१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ३६७ दर्शयज्ञ
जिसके तीन चरण हैं, उस विराट् पुरुष के एक भाग से यह जगत् पुनः प्रकट हुआ। इसके पश्चात् उसने (विराट् पुरुष ने) अन्नभोजी (प्राणियों) तथा अन्न न खाने वाले (वनस्पति आदि) की संव्यास किया। परब्रह्मोपनिषद् में भी जीव के, हृदयाकाश में 'रमा' आदि तीनों नाड़ियों के आश्रय से जाग्रत् आदि तीन अवस्थाओं तथा बन्ध-मोक्ष आदि की अवस्था में विचरण करने एवं उस जीव का त्रिपाद् ब्रह्म ही शेष रहने का उल्लेख किया गया है—सर्वत्र हिरण्मये परे .........तस्य त्रिपादं ब्रह्म एषात्रेय्य ततोऽनु तिष्ठति (परब्रह्मो०२)। १३०. त्रिपुटी— त्रिपुटी शब्द का उल्लेख प्रायः सभी कोशग्रन्थों में मिलता है। प्रख्यात कोशग्रन्थ हिन्दी विश्वकोश में त्रिपुटी इस प्रकार व्याख्यायित है— त्रीणि पुटानि सन्त्यस्याः अर्थात् जिसमें तीन पुट हों वह त्रिपुटी कहलाती है। त्रिवृता, निसोध, सूक्ष्मैला (छोटी इलायची) आदि के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है। दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तीनों पुटों का समाहार त्रिपुटी कहलाता है— .........त्रयाणां ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपाणां पुटानामाकाराणां समाहारः। .......भूतोत्पत्तेः पुरा भूमा त्रिपुटीद्वैतवर्जनात्। ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपा त्रिपुटी प्रलये हि नो (श०क० खं०२, पृ०६५९)। बृहत् हिन्दी कोश के अनुसार ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय के अतिरिक्त ध्याता, ध्यान, ध्येय और द्रष्टा, दृश्य तथा दर्शन का समाहार भी त्रिपुटी कहलाता है। मंडलब्राह्मण उपनिषद् में भी त्रिपुटी का उल्लेख हुआ है— एवं त्रिपुट्यां निरस्तायां निस्तरङ्ग समुद्रवन्निवातस्थित दीपवदचल संपूर्णभावाभावविहीन कैवल्य ज्योतिर्भवति (मं० ब्रा०उ० २.३.१) अर्थात् कैवल्यावस्था प्राप्त साधक की जब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूप त्रिपुटी निरस्त हो जाती है, तब लहररहित सागर और वायुरहित स्थल में रखे दीप के समान वह स्थिर हो जाता है तथा सम्पूर्ण भाव और अभावों से रहित होकर केवल ज्योति रूप अवशिष्ट रहता है। १३१. त्रिष्टुप्—द्र०-अनुष्टुप् । १३२. त्रैधातवी इष्टि—द्र०-आग्नेयी इष्टि। १३३. त्र्यम्बक— त्र्यम्बक देव का उल्लेख वैदिक काल से ही मिलता है। कोशग्रन्थों के अनुसार त्र्यम्बक शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—त्रीणि अम्बकानि, नयनान्यस्य, त्रयाणां लोकानां अम्बकः पितेति वा (वाच०पृ० ३३९६) अर्थात् तीन नेत्रों वाले भगवान् शिव या तीनों लोकों के पिता भगवान् रुद्र ही त्र्यम्बक हैं। त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) में महेश या महादेव को रुद्र भी कहा जाता है; क्योंकि वे सृष्टि के संहारक हैं। रुद्र शब्द की व्युत्पत्ति से उनका रुद्र नाम और भी सार्थक हो जाता है—रुद्रो रौतीति सतो, रोरूयमाणो द्रवतीति वा। रोदयतेर्वा (नि० १.१.५) अर्थात् वे (संहार करके) रुलाते हैं अथवा जीवों को कठोर दण्ड प्रदान करके रोने की विवश करते हैं, इसलिए ही वे रुद्र कहलाते हैं। रुद्रों की संख्या ग्यारह मानी गई है। एकादश रुद्रों में से एक का नाम त्र्यम्बक है। यजुर्वेद ३.६० में त्र्यम्बक देव की स्तुति इस प्रकार की गई है— त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। शिवजी को महेश या महेश्वर भी कहते हैं। महेश्वर का अर्थ है, महान् ईश्वर। हिन्दी विश्वकोश खं० १७ पृ०२९१ में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—महांश्चासावीश्वरश्च कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं वा समर्थः यद्वा महत्या महामायया ईश्वरः शिव, महादेव । ब्रह्मवै० पु० २.५.६.६७ में उल्लेख है- विश्वस्थानाञ्च सर्वेषां महतामीश्वरः स्वयम्। महेश्वरञ्च तेनेमं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ इसी प्रकार उपनिषद् में भी रुद्र को ही परब्रह्म, ईशान, महादेव और महेश्वर उपन्यस्त किया गया है—तत् परंब्रह्मेति स एकः स एको रुद्रः स ईशानः स भगवान् स महेश्वरः स महादेवः (अथर्वशिर०३)। ज्ञानाकांक्षी भक्तों की ज्ञान प्रदान करने, समस्त भावों का परित्याग कर आत्मज्ञान और योगैश्वर्य से अपनी महिमा में ही स्थित रहने के कारण इन्हें महेश्वर कहा गया है—...............योगैश्वर्येण महति महीयते तस्मादुच्यते भगवान्महेश्वरः (अथर्वशिर०-४)। नोट— त्र्यम्बक के स्थान पर पाठ भेद से कुछ ग्रन्थों में त्रयम्बक अथवा त्रियम्बक शब्द भी मिलता है। १३४. दक्षिणाग्नि—द्र०-आहवनीय। १३५. दक्षिणायन—द्र०- उत्तरायण। १३६. दर्शयज्ञ— आर्ष ग्रन्थों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख है, जैसे राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध यज्ञ आदि। दर्श और पौर्णमास यागों (यज्ञो) का नामकरण इनके समय की स्थिति के अनुसार किया गया है। वाचस्पत्यम् में दर्श को इस प्रकार परिभाषित किया गया है—दृश्येते शास्त्रदृष्ट्या सूर्य्यचन्द्रौ एकत्र स्थितौ यत्र। .......सूर्य्येन्दु सङ्गमकाले अमावास्या तिथौ 'एकत्रस्थौ चन्द्रसूर्य्यौ दर्शनात् दर्श उच्यते (वाच०पृ० ३४७३) अर्थात् जिस तिथि को चन्द्र और सूर्यदेव एक ही