अनाहत चक्र को अष्टदल कमल अथवा हृदय कमल भी कहते हैं। प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में अष्टदलकमल इन शब्दों में परिभाषित है- अष्टौ दलानि यस्य। अष्टपत्रकमले अर्थात् जिसमें आठ दल या पत्ते हों ऐसा कमल। अष्टदलकमल हृदय कमल को कहा जाता है। इसी को ब्रह्मपुर की संज्ञा भी प्रदान की गई है। इसका स्थान हृदय के पास है। क्षुरिकोपनिषदकार ने प्रत्याहार प्रकरण में हृदय स्थित रक्तोत्पल (लाल कमल) जैसे प्रतीत होने वाले को 'दहर पुण्डरीक' कहा है, वेदान्त में भी इसे दहर पुण्डरीक ही कहा गया है- ततो रक्तोत्पलाभासं हृदायतनं महत्। दहरं पुण्डरीकं तत् वेदान्तेषु निगद्यते (क्षुरिको० १०)। इसे ही अनाहत चक्र भी कहा जाता है। इसकी साधना करने से यह (अनाहतं चक्र) जाग्रत् ही जाता है। इसका लक्षण इन्द्रियों पर अधिकार प्राप्त हो जाना है। इससे वाक्पतित्व, कवित्वशक्ति भी प्राप्त होती है। शिवसार तन्त्र में कहा गया है कि इस स्थान में उत्पन्न होने वाली अनाहत ध्वनि ही सदाशिव है और त्रिगुणमय ओंकार इसी स्थान में अभिव्यक्त होता है, यथा-शब्दं ब्रह्मेति तं प्राह साक्षाद्देवः सदाशिवः । अनाहतेषु चक्रेषु स शब्दः परिकीर्त्यते ॥ ३३. अष्टाङ्ग योग- चित्तवृत्ति के निरोध के लिए को जाने वाली योग क्रिया के आठ उपाय या अंग माने जाते हैं। इनमें से पाँच बहिरंग कहलाते हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार। तीन अन्तरंग कहलाते हैं- धारणा, ध्यान और समाधि। इन्हीं को अष्टांग योग कहते हैं। पातञ्जल योग में मन और इन्द्रियों को विषयों को ओर जाने से रोकने को यम कहा जाता है। यम के पाँच भेद हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। वेदान्तसार में नियम को विवेचना
परिशिष्ट ३५३ आग्नेयी इष्टि करते हुए लिखा है, जो साधक को जन्म के हेतुभूत काम्य धर्मों से निवर्तित कर मोक्ष के हेतुभूत निष्काम धर्म में बाँध देते हैं, उन्हें नियम कहा जाता है। नियम पाँच प्रकार के हैं- शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार शरीर जिस स्थिति में स्थिर एवं सुखपूर्वक रहे, उसे आसन कहा जाता है। जिसे आसन की सिद्धि हो जाती है, उसे शीतोष्णादि द्वन्द्व अभिभूत नहीं करते हैं। पातञ्जल योग प्रदीप के अनुसार प्राणों को वश में करने का नाम प्राणायाम है। प्राणों को अपने अधिकार में चलाने वाले मनुष्य का अधिकार अपने शरीर, इन्द्रियों तथा मन पर हो जाता है। प्राणायाम के मुख्यतः तीन भेद हैं- रेचक, पूरक और कुम्भक । प्रत्याहार में चित्तवृत्तियों को या इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर चित्त को हर स्थिति में शान्त रखा जाता है। अपने चिन्तन को अनात्म पदार्थों से हटाकर आत्मा में लगाये रहना प्रत्याहार है। चित्तवृत्तियों को चारों ओर से हटाकर एक स्थान या विषय में लगाना धारणा है। योग सूत्र के अनुसार चित्त को एक स्थान पर दृढ़ करना धारणा है- 'देशबन्धश्चित्तस्य धारणा' (यो०द० ३.१)। चित्त को चारों ओर से हटाकर किसी एक विषय पर सतत स्थिर करना ध्यान कहलाता है। उपनिषद् में कहा गया है- मन का विकारों से मुक्त होना ही ध्यान है- "ध्यानं निर्विषयं मनः" (मैत्रे० २.३)। योग के आठ अंगों में अन्तिम अंग समाधि है। ध्यान की पराकाष्ठा को समाधि कहा गया है। इसे योग का चरम फल भी कहते हैं। इसमें साधक अपने चित्त को बाह्य जगत् से मोड़कर आत्मा में स्थिर कर लेता है, ऐसी अवस्था में वह विविध शक्तियों को धारण करने में समर्थ हो जाता है और अन्त में कैवल्य पद को प्राप्त होता है। समाधि के प्रायः दो भेदों का निरूपण किया जाता है- १. सविकल्पक समाधि और २. निर्विकल्पक समाधि। ३४. असूया - अध्यात्म के पथ पर अग्रसर होने वाले साधक के अन्दर अनेक प्रकार के विकार भी प्रायः उत्पन्न होते रहते हैं, जैसे- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य। इन पर विजय प्राप्त कर साधक जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य प्राप्त करता है। इसी प्रकार का एक दोष 'असूया' है। असूया का अर्थ किसी के गुणों में भी दोष देखने की प्रवृत्ति से है-असूया परगुणेषु दोषाविष्करणम् (वाच० पृ० ५५८)। अमरकोश भी इसी तथ्य को पुष्टि करता है-असूया तु दोषारोपो गुणेष्वपि। यह किसी के प्रति क्रोध-द्रोह के फलस्वरूप उत्पन्न होती है। काव्यकारों ने इसे एक प्रकार का संचारी भाव माना है। योग दर्शन में मनोगत कालुष्य के भेदों में असूया भी वर्णित है। उसके अनुसार अपने से श्रेष्ठ पुरुष के सद्गुणों में भी दोषदर्शन-दोषारोपण करना 'असूया' कहा जाता है। न्याय दर्शन के अनुसार दूसरे के गुणों को सहन न करना (उनसे ईर्ष्या रखना) असूया कहलाता है-ईर्ष्याऽसूया.... (वात्स्या० ४.१.३) ३५. अस्तेय - द्र०-यम। ३६. अहंकार - द्र०- ज्ञानखण्ड-अन्तःकरण चतुष्टय । ३७. अहिंसा - द्र०-यम-नियम। ३८. आग्नेय - सामान्यतः आग्नेय शब्द का अर्थ अग्नि से सम्बन्धित है। यह शब्द विभिन्न शब्दों के विशेषण के रूप में भी प्रयुक्त होता है। अग्नि में दी जाने वाली विशेष प्रकार को आहुति 'पुरोडाश' को भी आग्नेय कहा गया है- "आग्नेयः पुरोडाशो भवति" (वाच०पृ० ६२०)। अठारह पुराणों में अग्निपुराण को भी अग्नि से सम्बन्धित होने के कारण आग्नेय पुराण कहते हैं- "आग्नेयं वेदसम्मितम्।" इत्युक्ते अग्निप्रोक्ते महापुराणभेदे अग्निपुराणशब्दे विवृतिः (वाच०पृ० ६२०)। दक्षिण और पूर्व के मध्यवर्ती दिशा को भी आग्नेय दिशा कहते हैं; क्योंकि उसके देवता अग्नि होते हैं। स्वर्ण को भी आग्नेय कहते हैं; क्योंकि उसका आविर्भाव अग्नि के वीर्य से ही हुआ है। जैमिनीय उपनिषद् के अनुसार यह पृथिवी भी आग्नेय है; क्योकि प्रारम्भ में यह अग्नि का गोला मात्र थी। बदलते-बदलते इस वर्तमान रूप में आ गई है। ३९. आग्नेय यज्ञ - द्र०-आग्नेयी इष्टि। ४०. आग्नेयी इष्टि - श्रौत सूत्रों में कामनाओं को पूर्ति के लिए विभिन्न इष्टियों का विधान है। सामान्यतः इष्टि शब्द- कामना, कामना की गई वस्तु, दान संग्रह तथा यज्ञ के अर्थ में प्रयुक्त होता है; किन्तु श्रौत ग्रन्थों में इसे विशेष प्रयोजनों के लिए किया जाने वाला याग (यज्ञ) माना गया है। कात्यायन यज्ञ पद्धति विमर्श पृ० ४६८ में इष्टि इन शब्दों में परिभाषित है "आहिताग्नि (नियमित रूप से यज्ञ करने वाले) के द्वारा दर्श (अमावस्या) तथा पूर्णिमा को सम्पन्न किया जाने वाला याग इष्टि है।" प्रयोजन भेद से इष्टियो के कई प्रकार हैं। जैसे-मित्रविन्देष्टि, आग्नेयी इष्टि, अधिक श्रीकामेष्टि, चित्रेष्टि, प्रजा कामेष्टि, प्राजापत्येष्टि, त्रैधातवी इष्टि, वैमृधीष्टि, अन्वारम्भणीय इष्टि तथा अन्त्येष्टि आदि। इष्टियाँ असंख्य हैं;
किन्तु स्थानाभाव से यहाँ कुछ प्रमुख इष्टियों की चर्चा की जा रही है। महर्षि कात्यायन के अनुसार किसी भी कामना की सिद्धि के लिए आग्नेयी इष्टि करनी चाहिए-आग्नेयं प्रतिकाममाहरेत् (का० श्रौ० सू० ४.५.१५)। आग्नेयी इष्टि में अग्निदेव के निमित्त आठ कपाल [कपाल मिट्टी का एक पात्र होता है, जिसमें पुरोडाश (हव्य विशेष) पकाया जाता है] पुरोडाश पूर्वक याग सम्पन्न होता है। आग्नेयी इष्टि को ही आग्नेय यज्ञ भी कहते हैं। आग्नेयी इष्टि के अधिष्ठाता अग्निदेव होते हैं। जाबालोपनिषद् में आहिताग्नि संन्यास विधि प्रकरण में आग्नेयी इष्टि करके ही संन्यास लेने का विधान बताया गया है -...... तदु तथा न कुर्यात्। आग्नेयीमेव कुर्यात्। अग्निहिं वै प्राणः' (जाबालो० ४.२) अर्थात् आहिताग्नि यदि संन्यास ले, तो उसे आग्नेयी इष्टि ही करनी चाहिए; क्योंकि अग्नि ही प्राण है। इस इष्टि से प्राण को वृद्धि होती है। कुछ विद्वानों का मत है कि संन्यास धारण करने के पूर्व द्विज (चाहे वह गृहस्थ हो या वानस्थ) को चाहिए कि वह सर्वस्व दक्षिणा देकर प्रजापति का यज्ञ (प्राजापत्य यज्ञ) करे अर्थात् इस इष्टि. के अधिष्ठाता प्रजापति के लिए पुरोडाशपूर्वक आहुतियाँ समर्पित करके प्राजापत्य इष्टि करे तथा अग्नियों (ज्ञानाग्नि) को अपने आत्मा में स्थापित करे। याज्ञवल्क्य स्मृति में इस तथ्य का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-वनाद् गृहाद्वा कृत्वेष्टिं सर्ववेद सदक्षिणाम्। प्राजापत्यां तदन्ते तानग्नीनारोप्य चात्मनि (याज्ञ० स्मृ० ३.५६)। प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् पृ० ४५०७ में प्राजापत्य इष्टि को सर्ववेद दक्षिणा कोटि की इष्टि विवेचित करते हुए ग्रन्थकार ने उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि की है-"प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेद सदक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् ।।' पाठ भेद से यह श्लोक शंख स्मृति ७.१ में भी मिलता है। जाबालोपनिषद् में भी कुछ आचार्यों का मन्तव्य विवेचित है कि वे संन्यास धारण करते समय आग्नेयी इष्टि के स्थान पर प्राजापत्य इष्टि करते हैं-'..........केचन आचार्याः प्रजापतिदेवताकां प्राजापत्यामेवेष्टिं कुर्वन्ति ....... (जाबालो० ४.२ टीका)।' प्राजापत्य इष्टि के पुरोडाश के सम्बन्ध में कपाल संख्या का विवरण प्राप्त नहीं होता। त्रैधातवी इष्टि काम्य इष्टि है, जिसका अनुष्ठान गवामयन सत्र (जिसका दूसरा नाम संवत्सर सत्र है), जो एक वर्ष तक होता है, के अन्त में किया जाता है। इसके प्रमुख देव इन्द्र और विष्णु हैं; क्योंकि वृत्र से युद्ध करके इन्होंने वीर्यरूप यजु, ऋक् और सामवेद प्राप्त किये थे। इन्हीं तीनों वेदों (त्रिधातु वाली विद्या) से क्रमशः इष्टि करते हैं, इसीलिए इसे त्रैधातवी इष्टि कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण में इसका वर्णन इन शब्दों में मिलता है-तमनुपरामृश्य संलुप्याच्छिन्नत्सैषेष्टिरभवत्तद्यदेतस्मिन्नाशये त्रिधातुरिवैषा विद्याऽऽशेत तस्मात्त्रैधातवी नाम (शत० ब्रा० ५.५.५.६)। जाबालोपनिषद् में भी त्रैधातवी इष्टि का उल्लेख मिलता है; किन्तु वहाँ इसे त्रैधातवी इसलिए माना गया है कि इसमें प्रयुक्त अग्नि तीन रूप शुक्ल, रोहित (लोहित) और कृष्ण वर्ण वाली होती है, जो क्रमशः तीन धातुओं सत, रज और तम से युक्त होती है-.........ततस्त्रैधातवीयामेवेन्द्रदेवता .............कुर्यात्। तत्रोपपत्तिः। एतयैवेश्च्या त्रयो धातवो यदुताग्नेयं रूपत्रयं सत्त्वं शुक्लं रजो रोहितं तमः कृष्णम् (जाबालो० ४.२ टीका)। इस इष्टि में बारह कपाल हवि विशेष से (त्रैधातवी इष्टि के लिए चावल और जौ से निर्मित की जाती है) यजन किया जाता है; क्योंकि यह वर्षभर (बारह महीने) की इष्टि होती है। कात्यायन श्रौत सूत्र में इसे उदवसानीया इष्टि भी कहा गया है-'त्रैधातव्युदवसानीया सर्वत्र' (का०श्रौ०सू० १३.४.७)। ४१. आत्मज्ञान - द्र०-ज्ञानखण्ड-आत्मा-जीवात्मा। ४२. आत्मतत्त्व - द्र०- ज्ञानखण्ड-आत्मा-जीवात्मा। ४३. आत्मविद्या - द्र०- ज्ञानखण्ड- श्रेय-प्रेय मार्ग, आत्मा-जीवात्मा। ४४. आत्मश्राद्ध - स्वर्गस्थ देवों, ऋषियों, देवमानवों आदि की आत्माओं की शान्ति के लिए श्राद्ध कर्म का विधान है। श्राद्ध प्रायः आठ प्रकार के होते हैं-देवश्राद्ध, ऋषिश्राद्ध, दिव्यश्राद्ध, मनुष्यश्राद्ध, भूतश्राद्ध, पितृश्राद्ध, मातृश्राद्ध और आत्मश्राद्ध। जब व्यक्ति अपनी आत्मा की शान्ति के लिए स्वयं श्राद्ध करे, तो उसे आत्मश्राद्ध कहा जाता है। जब कोई क्रमिक अथवा आतुर संन्यास धारण करता है, तो वह प्रायश्चित स्वरूप कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रत सम्पन्न करके अष्ट श्राद्ध करता है, जिसके अन्तर्गत आत्मश्राद्ध में अपना, पिता का और पितामह का श्राद्ध किया जाता है; परन्तु पिता जीवित हों, तो उनका श्राद्ध न करके अपना, पितामह का और प्रपितामह का श्राद्ध किया जाता है। नारद परिव्राजकोपनिषद् में इसका उल्लेख इन शब्दों में संप्राप्य है- प्रथमं ......आत्मश्राद्धे आत्मपितृ पितामहान् जीवत्पितृ कश्चेत्पितरं त्यक्त्वा आत्मपितामहप्रपितामहानिति (ना० परि० ४.३७)। ४५. आत्म साक्षात्कार - द्र०-ज्ञानखण्ड-साक्षात्कार।
परिशिष्ट ३५५ आसन ४६. आत्मा - द्र०- ज्ञानखण्ड -आत्मा-जीवात्मा। ४७. आत्मा-परमात्मा - द्र०-ज्ञानखण्ड -आत्मा-जीवात्मा। ४८. आनन्द-द्र०- ज्ञानखण्ड -आनन्द-परमानन्द । ४९. आपः- द्र०- ज्ञानखण्ड। ५०. आवागमन - द्र०-ज्ञानखण्ड -आवागमन चक्र। ५१. आसन- हठ योग के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की मुद्राओं, बन्ध तथा आसनों द्वारा यौगिक क्रियाएँ सम्पन्न की जाती हैं, जिनके द्वारा नस-नाड़ियों का शोधन करके शरीर को स्वस्थ, चित्त को प्रसन्न और एकाग्र किया जाता है। पातञ्जल योग में 'आसन' इन शब्दों में परिभाषित है- 'स्थिरसुखमासनम् (पातं०यो० सा० पा० सूत्र-४६)' अर्थात् जो स्थिर और सुखदायी हो, वही आसन है। जिस प्रकार स्थिर होकर, अविचल होकर, कष्ट रहित होकर, सुखपूर्वक लम्बे समय तक बैठा जा सके, वह आसन है। स्थिति के अनुरूप विभिन्न साधकों के लिए पृथक्-पृथक् आसन ग्रहणीय होते हैं। वैसे तो विभिन्न प्रकार के आसनों का वर्णन पृथक्-पृथक् ग्रन्थों में मिलता है; किन्तु नौ प्रकार के आसन ही प्रमुख हैं। जो इस प्रकार हैं-स्वस्तिकं गोमुखं पद्मं वीरंसिंहासने तथा। भद्रं मुक्तासनं चैव मयूरासनमेव च॥ सुखासनसमाख्यं च नवमं मुनिपुङ्गव (जां०दर्शनो० ३.१-२) अर्थात् स्वस्तिक, गोमुख, पद्म, वीर, सिंह, भद्र, मुक्त, मयूर और सुख ये नौ प्रकार के आसन हैं। क. स्वस्तिकासन - स्वस्तिक आसन का वर्णन करते हुए उपनिषदकार ने लिखा है- जानूर्वोरन्तरे कृत्वा सम्यक् पादतले उभे। समग्रीवशिरःकायः स्वस्तिकं नित्यमभ्यसेत् (जा०दर्शनो० ३.२) अर्थात् जिसमें घुटनों और जंघाओं के बीच दोनों पैरों को सम्यक् प्रकार से रखकर ग्रीवा, मस्तक और शरीर को समान भाव से धारण कर (अथवा एक सीध में रखकर) अभ्यास किया जाता है, वह स्वस्तिकासन कहलाता है। ख. गोमुखासन- गोमुख आसन की स्थिति इस प्रकार वर्णित है- सव्ये दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठपार्श्वे नियोजयेत्। दक्षिणेऽपि तथा सव्यं गोमुखं तत्प्रचक्षते (जा० दर्शनो० ३.३) अर्थात् दाहिने पैर के गुल्फ (टखने) को बायीं ओर के पृष्ठ पार्श्व (नितम्ब) के नीचे ले जाये और बायें पैर के गुल्फ को दायीं ओर के पृष्ठ पार्श्व के नीचे ले जाकर बैठे-यह गोमुखासन कहलाता है। कुछ ग्रन्थों में गोमुखासन में उपर्युक्त स्थिति के अतिरिक्त दायें हाथ को सिर को तरफ से तथा बायें हाथ को नीचे होकर पीठ पर ले जाकर दायें हाथ की तर्जनी अँगुली से बायें हाथ की तर्जनी अँगुली को मजबूती से पकड़ने का भी उल्लेख मिलता है। ग. पद्मासन- जाबालदर्शन उपनिषद् ३.४-५ में पद्मासन इस प्रकार परिभाषित है-अङ्गुष्ठावधि गृह्णीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण तु ।। ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्र कृत्वा पादतलद्वयम्। पद्मासनं भवेत्प्राज्ञ सर्वरोगभयापहम् अर्थात् जंघाओं के ऊपर दोनों पाद तलों को स्थिर करके(रखकर)दोनों हाथों से (पीछे होकर) पैरों के अँगूठों को पकड़कर स्थिरता से बैठना पद्मासन कहलाता है। कुछ ग्रन्थों में इस स्थिति में दृष्टि को नासाग्र पर स्थिर रखना तथा चिबुक (ठोड़ी) को हृदय के पास सटाकर रखने का भी उल्लेख मिलता है। यह आसन समस्त रोगों के भय से मुक्ति दिलाने वाला है। घ. वीरासन- वीरासन की स्थिति इस प्रकार है-दक्षिणेतरपादं तु दक्षिणोरुणि विन्यसेत्। ऋजुकायः समासीनो वीरासनमुदाहृतम् (जा० दर्शनो० ३.६)। जाबालदर्शन उपनिषद् में वीरासन की स्थिति संक्षेप में वर्णित है; किन्तु हठयोग प्रदीपिका में इसका उल्लेख अधिक स्पष्ट है- यथा-एकं पादं तथैकस्मिन्विन्यसेदूरुणि स्थितम्। इतरस्मिंस्तथा चोरुं वीरासनमितीरितम् (हठ०प्र० १.२१) अर्थात् दक्षिण पाद वाम ऊरु पर और वाम पाद दक्षिण ऊरु (जंघा) पर रखकर शरीर को सीधा रखने से वीरासन की स्थिति बनती है। ङ. सिंहासन - सिंहासन का स्वरूप इस प्रकार है-गुल्फौ च वृषणस्याधः सीविन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत्। दक्षिणं सव्यगुल्फेन दक्षिणेन तथेतरत् ॥ हस्तौ जानौ ...............योगिभिः सदा (जा० दर्शनो० ३.६.१-३) अर्थात् दक्षिण टखने (गुल्फ) को बायीं ओर वृषण के नीचे सीवन के बगल में रखे, इसी प्रकार बायें टखने को दायीं ओर वृषण के नीचे सीवन के बगल में रखे, तत्पश्चात् दोनों हाथों को दोनों घुटनों पर जमाकर तथा अँगुलियाँ फैलाकर मुख को भी खोलकर फैलाए तथा दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर केन्द्रित करे। यह सिंह नामक आसन सदैव योगियों द्वारा पूजित है। कुछ ग्रन्थों में उपर्युक्त स्थिति में जीभ को बाहर निकाल कर ठोड़ी पर लगाने तथा सिंह को तरह आवाज निकालने का भी उल्लेख प्राप्त होता है।
आस्तिकता ३५६ परिशिष्ट
च. भद्रासन— भद्रासन इस प्रकार है-गुल्फौ तु वृषणस्याधः सीविन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत्। पार्श्वपादौ च पाणिभ्यां दृढं बद्ध्वा सुनिश्चलम्॥ भद्रासनं भवेदेतद्विषरोगविनाशनम् (जा०दर्शनो० ३.७) अर्थात् इस आसन में दोनों पैरों के गुल्फों (टखनों) को वृषण के नीचे सीवन के दोनों पार्श्व भागों में इस प्रकार रखा जाता है कि बायाँ टखना सीवन के वाम पार्श्व में और दायाँ टखना सीवन के दक्षिण पार्श्व भाग में स्थिर हो जाए। इसके बाद सीवन के पार्श्व भागों में स्थित पैरों का हाथों द्वारा दृढ़तापूर्वक पकड़कर स्थिर हुआ जाता है। भद्रासन विष से उत्पन्न रोगों का विनाशक है। छ. मुक्तासन— मुक्तासन की स्थिति इस प्रकार है-निपीड्य सीविनीं सूक्ष्मां दक्षिणेतरगुल्फतः। वामं याम्येन गुल्फेन मुक्तासनमिदं भवेत् (जा०दर्शनो०३.८-९) अर्थात् सीवन को सूक्ष्म रेखा को बायें टखने से दबाकर, बायें टखने को दायें टखने से दबाकर बैठने की स्थिति मुक्तासन कहलाती है। इसकी दूसरी विधि इस प्रकार बतायी गई है-मेढ्रादुपरि निक्षिप्य सव्यं गुल्फं ततोपरि। गुल्फान्तरं च संक्षिप्य मुक्तासनमिदं मुने (जा० दर्शनो० ३.९) अर्थात् उपस्थ (लिङ्ग) के ऊपर बायें टखने को स्थिर करके, बायें टखने पर दायें टखने को स्थिर करके बैठने की स्थिति भी मुक्तासन कहलाती है। ज. मयूरासन—मयूरासन की परिभाषा इस प्रकार विवेचित है-कूर्पराग्रं मुनिश्रेष्ठ निक्षिपेत्राभिपाश्वयोः॥ भूम्यां पाणितलद्वन्द्वं निक्षिप्यैकाग्रमानसः। समुन्नताशिरः पादो दण्डवद्व्योम्नि संस्थितः॥ मयूरासनमेतत्स्या-त्सर्वपापप्रणाशनम् (जा० दर्शनो० ३.१०-१२) अर्थात् दोनों हथेलियों को भूमि पर टिकाकर, कोहनियों के आगे के भाग को नाभि के दोनों पाश्वों में स्पर्श करके स्थिर चित्त होकर सिर और पादों को ऊँचा करके आकाश में दण्डवत् (पृथिवी के समानान्तर) होकर स्थित हो जाये। यह मयूर नामक आसन समस्त पापों का विनाश करने वाला है। झ. सुखासन— सुखासन का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है-येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते॥ तत्सुखासनमित्यु- क्तमशक्तस्तत्समाश्रयेत् (जा० दर्शनो० ३.१२-१३) अर्थात् जिस प्रकार भी बैठने से सुख और धैर्य बना रहे, वही सुखासन कहलाता है। अशक्त साधकों को इसी आसन का आश्रय लेना चाहिए। ञ. सिद्धासन— उपर्युक्त नौ आसनों के अतिरिक्त एक अन्य आसन 'सिद्धासन' भी प्रचलित है। उसकी स्थिति इस प्रकार वर्णित है-बायें पैर की एड़ी को सीवन के मध्य में मजबूती पूर्वक इस प्रकार स्थिर करके कि उसका तलवा दायें पैर की ऊरु (जंघा) को छूता हुआ हो। इसी प्रकार दायें पैर को लिङ्ग की जड़ के ऊपर इस तरह स्थापित करे कि उसका तलवा बायें पैर को जंघा का स्पर्श करे। तदुपरान्त बायें पैर के अँगुठे और तर्जनी को दायें पैर की जंघा और पिण्डली के बीच में ले ले तथा इसी तरह दायें पैर के अँगुठे और तर्जनी को बायें पैर को जंघा और पिण्डली के बीच में ले ले, यह सिद्धासन कहलाता है। कुछ ग्रन्थों में इस स्थिति में ठोड़ी को हृदय के समीप रखकर दृष्टि को भृकुटि के मध्य में स्थिर करने का वर्णन भी मिलता है। यह आसन मोक्ष कपाट का भेदन करने वाला कहा गया है-योनिस्यानकमंघ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेन्मेढे पादमथैकमेव हृदये कृत्वा हनुं सुस्थिरम्॥ ......सिद्धासनं प्रोच्यते (हठ० प्र० १.३५)। ५२. आस्तिकता - द्र०-ज्ञानखण्ड। ५३. आहवनीय — वैदिक ग्रन्थों में अग्नियों के अनेक प्रकार वर्णित हैं। जैसे-आहवनीय अग्नि, गार्हपत्य अग्नि और दक्षिणाग्नि आदि। अथर्ववेद ९.७.१३ में इन तीनों अग्नियों की संक्षिप्त परिभाषा इस प्रकार दी गई है- योऽतिथीनां स आहवनीयो यो वेश्मनि स गार्हपत्यो यस्मिन् पचन्ति स दक्षिणाग्निः अर्थात् जिस अग्नि से अतिथियों (देवों) का आवाहन किया जाता है, वह आहवनीय, गृहस्थित अग्नि गृहपति तथा अन्नपाचन करने वाली अग्नि को दक्षिणाग्नि कहते हैं। इन्हें श्रौत अग्नियां भी कहते हैं। महाराज मनु ने गार्हपत्य अग्नि को पिता, दक्षिणाग्नि को माता तथा आहवनीयाग्नि को गुरु की संज्ञा प्रदान की है-'पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः। गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी' (मनु० २.२३१)। कात्यायन यज्ञ पद्धति विमर्श में पारिभाषिक शब्दकोश के अन्तर्गत आहवनीय कुण्ड का भी नाम है। जिसमें आहवनीयाग्नि द्वारा देवों का आवाहन किया जाता है, उसे आहवनीय खर (कुण्ड) कहते हैं, जिसका स्थान यज्ञशाला में पूर्व की ओर होता है- आहूयन्तेऽस्मिन्नाहुतयइत्याहवनीयः। गार्हपत्याग्नि का स्वरूप सात्विक है, यज्ञशाला में गार्हपत्य खर (कुण्ड) का स्थान पश्चिम की ओर होता है। दक्षिणाग्नि का स्वरूप रजोगुणी है, यज्ञशाला में इसका स्थान दक्षिण की ओर होता है। कठरुद्रोपनिषद् में भी आहवनीय, दक्षिणाग्नि और गार्हपत्य अग्नियों का उल्लेख हुआ है- ......गार्हपत्यदक्षिणा- ग्न्याहवनीयेषु अरण्यिदेशाद्भस्ममुष्टिं पिबेदित्येके (कठरुद्रो० ३)। आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और सभ्य-ये श्रौत अग्नियों तथा आवसथ्य अग्नि स्मार्त कही जाती है।
परिशिष्ट ३५७ उपरति ५४. इड़ा — द्र०-ज्ञानखण्ड-सुषुम्ना नाड़ी। ५५. इन्द्रयोनि-वेदयेानि —द्र०-कपालाष्टक। ५६. इन्द्रियाँ — द्र०-ज्ञानखण्ड- अन्तःकरण चतुष्टय। ५७. इष्ट— भारतीय धर्म ग्रन्थों में इष्ट एक बहुप्रचलित शब्द है। जिसका सामान्य अर्थ है-अभिलषित, चाहा हुआ अथवा वाञ्छनीय। वाचस्पत्यम् पृ० १९० में इष्ट की व्युत्पत्ति इस प्रकार विवेचित है- इष्ट त्रि० इष कर्मणि क्त। अभिलषिते, प्रिये ........। यज्ञ, संस्कार तथा एरण्ड वृक्ष आदि शब्दों के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है। अपने पूजित देव के लिए भी इष्ट शब्द प्रयुक्त होता है। जैसे-किसी के इष्ट देव हनुमान् जी हैं, तो किसी के गणपति और किसी के राम और कृष्ण। इच्छा के विषय में भी इस शब्द का प्रयोग कई जगह होता है, जैसे- सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् (गी०-३.१०)। ५८. ईशान—द्र०- त्र्यम्बक। ५९. ईश्वर पूजन—द्र०- नियम। ६०. उञ्छवृत्ति — द्र०- गृहस्थ। ६१. उड़्डियान बन्ध—द्र०- बन्ध। ६२. उत्तरायण — ज्योतिर्विदों ने सम्पूर्ण आकाश मण्डल को दो भागों में विभक्त किया है- १. विषुवत् (मध्य) रेखा का उत्तरीभाग, २. विषुवत् रेखा का दक्षिणी भाग। सूर्य वर्षभर में छः माह उत्तरी भाग और छः माह दक्षिणी भाग में दृश्यमान होता है। जब सूर्य मकर रेखा से उत्तर (कर्क रेखा) की ओर जाता है, तो उसे उत्तरायण कहा जाता है तथा जब सूर्य कर्क रेखा से दक्षिण (मकर रेखा) की ओर जाता है, तो उसे दक्षिणायन कहा जाता है। यह ६-६ मास का समय होता है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार-भानोर्मकरसंक्रान्तेः षण्मासा उत्तरायणम्। सूर्य मकर संक्रान्ति से छः मास तक उत्तर की ओर रहता है, इस काल को उत्तरायण कहा जाता है। उत्तरायण में शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतुएँ परिगणित की जाती हैं। “शिशिरश्च वसन्तोऽपि ग्रीष्मः स्यादुत्तरायणे' (हारीत)। ६३. उदुम्बर—द्र०-वानप्रस्थ। ६४. उन्मनी अवस्था—द्र० - अमनस्क स्थिति। ६५. उन्मनी भाव—द्र०- अमनस्क स्थिति। ६६. उपदेष्टा — सामान्यतः उपदेष्टा धर्म का उपदेश करने वाले को कहते हैं, इसीलिए इसके लिए धर्मोपदेशक या उपदेशक शब्द भी प्रयुक्त होता है। वाचस्पत्यम् के अनुसार उपदेष्टा शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- उपदेष्टृ-पु० उप+दिश-तृच्। १. गुरौ कर्मोपदेशके २. आचार्ये अर्थात् कर्मोपदेशक और गुरु तथा आचार्य के अर्थ में उपदेष्टा शब्द का प्रयोग किया जाता है। आचार्य के अर्थ में ऋत्विजों को भी परिगणित किया गया है; क्योंकि वे यज्ञादि कर्मों में प्रत्यक्ष मार्गदर्शन (उपदेश) देते हैं। शास्त्र मान्यता है कि आचार्यों, ऋत्विजों के रूप में स्वयं भगवान् हरि ही कर्म का उपदेश प्रदान करते हैं- चत्वारो वयमृत्विजः स भगवान् कर्मोपदेष्टा हरिः" वेणी० (वाच०पृ० १२११)। भारतीय संस्कृति में उपदेष्टा की बहुत महत्ता है; क्योंकि वह जो कुछ उपदेश करता है, उसे पहले अपने जीवन में उतारता है, इसलिए वह आचरणीय होता है। इसी कारण उपदेष्टा का दूसरा नाम आचार्य है। वैसे तो गुरु को गोविन्द (ब्रह्म) से भी बड़ा बताया गया है तथा प्रणाम-अभिवादन के क्रम में गोविन्द से पहले गुरु को प्रणाम करने का परामर्श दिया गया है- गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय (कबीर); किन्तु उपदेशक की अर्चना गुरु से भी पूर्व करने का शास्त्रीय विधान मिलता है- तस्योपदेष्टारमपि पूजयेच्च ततो गुरुम् (वाच०पृ० १२११)। ६७. उपनयन—द्र०-अनुपवीत। ६८. उपरति — जीवन के चार लक्ष्यों में मोक्ष प्राप्ति अन्तिम लक्ष्य है। इसकी प्राप्ति के लिए साधक को षट्सम्पत्तियों का आश्रय लेना पड़ता है। ये षट्सम्पत्तियाँ- शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान कहलाती हैं। इनमें उपरति का
उपराम ३५८ परिशिष्ट
बहुत महत्त्व है। प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् के अनुसार 'उपरति' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- उप+रम+क्तिन्। जिसके कई अर्थ होते हैं, जैसे-विरति (विरक्ति), मृत्यु, प्राप्त विषयों के प्रति इन्द्रियों की उदासीनता तथा विहित कर्म विधान का संन्यास की स्थिति में परित्याग (विहित कर्मणाम् विधानतस्त्यागरूपे संन्यासे "पुमर्थः कर्मणा नेति धीर्या सोपरतिर्भवेत्"-वाच०पृ० १२८३); किन्तु विषयों से वैराग्य या उनके प्रति उदासीनता के भावार्थ में ही उपरति का अधिक प्रचलन है। अध्यात्मोपनिषद् मंत्र २८ में उपरति का उल्लेख इस रूप में आया है- वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम् । स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम् (अध्यात्मो० २८) अर्थात् वैराग्य का प्रतिफल बोध (आत्मज्ञान) है और बोध (ज्ञान) का फल उपरति अर्थात् विषयों से विरक्ति है। (उपरति के फलस्वरूप) आत्मानन्द से जो शान्ति प्राप्त होती है, वह उस उपरति का ही फल है। अतः आसक्ति ही अशान्ति और उपरति ही शान्ति का कारण है। उपरति धारण करने वाले साधक को उपराम कहते हैं। ६९. उपराम - द्र०-उपरति। ७०. उपवीत - द्र०-अनुपवीत । ७१. उपाधि - द्र०-ज्ञानखण्ड । ७२. ऊर्ध्वपुण्ड्र - द्र०-त्रिदण्ड-त्रिपुण्ड्र। ७३. ऊर्ध्वरेता - ऊर्ध्वरेता शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-ऊर्ध्वमूर्ध्वंगं नाधः पतत् रेतो यस्य अर्थात् जिसका रेतस् (वीर्य) अधोगामी न होकर ऊर्ध्वगामी हो गया हो, उसे ऊर्ध्वरेता कहा जाता है। रेतस्, पौरुष का प्रतीक है। अधिकांश लोगों का रेतस् अधोगामी होता है; किन्तु जिसके वीर्य को गति नीचे को ओर जाने से रुककर ऊर्ध्वगामी हो जाती है, वह ऊर्ध्वरेता कहलाता है-रेतो हि पुंचिह्नेन प्रायः सर्वेषामधो गच्छति यस्तस्य अधोगतिं संरुणद्धि स ऊर्ध्वरेता इत्युच्यते (वाच० पृ० १३९२)। इसलिए अखण्ड ब्रह्मचारी को भी ऊर्ध्वरेता कहा जाता है। जैसे- भीष्म, हनुमान्, सनकादिमुनि, भगवान् महादेव आदि। भीष्म (देवव्रत) ने अपने पिता शान्तनु के अभीष्ट विवाह के लिए स्वयं विवाह नहीं किया। अतः वे आजीवन ब्रह्मचारी रहने के कारण ऊर्ध्वरेता नाम से प्रख्यात हो गये। शंकर का भी एक नाम ऊर्ध्वरेता है- ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशायी नभस्थलः (वाच० १३९२)। जाबाल दर्शनोपनिषद् के नवें खण्ड में भी भगवान् शंकर की स्तुति में ऊर्ध्वरेता शब्द आया है-ऊर्ध्वरेतं विश्वरूपं विरूपाक्षं महेश्वरम्। सोऽहमित्यादरेणैव ध्यायेद्योगीश्वरेश्वरम् (जा० दर्शनो० ९.२)। इस प्रकार शास्त्रों में ऊर्ध्वरेता की बहुत महिमा गायी गई है; क्योंकि अधोगामी रेतस् जहाँ कुछ ही सृजनात्मक कार्य कर पाता है, वही ऊर्ध्वगामी रेतस् से चित्त के एकाग्र होने, चिन्तन परिष्कृत होने से लेकर विभिन्न महत्त्वपूर्ण ऋद्धियों-सिद्धियों का स्वामी बना देता है। हनुमान् जैसे भक्त इसी शक्ति के सहारे 'अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता' बन गये थे। ७४. ऋचा - ऋचा शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- ऋच्यते स्तूयतेऽनया (वाच०) अर्थात् जिससे देवों की स्तुति या अर्चना की जाती है, वह ऋचा है। सामान्य रूप से ऋचा का अर्थ स्तुति या पूजा से लिया जाता है। वैदिक मंत्रों के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है; किन्तु विशेष रूप से ऋग्वेद के मंत्रों को ऋचा कहा जाता है। डॉ० राजबली पाण्डेय ने भी हिन्दू धर्मकोश में लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में देवताओं के सम्मानार्थ उनकी जो स्तुति को जाती थी, उन्हें ऋक् या ऋचा कहते थे। ऋग्वेद ऐसी ही ऋचाओं का संग्रह है, इसीलिए उसका नाम ऋग्वेद पड़ा। ७५. ऋत - द्र०-ज्ञानखण्ड-ऋत-सत्य। ७६. ऋत्विक् - द्र०-ज्ञानखण्ड- ऋत्विज्। ७७. ऋषि-द्र०-ज्ञानखण्ड । ७८. एकत्व-द्र०-ज्ञानखण्ड-एकत्व-ऐक्य। ७९. एषणात्रय - द्र०-ज्ञानखण्ड । ८०. ओंकार - द्र०-ज्ञानखण्ड । ८१. कपालाष्टक - प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में योग विषयक विवेचन में कपालाष्टक शब्द का उल्लेख मिलता है। योग के आठ अंग बताये गये हैं। इन्हीं आठ अङ्गों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) को
परिशिष्ट ३५९ कला कपालाष्टक भी कहते हैं। कपालाष्टक की व्याख्या करते हुए उपनिषद् व्याख्याकार ब्रह्मयोगी ने लिखा है-'कं परमसुखमसुखकामादिवृत्तिभ्यः पृथक् कृत्य पालयन्तीति कपालानि योगाङ्गानि (परब्रह्मो० २ टीका) अर्थात् 'क' से तात्पर्य परमसुख प्रदाता और कामादिवृत्तियों से उत्पन्न होने वाले असुख (कष्ट) को पृथक् करके पाल अर्थात् साधक का पालन-पोषण करने वाले कृत्य कपाल (योगाङ्ग) कहलाते हैं। इनके अष्टक की ही कपालाष्टक कहते हैं, जो कि योगदर्शन में आसन-प्राणायाम आदि आठ अङ्ग प्रख्यात हैं-तेषामष्टकं यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहा- रधारणाध्यानसमाध्यात्मकं कपालाष्टकमष्टाङ्गयोगमनुसन्धाय यथावदभ्यस्य तद्बलेन चित्तगतमालिन्यं संक्षाल्य निर्विशेषज्ञानमवाप्य कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः (परब्रह्मो० २ टीका) अर्थात् यम नियमादि अष्टाङ्ग योग अथवा कपालाष्टक का यथावत् अभ्यास करने से उत्पन्न ऊर्जा द्वारा चित्तगत मलिनता धुल जाती है, जिससे साधक निर्विशेष ज्ञान को प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाता है। इसी प्रक्रिया (कपालाष्टक-अष्टांगयोग) द्वारा हृदय स्थल में जो स्तन या कदली पुष्पवत् लटका रहता है और योग के समय ऊपर उठता हुआ विकसित होता है। इसी में वह ईश्वर जाग्रत् रहता है। इस प्रकार अपने हृदय कमल में ध्यान करने वाला शुभाशुभ से परे होकर कर्मों से निर्लिप्त हो जाता है-तदैवं कपालाष्टकं संधाय य एव स्तन इवावलम्बते। सेन्द्रयोनिः वेदयानिरिति। ......कर्मभिर्न लिप्यते (परब्रह्मो० २)। ८२. कर्मफल - द्र० - ज्ञानखण्ड। ८३. कर्म संन्यासी-द्र- अवधूत । ८४. कर्मेन्द्रियाँ- द्र०- ज्ञानखण्ड-अन्तःकरण चतुष्टय। ८५. कला - कला एक व्यापक अर्थवाला तथा बहुप्रचलित शब्द है। वाचस्पत्यम् पृष्ठ १७८३ में कला की व्युत्पत्ति इन शब्दों में विवेचित है-कलयति कलते वा कर्त्तरि अच्, कल्यते ज्ञायते कर्मणि अच् वा अर्थात् जो किसी के कर्म अथवा स्थिति को द्योतित करती है,वह कला है। जैसे चन्द्रमा के सोलहवें भाग की उसकी एक कला कहते हैं- चन्द्रमण्डलस्य षोडशे भागे यथा च चन्द्रस्य षोडशभागस्य कला शब्द वाच्यत्वम् (वाच० पृ०१७८३)। यों तो तिथियाँ पन्द्रह होती हैं; किन्तु प्रतिपदा से चतुर्दशी तक १४ तिथियाँ दोनों पक्षों (शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष) में उभयनिष्ठ हैं। इनमें चन्द्रमा के घटने-बढ़ने की १४ कलाएँ होती हैं। अमावस्या और पूर्णिमा में, एक में चन्द्रमा बिल्कुल नहीं दीखता व दूसरे में पूरा दीखता है, अतः ये भी दो कलाएँ होने से १४+२=१६ कलाएँ कहलाती हैं। चन्द्रमा की सोलह कलाओं के नाम इस प्रकार हैं-अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीतिरङ्गा, पूर्णा तथा स्वरजा। इसी प्रकार सूर्य की भी द्वादश कलाएँ वर्णित हैं। इन्हें द्वादशादित्य भी कहते हैं। सूर्य की कलाएँ इस प्रकार हैं-तपिनी, तापिनी, धूम्रा, मरीचि, ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्ना, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी और क्षमा। वैसे कुल चौंसठ कलाएँ बतायी गई हैं; जो पूर्णतया परब्रह्म में मानी जाती हैं। वैदिक मान्यतानुसार परब्रह्म का त्रिपाद ऊर्ध्वलोकों में और एक पाद (चतुर्थांश) भूलोक (विश्व ब्रह्माण्ड के रूप में) व्याप्त है (त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहा भवत्पुनः - ऋ० १०.९०.४)। इसी कारण भूलोक पर १६ कलाएँ ही विद्यमान हैं और इन्हें 'पूर्ण कला' कहा जाता है। अवतारों के विषय में भी उनकी दस कलाओं, बारह कलाओं, सोलह कलाओं का उल्लेख मिलता है, जो उनकी विशेषताओं, शक्ति व स्थिति का बोध कराती हैं। जैसे राम बारह कला के और कृष्ण सोलह कला के अवतार माने जाते हैं। वस्तुतः जीव मात्र में एक-दो कलाएँ होती हैं और जैसे-जैसे वह अपने को विकसित करता जाता है; वैसे-वैसे उसको कलाएँ भी बढ़ती जाती हैं। जैसे उद्भिज्जों-वृक्ष, लता, गुल्म आदि में एक (अन्नमय) कला होती है अर्थात् ये भोजन ग्रहण करते व विकसित होते हैं; इसी प्रकार स्वेदजों (मक्खी, मच्छर, जूँ, लीख आदि) में दो (अन्नमय व प्राणमय) कलाएँ होती हैं। अण्डजों (कबूतर, चिड़िया, तोता, मयूर आदि) में तीन (अन्नमय, प्राणमय व मनोमय) कलाएँ होती हैं। जरायुजों (घोड़ों, कुत्तों, हाथियों व गाय-भैंस आदि) में चार (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय) कलाएँ होती हैं। मानव श्रेणी उपर्युक्त जीवों के बाद की सृष्टि में गिनी जाती है। मानवों में अन्नमय, प्राणयम, मनोमय, विज्ञानमय के अतिरिक्त आनन्दमय कला भी पायी जाती है। कुछ विशिष्ट मनुष्यों में उपर्युक्त पाँच कलाओं (पंचकोशों) के अतिरिक्त तीन अन्य कलाएँ भी देखी जाती हैं। जो इस प्रकार हैं- १. अतिशायिनी कला २. विपरिणामिनी कला ३. संक्रामिणी कला। प्रथम अतिशायिनी कला के कारण ही आद्यशंकराचार्य ने दस-बारह वर्ष की अवस्था में वह कार्य कर लिया था, जो सामान्य व्यक्ति के लिए कल्पनातीत होते थे। द्वितीय विपरिणामिनी कला के द्वारा साधक अणिमा आदि आठ सिद्धियों के माध्यम से शरीर को हल्का-भारी,
कल्पान्त ३६० परिशिष्ट छोटा-बड़ा करके परकाया प्रवेश भी कर सकते हैं। तृतीय संक्रामिणी कला के द्वारा साधक अपनी शक्ति दूसरों में भी प्रविष्ट कर सकते हैं, जैसे रामकृष्ण परमहंस जी ने स्वामी विवेकानन्द में शक्तिपात किया था और योगेश्वर कृष्ण ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। उपर्युक्त कलाएं मानवों तक सीमित हैं, इसके ऊपर की ९ से १६ तक की कलाएँ देवों व अवतारों में होती हैं। पूर्णकलाएँ १६ मानी गई हैं अर्थात् पूर्ण अवतार षोडश कलायुक्त होता है। देवों-अवतारों की ८ कलाएँ इस प्रकार हैं- १. प्रभ्वी २. कुण्ठिनी ३. विकासिनी ४. मर्यादिनी ५. संहादिनी ६. आह्लादिनी ७. परिपूर्ण ८. स्वरूपावस्थिति। इनमें प्रभ्वी का अर्थ ईश्वर की उस परिभाषा से सम्बन्धित है, जिसमे उन्हें 'कर्तुं अकर्तुं अन्यथाकर्तुं समर्थं प्रभु' कहा गया है अर्थात् असम्भव को भी संभव कर दिखाना-जैसे खम्भे में से नृसिंह अवतार। कुण्ठिनी कला से पंचमहाभूत या विषादि को प्रभावरहित किया जा सकता है, जैसे शिव ने विष प्रभाव कम करके ही हलाहल पान किया था। विकासिनी कला के द्वारा ही भगवान् वामन ने तीन पगों में समूचे ब्रह्माण्ड को नाप लिया था। मर्यादिनी कला के द्वारा श्रीराम सर्वशक्ति सम्पन्न होते हुए भी मर्यादाओं में बँधे रहे व मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। संहादिनी कला से भगवान् कृष्ण ने अनृतु में फूल-फल आदि उत्पन्न करके प्रकृति के नियम में हस्तक्षेप कर दिया था। आह्लादिनी कला से ही राधिका ने नित्य कृष्ण जी के साथ रहकर उनका अनुरञ्जन किया था। स्वरूपावस्थिति कला के द्वारा सम्पूर्ण कलाओं की समेट कर अपने मूलरूप में अवस्थित हुआ जा सकता है, जैसे-द्वापर में श्री कृष्ण जी ने अपनी सभी कलाओं को समेटकर मूल रूप में धारण किया था, जिससे उन्हें पूर्ण अवतार माना जाता है। उपर्युक्त कलाओं के अतिरिक्त अन्य भी लौकिक कलाएँ हैं, जैसे-वास्तुकला, चित्रकला, हस्तकला, काष्ठकला, स्थापत्यकला, वक्तृताकला, संगीतकला, नृत्यकला आदि। ८६. कल्पान्त - भारतीय कालगणना के क्रम में 'कल्प' का उल्लेख किया जाता है। यह एक बहुत लम्बी अवधि होती है। सृष्टि का कालचक्र चार युगों में विभक्त है। सतयुग (कृतयुग), त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। इनमें सतयुग की अवधि १७,२८,००० वर्ष, त्रेतायुग की १२,९६,००० वर्ष, द्वापरयुग की ८,६४,००० वर्ष तथा कलियुग की अवधि ४,३२,००० वर्ष मानी गई है। चारों युगों की सम्मिलित अवधि ४३,२०,००० वर्ष की एक चतुर्युगी कहते हैं। इस प्रकार की एक सहस्र चतुर्युगी का ब्रह्माजी का एक दिन और इतनी ही बड़ी एक रात्रि होती है। एक हजार चतुर्युगी अथवा ब्रह्मा का एक दिन 'कल्प' कहलाता है। तदुपरान्त प्रलय की स्थिति आती है, जिसमें सब कुछ विनष्ट हो जाता है। इस अवधि को कल्पान्त कहते हैं। इस प्रकार कल्प का साधारण अर्थ हुआ सृष्टि रचना से लेकर उसके विनाश तक का समय। विद्वानों का कहना है कि अब तक ब्रह्माजी के ५० वर्ष बीत चुके हैं, ५१ वाँ वर्ष चल रहा है, जिसके तीन युग बीत चुके हैं, चौथा चल रहा है। युगों की काल-गणना के अनुसार एक कल्प की अवधि चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष मानी जाती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार कलियुग की आयु १२०० वर्ष, द्वापर २४०० वर्ष, त्रेता की ३६०० वर्ष और सतयुग की आयु ४८०० वर्ष है। इस प्रकार एक चतुर्युगी १२००० वर्षों की हुई तथा ७१ चतुर्युगी का एक मन्वन्तर तथा १४ मन्वन्तरों का एक कल्प होता है। अस्तु, १४ मन्वन्तरों के समापन की अवधि कल्पान्त कहलाती है। ८७. कामना - द्र०-ज्ञानखण्ड-षड्रिपु-षड्वर्ग। ८८. कुटीचक - द्र० - अवधूत। ८९. कुण्डलिनी- भारतीय योग शास्त्रों में कुण्डलिनी महाशक्ति का बहुत महत्त्व है। कहते हैं कि यदि किसी साधक की कुण्डलिनी जाग जाये, तो वह सभी ऋद्धियों-सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। तांत्रिक मतानुसार इसे परमेश्वर की वह पराशक्ति कहा गया है, जो प्रत्येक जीव के शरीर में प्रसुप्तावस्था में रहती है। यह मनुष्य देह में मेरुदण्ड से नीचे मूलाधार (गुदा और उपस्थ के मध्य स्थित चक्र) में कुण्डली मारकर सर्पिणी की तरह स्थित है, इसीलिए इसका नाम कुण्डलिनी पड़ा है। तन्त्रसार में इसे एक देवी माना गया है, जो षट्चक्रों के अन्तर्गत मूलाधार में सूक्ष्म रूप से निवास करती है। कुण्डलिनी के सन्दर्भ में उल्लेख है कि वह स्वयम्भू लिङ्ग में साढ़े तीन चक्कर लगाये देवी रूप (सर्पिणी रूप) में प्रतिष्ठित है। करोड़ों विद्युतप्रभा के प्रकाश की तरह देदीप्यमान तथा उदीयमान सूर्य की कान्ति वाली उस कुण्डलिनी का ध्यान करते हुए साधक दृढ़ासन पर बैठकर श्वासोच्छ्वास प्रक्रिया (प्राणायाम) द्वारा प्राण मन्त्र (गायत्री मन्त्र) से उसे उठाकर (जाग्रत् करके) मन की एकाग्रता तथा सम्पूर्ण शुभ-शान्ति प्राप्त करते हैं-ध्यायेत् कुण्डलिनीं सूक्ष्मां मूलाधारनि- वासिनीम्। तामिष्टदेवतारूपां सार्द्धत्रिवलयान्विताम् ॥ कोटिसौदामिनीभासां स्वयम्भूल्लिङ्गवेष्टिनीम्। तामुत्थाप्य महादेवीं प्राणमन्त्रेण साधकः ॥ उद्यद्दिनकरद्योतां ..... चिन्तयेत् (श०क० खण्ड २, पृ० १४०) !
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परिशिष्ट ३६१ कैवल्य विवेक मार्तण्ड में कुण्डलिनी शक्ति का स्वरूप इस प्रकार विवेचित है कि वह कुण्डलिनी देदीप्यमान सर्पाकार कमल नाल के समान शुभ प्रतिफल प्रदान करने वाली है, जो योगविद्या के जानकारों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाली तथा इस विद्या से अनभिज्ञ व्यक्तियों के लिए बन्धन का कारण है। मानवी काया में कन्दस्थल (उपस्थ के ऊपर और नाभि से नीचे स्थित नाड़ियों का गुच्छक) के ऊपर अष्टप्रकृति वाली कुण्डलिनी शक्ति वलयाकार में ब्रह्मरंध्र के द्वार को अपने मुख से आच्छादित किए (रोके) हुए प्रसुप्तावस्था में है। साधक हठयोग, प्राण साधना द्वारा उस कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत् करके मानो मोक्ष प्राप्ति के द्वार ब्रह्मरंध्र में लगे ताले को ताली (चाभी) द्वारा खोलता है-प्रस्फुरद् भुजगाकारा पद्मतन्तुनिभा शुभा। मूढानां बन्धिनी सास्ति योगिनां मोक्षदायिनी ॥ कन्दोर्ध्वं कुण्डली शक्तिरष्टधा कुटिलाकृतिः । ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठति ॥ येन मार्गेण .......................मोक्षद्वारं प्रभेदयेत् (वि०मार्त० ५२-५६)। जाबाल दर्शनोपनिषद् में कुण्डलिनी का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है- नाभिकन्दादधः स्थानं कुण्डल्या द्वयङ्गुलं मुने । अष्टप्रकृतिरूपा सा कुण्डली मुनिसत्तम (जा०दर्शनो० ४.११) अर्थात् नाभि स्थल से दो अंगुल नीचे अष्ट प्रकृति (पृथिवी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) से युक्त वह कुण्डलिनी शक्ति निवास करती है। कुण्डलिनी शक्ति के सन्दर्भ में महायोग विज्ञान में उल्लेख है कि जिसकी मूलाधार शक्ति प्रसुप्त है, उसका सारा संसार प्रसुप्त है; जिसकी कुण्डलिनी जगी, समझना चाहिए कि उसका भाग्योदय हो गया है। योगिनी तंत्र के अनुसार कुण्डलिनी के जागते ही अन्तराल में छिपा वैभव अनायास ही दृष्टिगोचर होने लगता है। कुण्डलिनी जाग्रत् कर लेने वाले साधक के लिए जगत् में कुछ भी असंभव नहीं। ९०. कूटस्थ — द्र०-ज्ञानखण्ड। ९१. कृच्छ्र चान्द्रायण — कृच्छ्र शब्द का सामान्य अर्थ कष्टसाध्य या कठिनाई से प्राप्त होने वाला है। शारीरिक तप या प्रायश्चित्त के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है। चन्द्रमा की कलाओं के साथ जो कष्टसाध्य प्रायश्चित्त तप किया जाता है, उसे कृच्छ्र चान्द्रायण कहते हैं। प्रायश्चित्त के अतिरिक्त यह व्रत धर्म संचय के लिए भी किया जाता है। चान्द्रायण व्रत में चन्द्र कलाओं के बढ़ने एवं घटने के अनुरूप भोजन ग्रहण किया जाता है। प्राचीन काल से ही चान्द्रायण व्रत दो प्रकार से किए जाते हैं, यवमध्य (जौ के समान बीच में मोटा एवं दोनों छोरों में पतला) एवं पिपीलिका मध्य (चींटी के समान बीच में पतला एवं दोनों छोरों में मोटा) मनु० (११.२७), याज्ञ० स्मृ० (३.३२३), वसिष्ठ स्मृ० (२७.२१), बौधा० ध०सू०(४.५.१८) आदि में चान्द्रायण व्रत (यवमध्यप्रकार) की परिभाषा इस प्रकार दी है- मास के शुक्ल पक्ष से प्रथम दिन एक ग्रास (कौर) भोजन किया जाता है, दूसरी तिथि को दो ग्रास, तीसरी तिथि को तीन ग्रास और इसी प्रकार बढ़ते-बढ़ते पूर्णिमा के दिन १५ ग्रास भोजन ग्रहण किया जाता है। तत्पश्चात् कृष्ण पक्ष के प्रथम दिन १४ ग्रास, दूसरे दिन १३ ग्रास, इस प्रकार एक-एक ग्रास कम करते-करते कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को एक ग्रास खाया जाता है और अमावस्या के दिन निराहार रहकर पूर्ण उपवास किया जाता है। दूसरी विधि (पिपीलिका मध्य) में यदि कोई कृष्ण पक्ष की प्रथम तिथि को व्रत आरम्भ करता है, तो वह एक- एक ग्रास कम करते हुए प्रथम दिन में केवल १४ ग्रास, फिर १३ ग्रास, फिर बारह ग्रास खाता है, इसी प्रकार ग्रासों में कमी करते हुए कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को केवल एक ग्रास खाता है तथा अमावस्या को एक ग्रास भी नहीं लेता। इसके उपरान्त शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन एक ग्रास लेता है और इस प्रकार बढ़ाता-बढ़ाता पूर्णमासी के दिन १५ ग्रास खाता है। इस प्रकार ये दो प्रकार के कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत होते हैं। कृच्छ्र चान्द्रायण के सन्दर्भ में आश्रमोपनिषद् में संन्यासियों की आचार संहिता के क्रम में हंस (संन्यासियों का एक प्रकार) के विषय में उल्लेख है कि वह एक दण्ड धारण करने वाले, शिखा विहीन, यज्ञोपवीतधारी, हाथ में शिक्य (छींका) और कमण्डलु धारण करने वाले, ग्राम व शहर में निर्धारित रात्रियों तक ही विश्राम करने वाले होते हैं। वे कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रत सम्पन्न करके आत्मा की प्रार्थना अर्थात् आत्म दर्शन का प्रयास करते हैं- हंसा एक दण्डधराः शिखा वर्जिता ... कृच्छ्र चान्द्रायणादि चरन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ४)। ९२. कैवल्य — हिन्दी विश्वकोश में कैवल्य शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार विवेचित है- केवलस्य औपाधिक सुखदुःखादि रहितस्य चित्स्वरूपस्य भावः अर्थात् उपाधि रूप सुख-दुःख रहित चैतन्य स्वरूप स्थिति कैवल्य है। जब व्यक्ति को विवेक का साक्षात्कार हो जाता है, तो अहंकार स्वतः ही मिट जाता है। फिर ऐसा नहीं लगता कि मैं कर्त्ता, सुखी व दुःखी हूँ। अहंकार विनष्ट हो जाने पर उसके कार्यरूप राग-द्वेष, धर्म और अधर्म आदि भी उत्पन्न नहीं हो सकते। प्रारब्ध कर्म धीरे-धीरे मिट जाते हैं और अविद्या न रहने से फिर नया संस्कार नहीं बनता तथा संस्कार के अभाव में पुनर्जन्म नहीं
क्षेत्रपाल ३६२ परिशिष्ट होता। वर्तमान शरीर का अवसान होने पर आत्मा चित् स्वरूप में अवस्थित हो जाती है। इसी अवस्था को कैवल्य कहते हैं। पातञ्जल योग सूत्र के अनुसार पुरुषार्थ से शून्य हुए गुण, जब अपने कारण में विलीन हो जाते हैं, तब उस स्थिति को कैवल्य कहते हैं अथवा चिति-शक्ति का अपने वास्तविक स्वरूप (चैतन्य स्वरूप) में प्रतिष्ठित हो जाना ही कैवल्य है। व्यक्ति त्रिगुणातीत हो जाता है, उसकी यही स्थिति कैवल्य है- पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति (पातं० यो० सू० ४/३४)। सांख्य दर्शन के अनुसार दुःख की ऐकान्तिक और आत्यन्तिक निवृत्ति ही कैवल्य है- आत्यन्तिको दुःख त्रयाभावः कैवल्यम्। हिन्दी विश्वकोश में वर्णित जैन मान्यता के अनुसार कैवल्य अवस्था मुक्ति से पूर्व होती है। ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय-ये चार कर्म विनष्ट हो जाने पर आत्मा का 'केवल' (विशुद्ध) ज्ञान प्राप्त होता है, तब समस्त पदार्थों के सभी पर्यायों को यह जीव जान जाता है (तत्त्वार्थ सूत्र टीका)। अध्यात्मोपनिषद् (१६) में कैवल्यावस्था इन शब्दों में निरूपित है- जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहोऽपि स केवलः। समाधिनिष्ठतामेत्य निर्विकल्पो भवानघ अर्थात् जो जीवित स्थिति में ही कैवल्य-स्थिति (ब्रह्मनिष्ठा) प्राप्त कर चुका हो, वह विदेह (देहरहित) हो जाने पर ब्रह्मरूप हो जायेगा। इसलिए हे पापरहित ! समाधिनिष्ठ होकर निर्विकल्प बनो। इस प्रकार जीवित रहते हुए समस्त संकल्प-विकल्पों एवं गुणों से रहित होकर केवल ब्रह्म में ही समाहित हो जाना (ब्रह्मनिष्ठ हो जाना) कैवल्यावस्था को प्राप्त कर लेना है। ९३. क्षेत्रपाल— तैंतीस कोटि देवों में क्षेत्रपाल देवता को भी परिगणित किया जाता है। सामान्यतः क्षेत्रपाल से तात्पर्य क्षेत्ररक्षक अथवा खेत का रखवाला होता है- क्षेत्रं पालयति रक्षति (हि०वि०को० खंड ५ पृ० ६२५)। प्रयोग सार में क्षेत्रपाल के ४९ भेद वर्णित हैं। जैसे-अजर, आपकुन्त, इन्द्रस्तुति, ईड़ाचार, उक्त, उन्माद और ऋषिसूदन आदि। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार-'क्षेत्रपाल शिव के अनुचर हैं।' कार्तवीर्य को भी क्षेत्रपाल कहते हैं (मत्स्य पु० ४३.२७, वा०पु० ९४.२४)। शास्त्रों में यज्ञादि देव कार्यों में भी यज्ञ की रक्षार्थ क्षेत्रपालों को आबाहित करने का विधान है-क्षेत्रपालाग्नमस्यामि सर्वारिष्टनिवारकान्। अस्य यागस्य सिद्धयर्थं पूजयाराधितान् मया (कर्म०भा०)। क्षेत्रपाल के तीन नेत्रों का उल्लेख मिलता है। इनका वर्ण नीलगिरि की तरह है। उनके मस्तक पर शुभ्र चन्द्र और सिर पर जटायें हैं। इनके चार हाथ हैं, जिनमें गदा, कपाल, रक्तवर्ण की पुष्पमाला और गन्धवस्त्र हैं। उनके कानों में सर्पकुण्डल हैं। क्षेत्रपाल की अर्चना से कान्ति, मेधा, बल, आरोग्य, तेज, पुष्टि, यश और सम्पत्ति आदि की वृद्धि होती है। समस्त प्रमुख पुण्य क्षेत्रों में एक-एक क्षेत्रपाल होते हैं, उनकी विधिवत् पूजा सम्पन्न होती है। कुमायूँ क्षेत्र में क्षेत्रपाल को कहीं भूमिया और कहीं स्वयम्भू कहते हैं। ९४. खेचरी मुद्रा— द्र०-मुद्रा। ९५. गायत्र— द्र०- ब्रह्मचारी। ९६. गार्हपत्य— द्र०- आहवनीय। ९७. गुरु— द्र०- ज्ञानखण्ड- गुरु-शिष्य। ९८. गुरुकुल— द्र०- ज्ञानखण्ड-गुरु-शिष्य। ९९. गृहस्थ— आश्रम धर्म के अनुसार चार आश्रमों में ब्रह्मचर्य के बाद दूसरा आश्रम गृहस्थ कहलाता है। लक्ष्य की दृष्टि से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से इस आश्रम में अर्थ और काम (कामनाओं) की प्राप्ति (पूर्ति) की जाती है। इसे भी २५ वर्ष का माना गया है। इसमें व्यक्ति घर में रहकर पत्नी समेत अपने कुटुम्ब का पालन-पोषण करता है। गरुड़ पुराण के अनुसार परिवार का नियमपूर्वक पालन-पोषण करता हुआ गृहस्थ साधक स्वाध्याय द्वारा ऋषि ऋण, यज्ञादि द्वारा देव ऋण और सन्तानोत्पादन (अथवा आश्रितों के परिपालन) द्वारा पितृऋण से मुक्त होता है। गृहस्थों के चार भेद हैं- वार्ताकवृत्ति, शालीनवृत्ति, यायावर और घोर संन्यासिरु। आश्रमोपनिषद् में इसका उल्लेख इन शब्दों में उपलब्ध है- गृहस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वार्त्ताकवृत्तयः शालीनवृत्तयो यायावरा घोर- संन्यासिकाश्चेति। वार्त्ताकवृत्ति गृहस्थ वे कहलाते हैं, जो कृषि एवं पशुपालन आदि आनन्दित व्यापार करते हुए सौ वर्ष तक यज्ञादि (जीवन यज्ञ) करते हुए आत्म उपासना (जीवन देवता की साधना-आराधना) करते हैं-तत्र वार्त्ताकवृत्तयः
परिशिष्ट ३६३ चातुर्मास्य ......आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० २)। शालीनवृत्तिगृहस्थ उन्हें कहा जाता है, जो स्वयं तो यज्ञादि कृत्य सम्पन्न करते हैं; पर दूसरों की वह क्रिया सम्पन्न नहीं कराते। स्वयं तो अध्ययन करते हैं, पर कराते नहीं; इसी प्रकार स्वयं दान देते हैं, पर दूसरों से दान-दक्षिणा ग्रहण नहीं करते। इस प्रकार सौ वर्ष यज्ञादि सम्पन्न करते हुए आत्म साधना करते हैं। यायावर गृहस्थ वे हैं, जो स्वयं तो यज्ञादि करते ही हैं, दूसरों की भी कराते हैं; स्वयं भी अध्ययन करते हैं व दूसरों को भी तथा स्वयं (श्रेष्ठ कार्यों के निमित्त) दानादि ग्रहण करते हैं और लोकोपयोगी कार्यों के लिए दूसरों को भी दान देते हुए सौ वर्ष तक यज्ञीय जीवन जीकर आत्म प्रार्थना (आत्मा की साधना) करते हैं-यायावरा यजन्तो याजयन्तोऽधीयाना नाध्यापयन्तो ददतो न प्रतिगृह्णन्तः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो०२)। घोर संन्यासिक गृहस्थ उन्हें कहा जाता है, जो पवित्र जल द्वारा दैनिक कृत्य सम्पन्न करते हुए, उञ्छवृत्ति (खेतों में अवशिष्ट अनाज द्वारा आजीविका चलाना) अपनाकर अकिञ्चनवत् अपना निर्वाह करते हुए, सौ वर्ष तक यज्ञीय जीवन जीते हुए आत्म साधना करते हैं- घोरसंन्यासिका उद्धृतपरिपूताभिरद्भिः कार्यं कुर्वन्तः प्रतिदिवसमाहतोञ्छ- वृत्तिमुपयुञ्जानाः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० २)। इस प्रकार स्थिति भेद से गृहस्थों के ये चार प्रकार होते हैं। १००. घोर संन्यासिक — द्र०- गृहस्थ। १०१. चतुर्दश भुवन— सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में चौदह भुवन माने गये हैं, जिन्हें चतुर्दश भुवन भी कहा गया है। संस्कृत हिन्दी कोश पृ० ७४५ में इसकी पुष्टि इन शब्दों में की गई है- इह हि भुवनान्यन्ये धीराश्चतुर्दश भुञ्जते (भर्तृ०३.२३)। चतुर्दश भुवन से तात्पर्य चौदह लोकों से है। चौदह लोकों में से सात लोक ऊपर हैं एवं सात लोक नीचे हैं। ऊपर के लोकों की ऊर्ध्व लोक अथवा स्वर्गलोक कहते हैं। नीचे के लोकों की अधोलोक अथवा पाताल लोक कहते हैं। हि०वि० कोश में सात स्वर्ग अथवा ऊर्ध्वलोक इस प्रकार हैं- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्। अधोलोक अर्थात् पाताल लोक इस प्रकार हैं- अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। भारतीय संस्कृति कोश के अनुसार अतल लोक वह है, जिसकी मिट्टी कृष्णवर्णा हैं तथा जहाँ मय दानव का पुत्र अपनी माया की सृष्टि रचते हुए निवास कर रहा है। वितल लोक में शंकर और पार्वती का निवास बताया गया है। सुतल लोक में राजा बलि रहते हैं, यहाँ की मिट्टी रक्तवर्णा है। तलातल लोक में दानवराज मय का निवास है, यहाँ की मिट्टी पीतवर्णा है। महातल लोक में काद्रवेय सर्पों का निवास स्थल है, जहाँ की मिट्टी मीठी बतायी जाती है। रसातल लोक में ऐसे दैत्य-दानव आदि निवास करते हैं, जो देवराज इन्द्र से भयभीत रहते हैं। यहाँ की मिट्टी पथरीली है। पाताल लोक वासुकि सहित विशालकाय सर्पों का निवास स्थल है, जहाँ की भूमि स्वर्णमयी है। इस प्रकार नीचे के ये सात लोक हैं। उपनिषदों में इहलोक और परलोक दो ही लोक माने गये हैं, जबकि वेदादि में पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक ये तीन लोक वर्णित हैं। १०२. चरु — 'चरु' शब्द वैदिक काल से ही प्रचलित है। प्राचीन काल में यज्ञीय पदार्थों (हविष्यान्न) की निर्मित करने के पात्र विशेष के रूप में सम्भवतः कड़ाही के रूप में इसका प्रयोग किया जाता था। ऋग्वेद और अथर्ववेद में चरु का कई बार उल्लेख हुआ है। यथा-स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृधि। अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः (ऋ० १.७.६)। इस प्रकार अथर्ववेद में भी चरु का वर्णन इन शब्दों में संप्राप्य है- उत्क्रामातः परि चेदतमस्तस्ताञ्च्छरोरधि नाकं तृतीयम् (अथर्व० ९.५.६)। पात्र विशेष के रूप में 'चरु' शब्द का इतना प्रयोग हुआ कि बाद में उसमें पकाये जाने वाले हविष्यान्न को ही 'चरु' कहने लगे और हविष्यान्न के अर्थ में ही चरु शब्द रूढ़ हो गया। इसीलिए हिन्दी विश्वकोश में इस शब्द की व्युत्पत्ति में लिखा है-चर्यते भक्ष्यतेऽग्न्यादिभिः । यद्वा चरति होमादिकम् अर्थात् हव्यान्न अथवा होम के लिए पाक किया जाने वाला अन्न। चरु (विशिष्ट प्रकार का हविष्यान्न), जिसमें तण्डुल (चावल) की प्रमुखता रहती है, के निर्माण की विधि बहुत लम्बी हैं. जिसका सम्पूर्ण उल्लेख स्थानाभाव के कारण यहाँ सम्भव नहीं हैं। इसे कात्यायन श्रौत सूत्र ४.१.६.७ में देखा जा सकता है। 'श्रौत पदार्थ निर्वचनम्' नामक ग्रन्थ में भी चरु का उल्लेख पक्व तण्डुल के रूप में मिलता है- ते च परिपक्कास्तण्डुलाः चरुपदवाच्याः (श्रौ०प०नि० पृ० १९)। उपनिषद् ग्रन्थों में भी चरु का वर्णन आया है। कठरुद्रोपनिषद् के संन्यास प्रकरण में चरु का उल्लेख द्रष्टव्य है- द्वादशरात्रस्यान्तेऽग्नये वैश्वानराय प्रजापतये च प्राजापत्यं चरुं, वैष्णवं त्रिकपालं अग्निम् (कठरुद्रो० ३)। १०३. चातुर्मास्य — द्र०-ज्ञानखण्ड -चातुर्मास्य-आग्रयण।
चान्द्रायण व्रत ३६४ परिशिष्ट १०४. चान्द्रायण व्रत- द्र०- कृच्छ्र चान्द्रायण। १०५. चित्त शुद्धि- द्र०-ज्ञानखण्ड -चित्त। १०६. चिदात्मा- द्र०-चिद्घन। १०७. चिदानन्द- द्र०-चिद्घन। १०८. चिद्घन-परमात्मा को सत्, चित् और आनन्दस्वरूप कहते हैं। तीन तत्त्वों सत् (सत्य), चित् (चैतन्यता) और आनन्द (परम सुख-आन्तरिक सुख) की सघनता के कारण ही उसे सद्घन, चिद्घन और आनन्दघन कहते हैं। इसीलिए उपर्युक्त गुणों से युक्त ईश्वर को समस्तपद के रूप में सच्चिदानन्दघन कहते हैं। अध्यात्मोपनिषद में इसी तथ्य का उल्लेख इन शब्दों में है-परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेय........... विक्रियम्। सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमव्ययम् (अध्यात्मो० ६१) अर्थात् उस परब्रह्म को परिपूर्ण, आदि और अन्त से रहित, परिमाप रहित, विकार शून्य, सन्मय (सद्घन,) चिन्मय (चिद्घन), नित्य आनन्दमय (नित्य और आनन्दघन) तथा अविनाशी कहा गया है। कई अन्य विशेषताओं के कारण उस परमात्मा के और भी कई नाम हैं। जैसे- चैतन्य स्वरूप होने के कारण उसे चिदात्मा कहते हैं, जिसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- चित् चैतन्यमात्मा स्वरूपमस्य (हि०वि०को०ख०६, पृ० ३९१) अर्थात् चैतन्य स्वरूप परब्रह्म ही चिदात्मा है। चैतन्य रूप होने से ही उसे चैतन्य व चिद्रूप भी कहते हैं। चैतन्य और आनन्द स्वरूप होने से उसे ही चिदानन्द कहते हैं। चित् शब्द में मयट् प्रत्यय लगने से उस परमेश्वर को चिन्मय अर्थात् ज्ञानमय कहते हैं। निर्दोष, माया से रहित और विकाररहित होने के कारण उस ब्रह्म को ही निरञ्जन तथा निर्विकार कहते हैं- निरञ्जनो निर्विकारः ............नास्ति (आत्मो० १-घ)। कलाओं से रहित अथवा कलातीत होने के कारण उस ईश्वर को ही निष्कल कहते हैं- तेनेदं निष्कलं ......पञ्चभिः (ब्रह्मविद्यो० १७)। श्रेष्ठ (परम) पुरुष होने के कारण उस ब्रह्म को ही परम अथवा पुरुषोत्तम भी कहते हैं। ज्योतिस्वरूप होने के कारण उसे ही परम-ज्योति कहते हैं। प्राचीनतम होने के कारण उस ईश्वर को ही पुराण पुरुष तथा सम्पूर्ण सृष्टि का मूल तत्त्व होने से उसे ही परम तत्त्व कहते हैं। इसी तरह सबसे परे अथवा परे से भी परे होने के कारण उस परब्रह्म का एक नाम 'परात्पर' भी है। परमात्मा के उपर्युक्त गुणों का निरन्तर चिन्तन करते रहकर सतत आनन्दित रहने वाले परमात्म भाव में स्थित रहते हैं। इस प्रकार उस एक ही परब्रह्म के ये अनेक नाम हैं। १०९. चिन्मय- द्र०-चिद्घन। ११०. चैतन्य- द्र०-चिद्घन। १११. जगत्- द्र०-ज्ञानखण्ड। ११२. जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति- द्र०-ज्ञानखण्ड। ११३. जालन्धर बन्ध- द्र०-बन्ध। ११४. जितेन्द्रिय - धर्म पथगामी मुमुक्षु के लिए जितेन्द्रिय होना आवश्यक है। जितेन्द्रिय का सामान्य अर्थ है-इन्द्रियों को जीत लेने वाला अथवा इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने वाला। प्रख्यात संस्कृत कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में जितेन्द्रिय इन शब्दों में परिभाषित है-जितानि वशीकृतानीन्द्रियाणि येन अर्थात् जिसके द्वारा समस्त इन्द्रियाँ वश में कर ली गई या जीत ली गई हैं, वह जितेन्द्रिय है। महाराज मनु ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है-श्रुत्वा स्पृष्ट्वाथ दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः। न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः (वाच०पृ० ३१२०)। इसका अभिप्राय है, किसी भी प्रकार का विषय सुनकर, कुछ भी स्पर्श करके, कुछ भी देखकर, कुछ भी भक्षण करके तथा कुछ भी सूंघ कर जो व्यक्ति न तो हर्षित होता है और न ही ग्लानि अनुभव करता है, उसे ही जितेन्द्रिय जानना चाहिए। महर्षि पतञ्जलि के योग दर्शन में इस विषय में उल्लेख है कि आत्म शुद्धि हो जाने पर सत्त्वगुण प्रकट होता है, तब रजोगुण और तमोगुण नहीं आ सकते। कारण-कार्य न्याय से चित्त शुद्धि हो जाने पर रज और तम सत्त्वगुण से प्रभावित हो जाते हैं, जिससे वे चित्त में चञ्चलता उत्पन्न करने रूप कार्य को नहीं कर पाते; वरन् सत्त्वगुण को सहायता करके हर विषय में अनासक्ति पैदा कर देते हैं, जिससे न किसी से राग होता है, न द्वेष या क्षोभ। निश्चित विषय (ईश्वर) में चित्त अनुरक्त होने के कारण अन्य विषयों (श्रोत्रादि इन्द्रियों के विषयों) में मन नहीं रमता, जिससे इन्द्रियाँ पराजित हो जाती हैं। इस जितेन्द्रिय स्थिति के प्राप्त हो जाने पर आत्म दर्शन और मोक्ष का पथ प्रशस्त होता है। नारद परिव्राजकोपनिषद् (३.३८) में भी उपर्युक्त मनु कथित
परिशिष्ट ३६५ तुर्यावस्था श्लोक की तरह ही कुछ पाठ भेद से जितेन्द्रिय की परिभाषा उल्लिखित है- श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च भुक्त्वा च ... जितेन्द्रियः। ११५. ज्ञान-वैराग्य-संन्यासी- द्र०-अवधूत। ११६. ज्ञान-संन्यासी-द्र०-अवधूत। ११७. ज्ञानाग्नि - ज्ञान और अग्नि दो शब्दों का समस्त पद ज्ञानाग्नि है, जिसका सामान्य अर्थ है-ज्ञान की अग्नि अथवा ज्ञानरूपी अग्नि। जिस प्रकार अग्नि का कार्य जलाकर भस्म कर देना है, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि अज्ञान जनित विकारों को जलाकर भस्म कर देती है। श्रीमद्भगवद्गीता में उल्लेख है कि जिसके सभी कार्य कामना और संकल्प से रहित हो जाते हैं, उसके सभी कर्म (प्रारब्ध कर्म) ज्ञानाग्नि से दग्ध हो जाते हैं। ऐसे उस पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं- यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः (गी० ४.१९)। वेदान्त दर्शन में जीवन्मुक्त की स्थिति के सन्दर्भ में विवेचन है कि ज्ञानरूप ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाने पर अज्ञान और अज्ञान द्वारा संचित कर्म-संशय, विपर्यय आदि बाधित हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति समस्त बन्धनों से रहित होकर जीवन्मुक्त हो जाता है-अथ जीवन्मुक्तलक्षणमुच्यते। जीवन्मुक्तो नाम स्वरूपाखण्ड ब्रह्मज्ञा- नेन.......साक्षात्कृतेऽज्ञानतत्कार्य सञ्चित कर्मसंशयविपर्ययादीनामपि बाधितत्वादखिल बन्धरहितो ब्रह्मनिष्ठः (वे०सा० खं०-३४)। मुण्डक उपनिषद में भी ब्रह्मज्ञानरूप ज्ञानाग्नि द्वारा कर्मों के विनष्ट होने तथा हृदयग्रन्थि के खुल जाने से समस्त संशयों के विनष्ट होने का वर्णन है-भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्व संशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे (मुण्डको० २.२.८)। ब्रह्मविद्योपनिषद में ज्ञानाग्नि को ध्रुवाग्नि भी कहा गया है; क्योंकि ध्रुव (स्थिर) ज्ञानरूपी अग्नि का प्राकट्य हो जाने के बाद अज्ञान जनित समस्त विकार विनष्ट हो जाते हैं। स्व अज्ञान एवं उसके कार्यरूप प्रपञ्च के रूई के समान पर्वत (अम्बर) को जला देने में ज्ञानाग्नि ही सक्षम है, इसलिए इसे ध्रुवाग्नि कहा गया है-स्वाज्ञान तत्कार्य स्वातिरिक्त प्रपञ्चतुलाचलभस्मीकरणपटुत्वात् ध्रुवाग्निः ...............प्रचक्षते (ब्रह्मविद्यो० १ ब्रह्म० भा०)। ११८. ज्ञानेन्द्रियाँ - द्र०-ज्ञानखण्ड-अन्तःकरण-चतुष्टय। ११९. तत्त्वमसि - द्र०-ज्ञानखण्ड - महावाक्य । १२०. तप- द्र०-ज्ञानखण्ड -नियम। १२१. तारक ब्रह्म-तारक मन्त्र - उपनिषदों में तारक ब्रह्म और तारक मंत्र की महत्ता प्रतिपादित को गई है। अथर्वशिखोपनिषद् में तारक को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है- .........सर्वेभ्यो दुःखभयेभ्यः संतारयतीति तारणात्तारः (अथर्वशिख० २.१) अर्थात् जो समस्त दुःखों और भयों से मुक्त कर दे, वही तारक है। इसी प्रकार अथर्वशिर उपनिषद् में तारक का अर्थ किया गया है कि जिसके (जिस तारक मंत्र के) उच्चारण करने से ही गर्भ, जन्म, जरा-मरण एवं संसार के महाभयों से मुक्ति मिल जाती है, वह तारक ब्रह्म या तारक मंत्र है- अथ कस्मादुच्यते तारं यस्मादुच्चार्यमाण एव गर्भजन्मजरामरणसंसारमहाभयात् संतारयति तस्मादुच्यते तारम् (अथर्वशिर० ४९)। अद्वयतारकोपनिषद् में तो तारक का विस्तार से वर्णन किया गया है। उसमें भी तारक ब्रह्म का स्वरूप इसी प्रकार विवेचित है-गर्भजन्मजरा- मरणसंसारमहद्भयात् संतारयति तस्मात्तारकमिति (अद्वयता० ३)। उपनिषद्कार ने तारक योग का स्वरूप इस प्रकार बताया है कि नेत्र बन्द अथवा अर्धोन्मीलित रखकर भ्रूमध्य के ऊपरी स्थान में अन्तर्दृष्टि से इस प्रकार का भाव करे कि मैं चैतन्य स्वरूप हूँ। इस प्रकार का ध्यान करते रहकर सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेने वाला तद्रूप (तारक रूप) हो जाता है-योगी स्वान्तः .........ब्रह्माहमस्मीत्यालोकयन् तद्रूपः तारकरूपो भवति (अद्वयता० २ ब्रह्म० भा०)। तारक ब्रह्म को प्रत्यगात्मा माना गया है- ......संसारतारकत्वात् तारकं प्रत्यगात्मेत्यर्थः (अद्वयता० ३ ब्रह्म० भा०) हिन्दी विश्वकोश में षडक्षर मंत्र को तारक मंत्र बताया गया है, जिसमें श्रीराम को इसका अधिष्ठाता माना गया है, यह षडक्षर मंत्र 'ॐ रामाय नमः' है। उपनिषदों (रामोत्तरतापनीयोपनिषद् २.३, अथर्वशिर० ४४ आदि) में 'ॐ कार' को भी तारक ब्रह्म-तारक मन्त्र कहा गया है। १२२. तुरीयातीत - द्र०-ज्ञानखण्ड - अवधूत । १२३. तुरीयावस्था - द्र०-ज्ञानखण्ड-तुरीय-तुरीयातीत । १२४. तुर्यावस्था - द्र०-ज्ञानखण्ड -तुरीय-तुरीयातीत ।
तैजस ३६६ परिशिष्ट १२५. तैजस - द्र०-ज्ञानखण्ड । १२६. त्रय शरीर - द्र०-ज्ञानखण्ड। १२७. त्रिगुणातीत-निर्गुण - द्र०-ज्ञानखण्ड-निर्गुण-सगुण। १२८. त्रिदण्ड-त्रिपुण्ड् - संन्यासाश्रम में अनेक प्रकार के संन्यासी होते हैं। उनकी कई शाखाएँ हैं, जिनके अनुसार उनके चिह्न भी पृथक्-पृथक् होते हैं। जैसे कुछ संन्यासी एक दण्ड और कुछ त्रिदण्ड धारण करते हैं। इसी प्रकार कुछ त्रिपुण्ड्र, कुछ ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करते हैं। प्रख्यात संस्कृत शब्दकोश 'शब्द कल्पद्रुम' में त्रिदण्ड के सम्बन्ध में उल्लेख है- 'त्रिदण्डं चतुरङ्गुलगोबालवेष्टनादन्योन्यसम्बन्धं अस्त्यस्येति' (श०क०खं० २ पृ० ६५६) अर्थात् त्रिदण्ड यतियों का वह चिह्न है, जिसमें चार-चार अङ्गुल के तीन दण्ड एक दूसरे में बँधे रहते हैं। यह तो त्रिदण्ड का स्थूल स्वरूप हुआ। इसके धारण करने के मूल में भाव यह है कि त्रिदण्डधारी-त्रिदण्डी यतियों के कायदण्ड, मनोदण्ड और वाग्दण्ड बुद्धि में स्थापित रहते हैं अर्थात् ये (त्रिदण्डी) ज्ञानशक्ति से मन, वचन और कर्म को नियन्त्रित रखते हैं- वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च। यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते (श०क० खं०२, पृ० ६५६)। हिन्दूधर्म कोश के अनुसार त्रिदण्डी संन्यासी श्री वैष्णव संन्यासी कहे जाते हैं, जो शैव दशनामी संन्यासियों से भिन्न हैं। इनमें केवल ब्राह्मण वर्णोत्पन्न ही ग्रहण किए जाते हैं, वे ही त्रिदण्ड धारण कर सकते हैं। नारद परिव्राजकोपनिषद् में उपनिषद्कार ने यतिचर्या का विवेचन करते हुए लिखा है कि यति को सतत सर्वभूतहितरत रहते हुए शान्त, त्रिदण्डी तथा कमण्डलुधारी होकर आत्मा में रमण करते हुए परिव्रज्या करनी चाहिए और एकाकी ही विचरण करना चाहिए, उसे मात्र भिक्षा के लिए ही ग्राम में प्रवेश करना चाहिए, अन्य कार्यों के लिए नहीं- सर्वभूतहितः शान्तस्त्रिदण्डी सकमण्डलुः। एकारामः परिव्रज्य भिक्षार्थं ग्राममाविशेत् (ना०परि०३.५५)। काया, मन और वाणी को नियन्त्रित रखने वाले त्रिदण्डी को महायति की संज्ञा देते हुए उपनिषद् भाष्यकार ब्रह्मयोगी ने श्रुति का एक श्लोक उद्धृत किया है-वाग्दण्डः कायदण्डश्च मनोदण्डश्च ते त्रयः। यस्यैते नियता दण्डाः स त्रिदण्डी महायतिः (ना०परि० ३.५४.६२ ब्रह्म० भा०)। शैव सम्प्रदाय का धार्मिक चिह्न त्रिपुण्ड्र है, जो भृकुटी (भौंहों) के ऊपर मस्तक के एक सिरे से दूसरे तक भस्म की तीन आड़ी रेखाओं के द्वारा अंकित किया जाता है। हिन्दी विश्वकोश में त्रिपुण्ड्र शब्द का स्वरूप इस प्रकार वर्णित है- त्रयाणां पुण्ड्राणां इक्षुवदाकाराणां समाहारः अर्थात् ईख के आकार की तीन रेखाओं का समुच्चय त्रिपुण्ड्र है। इसे ललाट के अतिरिक्त वक्षस्थल, भुजाओं एवं अन्य अंगों पर भी अंकित किया जाता है। नारद परिव्राजकोपनिषद् में बहूदक संन्यासी के लक्षण के सन्दर्भ में त्रिपुण्ड्र का उल्लेख किया गया है-बहूदकः शिखादि कन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी .......कबलाशी (ना०परि० ५.१३)। रामानन्दी वैष्णव सम्प्रदाय के सन्तों के ऊर्ध्व पुण्ड्र (मस्तक पर ऊपर की ओर खड़ी रेखा) धारण करने का विधान भी कुछ ग्रन्थों में मिलता है। कुटीचक के लक्षण में भी श्वेत ऊर्ध्वपुण्ड्र और त्रिदण्ड धारण करने का उल्लेख है-एकत्रान्नादनं परः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः (ना०परि०५.१२)। १२९. त्रिपाद् ब्रह्म- ब्रह्म की अनेक संज्ञाओं में एक संज्ञा त्रिपाद् ब्रह्म भी है। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में सभी जगह त्रिपाद् ब्रह्म का उल्लेख मिलता है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-"त्रयः पादा अस्य संख्या सुपूर्व्वस्य।" जिसके पैरों (पादों या चरणों) की संख्या तीन हो, वह अर्थात् विष्णु भगवान्। पुराणों में उल्लेख है कि एक बार भगवान् विष्णु ने वामन रूप धारण करके राजा बलि से तीन पग भूमि की याचना की, बलि ने वह देना स्वीकार कर लिया, तब वामन ने अपना मूल स्वरूप (विराट् स्वरूप) दिखाया। बलि को ऐसा अनुभव हुआ कि पृथिवी उनके (विराट् भगवान् के) पादद्वय, अन्तरिक्ष मस्तक, सूर्य और चन्द्र दोनों नेत्र हैं आदि। इसे देखकर वे सम्मोहित हो गये। उस समय भगवान् के एक पाद से बलि की समस्त भूमि (पृथिवी), शरीर से आकाश, भुजाओं से समस्त दिशाएँ छा गईं। उनके दूसरे पाद में स्वर्ग के सभी लोक आ गये, परन्तु तीसरा पाद रखने की जगह शेष न बचने पर उनने उसे स्वर्ग लोक से लेकर मर्त्यलोक, जनः लोक, तपः लोक और सत्यलोक में विस्तारित किया। श्रीमद्भागवत में यह प्रकरण इस प्रकार विवेचित है- "क्षितिं पदैकेन बलेर्विचक्रमे, नभः शरीरेण दिशश्च बाहुभिः। पदं द्वितीयं क्रमतस्त्रिविष्टपं, न वै तृतीयाय तदीयमण्वपि । उरुक्रमस्याङ्घ्रिरुपर्युपर्यथो, महर्जनाभ्यां तपसः परं गतः" (भा० ८.२०.३३-३४)। वेद के मत में संसाररहित ब्रह्मस्वरूप पुरुष ही त्रिपाद् ब्रह्म है। उस ब्रह्मरूप पुरुष (त्रिपाद् ब्रह्म) के सन्दर्भ में ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के ऋषि नारायण द्वारा दृष्ट एक ऋचा में तीन पादों का वर्णन इस प्रकार है-त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि (ऋ० १०.९०.४) अर्थात् ऊपर (दिव्यलोक में)
परिशिष्ट ३६७ दर्शयज्ञ
जिसके तीन चरण हैं, उस विराट् पुरुष के एक भाग से यह जगत् पुनः प्रकट हुआ। इसके पश्चात् उसने (विराट् पुरुष ने) अन्नभोजी (प्राणियों) तथा अन्न न खाने वाले (वनस्पति आदि) की संव्यास किया। परब्रह्मोपनिषद् में भी जीव के, हृदयाकाश में 'रमा' आदि तीनों नाड़ियों के आश्रय से जाग्रत् आदि तीन अवस्थाओं तथा बन्ध-मोक्ष आदि की अवस्था में विचरण करने एवं उस जीव का त्रिपाद् ब्रह्म ही शेष रहने का उल्लेख किया गया है—सर्वत्र हिरण्मये परे .........तस्य त्रिपादं ब्रह्म एषात्रेय्य ततोऽनु तिष्ठति (परब्रह्मो०२)। १३०. त्रिपुटी— त्रिपुटी शब्द का उल्लेख प्रायः सभी कोशग्रन्थों में मिलता है। प्रख्यात कोशग्रन्थ हिन्दी विश्वकोश में त्रिपुटी इस प्रकार व्याख्यायित है— त्रीणि पुटानि सन्त्यस्याः अर्थात् जिसमें तीन पुट हों वह त्रिपुटी कहलाती है। त्रिवृता, निसोध, सूक्ष्मैला (छोटी इलायची) आदि के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है। दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तीनों पुटों का समाहार त्रिपुटी कहलाता है— .........त्रयाणां ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपाणां पुटानामाकाराणां समाहारः। .......भूतोत्पत्तेः पुरा भूमा त्रिपुटीद्वैतवर्जनात्। ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपा त्रिपुटी प्रलये हि नो (श०क० खं०२, पृ०६५९)। बृहत् हिन्दी कोश के अनुसार ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय के अतिरिक्त ध्याता, ध्यान, ध्येय और द्रष्टा, दृश्य तथा दर्शन का समाहार भी त्रिपुटी कहलाता है। मंडलब्राह्मण उपनिषद् में भी त्रिपुटी का उल्लेख हुआ है— एवं त्रिपुट्यां निरस्तायां निस्तरङ्ग समुद्रवन्निवातस्थित दीपवदचल संपूर्णभावाभावविहीन कैवल्य ज्योतिर्भवति (मं० ब्रा०उ० २.३.१) अर्थात् कैवल्यावस्था प्राप्त साधक की जब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूप त्रिपुटी निरस्त हो जाती है, तब लहररहित सागर और वायुरहित स्थल में रखे दीप के समान वह स्थिर हो जाता है तथा सम्पूर्ण भाव और अभावों से रहित होकर केवल ज्योति रूप अवशिष्ट रहता है। १३१. त्रिष्टुप्—द्र०-अनुष्टुप् । १३२. त्रैधातवी इष्टि—द्र०-आग्नेयी इष्टि। १३३. त्र्यम्बक— त्र्यम्बक देव का उल्लेख वैदिक काल से ही मिलता है। कोशग्रन्थों के अनुसार त्र्यम्बक शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—त्रीणि अम्बकानि, नयनान्यस्य, त्रयाणां लोकानां अम्बकः पितेति वा (वाच०पृ० ३३९६) अर्थात् तीन नेत्रों वाले भगवान् शिव या तीनों लोकों के पिता भगवान् रुद्र ही त्र्यम्बक हैं। त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) में महेश या महादेव को रुद्र भी कहा जाता है; क्योंकि वे सृष्टि के संहारक हैं। रुद्र शब्द की व्युत्पत्ति से उनका रुद्र नाम और भी सार्थक हो जाता है—रुद्रो रौतीति सतो, रोरूयमाणो द्रवतीति वा। रोदयतेर्वा (नि० १.१.५) अर्थात् वे (संहार करके) रुलाते हैं अथवा जीवों को कठोर दण्ड प्रदान करके रोने की विवश करते हैं, इसलिए ही वे रुद्र कहलाते हैं। रुद्रों की संख्या ग्यारह मानी गई है। एकादश रुद्रों में से एक का नाम त्र्यम्बक है। यजुर्वेद ३.६० में त्र्यम्बक देव की स्तुति इस प्रकार की गई है— त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। शिवजी को महेश या महेश्वर भी कहते हैं। महेश्वर का अर्थ है, महान् ईश्वर। हिन्दी विश्वकोश खं० १७ पृ०२९१ में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—महांश्चासावीश्वरश्च कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं वा समर्थः यद्वा महत्या महामायया ईश्वरः शिव, महादेव । ब्रह्मवै० पु० २.५.६.६७ में उल्लेख है- विश्वस्थानाञ्च सर्वेषां महतामीश्वरः स्वयम्। महेश्वरञ्च तेनेमं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ इसी प्रकार उपनिषद् में भी रुद्र को ही परब्रह्म, ईशान, महादेव और महेश्वर उपन्यस्त किया गया है—तत् परंब्रह्मेति स एकः स एको रुद्रः स ईशानः स भगवान् स महेश्वरः स महादेवः (अथर्वशिर०३)। ज्ञानाकांक्षी भक्तों की ज्ञान प्रदान करने, समस्त भावों का परित्याग कर आत्मज्ञान और योगैश्वर्य से अपनी महिमा में ही स्थित रहने के कारण इन्हें महेश्वर कहा गया है—...............योगैश्वर्येण महति महीयते तस्मादुच्यते भगवान्महेश्वरः (अथर्वशिर०-४)। नोट— त्र्यम्बक के स्थान पर पाठ भेद से कुछ ग्रन्थों में त्रयम्बक अथवा त्रियम्बक शब्द भी मिलता है। १३४. दक्षिणाग्नि—द्र०-आहवनीय। १३५. दक्षिणायन—द्र०- उत्तरायण। १३६. दर्शयज्ञ— आर्ष ग्रन्थों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख है, जैसे राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध यज्ञ आदि। दर्श और पौर्णमास यागों (यज्ञो) का नामकरण इनके समय की स्थिति के अनुसार किया गया है। वाचस्पत्यम् में दर्श को इस प्रकार परिभाषित किया गया है—दृश्येते शास्त्रदृष्ट्या सूर्य्यचन्द्रौ एकत्र स्थितौ यत्र। .......सूर्य्येन्दु सङ्गमकाले अमावास्या तिथौ 'एकत्रस्थौ चन्द्रसूर्य्यौ दर्शनात् दर्श उच्यते (वाच०पृ० ३४७३) अर्थात् जिस तिथि को चन्द्र और सूर्यदेव एक ही
दहर पुण्डरीक ३६८ परिशिष्ट स्थान पर एकत्र हुए दृष्टिगोचर होते हैं, उस तिथि को अमावस्या कहते हैं। चन्द्रमा और सूर्य के एक स्थान पर दृश्यमान होने के कारण इस अमावस्या तिथि को ही दर्श कहते हैं एवं इस तिथि में सम्पन्न होने वाले यज्ञ को दर्शयज्ञ कहते हैं। इसी प्रकार जिस दिन चन्द्र पूर्ण कलायुक्त दिखाई देता है, उसे पूर्णिमा तिथि कहते हैं- पूर्ण: कलाभिः पूर्णोमाश्चन्द्रमा यत्र। पूर्णिमायाम् (वाच० पृ० ४४०२)। पूर्णिमा को सम्पन्न किये जाने वाले यज्ञ को पूर्णमास या पौर्णमास यज्ञ कहते हैं। श्रुतियों में भी प्रतिपक्ष दर्श और पूर्णमास यज्ञ सम्पन्न करने का वर्णन मिलता है, 'दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत', 'सर्वेभ्यो दर्श पूर्णमासौ श्रुतिः' (वाच०पृ० ४४०२)। इसीलिए इन्हें श्रौतयाग कहा जाता है। दर्शपौर्णमास याग (यज्ञ) क्रमशः पूर्णिमा और अमावस्या को किये जाते हैं। समस्त कामनाओं की सिद्धि हेतु अग्निहोत्री इन अनुष्ठानों को प्रतिपक्ष करते रहते हैं- सर्वेभ्यः कामेभ्यो दर्शपूर्णमासौ (आप०श्रौ०सू० ३.१४.९)। दर्श और पौर्णमास में प्रमुखता पौर्णमास याग की ही है, इसी कारण पूर्णिमा को अग्नि परिग्रह के पश्चात् प्रथम पूर्णिमा आने पर ही पौर्णमास यागानुष्ठान प्रारम्भ होता है। अग्नि परिग्रह अमावस्या और पूर्णिमा दोनों को ही किया जा सकता है। यदि अमावस्या को अग्नि परिग्रह किया गया ही, तो पूर्णमासी आने तक प्रतीक्षा करने के बाद ही याग अनुष्ठान प्रारम्भ होता है। श्रौत ग्रन्थों में अग्निहोत्री को दर्श और पौर्णमास याग का अनुष्ठान सम्पूर्ण जीवन अथवा तीस वर्ष तक अथवा शारीरिक सामर्थ्य रहने तक करने का विधान है- त्रिंशतवर्षाणि दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत (का०श्रौ०सू० ४.२.४७)। यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत।........त्रिंशतं वा वर्षाणि जीर्णो वा विरमेत् (आप०श्रौ०सू० ३.१४.१२-१३)। कठरुद्रोपनिषद् में उच्चस्थिति के संन्यासी को स्थिति बताते हुए उपनिषद्कार ने कहा है कि उसके द्वारा अमावस्या को किया गया भोजन ही उसका दर्शयज्ञ तथा पूर्णिमा को किया गया भोजन ही उसका पौर्णमास यज्ञ है-यद्दर्शं तद्दर्शं यत्पौर्णमास्ये तत्पौर्णमास्यं.....वाप्येत्सोऽस्याग्निष्टोमः (कठरुद्रो० ३)। दर्श और पौर्णमास यज्ञ को दर्शेष्टि और पौर्णमासेष्टि भी कहते हैं। १३७. दहर पुण्डरीक - द्र०- अष्टदल कमल। १३८. दीक्षा - भारतीय संस्कृति में जीवन को सफलता तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए दीक्षा अति आवश्यक मानी गयी है। हिन्दी विश्वकोश में दीक्षा शब्द की रचना इस प्रकार वर्णित है- दक्षी भावे अ स्त्रियां टाप् । इसके कई अर्थ हैं, जैसे नियम-संकल्प पूर्वक अनुष्ठान, अभीष्ट देवमन्त्र ग्रहण, यजन, पूजन, व्रत-संग्रह, उपनयन संस्कार आदि। उपनयन संस्कार में भी गुरु या आचार्य यज्ञोपवीत प्रदान करते समय शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा प्रदान करते हैं। तन्त्र ग्रन्थों में दीक्षा का विस्तार से वर्णन हुआ है। एक तन्त्र ग्रन्थ के अनुसार दीक्षा को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- दीयते विमलं ज्ञानं क्षीयते कर्मवासना। तेन दीक्षेति सा प्रोक्ता मुनिभिस्तन्त्रवेदिभिः (वाच०पृ० ३६००) अर्थात् जो विमल ज्ञान देकर कर्म वासना का क्षय कर देती है, उसे तन्त्रज्ञ मुनियों द्वारा दीक्षा कहा गया है। प्रख्यात तन्त्र ग्रन्थ रुद्रयामल में दीक्षा की परिभाषा इस प्रकार दी गई है-ददाति शिवतादात्म्यं क्षिणोति च मलत्रयम्। अतो दीक्षेति संप्रोक्ता दीक्षा तन्त्रार्थवेदिभिः (वाच०पृ० ३६०२) अर्थात् जिससे शिव (कल्याणकारी) से तादात्म्य प्राप्त होता है तथा मलत्रय (लोभ, मोह, अहंकार) का प्रक्षालन होता है, उसे तन्त्रज्ञों ने दीक्षा कहा है। योगिनी तन्त्र तृतीय भाग के षष्ठ पटल में भी दीक्षा की महत्ता बताते हुए तन्त्रकार ने लिखा है-दीयते ज्ञानमत्यर्थं क्षीयते पाशबन्धनम्। अतो दीक्षेति देवेशि! कथिता तत्त्वचिन्तकैः अर्थात् जो ज्ञान-मति प्रदान करती तथा पाशबन्धनों को क्षीण करती है, उसे तत्त्वचिन्तकों ने दीक्षा नाम दिया है। दीक्षा से जीवन जीने की कला में दक्षता प्राप्त हो जाती है, जिससे व्यक्ति स्वयं तो सुख-शान्तिमय जीवनयापन करता ही है, समाज और संस्कृति के उत्कर्ष के लिए भी बहुत कुछ कर गुजरने को समुद्यत होता है। सद्गुरु से दीक्षा लिए बिना व्यक्ति 'निगुरा' कहलाता है, जो एक प्रकार की गाली है। अस्तु, प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ गुरु से दीक्षा अवश्य लेनी चाहिए। दीक्षा के बिना मंत्र का जप करना उसी प्रकार समुचित फलदायक नहीं होता, जिस प्रकार पत्थर की चट्टान में बोया बीज अंकुरित नहीं होता-अदीक्षितस्य निन्दाम्राह तन्त्रसारे-अदीक्षिता ये कुर्वन्ति जप पूजादिकाः क्रियाः। न भवन्ति श्रियै तेषां शिलायाममुमबीजवत् (वाच०पृ० ३६०२)। यों तो शुभकार्य जितना शीघ्र हो, कर लेना चाहिए; किन्तु दीक्षा के सम्बन्ध में कुछ समय श्रेष्ठ माने गये हैं। हिन्दी विश्वकोश के अनुसार-शुक्ल पक्ष में दीक्षा शुभफल प्रदायक होती है। कृष्ण पक्ष में भी पंचमी तिथि तक ली जा सकती है। श्रीकामी को शुक्ल पक्ष में और मुमुक्षु को कृष्ण पक्ष में मंत्र दीक्षा लेना उचित है। विद्वानों का मत है कि रविवार को दीक्षा लेने से धन संचय,चन्द्रवार को शान्ति, भौमवार को आयुः क्षय, बुधवार को सौन्दर्य प्राप्ति, गुरुवार को ज्ञान प्राप्ति, शुक्रवार को सौभाग्य और शनिवार को यशनाश होता है। ये बातें सामान्य स्थलों पर लागू होती हैं; किन्तु