१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ३६९ धारणा गङ्गादि पुण्य तीर्थ स्थलों, काशी, प्रयाग, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों में दीक्षा लेने के सम्बन्ध में कोई विचार नहीं किया जाता। दीक्षा के अनेक प्रकार हैं—जैसे—मंत्रदीक्षा, अग्रिदीक्षा, प्राणदीक्षा। तान्त्रिकों में प्रचलित दीक्षा भी कई प्रकार की होती है, जैसे-समयीदीक्षा, लोकदीक्षा, क्रियादीक्षा और कला दीक्षा आदि। उपनिषद् ग्रन्थों में भी दीक्षा की कई स्थानों पर महिमा गायी गई है। बृहदारण्यक उपनिषद् में बताया गया है कि दीक्षा सत्य में प्रतिष्ठित है-कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति (बृह०उ० ३.९.२३)। इसी प्रकार सोम की प्रतिष्ठा दीक्षा में निर्दिष्ट है-सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायाम् (बृह० ३.९.२३)। निर्वाणोपनिषद् में अवधूत लक्षण में दीक्षा के सम्बन्ध में कहा गया है कि परब्रह्म से संयोग ही उसकी दीक्षा है। उसके लिए किसी स्थूल कर्मकाण्ड की आवश्यकता नहीं है—परमहंसः सोऽहम् ...........संयोग दीक्षा (निर्वाणो० २-१४)। १३९. देव - द्र०-ज्ञानखण्ड । १४०. देवयजन—वेदों, उपनिषदों आदि आर्ष ग्रन्थों में देवयजन शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है। हिन्दी विश्वकोश में 'देवयजन' शब्द की रचना इस प्रकार विवेचित है-देवा इज्यन्तेऽत्र यज आधारे ल्युट्। इसके तीन अर्थ हैं- वेदिस्यान (यज्ञवेदी), यज्ञ करने का स्थल और पृथिवी। सामान्यतया इस शब्द का अर्थ 'देवताओं के लिए यज्ञ क्रिया' जैसा प्रतीत होता है; किन्तु इसका वास्तविक अर्थ यज्ञवेदी, यज्ञकुण्ड, यज्ञस्थल आदि है। शतपथ ब्राह्मण और कात्यायन श्रौत्र सूत्र आदि ग्रन्थों में इसका अर्थ यज्ञवेदी, यज्ञ स्थल होने की पुष्टि की गई है-"वेदीमार्जन प्रशंसार्थमितिहासमाह। आ समन्तात् मृतं सर्वदा नश्वरमामृतं तद्विपरीतं यद्देवयागाधिकरणभूतं स्थानम्" (वाच०पृ०३७३९)। जाबालोपनिषद् में देवयजन का दार्शनिक स्वरूप इस प्रकार विवेचित है- "याज्ञवल्क्य के यह पूछने पर कि प्राणों का क्षेत्र तथा इन्द्रियों का देवयजन क्या है? बृहस्पति ने कहा कि अविमुक्त ही प्राणों का स्थल (कुरुक्षेत्र) है और वही इन्द्रियों का देवयजन (यज्ञस्थल) है तथा वही प्राणियों का ब्रह्मसदन भी हैं-यदमु कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्। अविमुक्तं वै कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम् (जाबालो० १.१)। कात्यायन यज्ञ पद्धति विमर्श में उल्लेख है कि यागोचित स्थल में ही देवयजन का निर्माण किया जाता है। देवयजन के निमित्त उस स्थल की कुछ विशेषताएँ होनी चाहिए, जैसे- जहाँ कृष्णसार मृग स्वाभाविक रूप से विचरते हों, वह स्थान देवयजन के लिए उपयुक्त होता है- कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः। स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परः (मनु० २.२३)। १४१. द्रष्टा - आर्ष ग्रन्थों में 'द्रष्टा' शब्द कई स्थलों पर प्रयुक्त हुआ है। सामान्यतः 'देखने वाले' के अर्थ में ही द्रष्टा शब्द प्रचलित है; किन्तु विशेषणों सहित इसके कई प्रकार के शब्द व अर्थ बनते हैं; जैसे-मूकद्रष्टा (चुप रहकर देखने वाला), भविष्यद्रष्टा (भविष्य देखने वाला), दूरद्रष्टा (दूर तक देखने वाला), युगद्रष्टा (वर्तमान युग की समस्याओं के समाधान खोजने वाला अथवा भावी युग के दृश्य को पहले से देख लेने वाला) आदि। इसी प्रकार ईश्वर का एक नाम भी सर्वद्रष्टा (सब कुछ देखने वाला) है। इसीलिए मैत्रेयी उपनिषद् में साधक कहता है कि मैं जगत् का सर्वद्रष्टा नहीं हूँ अर्थात् वह ईश्वर ही जगत् का सर्वद्रष्टा है- न जगत्सर्वद्रष्टास्मि (मैत्रे० ३.१४)। निरुक्तकार यास्क मुनि ने मन्त्रों का दर्शन करने वाले ऋषियों को भी 'द्रष्टा' की संज्ञा प्रदान को है। उनके अनुसार मन्त्रों अथवा ऋचाओं का दर्शन या साक्षात्कार करने के कारण ही वे ऋषि कहलाते हैं- दर्शनात् ऋषिः (नि०२.३.१२)। इसीलिए ऋषियों को मन्त्रद्रष्टा कहा गया है-साक्षात्कृत धर्माण ऋषयो बभूवुः । .....ऋषयो मन्त्रद्रष्टारो मन्त्रकाले बभूवुः (नि० १.६.२०)। पातञ्जल योग सूत्र में आत्मा को द्रष्टा तथा अन्तःकरण को दृश्य बताते हुए सूत्रकार ने इन दोनों के संयोग को दुःख का हेतु कहा है-द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः (पात० यो०सू० २.१७)। मैत्रेयी उपनिषद् २.२९ में उल्लेख है कि मुमुक्षु को चाहिए कि वह द्रष्टा, दृश्य और दर्शन को वासना के साथ ही त्यागकर उस आत्मा का ही भजन करे (उसी में रमण करे), जिसमें दर्शन का सर्वप्रथम आभास होता है-द्रष्टृदर्शन दृश्यानि त्यक्त्वा ........... केवलं भज। भगवान् कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में देहस्थित पुरुष को साक्षी होने से उपद्रष्टा कहा है-उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः (गी० १३.२२)। १४२. द्वैत - द्र०-ज्ञानखण्ड-अद्वैत। १४३. धर्म - द्र०-ज्ञानखण्ड-धर्म-अधर्म। १४४. धारणा - द्र०-ज्ञानखण्ड।