भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३७१ नियम को सुनकर षड्विधलिङ्ग द्वारा ब्रह्म के सन्दर्भ में उनका अभिप्राय निर्धारित करना वेदान्त की भाषा में 'श्रवण' कहलाता है- श्रवणं नाम षड्विधलिङ्गैरशेषवेदान्तानामद्वितीय वस्तुनि तात्पर्यावधारणम् (वे०सा०३०)। अध्यात्मोपनिषद् में भी 'श्रवण' इसी प्रकार निर्दिष्ट है- इत्थं वाक्यैस्तथार्थानुसंधानं श्रवणं भवेत् (अध्यात्मो० ३३) अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों द्वारा जीव-ब्रह्म ऐक्य का अर्थानुसंधान 'श्रवण' है। इसे और सरल शब्दों में कहें, तो इस प्रकार कह सक ते हैं कि आप्त पुरुषों अथवा गुरु आदि के द्वारा जीव-ब्रह्म ऐक्य, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करना 'श्रवण' अथवा 'सिद्धान्त श्रवण' कहलाता है। वेदान्तसार रचयिता श्री सदानन्द ने 'श्रवण' के अगले उपक्रम 'मनन' का अर्थ, श्रवण को गई अद्वितीय वस्तु का वेदान्तानुरूप तर्कों द्वारा चिन्तन करना बताया है-मननं तु श्रुतस्याद्वितीय वस्तुनो वेदान्तानुगुण युक्तिभिरनवरतमनुचिन्तनम् (वे०सा० ३०)। उपनिषद् में भी शब्दान्तर से मनन की यही परिभाषा वर्णित है-युक्त्या संभावितत्वानुसंधानं मननं तु तत् (अध्यात्मो० ३३) अर्थात् श्रवण किए गए तथ्य के अर्थ पर तर्क पूर्वक विचार करना 'मनन' कहलाता है। मनन का अगला चरण निदिध्यासन है। इसमें साधक श्रवण और मनन किए गए विषय में सन्देहरहित होकर, उसमें चित्त को एकाग्र कर स्थिर कर लेता है, चित्त का यही एकतानत्व निदिध्यासन कहलाता है। उपनिषदकार ने निदिध्यासन की स्थिति इस प्रकार बतायी है-ताभ्यां निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत्। एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते (अध्यात्मो० ३४)। वेदान्तसार में निदिध्यासन की परिभाषा करते हुए ग्रन्थकार ने लिखा है-विजातीय देहादि प्रत्ययरहिता द्वितीयवस्तुसजातीयप्रत्ययप्रवाहो निदिध्यासनम् (वे०सा० ३०)। इसका अभिप्राय यह है कि शरीर आदि जड़ होने से (आत्मा के) विजातीय हैं, इन विजातीय विचारों से रहित तथा अद्वितीय वस्तु ब्रह्म विषयक सजातीय विचारों का सतत (तैलधारावत्) अविच्छिन्न प्रवाह ही निदिध्यासन है। दूसरे शब्दों में आत्मा को सजातीय प्रतीतियों में चित्त का अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित होना ही निदिध्यासन है। निदिध्यासन के बाद अन्तिम अवस्था समाधि है। चित्त की एकाग्रता का नाम समाधि है। इसकी व्युत्पत्ति से ही इसका अर्थ स्पष्ट है-सम्यक् आधीयते एकाग्रीक्रियते विक्षेपान् परिहृत्य मनः यत्र स समाधिः (घे०वि०पृ० २७९) अर्थात् विक्षेपों का परिहार हो जाने पर जब मन एकाग्र हो जाता है, उस स्थिति को 'समाधि' कहते हैं। स्थिति के अनुरूप इसके कई भेद भी होते हैं। इस सन्दर्भ में १०८ उपनिषद् ज्ञानखण्ड के परिभाषा कोश परिशिष्ट में समाधि प्रकरण में विस्तृत उल्लेख किया गया है। बृहदारण्यक उपनिषद् में आत्मा को ही द्रष्टव्य, श्रोतव्य, मन्तव्य और निदिध्यासितव्य बताते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को आत्मदर्शन-आत्म साक्षात्कार को ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य बताया है-आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् (बृह०३०२.४.५)। १५२. नियम- योग दर्शन के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए नियम पालन आवश्यक है। जिस प्रकार पातञ्जल योग में पाँच यम वर्णित हैं, उसी प्रकार पाँच नियम-शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान भी हैं। योगदर्शन में उल्लेख है- शौचसंतोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः (पातं०यो० सू०-३२)। अध्यात्म पथ के पथिक को अपने जीवन क्रम में इन नियमों को समाविष्ट करना आवश्यक है। शब्द कल्पद्रुम में नियम को व्युत्पत्ति इस प्रकार है-नियमः पुं- (नियमनमिति। नि+यम) अर्थात् आत्म नियमन=नियन्त्रण। यमों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) को स्वभाव का अंग बनाने के लिए इन नियमों (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान या ईश्वर पूजन) आवश्यक है। वस्तुतः यम और नियम अन्योन्याश्रित हैं। कुछ उपनिषदों व शास्त्रों में दशविध नियम वर्णित हैं- तपः संतोषमास्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम्। सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीमंतिश्च जपो व्रतम्॥ एते च नियमाः प्रोक्तास्तान्वक्ष्यामि क्रमाच्छृणु (जा०दर्शनो० २.१) अर्थात् तप, सन्तोष, आस्तिकता, दान, ईश्वर पूजन, सिद्धान्त-श्रवण, ह्री (लज्जा), मति, जप और व्रत ये नियम हैं; किन्तु ऊपर वर्णित योग दर्शन के पाँच नियम (शौच, सन्तोष, तप आदि) ही अधिक प्रचलित हैं। प्रथम-नियम शौच है। शौच अर्थात् पवित्रता, १. बाह्यशौच २. आभ्यन्तर शौच। मिट्टी और जल से शरीर, वस्त्र, पात्र, स्थान आदि को शुद्ध रखना बाह्य शौच है। मैत्री आदि से ईर्ष्या, अभिमान, घृणा आदि मलों को साफ करना आन्तरिक या आभ्यन्तर शौच है। जाबाल दर्शनोपनिषद् में उल्लेख है- स्वदेहमलनिर्मोक्षो मृज्जलाभ्यां महामुने। यत्तच्छौचं भवेद् बाह्यं मानसं मननं विदुः । अहं शुद्ध इति ज्ञानं ........ रमते नरः (जा०दर्शनो० १.२०-२२) अर्थात् मिट्टी और जल से शरीर को पवित्र रखना बाह्य शौच है; किन्तु ज्ञानीजन 'मैं विशुद्ध आत्मा हूँ' ऐसा भाव रखने को ही सर्वोत्कृष्ट शौच कहते हैं। शरीर तो बाहर-भीतर उभयविध अशुद्ध है; पर इसमें निवास करने वाला देही अत्यन्त निर्मल है। ऐसा ज्ञान होने