भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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दहर पुण्डरीक ३६८ परिशिष्ट स्थान पर एकत्र हुए दृष्टिगोचर होते हैं, उस तिथि को अमावस्या कहते हैं। चन्द्रमा और सूर्य के एक स्थान पर दृश्यमान होने के कारण इस अमावस्या तिथि को ही दर्श कहते हैं एवं इस तिथि में सम्पन्न होने वाले यज्ञ को दर्शयज्ञ कहते हैं। इसी प्रकार जिस दिन चन्द्र पूर्ण कलायुक्त दिखाई देता है, उसे पूर्णिमा तिथि कहते हैं- पूर्ण: कलाभिः पूर्णोमाश्चन्द्रमा यत्र। पूर्णिमायाम् (वाच० पृ० ४४०२)। पूर्णिमा को सम्पन्न किये जाने वाले यज्ञ को पूर्णमास या पौर्णमास यज्ञ कहते हैं। श्रुतियों में भी प्रतिपक्ष दर्श और पूर्णमास यज्ञ सम्पन्न करने का वर्णन मिलता है, 'दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत', 'सर्वेभ्यो दर्श पूर्णमासौ श्रुतिः' (वाच०पृ० ४४०२)। इसीलिए इन्हें श्रौतयाग कहा जाता है। दर्शपौर्णमास याग (यज्ञ) क्रमशः पूर्णिमा और अमावस्या को किये जाते हैं। समस्त कामनाओं की सिद्धि हेतु अग्निहोत्री इन अनुष्ठानों को प्रतिपक्ष करते रहते हैं- सर्वेभ्यः कामेभ्यो दर्शपूर्णमासौ (आप०श्रौ०सू० ३.१४.९)। दर्श और पौर्णमास में प्रमुखता पौर्णमास याग की ही है, इसी कारण पूर्णिमा को अग्नि परिग्रह के पश्चात् प्रथम पूर्णिमा आने पर ही पौर्णमास यागानुष्ठान प्रारम्भ होता है। अग्नि परिग्रह अमावस्या और पूर्णिमा दोनों को ही किया जा सकता है। यदि अमावस्या को अग्नि परिग्रह किया गया ही, तो पूर्णमासी आने तक प्रतीक्षा करने के बाद ही याग अनुष्ठान प्रारम्भ होता है। श्रौत ग्रन्थों में अग्निहोत्री को दर्श और पौर्णमास याग का अनुष्ठान सम्पूर्ण जीवन अथवा तीस वर्ष तक अथवा शारीरिक सामर्थ्य रहने तक करने का विधान है- त्रिंशतवर्षाणि दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत (का०श्रौ०सू० ४.२.४७)। यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत।........त्रिंशतं वा वर्षाणि जीर्णो वा विरमेत् (आप०श्रौ०सू० ३.१४.१२-१३)। कठरुद्रोपनिषद् में उच्चस्थिति के संन्यासी को स्थिति बताते हुए उपनिषद्कार ने कहा है कि उसके द्वारा अमावस्या को किया गया भोजन ही उसका दर्शयज्ञ तथा पूर्णिमा को किया गया भोजन ही उसका पौर्णमास यज्ञ है-यद्दर्शं तद्दर्शं यत्पौर्णमास्ये तत्पौर्णमास्यं.....वाप्येत्सोऽस्याग्निष्टोमः (कठरुद्रो० ३)। दर्श और पौर्णमास यज्ञ को दर्शेष्टि और पौर्णमासेष्टि भी कहते हैं। १३७. दहर पुण्डरीक - द्र०- अष्टदल कमल। १३८. दीक्षा - भारतीय संस्कृति में जीवन को सफलता तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए दीक्षा अति आवश्यक मानी गयी है। हिन्दी विश्वकोश में दीक्षा शब्द की रचना इस प्रकार वर्णित है- दक्षी भावे अ स्त्रियां टाप् । इसके कई अर्थ हैं, जैसे नियम-संकल्प पूर्वक अनुष्ठान, अभीष्ट देवमन्त्र ग्रहण, यजन, पूजन, व्रत-संग्रह, उपनयन संस्कार आदि। उपनयन संस्कार में भी गुरु या आचार्य यज्ञोपवीत प्रदान करते समय शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा प्रदान करते हैं। तन्त्र ग्रन्थों में दीक्षा का विस्तार से वर्णन हुआ है। एक तन्त्र ग्रन्थ के अनुसार दीक्षा को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- दीयते विमलं ज्ञानं क्षीयते कर्मवासना। तेन दीक्षेति सा प्रोक्ता मुनिभिस्तन्त्रवेदिभिः (वाच०पृ० ३६००) अर्थात् जो विमल ज्ञान देकर कर्म वासना का क्षय कर देती है, उसे तन्त्रज्ञ मुनियों द्वारा दीक्षा कहा गया है। प्रख्यात तन्त्र ग्रन्थ रुद्रयामल में दीक्षा की परिभाषा इस प्रकार दी गई है-ददाति शिवतादात्म्यं क्षिणोति च मलत्रयम्। अतो दीक्षेति संप्रोक्ता दीक्षा तन्त्रार्थवेदिभिः (वाच०पृ० ३६०२) अर्थात् जिससे शिव (कल्याणकारी) से तादात्म्य प्राप्त होता है तथा मलत्रय (लोभ, मोह, अहंकार) का प्रक्षालन होता है, उसे तन्त्रज्ञों ने दीक्षा कहा है। योगिनी तन्त्र तृतीय भाग के षष्ठ पटल में भी दीक्षा की महत्ता बताते हुए तन्त्रकार ने लिखा है-दीयते ज्ञानमत्यर्थं क्षीयते पाशबन्धनम्। अतो दीक्षेति देवेशि! कथिता तत्त्वचिन्तकैः अर्थात् जो ज्ञान-मति प्रदान करती तथा पाशबन्धनों को क्षीण करती है, उसे तत्त्वचिन्तकों ने दीक्षा नाम दिया है। दीक्षा से जीवन जीने की कला में दक्षता प्राप्त हो जाती है, जिससे व्यक्ति स्वयं तो सुख-शान्तिमय जीवनयापन करता ही है, समाज और संस्कृति के उत्कर्ष के लिए भी बहुत कुछ कर गुजरने को समुद्यत होता है। सद्गुरु से दीक्षा लिए बिना व्यक्ति 'निगुरा' कहलाता है, जो एक प्रकार की गाली है। अस्तु, प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ गुरु से दीक्षा अवश्य लेनी चाहिए। दीक्षा के बिना मंत्र का जप करना उसी प्रकार समुचित फलदायक नहीं होता, जिस प्रकार पत्थर की चट्टान में बोया बीज अंकुरित नहीं होता-अदीक्षितस्य निन्दाम्राह तन्त्रसारे-अदीक्षिता ये कुर्वन्ति जप पूजादिकाः क्रियाः। न भवन्ति श्रियै तेषां शिलायाममुमबीजवत् (वाच०पृ० ३६०२)। यों तो शुभकार्य जितना शीघ्र हो, कर लेना चाहिए; किन्तु दीक्षा के सम्बन्ध में कुछ समय श्रेष्ठ माने गये हैं। हिन्दी विश्वकोश के अनुसार-शुक्ल पक्ष में दीक्षा शुभफल प्रदायक होती है। कृष्ण पक्ष में भी पंचमी तिथि तक ली जा सकती है। श्रीकामी को शुक्ल पक्ष में और मुमुक्षु को कृष्ण पक्ष में मंत्र दीक्षा लेना उचित है। विद्वानों का मत है कि रविवार को दीक्षा लेने से धन संचय,चन्द्रवार को शान्ति, भौमवार को आयुः क्षय, बुधवार को सौन्दर्य प्राप्ति, गुरुवार को ज्ञान प्राप्ति, शुक्रवार को सौभाग्य और शनिवार को यशनाश होता है। ये बातें सामान्य स्थलों पर लागू होती हैं; किन्तु