भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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धृति ३७० परिशिष्ट १४५. धृति— सामान्यतः धृति का उल्लेख धर्म के दस लक्षणों के अन्तर्गत आता है। मनुस्मृति ६.९२ में धृति (धैर्य या सन्तोष) को धर्म का प्रथम लक्षण माना गया है- धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ धृ+क्तिन् से निर्मित धृति शब्द के कोश ग्रन्थों में कई अर्थ हैं जैसे- धारण करना, तुष्टि, सन्तोष, तृप्ति, धैर्य, मन की दृढ़ता और षोडश मातृकाओं में से एक का नाम आदि। श्री मल्लिनाथ ने रघुवंश को अपनी टीका में धृति को धैर्य या प्रीति माना है- 'धृतिर्धैर्यं प्रीतिर्वा' (वाच०पृ० ३९०६)। मानसिक धारणा को भी धृति कहते हैं। गीता (१८.३३- ३५) में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को इसके सात्त्विकी, राजसी और तामसी तीन भेद बताये हैं-धृत्या यया धारयते मनः प्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥ यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥ औपनिषदिक परिप्रेक्ष्य में यमों के भी दस प्रकार हैं। पातञ्जल योग के अनुसार सामान्यतः पाँच यम व पाँच नियम माने जाते हैं; किन्तु जाबाल दर्शनोपनिषद् में इन्हें दस-दस माना गया है। जिनमें एक यम 'धृति' भी है-अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयाऽऽर्जवम्। क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश (जा०दर्शनो० १.६)। उपनिषदकार ने धृति को इन शब्दों में परिभाषित किया है- वेदादेव विनिर्मोक्षः संसारस्य न चान्यथा। इति विज्ञान निष्पत्तिर्धृतिः प्रोक्ता हि वैदिकैः (जा०दर्शनो० १.१७) अर्थात् वेदादि की अनुकूलता (वैदिक मार्ग पर चलने) से ही सांसारिक प्राणियों को मोक्ष प्राप्त होता है। इससे भिन्न मोक्ष प्राप्ति का अन्य कोई साधन नहीं है। इस प्रकार के दृढ़ निश्चय या दृढ़ धारणा को ही ज्ञानी जनों द्वारा धृति कहा गया है। १४६. ध्यान— द्र०-ज्ञानखण्ड। १४७. धुवाग्नि-द्र०-ज्ञानाग्नि। १४८. नवद्वार— आध्यात्मिक सन्दर्भ में मानव शरीर में स्थित नवद्वारों की चर्चा की जाती है। ये नव (९ की संख्या) द्वार शरीर में स्थित विभिन्न इन्द्रियों के छिद्र ही हैं। प्रख्यात कोशग्रन्थ वाचस्पत्यम् में नवद्वार इन शब्दों में विवेचित है-नवद्वा- राणीव चित्तवृत्त्यादेर्बहिर्गमन साधनत्वात् यत्र। देहे तत्र नवभिश्छिद्रैश्चित्तादेर्बहिर्गमनातस्य तथात्वम्। तथा हि द्वे श्रोत्रे द्वे चक्षुषी द्वे नासिके च मुखमेकमिति शीर्ष स्थानि सप्त द्वे पायूपस्थे अधः स्थे इति नवच्छिद्र रूपाणि द्वाराणि देहे सन्ति (वाच.पृ. ३९८८) अर्थात् देहस्थित नवद्वारों के माध्यम से चित्त वृत्तियाँ बहिर्गमन करती हैं, इसीलिए दो कान, दो आँखें, दो नासिका छिद्र, एक मुख, एक उपस्थ तथा एक गुदा इन नौ छिद्रों वाली इन्द्रियों को नवद्वार कहते हैं। शास्त्रों को ऐसी मान्यता है कि इस शरीर से जब प्राण बहिर्गमन करता है, तो इन्हीं नौ द्वारों में से किसी एक से होकर निकलता है; किन्तु योगीजन सहस्रार चक्र से प्राण निष्क्रमण करते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद् में उल्लेख है-नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः .....(श्वेता०३.१८) तात्पर्य यह है कि वह परम पुरुष-आत्मा प्रकाश स्वरूप है, जो नवद्वार वाले शरीर रूप नगर में अन्तर्यामी होकर विद्यमान है, वही बाह्यजगत् में विविध प्रकार से लीलाएँ कर रहा है-मैत्रेयी उपनिषद् में शरीरगत नौ छिद्रों को मल निष्कासन करने वाला कहकर यह विधान बताया गया है कि इसे (इस शरीर की) छूकर स्नान करना चाहिए अथवा पवित्र रखना चाहिए-विकाराकारविस्तीर्णं स्पृष्ट्वा स्नानं विधीयते। नवद्वारमलस्रावं सदाकाले स्वभावजम् (मैत्रे० २.५-६)। १४९. नाद— द्र०-अनाहत नाद। १५०. निःस्पृह-द्र०-ज्ञानखण्ड। १५१. निदिध्यासन— भारतीय दर्शन के अन्तर्गत ब्रह्म साक्षात्कार अथवा आत्मानुसन्धान के विविध आयामों में श्रवण, मनन आदि के क्रम में निदिध्यासन का भी उल्लेख है। वेदान्त दर्शन में यह उल्लेख इन शब्दों में है-एवंभूतस्वरूप चैतन्य साक्षात्कारपर्यन्तं श्रवणमनननिदिध्यासनसमाध्यनुष्ठानस्यापेक्षित तत्त्वात्तेऽपि प्रदर्श्यन्ते (वे०सा०३०) अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप चैतन्य (ब्रह्म) के साक्षात्कार हो जाने तक श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि, ये अनुष्ठान आवश्यक हैं। ब्रह्म साक्षात्कार हेतु साधना का प्रथम चरण 'श्रवण' है। श्रुति वाक्यों द्वारा ब्रह्म के सन्दर्भ में सुनना (श्रवण करना) चाहिए; तदुपरान्त ही उस पर मनन, निदिध्यासन व समाधि (ध्यान की उच्चतम स्थिति) सम्भव है। इन सबके बाद ही ब्रह्म साक्षात्कार हो सकता है। साधक द्वारा किसी सुयोग्य गुरु की शरण में जाकर 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों