१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
परिशिष्ट ३७१ नियम को सुनकर षड्विधलिङ्ग द्वारा ब्रह्म के सन्दर्भ में उनका अभिप्राय निर्धारित करना वेदान्त की भाषा में 'श्रवण' कहलाता है- श्रवणं नाम षड्विधलिङ्गैरशेषवेदान्तानामद्वितीय वस्तुनि तात्पर्यावधारणम् (वे०सा०३०)। अध्यात्मोपनिषद् में भी 'श्रवण' इसी प्रकार निर्दिष्ट है- इत्थं वाक्यैस्तथार्थानुसंधानं श्रवणं भवेत् (अध्यात्मो० ३३) अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों द्वारा जीव-ब्रह्म ऐक्य का अर्थानुसंधान 'श्रवण' है। इसे और सरल शब्दों में कहें, तो इस प्रकार कह सक ते हैं कि आप्त पुरुषों अथवा गुरु आदि के द्वारा जीव-ब्रह्म ऐक्य, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करना 'श्रवण' अथवा 'सिद्धान्त श्रवण' कहलाता है। वेदान्तसार रचयिता श्री सदानन्द ने 'श्रवण' के अगले उपक्रम 'मनन' का अर्थ, श्रवण को गई अद्वितीय वस्तु का वेदान्तानुरूप तर्कों द्वारा चिन्तन करना बताया है-मननं तु श्रुतस्याद्वितीय वस्तुनो वेदान्तानुगुण युक्तिभिरनवरतमनुचिन्तनम् (वे०सा० ३०)। उपनिषद् में भी शब्दान्तर से मनन की यही परिभाषा वर्णित है-युक्त्या संभावितत्वानुसंधानं मननं तु तत् (अध्यात्मो० ३३) अर्थात् श्रवण किए गए तथ्य के अर्थ पर तर्क पूर्वक विचार करना 'मनन' कहलाता है। मनन का अगला चरण निदिध्यासन है। इसमें साधक श्रवण और मनन किए गए विषय में सन्देहरहित होकर, उसमें चित्त को एकाग्र कर स्थिर कर लेता है, चित्त का यही एकतानत्व निदिध्यासन कहलाता है। उपनिषदकार ने निदिध्यासन की स्थिति इस प्रकार बतायी है-ताभ्यां निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत्। एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते (अध्यात्मो० ३४)। वेदान्तसार में निदिध्यासन की परिभाषा करते हुए ग्रन्थकार ने लिखा है-विजातीय देहादि प्रत्ययरहिता द्वितीयवस्तुसजातीयप्रत्ययप्रवाहो निदिध्यासनम् (वे०सा० ३०)। इसका अभिप्राय यह है कि शरीर आदि जड़ होने से (आत्मा के) विजातीय हैं, इन विजातीय विचारों से रहित तथा अद्वितीय वस्तु ब्रह्म विषयक सजातीय विचारों का सतत (तैलधारावत्) अविच्छिन्न प्रवाह ही निदिध्यासन है। दूसरे शब्दों में आत्मा को सजातीय प्रतीतियों में चित्त का अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित होना ही निदिध्यासन है। निदिध्यासन के बाद अन्तिम अवस्था समाधि है। चित्त की एकाग्रता का नाम समाधि है। इसकी व्युत्पत्ति से ही इसका अर्थ स्पष्ट है-सम्यक् आधीयते एकाग्रीक्रियते विक्षेपान् परिहृत्य मनः यत्र स समाधिः (घे०वि०पृ० २७९) अर्थात् विक्षेपों का परिहार हो जाने पर जब मन एकाग्र हो जाता है, उस स्थिति को 'समाधि' कहते हैं। स्थिति के अनुरूप इसके कई भेद भी होते हैं। इस सन्दर्भ में १०८ उपनिषद् ज्ञानखण्ड के परिभाषा कोश परिशिष्ट में समाधि प्रकरण में विस्तृत उल्लेख किया गया है। बृहदारण्यक उपनिषद् में आत्मा को ही द्रष्टव्य, श्रोतव्य, मन्तव्य और निदिध्यासितव्य बताते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को आत्मदर्शन-आत्म साक्षात्कार को ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य बताया है-आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् (बृह०३०२.४.५)। १५२. नियम- योग दर्शन के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए नियम पालन आवश्यक है। जिस प्रकार पातञ्जल योग में पाँच यम वर्णित हैं, उसी प्रकार पाँच नियम-शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान भी हैं। योगदर्शन में उल्लेख है- शौचसंतोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः (पातं०यो० सू०-३२)। अध्यात्म पथ के पथिक को अपने जीवन क्रम में इन नियमों को समाविष्ट करना आवश्यक है। शब्द कल्पद्रुम में नियम को व्युत्पत्ति इस प्रकार है-नियमः पुं- (नियमनमिति। नि+यम) अर्थात् आत्म नियमन=नियन्त्रण। यमों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) को स्वभाव का अंग बनाने के लिए इन नियमों (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान या ईश्वर पूजन) आवश्यक है। वस्तुतः यम और नियम अन्योन्याश्रित हैं। कुछ उपनिषदों व शास्त्रों में दशविध नियम वर्णित हैं- तपः संतोषमास्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम्। सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीमंतिश्च जपो व्रतम्॥ एते च नियमाः प्रोक्तास्तान्वक्ष्यामि क्रमाच्छृणु (जा०दर्शनो० २.१) अर्थात् तप, सन्तोष, आस्तिकता, दान, ईश्वर पूजन, सिद्धान्त-श्रवण, ह्री (लज्जा), मति, जप और व्रत ये नियम हैं; किन्तु ऊपर वर्णित योग दर्शन के पाँच नियम (शौच, सन्तोष, तप आदि) ही अधिक प्रचलित हैं। प्रथम-नियम शौच है। शौच अर्थात् पवित्रता, १. बाह्यशौच २. आभ्यन्तर शौच। मिट्टी और जल से शरीर, वस्त्र, पात्र, स्थान आदि को शुद्ध रखना बाह्य शौच है। मैत्री आदि से ईर्ष्या, अभिमान, घृणा आदि मलों को साफ करना आन्तरिक या आभ्यन्तर शौच है। जाबाल दर्शनोपनिषद् में उल्लेख है- स्वदेहमलनिर्मोक्षो मृज्जलाभ्यां महामुने। यत्तच्छौचं भवेद् बाह्यं मानसं मननं विदुः । अहं शुद्ध इति ज्ञानं ........ रमते नरः (जा०दर्शनो० १.२०-२२) अर्थात् मिट्टी और जल से शरीर को पवित्र रखना बाह्य शौच है; किन्तु ज्ञानीजन 'मैं विशुद्ध आत्मा हूँ' ऐसा भाव रखने को ही सर्वोत्कृष्ट शौच कहते हैं। शरीर तो बाहर-भीतर उभयविध अशुद्ध है; पर इसमें निवास करने वाला देही अत्यन्त निर्मल है। ऐसा ज्ञान होने
निरञ्जन ३७२ परिशिष्ट पर उसे पवित्र किया जाए। अतः हे मुने ! जो ज्ञान रूप पवित्रता को छोड़कर बाह्य पवित्रता में ही रमा रहता है, वह स्वर्ण के स्थान पर मिट्टी के ढेलों का ही संग्रह करता है। दूसरा-नियम सन्तोष है। अपनी स्थिति के अनुरूप उचित प्रयास करने पर जो भी फल प्राप्त हो, उसी में प्रसन्न रहना सन्तोष है। सन्तोष को सुख का मूल और इसके विपरीत स्थिति को दुःख का मूल कहा गया है-सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्। सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः (मनु० ४.१२)। इसी तथ्य की पुष्टि जाबाल दर्शनोपनिषद् में भी मिलती है-यदृच्छालाभतो नित्यं प्रीतिर्या जायते नृणाम्। तत्सन्तोषं विदुः प्राज्ञाः परिज्ञानैक तत्पराः (जा०दर्शनो० २.५)। प्रभु इच्छा से जो कुछ प्राप्त हो जाए, उसी में सन्तुष्ट रहना विद्वानों ने सन्तोष कहा है। सर्वत्र अनासक्त भाव से रहकर ब्रह्मलोक तक के सुख से विरक्ति और हर स्थिति में प्रसन्नता यही सर्वश्रेष्ठ सन्तोष है। तीसरा-नियम तप है। अश्व विद्या के कुशल सारथी द्वारा चञ्चल घोड़ों को साधने के समान, साधक द्वारा शरीर, प्राण, इन्द्रियों और मन को समुचित प्रकार से वश में करना तप कहलाता है। जाबालदर्शन उपनिषदकार ने तप की परिभाषा इस प्रकार की है- वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः । शरीरशोषणं यत्तत्तप इत्युच्यते बुधैः (जा० दर्शनो० २.३) अर्थात् वेदोक्त कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रत करके शरीर को क्षीण करना ही तप है, ऐसा विद्वान् कहते हैं। वस्तुतः उच्च आदर्शों के लिए कष्ट सहन करने का नाम ही तप है। महर्षि पतञ्जलि ने तप तीन प्रकार के माने हैं- शरीर का तप, वाणी का तप और मन का तप। शारीरिक तप के अन्तर्गत युक्त आहार- उचित आहार, सादा-सात्त्विक, सुपाच्य और मिताहार तथा युक्त विहार के अन्तर्गत संतुलित यात्रा, चलना-फिरना आदि है। इसी प्रकार युक्त कर्मचेष्टा अर्थात् नियमित रूप से कर्तव्य पालन, न अधिक श्रम, न आलस्य-प्रमाद बरतना, युक्त स्वप्नावबोध अर्थात् न अधिक सोना, न अधिक जागना। इस सन्दर्भ में गीता का यह श्लोक-'युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु । युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा' (गी०६.१७)। वाणी के तप का अर्थ है-वाणी को संयमित रखना। हितकर, प्रिय, मधुर और मित बोले। मन का तप मन को संयमित रखना है। द्वेष, घृणा, ईर्ष्या आदि के भाव मन में न रखना मन का तप है। चौथा-नियम स्वाध्याय है। जिस प्रकार शरीर के लिए भोजन आदि को सतत आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार विचार संस्थान मन-मस्तिष्क को सुव्यवस्थित-सन्तुलित रखने के लिए स्वाध्याय की आवश्यकता अनिवार्य रूप से है। स्वाध्याय का शाब्दिक अर्थ है- स्व-अपना, अध्याय-अध्ययन। अपना अध्ययन अर्थात् आत्मावलोकन ही स्वाध्याय है। वाचस्पत्यम् में स्वाध्याय की व्युत्पत्ति इन शब्दों में दी है- स्वः स्वकीयत्वे विहित अध्यायः .......। स्वाध्यायोऽध्येतव्यः इति श्रुतिः । स्वाध्याय के द्वारा वेद, शास्त्र, उपनिषद्, गीता व अन्य आर्षग्रन्थों का अध्ययन करके उससे प्राप्त ज्ञान के दर्पण में साधक अपने को देखकर आत्म समीक्षा करता है, जिससे आत्म सुधार होता है व आध्यात्मिक उन्नति होती चली जाती है। पातञ्जल योग के अनुसार ओंकार सहित गायत्री मंत्र का जप ही स्वाध्याय है। पाँचवाँ-नियम ईश्वर प्रणिधान है। फल सहित समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देना ईश्वर प्रणिधान है। यह समस्त नियमों में प्रमुख है। पातञ्जल योग प्रदीप में साधन पाद सूत्र- ३२ को व्याख्या में ग्रन्थकार ने महर्षि वेदव्यास कृत भाष्य का उद्धरण देते हुए ईश्वर प्रणिधान का फल इस प्रकार विवेचित किया है-शय्यासनस्थोऽथ पथि व्रजन्वा स्वस्थः परिक्षीण वितर्कजालः । संसारबीजक्षयमीक्षमाणः स्यान्नित्ययुक्तोऽमृतभोगभागी ॥ जो योगी पुरुष शय्या और आसन पर विराजमान या पथ पर गमन करता हुआ अथवा एकान्तस्थ हो, हिंसा आदि वितर्कजाल को विनष्ट करके ईश्वर प्रणिधान करता है, वह अविद्या आदि क्लेशों का विनाश करता हुआ नित्य स्वरूप परमात्मा से युक्त हुआ जीवन्मुक्त का सुख प्राप्त करता है। अतः सभी यमों और नियमों को परब्रह्म में अर्पण करके ईश्वर प्रणिधान करे। जाबालदर्शनोपनिषद् ने ईश्वर प्रणिधान को ईश्वर पूजन कहा है, जिसकी परिभाषा इस प्रकार दी है- रागाद्यपेतं हृदयं वागदुष्टाऽनृतादिना । हिंसादिरहितं कर्म यत्तदीश्वर पूजनम् (जा० दर्शनो० २.८) अर्थात् अनृत भाषण आदि दोषों से रहित तथा हिंसा आदि क्रूरता से मुक्त कर्म ही ईश्वर पूजन है। १५३. निरञ्जन - द्र०-चिद्घन । १५४. निरहंकारिता - द्र०-अमानित्व गुण । १५५. निर्गुण - द्र०-ज्ञानखण्ड -निर्गुण-सगुण । १५६. निर्वाण - निर्+वा+क्त से निर्मित निर्वाण शब्द का प्रयोग प्रायः निवृत्ति, शान्ति, अस्तागमन, वाणशून्य, शून्य, विश्रान्ति और मुक्ति या मोक्ष के अर्थ में होता है। दर्शन में इसका मुक्ति के अर्थ में ही अधिक प्रयोग हुआ है। सामान्य धारणा यह
परिशिष्ट | ३७३ | पञ्च तत्त्व-पंच तन्मात्राएँ
है कि शरीर छूटने के उपरान्त पूर्व कर्मानुसार पुनर्जन्म होता है, पर किसी-किसी योगी के समस्त कर्मक्षय हो जाने पर मृत्यु के उपरान्त पुनर्जन्म नहीं होता, यही स्थिति निर्वाण अथवा मोक्ष अथवा मुक्ति कहलाती है; किन्तु दर्शन ग्रन्थों में तृष्णा की सम्यक् निवृत्ति को ही निर्वाण कहा गया है-तृष्णाया विप्रहाणेन निर्वाणमिति कथ्यते ( हि०वि०को० खं० १२) अर्थात् यह जगत् कल्पित और आधाररहित है। अतः इस मिथ्या संसार के साथ अपने को सम्बद्ध रखने की प्रबल आकांक्षा का नाम ही तृष्णा है। इस तृष्णा के विनष्ट हो जाने पर ही संसारोच्छेद, आत्माभिमान का विनाश और निर्वाण प्राप्त होता है। प्रज्ञापारमिता ग्रन्थ के अनुसार अपनेपन और संसार के अभाव का नाम ही निर्वाण है। जिस अवस्था में न संसार है, न मैं हूँ, वह स्थिति दुर्बोध और गम्भीर है, यही स्थिति निर्वाण है। बौद्ध दर्शन में निर्वाण शब्द का बहुत प्रयोग हुआ है। वहाँ सर्वत्र इसका अभिप्राय मुक्ति से ही लिया गया है। उनका मन्तव्य है कि जिस प्रकार ईंधन न होने पर अग्नि निर्वाण की प्राप्त हो जाती है (बुझ जाती है), ठीक उसी तरह काम, कोध, लोभ और मोह जनित संस्कार के समूल नष्ट हो जाने से सत्ता या अस्तित्व का विलोप हो जाता है। सत्ता का निरोध ही निर्वाण कहलाता है। अश्वघोष ने बुद्ध चरित में उल्लेख किया है- करुणायमाना न्यायस्यो मृत्युभयविमोहिताः। नैर्वाणे स्थापनीयास्तत् पुनर्जन्मनिवर्त्तके (हि०वि०को०खं० १२ पृ० ७१) अर्थात् निर्वाण द्वारा पुनर्जन्म से निवृत्ति हो जाती है। समस्त (अच्छे या बुरे) संस्कारों का क्षय हो जाने पर पुनर्जन्म से निवृत्ति हो जाती है (हि०वि०को०)। अस्तु, संस्कार समूह के क्षय हो जाने पर ही निर्वाण को प्राप्ति होती है। बोधिचर्यावतार ग्रन्थ में उल्लेख है कि सर्वत्याग (जगत्, सुख-दुःख और अभिमान आदि सभी का त्याग) का ही दूसरा नाम निर्वाण है-सर्वत्यागश्च निर्वाणं निर्वाणार्थि च मे मनः (हि०वि०को०खं० १२ पृ० ७२)। निरालम्ब उपनिषद् के अनुसार मुक्ति या मोक्ष (निर्वाण) नित्य और अनित्य वस्तुओं के विचार से नश्वर संसार के सुख-दुःख प्रदाता सम्पूर्ण विषयों से ममत्व रूप बन्धन को नष्ट कर देना है-मोक्ष इति च नित्यानित्यवस्तु विचारादनित्य संसारसुखदुःखविषयसमस्तक्षेत्रममताबन्धक्षयो मोक्षः (निरा० २९)। गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने ज्ञानाग्नि द्वारा समस्त कर्मों के क्षय का उपदेश दिया है-ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा (गी० ४.३७)। आत्मज्ञान हो जाने पर समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं। ब्रह्म की अनुभूति हो जाने पर साधक अपने को अजर, अव्यय, सूक्ष्म, अक्षर, अविकल, निर्मल और निर्वाण मूर्ति अनुभव करने लगता है। "एकोऽहम ...........निर्वाणमयसंविदम्" (मैत्रे० १.१४)। १५७. निर्विकल्प - द्र०-ज्ञानखण्ड -समाधि। १५८. निर्विकार - द्र०-चिद्घन। १५९. निष्कल - द्र०-चिद्घन। १६०. निष्काम कर्म - द्र०- ज्ञानखण्ड। १६१. पञ्चकोश-द्र०- ज्ञानखण्ड। १६२. पञ्चतत्त्व-पञ्च तन्मात्राएँ- सम्पूर्ण सृष्टि पञ्चतत्त्वों अथवा पञ्चमहाभूतों से निर्मित मानी जाती है। यह शरीर भी पञ्चतत्त्वों का ही बना हुआ है। ये पाँच तत्त्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। ये ही पाँचों तत्त्व समस्त पद के रूप में पंच तत्त्व कहलाते हैं। प्रख्यात कोशग्रन्थ वाचस्पत्यम् में उल्लेख है-पञ्चानां तत्त्वानां समाहारः। पञ्चसु भूतेषु स्वरोदयः। तंत्र ग्रन्थों में पञ्च मकार-मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन को पञ्च तत्त्व कहा गया है- "मद्यं मांसं तथा मत्स्यो मुद्रा मैथुनमेव च। पञ्चतत्त्वमिदं प्रोक्तं देवि! निर्वाणहेतवे। मकारपञ्चकं देवि! देवानामपि दुर्लभम्। पञ्चतत्त्वविहीनानां कलौ सिद्धिर्न जायते (वाच० पृ०-४१८४)" अर्थात् मद्य-मांसादि पञ्च तत्त्व देवों को भी दुर्लभ हैं। इनके बिना कलियुग में निर्वाण सिद्धि नहीं मिल पाती। यहाँ यह ध्यातव्य है कि यह आलङ्कारिक वर्णन है। प्रत्यक्षतः इनका सेवन करके सिद्धि प्राप्त होने की बात नहीं कही गई है। अन्य तन्त्रग्रन्थों में गुरुतत्त्व, मंत्र तत्त्व, मनस्तत्त्व, देवतत्त्व और ध्यान तत्त्व इन्हें पञ्चतत्त्व माना गया है- गुरुतत्त्वं मन्त्रतत्त्वं मनस्तत्त्वं सुरेश्वरि! देवतत्त्वं ध्यानतत्त्वं पञ्चतत्त्वं प्रकीर्तितम् (निर्वाण तंत्र)। सृष्टि में विद्यमान जिन पञ्चतत्त्वों का वर्णन है, वे पृथ्वी आदि पञ्चतत्त्व ही हैं। रामचरित मानस के किष्किन्धा काण्ड में एक चौपायी में इन तत्त्वों का उल्लेख इन शब्दों में हुआ है-क्षिति, जल, पावक, गगन समीरा। पञ्च रचित अति अधम सरीरा ।। त्रिशिख ब्राह्मणोपनिषद् में इस अखिल जगत् को उत्पत्ति के क्रम में भी पञ्च तत्त्वों का उल्लेख मिलता है-इन तत्त्वों का अनुपात इस प्रकार है-पृथ्वी १/२+जल १/८+अग्नि १/८+आकाश १/८+वायु १/८=पृथ्वीतत्त्व, इसी प्रकार अन्य चारों तत्त्वों के १/२ अंश में शेष चारों तत्त्वों का अनुपात १/८, १/८ होने पर ही वे
पूर्ण तत्त्व बनते हैं। जाबाल दर्शनोपनिषद् में शरीर स्थित अङ्ग विशेषों में तत्त्वों की प्रधानता के सन्दर्भ में इस प्रकार उल्लेख है- देहमध्यगते व्योम्नि बाह्याकाशं तु धारयेत्। प्राणे बाह्यानिलं तद्वज्ज्वलने चाग्निमौदरे। आकाशांशस्तथा प्राज्ञः मूर्धांशः परिकीर्तितः (जा०दर्शनो० ८.१-५) अर्थात् तत्त्वाधिक्य की दृष्टि से पाँव से घुटने तक का भाग (पृथिवी तत्त्व के आधिक्य के कारण) पृथिवी तत्त्व का भाग कहलाता है, घुटने से गुदा तक जलीय अंश, गुदा से हृदय तक का अग्न्यंश, हृदय से भौहों तक वाय्वंश तथा मस्तक क्षेत्र आकाशांश कहा गया है। इन तत्त्वों में देवों के ध्यान के सन्दर्भ में वर्णन है कि पृथिवी तत्त्वांश में ब्रह्मा का, जलतत्त्वांश में विष्णु का, अग्नितत्त्वांश में महेश का, वायुतत्त्वांश में ईश्वर का तथा आकाश तत्त्वांश में सदाशिव का ध्यान करना चाहिए-ब्रह्माणं पृथिवीभागे विष्णुं तोयांशके तथा। अग्न्यंशे च महेशानमीश्वरं चानिलांशके। आकाशांशे महाप्राज्ञ धारयेत्तु सदाशिवम् (जा०दर्शनो० ८.५-६)। १६३. पञ्चमहायज्ञ - द्र०-वानप्रस्थ । १६४. पञ्चमात्रा - द्र०-अवधूत। १६५. परब्रह्म - द्र०- ज्ञानखण्ड -ब्रह्म । १६६. परमगति - द्र०-ज्ञानखण्ड । १६७. परमज्योति - द्र०-चिद्घन । १६८. परम तत्त्व- द्र०चिद्घन । १६९. परम पद - द्र०-ज्ञानखण्ड । १७०. परमपुरुष-द्र०-चिद्घन। १७१. परम व्योम- वेद, उपनिषद् आदि आर्ष ग्रन्थों में परमव्योम शब्द का उल्लेख हुआ है। व्योम शब्द सामान्यतः अन्तरिक्ष या आकाश के लिए प्रयुक्त होता है; किन्तु इसमें परम विशेषण जोड़ देने से इसका अर्थ पराचेतना हो जाता है, जो सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति का मूल कारण है। ऋग्वेद १.१६४.३९ में वेदों की ऋचाओं के परमव्योम में स्थित होने का वर्णन है- ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः अर्थात् अविनाशी ऋचाएँ परमव्योम में विद्यमान हैं, जहाँ सम्पूर्ण देव शक्तियों का वास है। कहा जाता है कि प्रलय हो जाने पर भी यह दिव्य ज्ञान तथा सृष्टि के तत्त्व कभी नष्ट नहीं होते; वरन् अपनी परम चेतना, पराचेतना या परमव्योम में समाहित हो जाते हैं और जब पुनः सृष्टि का आविर्भाव होता है, तब प्रकट होते हैं। यों तो यह बात कल्पित जैसी लगती है; किन्तु इसकी यथार्थता को कम्प्यूटर तन्त्र के मास्टर कम्प्यूटर के उदाहरण से स्पष्टतया समझा जा सकता है- जिस प्रकार मास्टर कम्प्यूटर के साथ माइक्रोवेव टावर्स द्वारा विभिन्न कम्प्यूटर जुड़े रहते हैं। देश के किसी भी कम्प्यूटराइज्ड रेलवे स्टेशन से कहीं के भी रेलवे का टिकट बुक कराने से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय आँकड़ों को जानने तक में कम्प्यूटर की इस प्रणाली का उपयोग किया जाता है, किन्तु यदि किसी कम्प्यूटर में गड़बड़ी हो जाये, तो उसके पर्दे पर आँकड़े न आने पर भी वे पूर्णतः नष्ट नहीं होते, वरन् अपने मास्टर कम्प्यूटर में समा जाते हैं। जब मशीनरी ठीक हो जाती है, तो वे आँकड़े पुनः उस कम्प्यूटर पर भी आने लगते हैं, जो कुछ समय पहले खराब हो गया था। ठीक इसी तरह पराचेतना-परमव्योम में सम्पूर्ण ज्ञान व सृष्टि के सभी तत्त्व अवस्थित रहते हैं। पृथिवी आदि किसी एक केन्द्र (ग्रह) के नष्ट हो जाने पर भी वे नष्ट नहीं होते तथा परम व्योम में समाहित हो जाते हैं और नये सिरे से पुनः प्रकट होते हैं। ऋग्वेद में वाणीरूपी गौ के सहस्राक्षरों से युक्त होकर परम व्योम में संख्यात होने को बात इस मंत्र में द्रष्टव्य है- गौरीर्भिमाय ...सहस्राक्षरा परमे व्योम (ऋ० १.१६४. ४१)। एकाक्षरोपनिषद् में भी उस अक्षर ब्रह्म को संसार का आदि कारण, समस्त प्राणियों का स्वामी, पुराण पुरुष तथा समस्त भुवनों का रक्षक कहकर उस पराचेतना का ही संकेत दिया गया है- एकाक्षरंत्वक्षरेऽत्रास्ति ...भुवनस्य गोप्ता (एकाक्षरो० १)। उस एकाक्षर ब्रह्म को हिरण्यगर्भ स्वरूप कहकर प्राणियों के हृदय व्योम (हृदयाकाश) में प्रकाशित होने वाला विवेचित किया गया है- वितत्य बाणं तरुणार्कवर्णं व्योमान्तरे भासि हिरण्यगर्भः ...... अरिष्टनेमिः (एकाक्षरो०४) । ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में उस विराट् ब्रह्म को त्रिपादूर्ध्व कहकर यह बताया गया है कि उसके एक चरण में ये समस्त प्राणी हैं तथा तीन चरण अनन्त दिव्य लोक (परम व्योम) में स्थित हैं- ... पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि (ऋ० १०.९०.३) त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ....अभि (ऋ० १०.९०.४) । अध्यात्मोपनिषद् में उल्लेख है कि जिस प्रकार घटाकाश (शरीर स्थित आकाश), महाकाश (परमव्योम) में स्थित है, उसी प्रकार परमात्मा में आत्मा को एकरूप करके योगी को
परिशिष्ट ३७५ पुर्यष्टक सतत शान्त रहना चाहिए-घटाकाशं महाकाश इवात्मानं परमात्मनि .........तूष्णीं भव सदा मुने (अध्यात्मो० ७)। १७२. परमसिद्धान्तश्रवण - द्र०-निदिध्यासन। १७३. परमहंस - द्र०-अवधूत। १७४. परमात्मभाव - द्र०- अद्वयानन्द । १७५. परमानन्द - द्र०-अद्वयानन्द । १७६. परलोक - द्र०-ज्ञानखण्ड - परलोक, समलोक । १७७. परात्पर-द्र०-चिद्घन । १७८. परिव्राजक - द्र०-ज्ञानखण्ड-परिव्रज्या, परिव्राजक । १७९. पश्चिमलिङ्ग- भारतीय संस्कृति में चार आश्रम माने गये हैं, जो जीवन को चार भागों में विभाजित करते हैं। जीवन के प्रथम चरण का आश्रम ब्रह्मचर्य, द्वितीय चरण का गृहस्थ, तृतीय चरण का वानप्रस्थ और चतुर्थ चरण का आश्रम संन्यास कहलाता है। संन्यास आश्रम में रहने वाले व्यक्ति को परिव्राजक भी कहते हैं। इनका प्रमुख कार्य अपने को पूर्णरूपेण परिष्कृत करके सतत लोकोपयोगी कार्यों में अपने को निरत रखकर परिव्रज्या करना होता है। संन्यासियों के कुछ चिह्न भी होते हैं, जैसे- शिक्य, कमण्डलु, दण्ड आदि। इन चिह्नों को धारण करने वाले संन्यासी (परिव्राजक) व्यक्त विष्णुलिङ्ग कहलाते हैं। उल्लेखनीय है कि परिव्राजकों (संन्यासियो) को विष्णुरूप मानने के कारण उन्हें विष्णुलिङ्ग कहते हैं। इनमें कुछ पूर्व लिङ्ग तथा कुछ पश्चिम लिङ्ग परिव्राजक कहलाते हैं-परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः (निर्वाणो० ३)। पूर्वेोलिङ्ग (व्यक्त विष्णु लिङ्ग) परिव्राजक होते हैं, जो संन्यास के गुणों, दया, क्षमा, करुणा, निरहंकारिता, निर्विकारिता आदि गुणों को धारण करके संन्यासी के बाह्य लिङ्ग (चिह्न) शिक्य, कमण्डलु, दण्ड आदि भी धारण करते हैं। पश्चिम लिङ्ग अथवा (अव्यक्त विष्णुलिङ्ग) परिव्राजक (संन्यासी) उन्हें कहते हैं, जो बाह्य चिह्न धारण न करके भी अन्तःकरण में संन्यासियों के समस्त गुण धारण किये रहते हैं। इन्हें ही अव्यक्त विष्णु लिङ्ग परिव्राजक भी कहते हैं। अड्यार से प्रकाशित निर्वाणोपनिषद् की टीका में ब्रह्मयोगी ने लिखा है-पश्चिममन्तः संन्यासलक्षणमव्यक्तविष्णुलिङ्गिनश्चेति ....स्वबाह्यान्तर्विलसितविक्षेपग्रासव्याक्ताव्यक्तविष्णुलिङ्गधारिण इत्यर्थः (निर्वाणो० १.५८ टीका)। १८०. पाप-पुण्य - द्र०-ज्ञानखण्ड - पाप-पुण्य । १८१. पिङ्गला - द्र०-ज्ञानखण्ड - सुषुम्ना नाड़ी। १८२. पितर - द्र०-ज्ञानखण्ड । १८३. पुनर्जन्म-द्र०-ज्ञानखण्ड । १८४. पुराण-पुरुष- द्र०-चिद्घन। १८५. पुर्यष्टक - यह शरीर विभिन्न तत्त्वों से निर्मित है। प्रत्यक्षतः यह स्थूल शरीर ही दिखाई देता है। यह भी पृथिवी, जल, वायु, अग्नि और आकाश तत्त्वों के सम्मिलन से निर्मित है। इसके अतिरिक्त इसी के अन्दर दो अदृश्य शरीर और हैं, जिन्हें सूक्ष्म व कारण शरीर कहा जाता है। इन दोनों शरीरों की रचना में पृथिवी आदि स्थूल पञ्चतत्त्व न होकर इनके सूक्ष्म तत्त्व रहते हैं। वेदान्त में सूक्ष्म शरीर को लिङ्ग शरीर भी कहते हैं। इसे देखा या स्पर्श नहीं किया जा सकता; वरन् अनुमान किया जा सकता है। सुख-दुःखादि की अनुभूति सूक्ष्म शरीर द्वारा ही होती है। लिङ्ग शरीर का अर्थ करते हुए स्वामी रामतीर्थ ने लिखा है- लिङ्ग्यते ज्ञाप्यते प्रत्यगात्मसद्भाव एभिरिति लिङ्गानि, तानि च तानि शरीराणि च .... लिङ्गशरीराणि . (वे०सा० टीका खं० १३) अर्थात् जिसके माध्यम से प्रत्यगात्मा के सद्भाव का ज्ञान होता है, वह लिङ्ग शरीर है। स्थूल शरीर के अन्त हो जाने पर, यह सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) ही निकलकर अन्य स्थूल शरीर में प्रविष्ट होकर, नूतन जन्म धारण करता है। वेदान्त में सूक्ष्म शरीर के सत्रह तत्त्व (अंग) माने गये हैं। ये तत्त्व पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, पञ्च वायु (प्राण), मन और बुद्धि हैं। शारीरकोपनिषद् में सूक्ष्म शरोर के अंग इन शब्दों में वर्णित हैं- 'बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभिः सुसूक्ष्मं लिङ्गमुच्यते (शारीरको० ५)। ब्राह्मणग्रंथों में सूक्ष्म शरीर या लिंग शरीर के सत्रह अंगों की गणना एक अन्य प्रकार से भी की गई है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पाँच सूक्ष्मभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, एक अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) और पंच वृत्तियों (प्राण,
पौर्णमास्य यज्ञ ३७६ परिशिष्ट
अपान, उदान, व्यान और समान) वाला एक प्राण ये सूक्ष्म शरीर के सत्रह अवयव हैं। सूक्ष्म शरीर या लिङ्ग शरीर के इन सत्रह अवयवों को आठ अंगों में भी समाहित किया जाता है, इसीलिए इसे पुर्यष्टक भी कहते हैं। पुर्यष्टक का शाब्दिक अर्थ आठ पुरियों का समूह है। आठ अंगों को सम्भवतः आलंकारिक रूप से आठ पुरियाँ कहा गया होगा, इसलिए इसे पुर्यष्टक नाम दिया गया। पुर्यष्टक (सूक्ष्म शरीर या लिङ्ग शरीर) के आठ अंग इस प्रकार वर्णित हैं-ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च। मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेति चतुष्टयम्॥ प्राणोऽपानस्तथा ........अविद्याकामकर्माणि लिङ्गं पुर्यष्टकं विदुः (पंच०) अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय पञ्चक, कर्मेन्द्रिय पञ्चक, प्राण पञ्चक, सूक्ष्म पञ्चभूत, अन्तःकरण चतुष्टय इन सभी को एक-एक इकाई मानकर कुल पाँच हुए। इसके अतिरिक्त काम, कर्म और अविद्या ये तीन मिलकर कुल आठ होते हैं। इन्हीं आठ अवयवों से मिलकर बने सूक्ष्म शरीर को पुर्यष्टक कहते हैं। पैङ्गलोपनिषद् में पुर्यष्टक इन शब्दों में विवेचित है-अथ ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं कर्मेन्द्रियपञ्चकं प्राणादिपञ्चकं वियदादिपञ्चकमन्तःकरणं चतुष्टयं कामकर्मतमांस्यष्टपुरम् (पैङ्गलो० २.५)। १८६. पौर्णमास्य यज्ञ - द्र०-दर्शयज्ञ। १८७ प्रज्ञा - द्र०-ज्ञानखण्ड-प्रज्ञा-प्रज्ञान। १८८. प्रज्ञात्मा - उपनिषदों में कई स्थलों पर 'प्रज्ञा' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका सामान्य अर्थ प्रकृष्ट ज्ञान या श्रेष्ठ बुद्धि है। विवेकवान्, विद्वान् या चैतन्य पुरुष को प्रज्ञावान् अथवा प्रज्ञान कहते हैं। इस प्रकार जिसके द्वारा बौद्धिक वृत्तियों, ज्ञातव्य विषयों तथा कामनाओं को ग्रहण किया जाता है, उसी का नाम प्रज्ञा है-केन धियो विज्ञातव्यं कामानिति। प्रज्ञयेति प्रब्रूयात् (कौ०ब्रा०उ० १.६)। प्रज्ञा+आत्मा दो शब्दों से मिलकर प्रज्ञात्मा शब्द विनिर्मित हुआ है। सामान्यतः इसका अर्थ प्रकृष्ट ज्ञान सम्पन्न अथवा विवेकवान् व्यक्ति हुआ; किन्तु कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् के तृतीय अध्याय में इसे एक विशेष अर्थ में लिया गया है, वहाँ प्रज्ञा को ही प्राण और प्राण को ही प्रज्ञा कहा गया है; क्योंकि दोनों एक ही साथ रहते व एक साथ ही शरीर से उत्क्रमण करते हैं-यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः स ह ह्येतावस्मिन् शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः (कौ०ब्रा०उ० ३.४)। इन्द्र-प्रतर्दन वार्तालाप में इन्द्र ने अपने को प्राणस्वरूप, आयुस्वरूप और अमृत स्वरूप बताते हुए, इसी रूप में उन्हें जानने के लिए कहते हुए, अपने को प्राण और प्रज्ञारूप आत्मा (प्रज्ञात्मा) कहा है- स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञाऽऽत्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्स्वायुः प्राणः प्राणो वा आयुः प्राण एवामृतम् ......ऽमृतत्वमाप्नोति (कौ०ब्रा०उ० ३.२) अर्थात् प्राण ही आयु है; क्योंकि जब तक प्राण रहता है, तभी तक आयु रहती है। शरीर से प्राण निकल जाने पर आयु भी समाप्त हो जाती है। प्राण ही अमृत है; क्योंकि शरीर के मृत हो जाने पर भी प्राण मृत नहीं होता। इसी प्रकार प्राण को ही प्रज्ञा (प्रकृष्ट ज्ञान) भी कहा गया है; क्योंकि समस्त इन्द्रियाँ अपने विषयों को प्राण अथवा प्रज्ञा के द्वारा ही ग्रहण करती हैं। समस्त इन्द्रियाँ रहते हुए भी यदि शरीर में प्राण नहीं है अथवा मरणासन्न स्थिति में अल्प मात्रा में ही प्राण शेष रह गया है, तो न आँखें देख सकती हैं (अर्थात् अपने प्रियजन को भी पहचानने में समर्थ नहीं हो सकतीं), न कान शब्द सुनते हैं, न मुख (वाणी) से शब्द निकलते हैं, न घ्राणेन्द्रिय गन्ध ले सकती है, न त्वचा को स्पर्शज्ञान होता है, न हाथ-पैर चलते हैं, न उपस्थ और गुदा ही अपना कार्य समुचित रूप से कर पाते हैं तथा मन भी सोच-विचार नहीं कर पाता। दूसरे शब्दों में क्रिया शक्ति का बोधक प्राण (प्रज्ञा) ही है, जो ज्ञान में प्रवृत्त करने वाला प्रज्ञा से युक्त आत्मा अर्थात् प्रज्ञात्मा है। यही शरीर को सभी ओर से आबद्ध करके विभिन्न क्रियाएँ कराता रहता है। जिस प्रकार रथ को नेमि अरों से तथा अरे उसकी नाभि से जुड़े होते हैं, उसी प्रकार समस्त भूत मात्राएँ (पंचभूत या तन्मात्राएँ) प्रज्ञामात्राओं (इन्द्रियों में विद्यमान प्रज्ञा के अंश) में अर्पित हैं तथा प्रज्ञामात्राएँ मुख्य प्राण (उक्थ) में अर्पित हैं। यह प्राण-प्रज्ञात्मा ही अजर-अमर और आनन्द स्वरूप है-तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पितो नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः। स एष प्राण एव प्रज्ञाऽऽत्माऽऽनन्दोऽजरोऽमृतः .......स म आत्मेति विद्यात् (कौ० ब्रा०उ० ३.९)। १८९. प्रज्ञान - द्र०-ज्ञानखण्ड-प्रज्ञा-प्रज्ञान। १९०. प्रणव - द्र०-प्रणव सन्धान। १९१ प्रणव सन्धान - योग शास्त्रों में विभिन्न प्रकार की साधनाओं का वर्णन है। ब्रह्म प्राप्ति या ब्रह्म सान्निध्य हेतु अनेक प्रकार को नाद साधनाएँ भी बतायी गई हैं। नादबिन्दूपनिषद् में उल्लेख है कि तत्त्वज्ञान हो जाने पर जब प्रारब्ध कर्म क्षीण
परिशिष्ट ३७७ प्रजापत्य इष्टि
हो जाते हैं, तब ॐ कार स्वरूप परब्रह्म के साथ अपनी आत्मा के एकत्व का चिन्तन (ध्यान) करने से नादरूपी स्व प्रकाशित शिव (कल्याणकारी तत्त्व) का प्रादुर्भाव उसी प्रकार हो जाता है, जिस प्रकार मेघाच्छादन हट जाने से स्वयं सूर्य भगवान् प्रकाशित हो जाने हैं- ब्रह्मप्रणवसंधानं नादो ज्योतिर्मयः शिवः । स्वयमाविर्भवेदात्मा मेघापायेंऽशुमानिव (नादबिन्दु० ३०) अर्थात् प्रणव ही ब्रह्मरूप है और वही नादरूप ब्रह्म है, उसे ही ॐ कार कहते हैं। इस ॐ कार की नाद साधना को ही प्रणव सन्धान कहते हैं। नादबिन्दूपनिषद् में ही प्रणव सन्धान प्रक्रिया का उल्लेख इस प्रकार है कि साधक को सिद्धासन में बैठकर वैष्णवी मुद्रा धारण करके दाहिने कान के अर्न्तगत उठती अनाहत ध्वनि (नाद) का निरन्तर श्रवण करना चाहिए। १९२. प्रतिष्ठा— द्र०-ज्ञानखण्ड । १९३. प्रत्यगात्मा— द्र०-ज्ञानखण्ड । १९४. प्रत्याहार— द्र०-ज्ञानखण्ड । १९५. प्रपञ्च— आध्यात्मिक सन्दर्भों में 'प्रपञ्च' शब्द का उपयोग बहुत होता है, जिसे भवसागर या संसार के अर्थ से लिया जाता है। कोशग्रन्थों में प्रपञ्च शब्द की रचना इस प्रकार वर्णित है- प्रपञ्च्यते इति प्र-पचि व्यक्तीकरणे घञ् (हिन्दी विश्व कोष)। इसके कई अर्थ हैं १. विस्तार, फैलाव। २. उलट-पलट, इधर का उधर। ३. पञ्चतत्त्वों का उत्तरोत्तर अनेक भेदों में विस्तार। ४. संसार, भवजाल। ५. सांसारिक व्यवहारों का विस्तार, दुनिया का जंजाल आदि। इनमें से तृतीय क्रमांक वाले अर्थ में ही इसका सर्वाधिक उपयोग किया जाता है। सम्भवतः जगत् का निर्माण- विस्तार वेदान्तवर्णित पञ्चीकरण (पंचभूतों के पञ्चीकृत विभाजन) प्रक्रिया द्वारा होने से इसे प्रपञ्च कहा जाने लगा होगा। उपनिषद् ग्रन्थों में 'प्रपञ्च' शब्द का उपयोग भवसागर, माया आदि के रूप में हुआ है। आत्मबोधोपनिषद् में आत्मबोध प्राप्त साधक का कथन है कि आत्मबोध हो जाने पर यह प्रपञ्च (जगत् या माया) मुझे सत्य (ब्रह्मरूप) ही लगता है। मिथ्या होने पर ही बन्ध-मोक्षादि व्यवहार सत्य जान पड़ते हैं। जिस प्रकार सर्पादि से रज्जु (रस्सी) का अस्तित्व है, उसी प्रकार प्रपञ्च आदि से केवल ब्रह्म सत्ता ही आधारभूत होकर वर्तती है-विवेके युक्ति बुद्ध्याऽहं ......प्रतीयते। निवृत्तोऽपि प्रपञ्चो मे .....ब्रह्मसत्तैव केवलम् (आत्मबोधो० २.११-१२)। महोपनिषद में इस जगत् रूप प्रपञ्च को अस्थिर और क्षणिक बताते हुए ऋषिपुत्र निदाघ ने अपने पिता से इस संसार से विरक्त होने की अपनी इच्छा प्रकट की है- जायते मृतये लोको ध्रियते जननाय च। अस्थिराः सर्व एवेमे सचराचर चेष्टिताः । ....आयुः पल्लवकोणाग्रलम्बाम्बुकणभङ्गुरम्। उन्मत्त इव संत्यज्य यात्यकाण्डे शरीरकम् (महो० ३.४,९)। १९६. प्रमेय-अप्रमेय— प्रमेय शब्द की संरचना से हो स्पष्ट है कि जो वस्तु या पदार्थ प्रमा योग्य अर्थात् अपना वास्तविक ज्ञान कराने के योग्य अथवा प्रमाणों द्वारा सिद्ध किये जाने योग्य है, उसे प्रमेय कहते हैं अथवा दूसरे शब्दों में जगत् का प्रत्येक पदार्थ जो प्रत्यक्ष, शब्द या अनुमान प्रमाण से सिद्ध किया जा सकता है, उसे प्रमेय कहेंगे। जैसे अग्नि में से धूम्र निकलता प्रत्यक्ष दिखाई दे, तो यह प्रत्यक्ष प्रमाणित हो गया कि वह धूम्र अग्नि से ही निकल रहा है। इसी प्रकार यदि कहीं केवल धूम्र निकलता दिखाई दे, तो अनुमान द्वारा यह प्रमाणित हो जाता है कि वहाँ अग्नि सुनिश्चित रूप से होगी ही। अनुमान प्रमाण का 'यत्र-यत्र धूमः तत्र-तत्र वह्निः' का सिद्धान्त सर्वविदित है। इस जगत् के कारण रूप परब्रह्म को प्रमाणों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रमाणित करना बुद्धिगम्य है और परब्रह्म बुद्धि से परे है, इसलिए उसका एक विशेषण अप्रमेय है। वेद, शास्त्र, उपनिषदों आदि में ईश्वर अथवा ब्रह्म की जो व्याख्याएँ की गई हैं, वे उसके स्वरूप के बहुत निकट तो हैं, किन्तु पूर्ण नहीं; क्योंकि इन आर्षग्रन्थों में भी अन्ततः नेति-नेति (इतना ही नहीं, इतना ही नहीं) लिखा है। इस प्रकार परब्रह्म का अप्रमेय नाम सार्थक ही है। मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् में परब्रह्म को सर्वेश, अप्रमेय, अज, शिव, परमाकाश, निराश्रय, अद्वैत, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र आदि का लक्षण स्वरूप और सबका कारण कहा गया है— .......तदनु सर्वेशमप्रमेयमजं शिवं परमाकाशं निरालम्बमद्वयं ब्रह्मविष्णुरुद्रादीनामेकलक्ष्यं सर्वकारणं परं ब्रह्मात्मन्येव .........प्राप्नोति (मं० ब्रा०उ० ३.१.३)। १९७. प्रव्रज्या— द्र०-अवधूत। १९८. प्रजापत्य— द्र०-ब्रह्मचारी। १९९. प्रजापत्य इष्टि— द्र०-आग्नेयी इष्टि।
प्रजापत्य यज्ञ ३७८ परिशिष्ट २००. प्रजापत्य यज्ञ - द्र०-आग्नेयी इष्टि। २०१. प्राज्ञ- द्र०-ज्ञानखण्ड । २०२. प्राण - द्र०-ज्ञानखण्ड-प्राण-सञ्चय । २०३. प्राणहंस - प्रणवहंस (मुख्यप्राण) - आर्षग्रन्थों में जीवात्मा के लिए अनेक स्थलों पर 'हंस' शब्द का प्रयोग हुआ है-प्राणिनां देहमध्ये तु स्थितो हंसः सदाऽच्युतः। हंस एव परं सत्यं हंस एव तु सत्यकम् (ब्रह्मविद्यो० ६०); पर कुछ स्थलों पर प्रणव हंस अथवा प्राण हंस का उल्लेख मुख्य प्राण के लिए भी मिलता है। मुख्य प्राण के विषय में कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में उल्लेख है कि प्राणी के अन्दर निवास करने वाले मुख्य प्राण से ही उसकी इन्द्रियों में निवास करने वाले अन्य समस्त प्राण सम्बद्ध हैं। इसीलिए व्यक्ति एक ही समय में बोल, देख, सुन और सूँघ नहीं सकता; क्योंकि जिस समय वह बोलता है, उस समय मुख्य प्राण तो वाणी में सक्रिय रहता ही है; साथ ही अन्य इन्द्रियों के प्राण भी उसी के सहयोग में लग जाते हैं। इसीलिए किसी वस्तु को ध्यान से देखते समय वह कुछ बोल, सुन या सूँघ नहीं सकता; क्योंकि समस्त प्राणों की शक्ति देखने में ही लग जाती है-तद्वैक आहुरेकभूयं वै प्राणा गच्छन्तीति न हि कश्चन शक्नुयात् सकृद्वाचा नाम प्रज्ञापयितुं चक्षुषा रूपं श्रोत्रेण शब्दं मनसा ध्यातमित्येकभूयं वै प्राणा एकैकं सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञापयन्ति (कौ० ब्रा० उ० ३.२) चूँकि जीवात्मा को हंस कहा जाता है और वह जीवात्मा वस्तुतः मुख्य प्राण ही है, अतः मुख्य प्राण को भी प्राण हंस कहते हैं। इसी प्रकार प्रणव अर्थात् ॐ (अ, उ और म्) का उच्चारण भी मुख्य प्राण की स्वसंचालित प्रक्रिया (श्वास-प्रश्वास) द्वारा होता रहता है। यह अजपा जप सोऽहं अर्थात् हंस (अहं सः) ही कहलाता है। इसीलिए मुख्य प्राण को प्रणव हंस भी कहते हैं। हंस और प्रणव में अभेद है; क्योंकि ॐ और सोऽहं मंत्र का अजपाजप एक साथ चलता रहता है, इसीलिए पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् में इन दोनों का अभेद वर्णित है-हंस प्रणवयोरभेदः (पाशुपत० पूर्व १९)। प्रणव हंस को ब्रह्म सूत्र अथवा यज्ञ सूत्र भी कहा गया है; क्योंकि प्रणव ॐ ही ब्रह्मप्राप्ति का उपाय अथवा स्वयं ब्रह्म है- प्रणवं ब्रह्मसूत्रं ब्रह्म यज्ञमयम्। प्रणवान्तवर्ती हंसो ब्रह्मसूत्रम् (पाशुपत० पूर्व १७)। परब्रह्मोपनिषद् में परब्रह्म की स्थिति निरूपित करते हुए उपनिषद्कार ने उसे सदैव प्रसन्नता देने वाला, असङ्ग, चिद्रूप, पुरुष और प्रणवहंस (परब्रह्म) बताया गया है। यहाँ प्रणव हंस प्राणहंस (मुख्य प्राण) के रूप में विवक्षित नहीं है; वरन् परब्रह्म के रूप में विवक्षित है। इसका स्पष्टीकरण देते हुए ब्रह्मयोगी ने लिखा है-संप्रसादः अन्तर्याम्यसङ्गचिद्रूपः पुरुषः स एव प्रणवार्थ तुर्य-तुर्य हंसः परं ब्रह्मेत्युच्यते। अत्र न प्राणहंसो मुख्यः प्राणो विवक्षितः परब्रह्मप्रकरणत्वात् (परब्रह्मो० २ टीका)। २०४. प्राणायाम - योग शास्त्रों में प्राणायाम की महिमा सर्वत्र गायी गयी है। कोशग्रन्थों में प्राणायाम शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार विवेचित है- प्राणस्य वायुविशेषस्य आयामः रोधः यद्वा प्राण आयम्यन्तेऽनेनेति- अर्थात् प्राण वायु का गति- विच्छेद कारक व्यापार भेद। अष्टाङ्गयोग में यम, नियम, आसन के उपरान्त प्राणायाम का क्रम आता है। चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग कहा गया है-'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' । चित्तवृत्तियों अथवा मन की एकाग्रता में प्राणायाम बहुत सहायक सिद्ध होता है। योग सूत्र के अनुसार वायु प्रच्छर्दन करके अर्थात् प्राणवायु आकर्षण सहित त्याग करके विधारण करना (अर्थात् खींची हुई वायु को शास्त्रोक्त विधान के अनुसार धारण करना) प्राणायाम कहलाता है-प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य (पातं० योग० सू०स०पा०-३४)। पातञ्जल योग में प्राणायाम की परिभाषा इन शब्दों में उल्लिखित है- तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः। अर्थात् आसन के स्थिर होने के पश्चात् श्वास-प्रश्वास की गति रोकने को प्राणायाम कहते हैं। अधिक स्पष्ट शब्दों में इसका अभिप्राय यह है कि श्वास-प्रश्वास की गतियों के प्रवाह को रेचक, पूरक और कुम्भक के माध्यम से बाहर और भीतर दोनों स्थानों में रोकना (विराम देना) ही प्राणायाम है। श्वास के भीतर जाने को श्वास (पूरक), बाहर निकलने को प्रश्वास (रेचक) तथा अन्दर और बाहर रुकने को विराम (कुम्भक) कहते हैं। प्राण के पाँच भेद हैं, इन्हें प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान कहते हैं। प्राणायाम प्रक्रिया में प्राण और अपान का मिलन होता है। इसीलिए योगाचार्यों ने प्राण और अपान का मिलन ही प्राणायाम का लक्षण बताया है। इस सन्दर्भ में योगी याज्ञवल्क्य नामक ग्रन्थ में उल्लेख है- प्राणापानसमायोगः प्राणायाम इतीरितः। प्राणायाम इति प्रोक्तो रेचकपूरककुम्भकैः (योगियाज्ञ० ६.२)। उपनिषदों में भी प्राणायाम का महत्त्व विवेचित है। अमृतनादोपनिषद् में प्राणायाम को समस्त इन्द्रियों के दोष उसी तरह दूर करने वाला बताया गया है, जिस प्रकार स्वर्ण को तपाने से उसके समस्त दोष दूर हो जाते हैं-यथा
परिशिष्ट ३७१ लोम-विलोम
पर्वतधातूनां दह्यन्ते धमनान्मलाः । तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते प्राणधारणात् (अमृतनादो० ७)। इसी उपनिषद् के ग्यारहवें मंत्र में प्राणायाम की परिभाषा इन शब्दों में निर्दिष्ट है- सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह। त्रिः पठेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते अर्थात् ॐ कार और व्याहृतियों सहित गायत्री मंत्र का तीन बार पाठ करते हुए पूरक-कुम्भक और रेचक प्रक्रिया करने को (एक) प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम को प्रणव ही माना गया है; क्योंकि प्रणव (ॐ या ॐ कार) में तीन अक्षर अ,उ और म् हैं तथा रेचक, पूरक और कुम्भक में भी तीन-तीन वर्ण ही हैं। अतः यह प्रत्यक्ष प्रणव उपासना ही है-वर्णत्रयात्मकाः प्रोक्ता रेचक पूरक कुम्भकाः। स एष प्रणवः प्रोक्तः प्राणायामश्च तन्मयः (जा०दर्शनो० ६.२)। यों तो पूरक-कुम्भक और रेचक एक ही प्राणायाम की प्रक्रियाएँ हैं; किन्तु कुछ योग शास्त्रों व उपनिषदों में रेचक, पूरक और कुम्भक को प्राणायाम के ही प्रकार माने गये हैं। अमृतनादोपनिषद् (१२) में रेचक प्राणायाम का स्वरूप इस तरह बताया है-उत्क्षिप्य वायुमाकाशे शून्यं कृत्वा निरात्मकम्। शून्यभावे नियुञ्जीयाद्रेचकस्येति लक्षणम् अर्थात् जिस प्राणायाम में प्राणवायु को आकाश में निकालकर हृदय को वायु से रहित और मन को चिन्तन शून्य कर दिया जाता है, वह रेचक प्राणायाम है। इसी प्रकार पूरक प्राणायाम का स्वरूप इस तरह बताया है-वक्त्रेणोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः। एवं वायुर्ग्रहीतव्यः पूरकस्येति लक्षणम् (अमृतनादो० १३)। इसका अभिप्राय है कि जिस प्रकार मुख से कमल नाल द्वारा जल को खींचते हैं, उसी प्रकार धीरे-धीरे वायु को अपने अन्दर खींचना पूरक प्राणायाम है। इसी उपनिषद् में कुम्भक प्राणायाम का लक्षण इस प्रकार उल्लिखित है-नोच्छ्वसेन्न च निःश्वसेनेव गात्राणि चालयेत्। एवं भावं नियुञ्जीयात् कुम्भकस्येति लक्षणम् अर्थात् कुम्भक प्राणायाम में न तो श्वास खींचते हैं और न ही निकालते हैं; वरन् शरीर को निश्चल करके स्थिर रखकर प्राणवायु को (अन्दर या बाहर) रोके रखते हैं। कुम्भक प्राणायाम आठ प्रकार के होते हैं-सहितः सूर्यभेदश्च उज्जायी शीतली तथा। भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा केवली चाष्टकुम्भकाः (गोरक्ष सं० १९५, घेर० सं०) अर्थात् क्रिया भेद से कुम्भक प्राणायाम के आठ प्रकार-सहित, सूर्यभेदी, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और केवली हैं। कुछ विद्वानों ने सहितकुम्भक और केवली कुम्भक के स्थान पर सीत्कारी (शीतकारी) और प्लावनी कुम्भक नामक प्राणायाम का उल्लेख किया है। वैसे तो ९६ प्रकार के प्राणायाम होते हैं; पर इन सबका सविस्तार वर्णन यहाँ सम्भव नहीं है; वर्तमान समयानुरूप सरल और उपयोगी कुछ प्राणायामों का संक्षिप्त वर्णन करना यहाँ उचित प्रतीत होता है। ये प्राणायाम हैं- अ. प्राणाकर्षण प्राणायाम - जिन्होंने कभी प्राणायाम की किसी विधि का अभ्यास नहीं किया, उनके लिए सर्वप्रथम प्राणाकर्षण प्राणायाम का अभ्यास करना आवश्यक है। यह अन्य साधनाओं से पूर्व उसी प्रकार उपयोगी है, जिस प्रकार बीज बोने से पूर्व भूमि की कई बार जोतकर पौधों की जड़ें सुगमता से भूमि के अन्दर जाने योग्य बनाया जाता है। इससे नस-नाड़ियाँ सशक्त बनतीं और शरीर इस योग्य हो जाता है कि अन्य शक्तिशाली साधना विधियों के प्रभाव को ग्रहण कर सके। इसकी प्रक्रिया यह है- प्रातःकाल किसी शांत और एकान्त स्थल पर सुखासन में कमर सीधी करके बैठकर नेत्र बन्द करके दोनों नासिका छिद्रों से श्वास खींचते हुए यह भावना की जाती है कि हमारे चारों ओर प्राण का दिव्य सागर लहरा रहा है और वह (प्राण) श्वास के माध्यम से हमारे शरीर के अंग-प्रत्यंग में पहुँच रहा है। इस पूरक प्रक्रिया के बाद कुछ (एकाध मिनट) देर तक अन्दर ही रोक कर अन्तःकुम्भक करके उस प्राण तत्त्व को अंग-प्रत्यंग में स्थापित होने का भाव किया जाता है; तदुपरान्त रेचक करते हुए, श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते समय यह भावना भी की जाती है कि अन्दर के दोष-दुर्गुण, कषाय-कल्मष बाहर निकल रहे हैं। इसमें ध्यान रखने की बात यह है कि पूरक से रेचक में अधिक समय लगे। यदि यह न बन पड़े, तो पूरक जितना समय तो रेचक में लगना ही चाहिए। श्वास खींचने व निकालने की प्रक्रिया धीरे-धीरे ही की जाती है, जल्दी से या झटके से नहीं। श्वास बाहर निकल जाने के पश्चात् कुछ सेकेण्ड बाह्य कुम्भक अर्थात् थोड़ी देर श्वास को बाहर ही रोका जाता है। प्रारंभ में यह प्राणायाम ५ बार से अधिक नहीं किया जाता। बाद में बढ़ाते-बढ़ाते २० तक भी किया जा सकता है। इस प्राणायाम से सुस्ती, निरुत्साह, झिझक आदि दूर होकर अन्दर एक प्रचण्ड शक्ति का अनुभव होने लगता है। ब. लोम-विलोम (सूर्यभेदन) प्राणायाम - जब प्राणाकर्षण प्राणायाम द्वारा पूरक, कुम्भक और रेचक का अभ्यास दृढ़ हो जाता है, तब लोम-विलोम अथवा सूर्य भेदन (सूर्यभेदी) प्राणायाम किया जाता है। इसमें भी पूर्वोक्त प्रकार से बैठकर कमर सीधी करके दायें हाथ की अँगुलियों और अँगूठे की सहायता से सर्वप्रथम बायें नथुने को बन्द करके, दायें से धीरे-
धीरे श्वास खींचते हैं तथा अन्तः कुम्भक करते समय नाभिस्थित सूर्यचक्र के जाग्रत् और प्रकाशित होने का भाव करते हुए यह भावना करते हैं कि हमारा अंग-प्रत्यंग नवजीवन प्राप्त कर रहा है। रेचक के उपरान्त बाह्य कुम्भक के समय भी यह भाव किया जाता है कि नाभि स्थित सूर्यचक्र से अग्नि सदृश तेज लपटें उठ रही हैं, वे सुषुम्ना नाड़ी, फेफड़ों, हृदय, कण्ठ आदि अवयवों को तेजस्वी बना रही हैं। इसमें सूर्यचक्र जाग्रत् हो जाता है तथा हर कार्य में उत्साह, उमंग एवं शरीर में स्फूर्ति आती है। स. नाड़ी शोधन प्राणायाम- मनुष्य के अशुद्ध खान-पान व अनुपयुक्त रहन-सहन से शरीर में विभिन्न प्रकार के मल एकत्र हो जाते हैं। ये केवल मलाशय में ही एकत्र नहीं होते; वरन् दूषित गैसें प्रकट कर रक्त को भी दूषित कर समस्त नस- नाड़ियों में भी पहुँच जाते हैं। जिससे अनेक रोग हो जाते हैं, इसके लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम सर्वोत्तम है। इसके लिए भी पूर्वोक्त प्रकार से खुली वायु में बैठकर दायीं नासिका का छिद्र बन्द करके बायें से धीरे-धीरे श्वास को इतना खींचते हैं कि वह फेफड़ों के अतिरिक्त पेट में भी भर जाय (इससे नाभिचक्र भी प्रभावित होता है), साथ ही (श्वास खींचते समय) यह भावना की जाती है कि वह नाभिस्थित चन्द्रमा [बायें नथुनें से श्वास खींचते समय श्वास इड़ा नाड़ी (जिसे चन्द्र नाड़ी भी कहते हैं) द्वारा अन्दर जाती है] को स्पर्श कर शीतल और प्रकाशवान् बना रही है। इसमें अन्तः कुम्भक और बाह्य कुम्भक करने की आवश्यकता नहीं है। श्वास बाहर भी बायें नथुनें से ही यह भाव करते हुए निकाली जाती है कि इड़ा नाड़ी शैत्य और शुद्धि प्राप्त कर पुष्ट हो रही है। यह क्रम तीन बार दोहराते हैं। तदुपरान्त बायें नथुने को बन्द करके तीन बार वही उपक्रम दायें नथुने से करते हुए नाभि स्थित सूर्य चक्र को ऊष्मा और प्रकाश से पिंगला अथवा सूर्यनाड़ी के शुद्ध और सशक्त होने की भावना करते हैं। इसके बाद दोनों नथुनों से श्वास खींचकर एकबार मुख मार्ग से बाहर निकाल देते हैं। इस प्रकार यह सम्पूर्ण क्रिया करने पर एक नाड़ी शोधन प्राणायाम होता है। इससे नाड़ियाँ मलरहित, शरीर हल्का और शक्तिसम्पन्न बनता है। ये तीनों प्राणायाम सर्वोपयोगी और सरल हैं, इन्हें हर कोई सम्पन्न कर सकता है तथा खतरा कुछ भी नहीं। प्राणायाम के उपरान्त ही योग के अन्य अंग प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की ओर बढ़ सकना सम्भव होता है। २०५. प्रारब्ध —द्र०-ज्ञानखण्ड। २०६. प्लुतमात्रा —द्र०-भूचर सिद्धि। २०७. फेनप —द्र०-वानप्रस्थ। २०८. बन्ध— हठयोग के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के बन्धों का उल्लेख है। विभिन्न उपनिषदों जैसे योग कुण्डल्युपनिषद्, योग- चूड़ामणि उपनिषद्, योगतत्त्व उपनिषद्, योग शिखोपनिषद् और शाण्डिल्योपनिषद् में भी बन्धों का वर्णन है। इनका मूल उद्देश्य शरीरगत वायु को नियन्त्रित करना है। योग शिखोपनिषद् में इनकी महत्ता इन शब्दों में प्रतिपादित है-बन्धत्रयमथेदानीं प्रवक्ष्यामि यथाक्रमम्। नित्यं कृतेन तेनासौ वायोज्र्यमवाप्नुयात् (यो०शि० १०१)। पाँच बन्धों में प्रायः तीन बन्ध प्रमुख हैं। ये हैं मूलबन्ध, उड्डियानबन्ध और जालन्धर बन्ध, इसके अतिरिक्त महाबन्ध और महावेध का भी उल्लेख पाया जाता है। योगतत्त्वोपनिषद् में मूलबन्ध का यह स्वरूप प्रतिपादित है-पाष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्द्ढम्। अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य योनिबन्धोऽयमुच्यते। प्राणापानौ नादबिन्दू मूलबन्धेन चैकताम् (यो.त. १२०-१२१) अर्थात् लिङ्ग स्थान और मूल (गुदा) के रन्ध्र को बन्द करने एवं अपान वायु का ऊर्ध्वगमन करके प्राण वायु के साथ एकत्व ही मूलबन्ध है। इसमें बाएँ पैर की सीवन (एड़ी की गुदा और लिङ्ग के बीच) में दृढ़तापूर्वक लगाकर और उसे सिकोड़कर अधोगामी अपान वायु का ऊर्ध्वगमन किया जाता है। उससे कुण्डलिनी शक्ति ऊपर की ओर चढ़ती है। उड्डियान बन्ध का स्वरूप उपनिषदों में इस प्रकार निरूपित है-बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः। उड्डयाणाख्यो हि बन्धोऽयं योगिभिः समुदाहृतः (यो०त० ११९)। इस बन्ध में दोनों जानुओं को मोड़कर पैरों के तलुवों की आपस में मिलाकर नाभि से नीचे और आठ अंगुल ऊपर के पेट के हिस्से को बलपूर्वक खींचकर मेरुदण्ड में इस प्रकार लगाया जाता है, जिससे पेट में गड्ढा जैसा दीखने लगता है। इससे प्राण, पक्षी की तरह सुषुम्ना की ओर उड़ने लगता है। जिसके कारण ही इसका नाम उड्डियान बन्ध पड़ गया है। जालन्धर बन्ध के सन्दर्भ में योगतत्त्व उपनिषद् कहता है-कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेद्द्ढया धिया। बन्धो जालन्धराख्योऽयं मृत्युमातङ्गकेसरी (यो०त० ११८) अर्थात् कण्ठ का आकुञ्चन करके ठोड़ी को कण्ठ कूप में दृढ़तापूर्वक इस प्रकार स्थापित करे कि हृदय से ठोड़ी का अन्तर मात्र चार अंगुल का रह जाय और सीना आगे की ओर तना हुआ हो। कण्ठ क्षेत्र के समस्त नाड़ी जाल को बाँध कर उस प्रदेश को सभी विकृतियों
परिशिष्ट ३८१. ब्रह्मचारी को दूर करने के कारण ही इसे जालन्धर बन्ध कहते हैं। जालन्धर बन्ध के सन्दर्भ में विवेक मार्तण्ड में उल्लेख है- जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे । न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति (वि० मार्त० ६७) । महाबन्ध प्रायः पूर्वोक्त तीनों बन्धों का सम्मिलित स्वरूप होता है। योग तत्त्व उपनिषद् (११२-११४) में उल्लेख है- पाणिर्वामस्य पादस्य.....उभयत्रैवमभ्यसेत् । महावेध में मूलबन्धपूर्वक पद्मासन से बैठकर प्राण और अपान वायु को नाभि प्रदेश पर एक करके, दोनों हाथ तानकर नितम्बों से मिलाते हुए भूमि पर जमाकर नितम्बों को आसन के साथ ही उठाकर बार-बार भूमि पर ताड़ित किया जाता है। इससे प्राण सुषुम्ना में प्रविष्ट होकर कुण्डलिनी का जागरण होता है। २०१. बन्धन—द्र०-ज्ञानखण्ड । २१०. बहूदक—द्र०-अवधूत । २११. बिन्दु—सामान्यतः बिन्दु शब्द जल कण, बूंद के अर्थ में प्रयुक्त होता है। हाथी के मस्तक पर शोभा हेतु लगाई जाने वाली बिन्दी के अर्थ में तथा मनुष्यों द्वारा भी दोनों भौहों के बीच लगाये जाने वाले गोल तिलक के अर्थ में भी बिन्दु या विन्दु शब्द प्रयुक्त होता है। रेखा गणित में भी नियत स्थान पर जिसका विभाग न हो सके, उसे बिन्दु कहते हैं। शब्दों के ऊपर अनुस्वार रूप में लगने वाली बिन्दी को भी बिन्दु कहते हैं। ब्रह्मचर्य प्रकरण में वीर्य के अर्थ में भी बिन्दु का प्रयोग किया जाता है- एवं संरक्षयेद्विन्दुं मृत्युं जयति योगवित्। मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दु धारणात् (हठ०प्र० ३.८८) अर्थात् बिन्दु (वीर्य) का संरक्षण करने वाला योग तत्त्व का ज्ञाता मृत्यु को जीत लेता है, क्योंकि बिन्दु धारण ही जीवन तथा बिन्दु पतन ही मरण है। इसकी महत्ता यहाँ तक बतायी गयी है कि बिन्दुधारण से शरीर में सुगन्धि उत्पन्न हो जाती है तथा जिसके शरीर में वीर्य (बिन्दु) है, उसे मृत्यु का भय कहाँ-सुगन्धो योगिनो देहे जायते बिन्दुधारणात्। यावद्विन्दुः स्थिरो देहे तावत्कालभयं कुतः (हठ०प्र० ३.८९)। श्रीमद्भागवत और शारदा तिलक में उल्लेख है कि सच्चिदानन्द विभव परमेश्वर से शक्ति, शक्ति से नाद और नाद से बिन्दु का प्रादुर्भाव हुआ है-सच्चिदानन्दविभवात् सकलात् परमेश्वरात् । आसीच्छक्तिस्ततो नादो नादाद्विन्दुसमुद्भवः ॥ हिन्दी विश्वकोश खं० २९ पृष्ठ ४२६ में कुज्जिका तन्त्र में वर्णित बिन्दु को सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाला (अर्थात् ब्रह्म) माना गया है-आसीद्विन्दुस्ततो नादो नादाच्छक्तिः समुद्भवा । क्रियासार नामक ग्रन्थ में बिन्दु को शिवात्मक (कल्याणकारी) और बीज को शक्त्यात्मक माना गया है। इन दोनों के संयोग से ही नाद और नाद से त्रिशक्ति उत्पन्न हुई है- बिन्दुः शिवात्मकस्तत्र बीजं शक्त्यात्मकं स्मृतम्। तयोः ....जातास्त्रिशक्तयः ॥ (हि०वि० को०खं०२१ पृ० ४२६) नाद से बिन्दु का घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण ही प्रायः नाद और बिन्दु शब्दों का उल्लेख एक साथ ही मिलता है। मण्डल ब्राह्मण उपनिषद् में उस परब्रह्म को नाद बिन्दु-कलातीत और अखण्डमण्डलाकार कहा गया है- तन्नादबिन्दुकलातीतमखण्डमण्डलम् (मं० ब्रा०उ० २.१.४) । योगशिखोपनिषद् में नाद को ही बिन्दु और बिन्दु को ही चित्त कहा गया है, अर्थात् तीनों एक ही तत्त्व हैं-यो वै नादः स वै बिन्दुस्तद्वै चित्तं प्रकीर्तितम्। नादो बिन्दुश्च चित्तं च त्रिभिरेक्यं प्रसाधयेत् (यो०शि० ६.७२)। इसी प्रकार (बिन्दु की) उत्पत्ति, स्थिति और कारण वाला मन ही बिन्दु है; क्योंकि मन से बिन्दु उसी प्रकार उत्पन्न होता है, जिस प्रकार दूध से घृत-मन एव हि बिन्दुश्च उत्पत्तिस्थिति कारणम्। मनसोत्पद्यते बिन्दुर्यथा क्षीरं घृतात्मकम् (यो०शि० ६.७३)। इस प्रकार बिन्दु शब्द के अनेक अर्थ हैं। योग और ध्यान सन्दर्भों में यह ब्रह्म, चित्त, मन आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। २१२. बृहन् (बृहत्)-द्र०-ब्रह्मचारी। २१३. बोध-द्र०-ज्ञानखण्ड-बोध-प्रतिबोध। २१४. ब्रह्म-द्र०-ज्ञानखण्ड-ब्रह्म-परब्रह्म। २१५. ब्रह्मचर्य-द्र०-यम। २१६. ब्रह्मचारी- भारतीय आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत जीवन को चार भागों में बाँटा गया है। इन चारों भागों की अवधि को ही चार आश्रम कहते हैं, जो इस प्रकार हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। आर्ष मान्यता के आधार पर प्रत्येक आश्रम की अवधि २५ वर्ष मानी गई है; क्योंकि ऋषियों की परिकल्पना थी कि जीवन १०० वर्ष का होता है। प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य कहलाता है। ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले को ब्रह्मचारी कहते हैं। 'ब्रह्मचर्य' शब्द का विस्तृत विवेचन इसी खण्ड के परिभाषा कोश, परिशिष्ट में 'यम' शब्द के अन्तर्गत किया जा चुका है। ब्रह्मचारी की परिभाषा इस
ब्रह्मतत्त्व ३८२ परिशिष्ट एक ही वाक्य से स्पष्ट हो जाती है - ब्रह्मणि वेदे चरति इति ब्रह्मचारी अर्थात् जो वेद-ब्रह्म के चिन्तन-मनन में नित्य तल्लीन रहता है, वह ब्रह्मचारी है। आश्रमोपनिषद् के प्रथम मंत्र में ब्रह्मचारी के चार भेद वर्णित हैं। गायत्र, ब्राह्म (ब्राह्मण), प्राजापत्य और बृहन् (बृहत्)- तत्र ब्रह्मचारिणश्चतुर्विधा भवन्ति गायत्रो ब्राह्मः प्राजापत्यो बृहन्निति। इनमें जो ब्रह्मचारी उपनयनोपरान्त तीन रात्रि तक अलवण (बिना नमक का) भोजन ग्रहण करके गायत्री मंत्र का जप करते हैं, उन्हें गायत्र कहते हैं-यं उपनयनादूर्ध्वं ............गायत्रीमधीते स गायत्रः (आश्रमो० १)। जो अड़तालीस वर्ष पर्यन्त वेद के पठन्-पाठन हेतु ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं अर्थात् प्रत्येक वेद का पाठ १२ वर्ष तक करते हुए ब्रह्मचर्य पालते हैं, वे ब्राह्म या ब्राह्मण कहलाते हैं। जो २४ वर्ष तक गुरुकुल में रहे। (ध्यातव्य है कि प्रचलित ब्राह्मण शब्द की व्याख्या १०८ उपनिषद् के ज्ञानखण्ड के परिभाषाकोश परिशिष्ट में की जा चुकी है। यहाँ ब्राह्म के पर्याय स्वरूप लिखा गया ब्राह्मण शब्द ब्रह्मचारी के एक भेद के सन्दर्भ में आया है।) जो गृहस्थ होते हुए केवल ऋतुकाल में अपनी पत्नी से ही संसर्ग करने वाले तथा परदारा (दूसरे की स्त्री) को त्यागने या निषिद्ध मानने वाले हैं, उन्हें प्राजापत्य कहते हैं-स्वदारनिरत ऋतुकालाभिगामी सदा परदारवर्जी प्राजापत्यः (आश्रमो० १)। उन्हें भी प्राजापत्य ही कहा जाता है, जो ४८ वर्ष तक गुरुकुल में निवास करें। जो (ब्रह्मचारी) जीवन पर्यन्त गुरु का परित्याग न करे, ऐसा नैष्ठिक बृहन् या बृहत् कहलाता है- आ प्रायणाद्गुरोरपरित्यागी नैष्ठिको बृहन्निति (आश्रमो० १)। इस प्रकार आचरण भेद से ब्रह्मचारी के ये चार प्रकार हैं। २१७. ब्रह्मतत्त्व—द्र०-ज्ञानखण्ड-ब्रह्म-परब्रह्म। २१८. ब्रह्मनिष्ठ—द्र०-ज्ञानखण्ड-ब्रह्म विद्या। २१९. ब्रह्मपुर—द्र०-अष्टदल कमल। २२०. ब्रह्मयज्ञ—द्र०-वानप्रस्थ। २२१. ब्रह्मरन्ध्र—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२२. ब्रह्मलीन—द्र०-ज्ञानखण्ड-जीवन्मुक्त। २२३. ब्रह्मविद्या—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२४. ब्रह्मवेत्ता—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२५. ब्रह्माण्ड—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२६. ब्रह्मानन्द—द्र०-अद्वयानन्द। २२७. ब्राह्म—द्र०-ब्रह्मचारी। २२८. ब्राह्मण—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२९. भद्रासन—द्र०-आसन। २३०. भवसागर—द्र०-ज्ञानखण्ड- जीवन्मुक्त। २३१. भिक्षु—द्र०-अवधूत। २३२. भूचर सिद्धि—योग साधनाओं से विभिन्न प्रकार की सिद्धियों का वर्णन योग शास्त्रों में मिलता है। अष्टसिद्धियों का कई स्थलों पर उल्लेख है। ये हैं- अणिमा, गरिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। योग सम्बन्धी उपनिषदों में शरीर के नीरोग रहने की सिद्धि, दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, दूरस्थ व्यक्ति की प्राणशक्ति द्वारा सहायता करना आदि अनेकों सिद्धियों का विवेचन है। कुछ सिद्धियाँ ऐसी भी हैं, जिनका प्रयोग या तो निषिद्ध है अथवा इनका प्रयोग बहुत ही सावधानी पूर्वक करने का निर्देश दिया गया है। प्राणायाम के अनेक प्रकारों द्वारा अनेकप्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इन्हीं में से एक सिद्धि है- भूचर सिद्धि। दत्तात्रेय स्मृति और योगतत्त्वोपनिषद् में इसका उल्लेख है। केवल- कुम्भक प्राणायाम सिद्ध हो जाने पर योगी के लिए त्रिलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। केवल-कुम्भक प्राणायाम सिद्ध हो जाने पर रेचक और पूरक का त्याग कर दिया जाता है। उसके बाद अभ्यास के समय निकले पसीने को शरीर में ही मल लिया जाता है। देह में कम्प और दर्दुर भाव (मेंढक के उछलने जैसी चेष्टा) के बाद योगी का शरीर पद्मासन स्थिति
परिशिष्ट ३८३ मन्त्रयोग, लययोग, राजयोग में ही भूमि से ऊपर उठने लगता है। इसके पश्चात् और भी अतिमानुषी चेष्टाएँ होने लगती हैं; पर इन्हें किसी के समक्ष प्रदर्शन न करने का स्पष्ट निर्देश है- केवले कुम्भके सिद्धे ...... न दर्शयेच्च सामर्थ्यं दर्शनं वीर्यवत्तरम् (यो० त० ५०- ५६)। शरीर वृत्तियों में और भी अनेक परिवर्तन होने पर भूचर सिद्धि हो जाती है। इसके प्राप्त हो जाने पर सभी भूचरों (पृथ्वी पर चलने वाले) जीवों पर विजय प्राप्त हो जाती है। व्याघ्र, शरभ, गवय (नीलग्राय), सिंह आदि योगी के हस्त ताडन मात्र से हो मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। शरीर अनंग (कामदेव) के समान सुन्दर हो जाता है-येन भूचरसिद्धिः स्याद्भूचराणां जये क्षमः । व्याघ्रो वा शरभो वाऽपि गजो गवय एव वा ।। सिंहो वा योगिना तेन प्रियन्ते हस्तताडिताः । कन्दर्पस्य यथारूपं तथा स्यादपि योगिनः (यो०त० ५९-६०)। इस सिद्धि में अपेक्षित नैष्ठिक ब्रह्मचर्य धारण करने से शरीर सुगन्धित रहने लगता है, जिससे काम सम्बन्धी अनेक विघ्न आते हैं। अतः स्त्रियों का चिन्तन नहीं करना चाहिए और एकान्त स्थल में प्लुत मात्रा में (ॐ के उच्चारण में जितना समय लगता है, उससे तिगुने समय में) प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए, इससे पूर्वार्जित पापों का शमन होता है-वर्जयित्वा स्त्रियां संगं........ प्रणवं प्लुतमात्रया। जपेत्पूर्वार्जितानां तु पापानां नाशहेतवे (यो०त० ६२-६३)। २३३. भूमा - कोशग्रन्थों में भूमा शब्द का अर्थ है- भारी परिमाण, प्राचुर्य, यथेष्टता बड़ी संख्या आदि । दौलत, पृथ्वी, प्रदेश, प्राणी आदि अर्थों में भी भूमा शब्द का प्रयोग मिलता है। उपनिषदों में भूमा शब्द ब्रह्म (ईश्वर) की एक विशेषता के रूप में प्रतिपादित है। छान्दोग्योपनिषद् में ईश्वर को भूमा (निरतिशय) कहते हुए उसे सुख कहा गया है-यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमा भगवो विजिज्ञास इति (छान्दो० ७.२३.१) अर्थात् सुनिश्चित रूप से भूमा (आधिक्य, निरतिशयत्व) ही सुख है। अल्प में सुख नहीं है। भूमा ही विशिष्टतः जानने योग्य है। भूमा का लक्षण क्या है ? यह बताते हुए उपनिषद्कार ने लिखा है- (किं लक्षणोऽसौ भूमेत्याह) यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ ... महिम्रीति (छान्दो० ७.२४.१) अर्थात् जहाँ कुछ अन्य नहीं देखता, कुछ अन्य श्रवण नहीं करता तथा न ही कुछ जानता है, वही भूमा है; किन्तु जहाँ कुछ और देखता, सुनता व जानता है वह अल्प है; क्योंकि जो अल्प है, वह मरणधर्मा और जो भूमा (निरतिशय) है, वह अमृत है। वह भूमा कहाँ प्रतिष्ठित है, इसके उत्तर में कहा गया है वह भूमा अपनी महिमा में प्रतिष्ठित है। वस्तुतः वह अपनी महिमा में भी प्रतिष्ठित नहीं है; क्योंकि संसार में गौ, अश्वादि को भी महिमा कहते हैं; वह भूमा इनमें प्रतिष्ठित नहीं है, वह तो निरालम्ब अर्थात् अवल- म्बन रहित है। वह भूमा नीचे-ऊपर, बायें-दायें,आगे-पीछे सभी ओर है। उसी भूमा में (व्यक्तिभाव से) अहंकारवश इस प्रकार कहा जाता कि मैं ही ऊपर-नीचे, दायें-बायें और सब ओर हूँ-स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स ...ऽहमुत्तरतोऽहमेवेद १९सर्वमिति (छान्दो० ७.२५.१)। जिसका विभाजन न हो सके, जिसकी सीमा न हो या जो अन्तर रहित हो ऐसा भूमा है और ऐसे अखण्ड आनन्द को भूमानन्द कहा गया है। तेजोबिन्दूपनिषद् में उपनिषदकार ने ब्रह्मसाक्षात्कार हो जाने पर अथवा ब्रह्म से एकीभूत हो जाने पर आत्म स्वरूप का वर्णन करते हुए एक साधक का कथन इन शब्दों में उद्धृत किया है-नित्यशेषस्वरूपोऽस्मि सर्वातीतोऽस्म्यहं सदा। रूपातीतस्वरूपोऽस्मि परमाकाश विग्रहः । भूमानन्दस्वरूपोऽस्मि भाषाहीनोऽस्म्यहं सदा । सर्वाधिष्ठानरूपोऽस्मि सर्वदा चिद्धनोस्म्यहम् (ते०बि०३.१२-१३)। इसी रूप में आत्मबोधोपनिषद् में भी आत्मबोध प्राप्त व्यक्ति अपने को भूमा स्वरूप बताता है .........परमानन्द घनोऽहं परमानन्दैकभूमरूपोऽहं (आत्मबोधो० २.८)। शतपथ ब्राह्मण में श्री को ही भूमा कहा गया है-श्रीर्वै भूमा (श०ब्रा० ३.१.१.१२)। इसी प्रकार तैत्तिरीय ब्राह्मण में पुष्टि को भूमा की संज्ञा प्रदान की गई है- पुष्टिवैं भूमा (तैत्ति०ब्रा० ३.९.८.३)। भूमा स्थिति प्राप्त कर लेने वाले साधु-सन्तों को भी कई लोग भूमा कहने लगते हैं। २३४. भ्रुकुटि - द्र०-त्रिदण्ड-त्रिपुण्ड्र। २३५. मन- द्र०-ज्ञानखण्ड-मानस। २३६. मनन - द्र०-निदिध्यासन । २३७. मन्त्रयोग, लययोग, राजयोग - भारतीय दर्शन में विभिन्न प्रकार के योगों का वर्णन मिलता है। योग का सामान्य अर्थ जोड़ना, मिलाना, संयोग संबंधी, संगति, ध्यान, युक्ति और चित्तवृत्ति निरोध आदि है। व्यावहारिक दृष्टि से योग के कई प्रकार हैं, जैसे- मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग, राजयोग आदि। योगतत्त्वोपनिषद् में इनका उल्लेख इन शब्दों में हुआ है- योगो हि बहुधा ब्रह्मन् भिद्यते व्यवहारतः। मन्त्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगकः (यो०त० १९)। ये सभी
ममता ३८४ परिशिष्ट मिलकर महायोग कहलाते हैं "मन्त्रो लयो .......महायोगोऽभिधीयते" (यो०शि० १२९)। सभी योगों की चार अवस्थाएँ होती हैं। ये हैं- आरम्भावस्था, घटावस्था, परिचयावस्था तथा निष्पत्ति अवस्था-आरम्भश्च घटश्चैव .........परिकीर्तिता (यो०त० २०)। मन्त्रयोग के लक्षण का उपनिषद्कार ने इन शब्दों में उल्लेख किया है....मातृकादियुतं मन्त्रं द्वादशाब्दं तु यो जपेत् । क्रमेण लभते ज्ञानमणिमादिगुणान्वितम् । अल्पबुद्धिरिमं योगं सेवते साधकाधमः (यो०त०२१-२२) अर्थात् जो साधक मातृकायुक्त बारह सौ मन्त्र का जप करता हुआ मन्त्रयोग सिद्ध करता है, वह क्रमशः अणिमा आदि सिद्धियों का ज्ञान प्राप्त करता है। योगशिखोपनिषद् में मंत्रयोग को हंस (सोऽहम्) मंत्र पर आधृत होने का विवेचन है। समस्त प्राणियों द्वारा निरन्तर श्वास-प्रश्वास के द्वारा हंस मंत्र का जप होता रहता है; किन्तु जब गुरु उपदेश से साधक सुषुम्ना नाड़ी में (प्राण प्रविष्ट हो जाने पर) इसी मंत्र का उल्टा (हंस के स्थान पर) सोऽहम् का जप करता है, तब इसे मन्त्र योग कहते हैं- हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः । हंसहंसेति मन्त्रोऽयं सर्वैर्जीवैश्च जप्यते ॥ गुरुवाक्यात् ..... मन्त्रयोगः स उच्यते (यो०शि० १.१३०-१३१)। जो साधक चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-खाते, चित्त को निष्कल परमात्मा में लगाते हैं अर्थात् परमात्मा में ध्यान को एकाग्र करते हैं, वे लययोग करते हैं-लययोगश्चित्तलयः कोटिशः परिकीर्तितः । गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्भुञ्जन्ध्या-येन्निष्कलमीश्वरम्। स एव लययोगः .........शृणु (यो०त० २३-२४)। अन्यत्र भी लययोग का यही स्वरूप निर्दिष्ट है कि जब जीव और परमात्मा का ऐक्य होकर साधक का चित्त ब्रह्म में विलीन हो जाता है, तब शरीर स्थित पवन (प्राण) स्थैर्य को प्राप्त हो जाता है और लययोग का उदय होता है। लययोग से सुख और आत्मानन्दपूर्वक परम पद की प्राप्ति होती है- ....क्षेत्रज्ञः परमात्मा च तयोरैक्यं यदा भवेत् । ......पवनः स्थैर्यमायाति लय योगोदये सति ॥ लयात् .......परं पदम् (यो०शि० १.१३४-१३६) । यमनियमादि योग के आठ अंगों, मुद्रा-बन्ध आदि के साथ जो योग करते हैं, वह हठ योग है। इसमें हठ पूर्वक इन्द्रियों को सहजधारा से अलग हटाकर निश्चित धारा में लगाने के कारण इसे हठ योग कहते हैं। हठयोग का विस्तृत वर्णन इसी परिभाषा कोश परिशिष्ट के 'हठयोग' प्रकरण में किया जा चुका है, विशेष जानकारी हेतु उसे देखना चाहिए। विभिन्न अंग-उपाङ्गों सहित हठयोग द्वारा जब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, तब उनके (योगियों के) लिए हठयोग की क्रियाओं की आवश्यकता नहीं रहती। वे सिद्धियाँ उनके लिए सहज हो जाती हैं। इसी को राजयोग कहते हैं- हठयोगसिद्धोऽयं राजयोगः योगराजत्वात् (यो०त० १३० टीका) अर्थात् हठयोग द्वारा जो पुरुष सिद्ध हो जाता है, वही राजयोगी है। एक अन्य उपनिषद् में राजयोग की परिभाषा इस प्रकार को गई है-योनिमध्ये महाक्षेत्रे जपाबन्धूकसंनिभम् । रजो वसति जन्तूनां देवीतत्त्वं समावृतम् । रजसो रेतसो योगाद्राजयोग इति स्मृतः । अणिमादिपदं प्राप्य राजते राजयोगतः (यो०शि० १.१३६-१३८) अर्थात् प्रत्येक जन्तु (जीव)के योनि मध्य (मूलाधार और स्वाधिष्ठान के बीच स्थित कन्द), जिसे महाक्षेत्र की संज्ञा प्रदान की गई है,में जपा और बन्धूक के पुष्पों के समान लाल रंग वाला रज निवास करता है, जो देवी तत्त्व से समावृत है। जब यौगिक क्रियाओं (कुण्डलिनी साधना) द्वारा साधक शरीर के ऊर्ध्व भाग स्थित शिवस्वरूप रेतस् और अधोभाग स्थित रज का योग करता है, तब प्राण और अपान भी उन्हीं में लीन हो जाते हैं, इससे वह समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। रज और रेतस् योग की इस क्रिया को ही राजयोग कहते हैं- प्रकृत्यष्टकरूपं च स्थानं गच्छति कुण्डली । .........इत्यथोर्ध्वरजः शुक्ले शिवे तदनु मारुतः । प्राणापानौ समौ याति सह जातौ तथैव च (यो०कु० १.७४-७५)। भौतिक जगत् में भी नारी के शरीर में स्थित रज और पुरुष के शरीर में स्थित रेतस् (वीर्य) के योग से ही नूतन जीवन (शिशु) का प्रादुर्भाव होता है; किन्तु योगी जनों के एक ही शरीर में यह प्रक्रिया सम्पन्न होती है और वे शनैः-शनैः इस अभ्यास से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं-एकेनैव शरीरेण योगाभ्यासाच्छनैः शनैः । चिरात्संप्राप्यते मुक्तिर्मर्कटक्रम एव सः (यो०शि० १.१४०) । राजयोग की प्रशंसा कई ग्रन्थों में उल्लिखित है। हठयोग प्रदीपिका में उल्लेख है कि आत्मज्ञान, विदेहमुक्ति, अणिमा आदि सिद्धियाँ, गुरु कृपा से प्राप्त राजयोग द्वारा उपलब्ध होती हैं-राजयोगस्य माहात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः । ज्ञानं मुक्तिः स्थितिः सिद्धिर्गुरुवाक्येन लभ्यते (हठ०प्र० ४.८)। २३८. ममता-द्र०-ज्ञानखण्ड - मोह-ममता-आसक्ति। २३९. महापातक- पातक शब्द पाप का पर्यायवाची है। किसी को किसी भी प्रकार से पीड़ा पहुँचाना ही पाप है। इसी प्रकार किसी को सुख पहुँचाना अथवा परोपकार करना ही पुण्य है। पाप-पुण्य को सामान्यतः इस श्लोक से स्पष्ट समझा जा सकता है- अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ पाप कई प्रकार के
परिशिष्ट ३८५ मुद्रा होते हैं। उनकी श्रेणी के अनुसार उनके अलग-अलग नामकरण किये गये हैं, जैसे- उपपातक, महापातक आदि। छोटे पापों को उपपातक कहते हैं। कोशग्रन्थों के अनुसार इनकी संख्या प्रायः पचास है; जिनमें गोवध, परदारगमन, मातृत्याग, पितृत्याग, गुरुत्याग, आत्मविक्रय, अपत्यविक्रय, दारविक्रय, स्त्रीवध आदि प्रमुख हैं। महान् या बड़े पापों को महापातक कहते हैं, जिसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- महदतिशयितं पातकं इति महापातकम्। महापातक पाँच प्रकार के माने गये हैं- ब्रह्महत्या, सुरापान, गुरुपत्नीगमन, चोरी करना तथा इन सभी पापियों के साथ संसर्ग। मनुस्मृति में यह तथ्य इन शब्दों में विवेचित है-ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः। महान्ति पातकान्याहुःसंसर्गश्चापि तैः सह (मनु० ११.५४)। 'जो पापी उपर्युक्त इन पापों को करते हैं, उनको नरक भोग के बाद असाध्य रोगों का भी भोग करना पड़ता है। इस प्रकार सात जन्मों तक यह क्रम चलता रहता है, तब महापातक से निवृत्ति मिलती है। प्राचीन ग्रन्थों में महापातक शमन के अनेक उपाय वर्णित हैं। कार्तिक, वैशाख और माघ मास में नित्य प्रातःकाल स्नानादि करके हविष्य भोजन व नैष्ठिक ब्रह्मचर्य पालन से महापातक का विनाश होता है-तुलामकरमेषेषु प्रातः स्नानं विधीयते। हविष्यं ब्रह्मचर्यञ्च महापातकनाशनम् (हि०वि०को०खंड १७ पृ० १४७)। इसी प्रकार कृष्ण नाम जप को भी महापातक का शामक कहा गया है- कृष्णोति मङ्गलं नाम ......महापातककोटयः (हि०वि०को०पृ० १४७)। जाबाल्युपनिषद् में भी विद्वान्, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी अथवा यति द्वारा भस्म का त्रिपुण्ड्र (ललाट पर तीन आड़ी रेखाएँ) धारण करने और उन तीनों रेखाओं के तत्त्वदर्शन को समझने व जीवन में धारण करने से (जिसका वर्णन जाबाल्युपनिषद् के ही २१ वें मंत्र में है) महापातकों और उपपातकों के शमन का उल्लेख है- त्रिपुण्ड्रं भस्मना करोति यो विद्वान् ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिर्वा स महापातकोपपातकेभ्यः पूतो भवति (जाबाल्यु० २१)। २४०. महाबन्ध - द्र०-बन्ध। २४१. महामुद्रा- द्र०-मुद्रा। २४२. महावाक्य - द्र०-ज्ञानखण्ड। २४३. महावेध - द्र०-बन्ध। २४४. महेश्वर - द्र०-त्र्यम्बक। २४५. माया- द्र०-ज्ञानखण्ड -अविद्या, माया, अज्ञान। २४६. मुक्तात्मा - द्र०-ज्ञानखण्ड-जीवनमुक्त। २४७. मुक्ति-द्र०-ज्ञानखण्ड-मुक्ति-मोक्ष। २४८. मुद्रा - योग के अन्तर्गत चित्तशोधन व प्राण के ऊर्ध्वगमन के निमित्त विभिन्न मुद्राएँ प्रतिपादित की गयी हैं- जैसे खेचरी मुद्रा, महामुद्रा, अश्विनीमुद्रा, शक्तिचालिनी मुद्रा, योनिमुद्रा, योगमुद्रा, शाम्भवी मुद्रा, तड़ागीमुद्रा, विपरीतकरणी मुद्रा, वज्रोली, अमरोली, सहजोली मुद्रा आदि। इनमें कुछ प्रमुख मुद्राएँ इस प्रकार हैं- खेचरी मुद्रा में जीभ को उलट कर कपाल कुहर में प्रविष्ट कराकर दृष्टि को भ्रूमध्य में एकाग्र किया जाता है। ध्यान की स्थिरता में इस मुद्रा से बहुत सहायता मिलती है। इसके अभ्यासी को क्षुधा, निद्रा, तृष्णा, मूर्च्छा आदि से त्राण मिलता है। चित्तशून्य (अन्तरिक्ष-खे) में रमण (चर) करने के कारण इसका नाम खेचरी मुद्रा पड़ा है। उपनिषदकार ने इस मुद्रा के विषय में लिखा है-अन्तः कपाल कुहरे जिह्वां व्यावृत्त्य धारयेत्। भ्रूमध्यदृष्टिरप्येषा मुद्रा भवति खेचरी (यो०त० ११७)। इस मुद्रा की सिद्धि के लिए जिह्वा वृद्धि हेतु छेदन, दोहन व चालन आदि कृत्य किये जाते हैं। महामुद्रा में मूलबन्धपूर्वक वाम पाद की एड़ी से गुदा और उपस्थ के बीच का स्थान (सीवन) दबाते हैं और दक्षिण पाद को फैलाकर उसकी अँगुलियों को दोनों हाथों से पकड़ते हैं। इसके बाद बायें नथुने से पूरक करके जालन्धर बन्ध लगाते हैं, तत्पश्चात् जालन्धर बन्ध खोलकर दाहिने नथुने से रेचक करते हैं। इसी प्रकार दाहिने ओर से भी यही मुद्रा करनी चाहिए। अश्विनी मुद्रा में पद्मासन अथवा सिद्धासन से बैठकर योनि प्रदेश को अश्व (घोड़े) की तरह बारम्बार आकुंचन-प्रकुंचन किया जाता है। इससे प्राण का उत्थान व कुण्डलिनी शक्ति के जागरण में सहायता मिलती है। शाम्भवी मुद्रा में मूल और उड्डियानबन्धपूर्वक पद्म अथवा सिद्ध आसन में बैठकर नासाग्र अथवा भ्रूमध्य में दृष्टि को स्थिर करके ध्यान लगाया जाता है। वज्रोली मुद्रा में साधक प्रारम्भ में उपस्थेन्द्रिय द्वारा मूत्र को ऊपर खींचने और पुनर्विसर्जित करने का अभ्यास करता है। बाद में जल, दूध, तेल, घृत, शहद और पारे को भी खींचने और छोड़ने का
मुनि ३८६ परिशिष्ट अभ्यास बन जाता है। इसका अभ्यास दृढ़ हो जाने पर स्त्री योनि में रेतस् विसर्जित करके उसके रज को ग्रहण किया जाता है; पर इस क्रिया में किसी अनुभवी का मार्गदर्शन अपेक्षित है, अन्यथा शारीरिक हानि के साथ ही आध्यात्मिक पतन की सम्भावना भी रहती है। वज्रोली के सन्दर्भ में योगतत्त्व उपनिषद् में उल्लेख है-किं नाम वज्रोली ? कांस्यपात्रे गोक्षीरं निक्षिप्य वज्रोलीतुल्य लिङ्गनालेन ग्रसित्वा पुनर्विरेंच्य पुनर्ग्रसनादिकमभ्यस्याथ स्त्रीयोनिमण्डले रेतो विसृज्य तच्छोणितेन साकं ग्रसेदिति यत्सेव वज्रोलीत्युच्यते (यो०त० १२६.१२७)। अमरोली मुद्रा वज्रोली का ही अगला चरण है। इसमें अमरी (मूत्र) की प्रथम और अन्तिम धारा को छोड़कर, मध्य धारा को हाथ या पात्र में लेकर प्रतिदिन पीकर तथा नस्य (नासिका द्वारा लेकर) करते हुए, वज्रोली क्रिया का अभ्यास किया जाता है। यही अमरोली मुद्रा कहलाती है- अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन् दिने-दिने। वज्रोलीमभ्य- सेन्नित्यममरोलीति कथ्यते (यो०त० १२८)। सहजोली मुद्रा वह कहलाती है, जिसमें अमरोलीसिद्ध को अमरीपान और नस्य के बिना ही (सहज ही) सिद्धि प्राप्त हो जाती है- एवममरोलीसिद्धस्यामरीपाननस्यं विना या सिद्धिरुदेति सैव सहजोलीत्युच्यते (यो०त० १२८ टीका)। षण्मुखी मुद्रा का प्रयोग योगमार्ग में, मन पर विजय प्राप्त करने, वायु को वश में करने आदि के लिए किया जाता है; जिससे प्राण ऊर्ध्वगामी हो चित्त एकाग्र होता है तथा आनन्दानुभूति होती है। जाबाल दर्शनोपनिषद् में इसका स्वरूप इस प्रकार निरूपित है-स्वस्तिकासनमास्थाय समाहितमनास्तथा। अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्रणवेन शनैःशनैः। हस्ताभ्यां धारयेत्सम्यक् कर्णादिकरणानि च........महामुने (जा०दर्शनो० ६.३२-३५) अर्थात् स्वस्तिक आसन पर बैठकर मन एकाग्र करके अपान वायु को ऊपर चढ़ाकर शनैः-शनैः प्रणव (ओंकार) का जप करते हुए दोनों अँगूठों से कानों को, तर्जनी से नेत्रों को और अन्य अँगुलियों से नासा पुटों को बन्द करके मूर्धा में मन (प्राण) को तब तक धारण करे (ध्यान लगाये), जब तक आनन्द की अनुभूति हो। इस प्रकार प्राण ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश कर जाता है। यही षण्मुखी मुद्रा है। साधक द्वारा वैष्णवी मुद्रा का प्रयोग मूलाधारादि चार चक्रों में मन को एकाग्र करने के लिए किया जाता है। इसमें मूलाधार, अनाहत, आज्ञा तथा सहस्रार चक्रों में विराजमान क्रमशः विराद् सूत्र, बीज, तुरीय अथवा अन्तर्लक्ष्य में बहिर्दृष्टि रखते हुए (खुले नेत्रों से) अपलक होकर मन को एकाग्र किया जाता है। इस सन्दर्भ में शाण्डिल्य उपनिषद् में उल्लेख है- मूलाधारानाहताज्ञा सहस्रारेषु यथाक्रमं विराट् सूत्रं बीजं तुरीयं वा अन्तर्लक्ष्यं तदेकतानं मनः बहिर्दृष्टिस्तु अन्तर्दृष्टिर्भूत्वा यदा निमेषोन्मेषवर्जिता भवति तदा दृष्टिरियं वैष्णवीमुद्रा भवतीत्यर्थः (शाण्डिल्यो० १.७. १४ टीका)। २४९. मुनि-संस्कृति के विकास में ऋषि-मुनियों का आदिकाल से ही योगदान रहा है। ये ही समय-समय पर विकृत परम्पराओं में संशोधन करके नया चिन्तन व साहित्य समाज को देकर उसे नई दिशा प्रदान करते रहे हैं। 'ऋषयोमन्त्र द्रष्टारः तथा दर्शनादृषिः'-यह परिभाषा ऋषि के स्वरूप का स्पष्ट बोध कराती है। ऋषि के संदर्भ में ज्ञानखण्ड के परिभाषा कोश परिशिष्ट में विस्तृत वर्णन किया जा चुका है। मुनि, ऋषियों से कुछ भिन्न होते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में मुनि की परिभाषा इस प्रकार निर्दिष्ट है-दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते (गी० २.५६) अर्थात् जो दुःख में उद्विग्न नहीं होता तथा सुख में अनासक्त रहता है, जिसे राग, भय, क्रोध-आदि स्पर्श भी नहीं कर सकते, वही मुनि कहलाता है। गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि मुनि समस्त वासनाओं को त्याग कर एकमात्र विष्णु में ही सतत लीन रहकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करते रहते हैं। वे होम, संध्यावन्दन, तर्पण आदि क्रियाएँ करके धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष प्रदाता भगवान् विष्णु को प्राप्त करते हैं। हिन्दी विश्वकोश खं० १८ पृ० ९० में मुनि की व्युत्पत्ति इस प्रकार वर्णित है-मनुते जानाति यः इति अर्थात् मौनव्रती, मननशील महात्मा। अभिप्राय यह है कि चित्त को एकाग्र करके (मौन रहकर) तपस्वी जीवन जीते हुए मनन करने वाला मुनि है। नैषध महाकाव्य में मुनि की सादृश्यता इन शब्दों में निर्दिष्ट है-फलेन मूलेन च वारिभूरुहां मुनेरिवेत्थं मम यस्य वृत्तयः (नैषधी० १.१३३)। महोपनिषद् में साधक को गुरु और शास्त्र वचन व स्वानुभूति से स्वयं को ब्रह्मरूप में जानने और शोकादि को त्यागकर मुनि बनने की आज्ञा दी गई है-गुरु शास्त्रोक्तमार्गेण स्वानुभूत्या च चिद्घने। ब्रह्मैवाहमिति ज्ञात्वा वीतशोको भवेन्मुनिः (महो० ४.२५)। मरीचि, नारद, कर्दम, अत्रि, दक्ष और वशिष्ठ आदि मुनियों की श्रेणी में ही आते हैं। साधकों की एक अन्य श्रेणी में मुमुक्षु का नाम भी आता है, जिसका अर्थ कोश ग्रन्थों में इस प्रकार विवेचित है-मुमुक्षु मोक्तुमिच्छतीति अर्थात् मुक्ति का अभिलाषी, मोक्ष की इच्छा रखने वाला अथवा वह व्यक्ति जो मुक्ति की कामना करता हो। श्रुति आदेश है कि मुक्तिकामी को चाहिए कि वह वर्जनीय और काम्य कर्म का त्याग करके श्रवण और मनन आदि
परिशिष्ट ३८७ यम के द्वारा ईश्वराराधना में ही निरत रहे। श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म के प्रति स्पृहा न रखने के संदर्भ में भगवान् कृष्ण अर्जुन को उनके पूर्वज मुमुक्षुओं के पदचिह्नों पर चलने का उपदेश देते हैं-एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् (गी० ४.१५)। २५०. मुमुक्षु- द्र०-मुनि। २५१. मूलबन्ध- द्र०-बन्ध। २५२. मूलाधार- द्र०-कुण्डलिनी। २५३. मृत्यु-द्र०-ज्ञानखण्ड-अमृत-मृत्यु। २५४. मोक्ष-द्र०-ज्ञानखण्ड-मुक्ति-मोक्ष। २५५. यज्ञ-द्र०-ज्ञानखण्ड-यज्ञ-अग्निहोत्र। २५६. यज्ञसूत्र (जनेऊ-ब्रह्मसूत्र)-द्र०-ज्ञानखण्ड-यज्ञोपवीत उपनयन। २५७. यज्वा - यज् धातु से निर्मित यज्वा शब्द का प्रयोग याज्ञिक अथवा यज्ञकर्त्ता के अर्थ में किया जाता है। कोश ग्रन्थ में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार निर्दिष्ट है- यज्वन्-यज्+क्वनिप् अर्थात् सविधि (शास्त्रोक्त ढंग से) यज्ञ करने वाला। ब्रह्मोपनिषद् में उपनिषदकार ने शिखा और यज्ञोपवीत धारण करने का मर्म समझाते हुए कहा है कि जो ज्ञानरूपी शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं, सच्चे अर्थों में वे ही ब्राह्मण हैं-शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुः (ब्रह्मो० १४)। यहाँ ज्ञान को ही यज्ञोपवीत की विशेषता बताया गया है; (वैसे सामान्यतः यज्ञोपवीत को यज्ञ का धागा माना जाता है) इसलिए अगले मंत्र में ज्ञान को यज्ञोपवीत और परम परायण कहा गया है। वस्तुतः ज्ञानी और यज्ञमय-त्याग परायण जीवन जीने वाला ही यज्ञोपवीती (यज्ञोपवीतधारी) है। ऐसे साधक को ही यज्ञरूप और यज्वा (यज्वन्) कहा गया है-इदं यज्ञोपवीतं तु परमं यत्परायणम्। स विद्वान्यज्ञोपवीती स्यात्स यज्ञस्तं यज्वानं विदुः (ब्रह्मो० १५)। २५८. यति-द्र०-ज्ञानखण्ड-संन्यासी-यति। २५९. यम - आर्षग्रन्थों में प्रमुखतः योग के आठ अंग प्रतिपादित हैं। ये हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यम और नियमों के अन्तर्गत भी पाँच-पाँच गुण समाविष्ट हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह--ये यम कहलाते हैं- अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः (पातं०यो०प्र०सा०पा०सूत्र-३०)। प्रथम-यम अहिंसा शब्द का अर्थ है-अद्रोह, अनपकार, किसी प्रकार भी किसी को पीड़ा न पहुँचाना। वाचस्पत्यम् में इसका अर्थ इन शब्दों में परिभाषित किया गया है-वेदोक्तेन प्रकारेण विना सत्यं तपोधन। कायेन मनसा वाचा हिंसा हिंसा न चान्यथा।। आत्मा ....वेदान्त वेदिभिः अर्थात् वेदोक्त रीति के बिना मन, वाणी और शरीर के द्वारा किसी को कष्ट पहुँचाना ही हिंसा है; किन्तु किसी के कल्याण के लिए यदि उसे उक्त तीनों प्रकार से कष्ट पहुँचे, तो वह अहिंसा ही कही जायेगी, जैसे-शिक्षार्थ किसी को ताड़ना देना या रोग निवारण हेतु किसी को कटु औषधि देना, आपरेशन करना अहिंसा ही है, वस्तुतः समस्त यम नियमों का मूल अहिंसा है, क्योंकि अहिंसा को परम धर्म कहा गया है-अहिंसा परमोधर्मः। दूसरा-यम सत्य है। किसी वस्तु का यथार्थ ज्ञान सत्य कहलाता है। शरीर द्वारा इसका प्रयोग शरीर का सत्य है। वाणी द्वारा इसका प्रयोग वाणी का सत्य, मन के द्वारा इसका प्रयोग मन का सत्य है। साधारणतः सत्य को वाणी द्वारा व्यक्त करने का ही विषय माना जाता है। इन्द्रियों द्वारा जैसा देखा, सुना और सूँघा है, उसे वाणी द्वारा वैसा कह देना सत्य है- चक्षुरादीन्द्रियैर्दृष्टं श्रुतं घ्रातं मुनीश्वर। तस्यैवोक्तिर्भवेत् सत्यं विप्र तन्नान्यथा भवेत् (जा०दर्शनो० १.२)। वेदान्त में परब्रह्म को ही सत्य माना गया है; क्योंकि वह सर्वकाल में शाश्वत है। उसके अतिरिक्त अन्य कोई सत्य नहीं है-सर्वं सत्यं परं ब्रह्म ...... (जा०दर्शनो १.१०)। वाणी द्वारा यदि ऐसा सत्य कहा जाता है, जो किसी का अहित करता है, तो इसे ऋषियों ने सत्य नहीं माना है। इसीलिए उसने सत्य की मर्यादा सुनिश्चित कर दी है-सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् (मनु०) अर्थात् वह सत्य बोले जो प्रिय (हितकर) हो। अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए। महाभारत ने भी इसी प्रकार के सत्य की पुष्टि की है- सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् यद्भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यं मतं मम। तृतीय- यम अस्तेय अर्थात् चोरी न करना है; किन्तु यह स्थूल धन की चोरी न करने तक ही सीमित नहीं है। किसी के अधिकारों का हनन न करना तथा नैतिक मूल्यों की रक्षा करना भी अस्तेय है। इसके विपरीत अधिकारियों द्वारा
यायावर ३८८ परिशिष्ट रिश्वत लेना, दुकानदारों द्वारा निश्चित या उचित मूल्य से अधिक लेना, कम तौलना, मिलावट करना ये सभी अस्तेय विरोधी हैं। जाबाल दर्शनोपनिषद् में अस्तेय इन शब्दों में निरूपित है- अन्यदीये तृणे रत्ने काञ्चने मौक्तिकेऽपि च। मनसा विनिवृत्तिर्या तदस्तेयं विदुर्बुधाः। आत्मन्यानात्मभावेन ......मुने (जा०दर्शनो० १.१०-१२) अर्थात् किसी दूसरे के तृण (तिनके), रत्न, मणि, मुक्ता, सुवर्ण, धन सम्पदा पर मन भी न चलना अस्तेय है। संसार के सभी व्यवहार अनात्म हैं अर्थात् आत्मा से भिन्न हैं, ऐसा मानने वाले ज्ञानीजन अस्तेय का ही पालन करते हैं। चौथा-यम ब्रह्मचर्य है। शास्त्रों में इसकी बहुत महिमा गायी गई है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार ब्रह्म अर्थात् वेदार्थ का आचरण ही ब्रह्मचर्य है- ब्रह्मचर्यं, क्ली; (ब्राह्मणे वेदार्थे चर्य्यं आचरणीयम्)। सामान्यतः ब्रह्मचर्य का अर्थ अष्ट प्रकार के मैथुन का प्रतिषेध है- ब्रह्मचर्य्यं अष्टाङ्गमैथुन प्रतिषेधः (श०क० खं० ३ पृ० ४४४)। किसी भी प्रकार से वीर्य का क्षय न करना ब्रह्मचर्य माना जाता है। इसकी महिमा बताते हुए हठयोग प्रदीपिकाकार ने कहा है- मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणम् अर्थात् बिन्दु (वीर्य) का पात मरण तथा बिन्दु की रक्षा ही जीवन है। जाबाल दर्शनोपनिषद् में ब्रह्मचर्य इन शब्दों में विवेचित है- कायेन वाचा मनसा स्त्रीणां परिविवर्जनम्। ऋतौ भार्या तदा स्वस्य ब्रह्मचर्यं तदुच्यते ॥ ब्रह्मभावे मनश्चारं ब्रह्मचर्यं परन्तप (जा०दर्शनो० १.१३) अर्थात् मन, वाणी और शरीर से नारी प्रसंग का परित्याग तथा धर्म बुद्धि से ऋतु काल में ही स्त्री प्रसंग ब्रह्मचर्य है। अथर्ववेद में उल्लेख है कि ब्रह्मचर्य तप के द्वारा ही देवों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है- ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत (अथर्व० ११.७.१९) पाँचवाँ-यम अपरिग्रह है। अपनी अनिवार्य आवश्यकता से अधिक वस्तुओं, धनादि का परित्याग अपरिग्रह कहलाता है। विषय वस्तुओं की अस्वीकार करना भी अपरिग्रह है। महर्षि व्यास के अनुसार विषयों में विभिन्न दोष देखकर उन्हें ग्रहण न करना ही अपरिग्रह है-विषयाणामर्जंनरक्षणक्षयसंगहिंसादोषदर्शनादस्वीकरणमपरिग्रहः (साङ्ख्य दर्शन-व्यास भाष्य)। इस प्रकार प्रमुखतः ये पाँच यम ही प्रचलित हैं। कुछ ग्रन्थों में दशविध यम वर्णित हैं। ये अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव (सभी के प्रति समान भाव), क्षमा, धृति, मिताहार और शौच हैं- अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयाऽऽर्जवम्। क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश (जा०दर्शनो० १.६)। २६०. यायावर- द्र०-गृहस्थ। २६१. योग -द्र०-ज्ञानखण्ड। २६२. योगनिद्रा- यौगिक क्रियाओं में योगनिद्रा का भी उल्लेख मिलता है। सामान्यतः निद्रा सुषुप्तावस्था को कहते हैं; किन्तु यौगिक प्रक्रिया से उत्पन्न निद्रा योगनिद्रा कहलाती है,जिसे कोश ग्रन्थों में समाधि का एक अंग कहा गया है। हिन्दी विश्वकोश खं० १८ पृ० ६२२ में उल्लेख है-योगश्चित्तवृत्ति निरोधलक्षणः समाधिस्तद्रूपा निद्रा अर्थात् योग, चित्त वृत्ति का निरोध है, उसका चरमोत्कर्ष समाधि है। समाधि में बाह्यज्ञान नहीं रहता। इसलिए यह अवस्था योगनिद्रा कहलाती है। मण्डलब्राह्मण उपनिषद में भी शुद्ध, अद्वैत, चैतन्य और सहज अमनस्क स्थिति की योगनिद्रा की उपमा दी गई है- शुद्धाद्वैताजाड्यसहजामनस्कयोगनिद्रा.....जीवन्मुक्तो भवति (मं०ब्रा०उ० २.५.२)। इस मंत्र की टीका में ब्रह्मयोगी ने उपर्युक्त स्थिति को निर्विकल्प समाधि कहा है-अजाड्य.....निर्विकल्प समाधिः (मं०ब्रा०उ० २.५.२ टीका)। २६३. योगी- द्र०-ज्ञानखण्ड -योग। २६४. योनि- द्र०-ज्ञानखण्ड। २६५. राजयोग- द्र०-मन्त्रयोग। २६६. रुद्र- द्र०-त्र्यम्बक। २६७. लक्ष्यत्रय- इस शब्द का उल्लेख उपनिषदों में प्राप्त होता है। भ्रूमध्य स्थित सच्चिदानन्द स्वरूप चेतन पुञ्ज ब्रह्म (तारक ब्रह्म) का दर्शन प्राप्त करने के लिए लक्ष्यत्रय का अवलोकन करने का विवेचन मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् में इन शब्दों में निर्दिष्ट है-भ्रूमध्ये सच्चिदानन्दतेजः कूटरूपं .....तदाप्त्युपायं लक्ष्यत्रयावलोकनम् (मं०ब्रा० उ० १.२.४- ५)। ब्रह्मदर्शन में जिन तीन प्रकार की दर्शन प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाता है और उनमें जिन रंग विशेषों व स्थितियों का दर्शन होता है, वे ही तीन प्रकार के दर्शन लक्ष्यत्रय के नाम से जाने जाते हैं। बाह्य लक्ष्य, मध्य लक्ष्य और अन्तर्लक्ष्य- ये ही त्रिलक्ष्य (लक्ष्यत्रय) हैं। ज्योति (ब्रह्मज्योति) के दर्शन में सर्वप्रथम योगी को नासिका के अग्रभाग से चार, छः, आठ, दस और बारह अंगुल की दूरी पर क्रमशः नीला, काला, रक्त, पीत और दो रंगों के संमिश्रण जैसे रंग का आकाश
दिखाई पड़ता है, यही बाह्य लक्ष्य है-बहिर्लक्ष्यं तु नासाग्रे चतुःषडष्टदश-द्वादशाङ्गुलीभिः .......व्योमत्वं पश्यति स तु योगी (मं० ब्रा०उ० १.२.८)। मध्य लक्ष्य का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है- प्रातः काल में (ध्यान करने पर) सूर्य, चन्द्र और अग्नि को ज्वालाओं के समान और उससे रहित अन्तरिक्ष-सम दिखाई पड़ता है। वह उसी के आकारवत् आकारयुक्त हो जाता है। यही मध्य लक्ष्य है-मध्यलक्ष्यं तु प्रातःश्चित्रादिवर्णसूर्य चन्द्र वह्निज्वालावलीवन्न- द्विहीनान्तरिक्षवत्पश्यति। तदाकाराकारी भवति (म०ब्रा०उ०१.२.११-१२)। इसी उपनिषद् में अन्तर्लक्ष्य का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है कि अन्तर्लक्ष्य दीप्तिमान् ज्योति के समतुल्य है, बाह्य और आन्तरिक इन्द्रियों द्वारा अगोचर इसे महर्षिगण ही (पूर्णतः) जान सकते हैं-अन्तर्लक्ष्यं जलज्योतिः स्वरूपं भवति। महर्षिवेद्यं अन्तर्बाह्येन्द्रियैरदृश्यम् (मं०ब्रा०उ० १.३.६)। अन्तर्लक्ष्य के विषय में विभिन्न विद्वानों के पृथक्-पृथक् मत हैं। कोई इसे सहस्रार दल में दीप्तिमान् ज्योति के समतुल्य मानते है, कोई बुद्धि रूपी गुहा में सर्वाङ्ग सुन्दर पुरुष के रूप को अन्तर्लक्ष्य मानते हैं, कोई शीर्ष के अन्तर्गत स्थित मण्डल के बीच में स्थित पंचमुखी और उमा सहित महेश्वर का प्रशान्त रूप ही अन्तर्लक्ष्य मानते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष ही अन्तर्लक्ष्य है-सहस्रारे जलज्योतिरान्तर्लक्ष्यम्। बुद्धिगुहायां ...........अङ्गुष्ठ मात्रः पुरुषोऽन्तर्लक्ष्यमित्येके (मं०ब्रा०उ० १.४.१)। उपर्युक्त समस्त विकल्प आत्मा के ही हैं। अस्तु, उस अन्तर्लक्ष्य का जो पुरुष शुद्धात्मा दृष्टि से दर्शन करता है, वह ब्रह्मनिष्ठ कहलाता है-उक्तविकल्पं सर्वमात्मैव। तल्लक्ष्यं शुद्धात्मदृष्ट्या वा यः पश्यति स एव ब्रह्मनिष्ठो भवति (मं०ब्रा०उ० १.४.२)। अन्तर्लक्ष्य का दर्शन कर लेने से जीव जीवन्मुक्त स्थिति की ओर अग्रसर होकर, स्वयं अन्तर्लक्ष्य होकर परमाकाश स्वरूप अखण्ड मण्डलाकार हो जाता है। २६८. लययोग- द्र०-मन्त्रयोग। २६९. लिङ्ग शरीर - द्र०-पुर्यष्टक। २७०. लोक- द्र०- ज्ञानखण्ड-लोक-परलोक-समलोक। २७१. वज्रोली मुद्रा- द्र०-मुद्रा। २७२. वर्णाश्रम- द्र०-ज्ञानखण्ड-चतुराश्रम एवं चतुर्वर्ग। २७३. वानप्रस्थ - चारों आश्रमों में ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के पश्चात् तीसरा आश्रम वानप्रस्थ कहलाता है। इसमें गृहस्थ व्यक्ति परिवार को जिम्मेदारियों को निपटाकर पुत्रादि पर परिवार के दायित्व सौंप कर अगले चरण में पत्नी सहित पवित्र जीवन जीकर आत्म कल्याण और लोक सेवा के कार्यों में अपने जीवन के पच्चीस वर्ष लगाता है। हलायुध कोश में वानप्रस्थ को परिभाषा इन शब्दों में विवेचित है-वानप्रस्थः पुं० (वनप्रस्थे भवः, अण्) वैखानसः, तृतीयाश्रमः पुत्रमुत्याद्य वनवासं कृत्वा अकृष्टपच्यफलादिभक्षयित्वा ईश्वराराधन करोति यःसः (हला० पृ० ६००) अर्थात् वानप्रस्थी पुत्रोत्पत्ति के पश्चात् वन में निवास करता हुआ स्वयं उत्पन्न तथा स्वयं पके फलादि का सेवन करके ईश्वराराधन करता है। आश्रम उपनिषद् मंत्र ३ में वानप्रस्थी के चार भेद बताये गये हैं- वैखानस, उदुम्बर, वालखिल्य तथा फेनप-वानप्रस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वैखानसा उदुम्बरा बालखिल्याः फेनपाश्चेति। इनमें वैखानस वानप्रस्थी वे कहलाते हैं, जो स्वयं उत्पन्न तथा पकी हुई औषधियों तथा वनस्पतियों, जो ग्रामीणों द्वारा उपेक्षित है, में अग्नि संचार कर उदरपूर्ति करते हुए नियमित पञ्च महायज्ञ [वानप्रस्थी के लिए नियमित पाँच यज्ञ ब्रह्मयज्ञ (वेदाध्ययन व वेदाध्यापन), देवयज्ञ (अग्निहोत्र), पितृयज्ञ (श्राद्ध-तर्पण), अतिथि यज्ञ अथवा मनुष्य यज्ञ (अतिथिसेवा) और भूतयज्ञ (बलिवैश्व आदि- चींटी, कीड़े, कुत्ते, गौ व मछलियों आदि को भोजन कराना) करने का विधान है] सम्पन्न करते हुए आत्मा को साधना करते हैं-तत्र वैखानसा अकृष्ट पच्यौषधिवनस्पतिभिर्ग्रामबहिष्कृताभिरग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ३)। उदुम्बर वानप्रस्थी उन्हें कहते हैं, जो प्रातः उठकर जिस दिशा में भी देखें उधर जाकर उदुगरि (गूलर), बदर (बेर), नीवार और श्यामाक (साँवाँ) आदि का संग्रह करके उनमें अग्नि संचार करके पञ्च महायज्ञों को क्रियाएँ सम्पन्न करते हुए जीवन को साधना करते हैं-उदुम्बराः प्रातरुत्थाय यां दिशमभिप्रेक्षन्ते.....आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ३)। उल्लेखनीय है कि गूलर आदि का सेवन करने के कारण इन वानप्रस्थियों का नाम उदुम्बर पड़ा है। कुछ उपनिषदों में 'औदुम्बर' पाठ भी मिलता है।
वार्त्ताक वृत्ति ३१० परिशिष्ट
बालखिल्य वानप्रस्थी वे कहलाते हैं, जो जटाधारण करके फटे वस्त्र और वृक्ष की छालों को शरीर का आवरण बनाते हुए, आठ मास (मार्गशीर्ष मास से आषाढ़ मास) तक उपार्जित पुष्प-फल आदि (शाक-कन्दमूलादि फल और अन्नों) को ग्रहण करते हुए (उन आठ मासों के अतिरिक्त आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिकी पूर्णिमा के चार महीने-चातुर्मास्य तक भी वही आठ मास में उपार्जित पदार्थ ग्रहण करते हुए) कार्तिकी पूर्णिमा को सभी संचित भक्ष्य पदार्थ त्याग देते हैं अर्थात् कार्तिकी पूर्णिमा के बाद फिर नया उपार्जन करके ही ग्रहण करते हैं। इस तरह वे इन संचित भोज्य पदार्थों में अग्नि संचरण करते हुए पञ्चमहायज्ञों को सम्पन्न करते हुए आत्मा को प्रार्थना (साधना) करते हैं। आश्रम उपनिषदकार ने यह तथ्य इन शब्दों में प्रतिपादित किया है-वालखिल्य जटाधराश्चीरचर्मवल्कल-परिवृताः कार्त्तिक्यां पौर्णमास्यां पुष्पफलमुत्सृजन्तः शेषानष्टौ...प्रार्थयन्ते (आश्रामो० ३)। उल्लेखनीय है कि कुछ ग्रन्थों में वालखिल्य के स्थान पर बालखिल्य और बालिखिल्य पाठ भी मिलते हैं। फेनप वानप्रस्थी के लक्षण यह हैं कि वे विक्षिप्तवत् रहते हुए, शीर्ण पर्ण-फल (अपने आप गिरे हुए पत्ते और फल) ग्रहण कर उनमें अग्नि परिचरण करते हुए, जहाँ कहीं भी स्थान मिल जाये, वहीं निवास करते हुए, नियमित पञ्च महायज्ञादि क्रियाएँ सम्पन्न करते हुए आत्म साधना में निरत रहते हैं- फेनपा उन्मत्तकाः शीर्णपर्णफलभोजिनो यत्र तत्र वसन्तोऽग्निपरिचरणं कृत्वा आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो०३)। इन वानप्रस्थियों का नाम फेनप पड़ने का कारण अड्यार प्रकाशित माइनर उपनिषद् में आश्रमो०की टिप्पणी में लिखा है- फेनपाः स्वयं पतित पर्णफलादिकं फेनो नामेति केचित् अर्थात् कुछ विद्वानों का मानना है कि स्वयं गिरने वाले पत्ते और फलों को फेन कहते हैं। अतः इन्हें ग्रहण करने के कारण इन वानप्रस्थियों का नाम भी फेनप पड़ गया है। श्रीमद्भागवत के ३.१२. ४३ वें श्लोक की व्याख्या में फेनप उन्हें बताया गया है, जो (दूध पीते समय) बछड़े के मुख से गिरने वाले दूध के फेन से जीवनयापन करते हैं-फेनपा ........वत्समुखगलितपयःफेनपानेन जीवन्त इति। २७४. वार्त्ताक वृत्ति — द्र०-गृहस्थ। २७५. वालखिल्य — द्र०-वानप्रस्थ। २७६. वासनात्रय- वासना शब्द का उपयोग सामान्यतः आसक्ति अथवा विषम लिङ्गियों (स्त्री-पुरुषों) में परस्पर काम वासना को प्रगाढ़ता के अर्थ में किया जाता है; किन्तु कोश ग्रन्थों में इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार प्रतिपादित है-वासयति कर्मणा योजयति जीवमनांसीति वस-णिच्-युच्-टाप् (हि० वि० को० खं० २१ पृ० २३०) जिसके अनेक अर्थ है, जैसे-प्रत्याशा, ज्ञान, संस्कार, स्मृति, हेतु, भावना, इच्छा, कामना आदि। किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति अत्यधिक स्नेह या मोह के कारण उससे सम्बन्धित कोई प्रसङ्ग उपस्थित होते ही उसका संस्कार अथवा वासना जाग पड़ती है, जिससे वह तत्सम्बन्धित कार्य करने को समुद्यत हो उठता है। जैसे कोई लेखक या कवि जो नदी, सरोवर, बगीचे आदि के निकट लेख या कविता लिखने का अभ्यासी है। यदि वह कहीं बाहर गया हुआ है और वहाँ भी उसे ऐसा ही वातावरण मिल जाए, तो उसके अन्दर कुछ लिखने के भाव जाग्रत् होने लगते हैं; इसे ही उसका संस्कार या वासना का जागना कहेंगे। वासनाएँ तीन प्रकार को मानी गयी है, जिन्हें उपनिषदों में वासनात्रय के नाम से जाना जाता है। ये हैं-देह सम्बन्धी वासना, मन सम्बन्धी वासना और बुद्धि सम्बन्धी वासना। संन्यासोपनिषद् (२-२०) के वासनात्रय के अन्तर्गत देह वासना, शास्त्र वासना तथा लोक वासना का भी उल्लेख किया गया है। परमहंस परिव्राजकोपनिषद् में मुमुक्षु को निर्देश दिया गया है कि वह सद्गुरु से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर इहलोक और परलोक के सुखों के वास्तविक स्वरूप को समझकर एषणात्रय, वासनात्रय, ममता और अहंकारादि को वमन किए (उल्टी किए) हुए अन्न के समतुल्य समझकर मोक्ष के एक मात्र साधन ब्रह्मचर्याश्रम को पूरा करके गृहस्थ बने, तदुपरान्त वानप्रस्थी और इसके पश्चात् संन्यास आश्रम ग्रहण कर प्रव्रज्या करे-सद्गुरु समीपे ....... ज्ञात्वैषणात्रय वासनात्रय ममत्वाहंकारादिकं वमनान्नमिव ......प्रव्रजेत् (परम० प० २)। इस मंत्र को टीका में ब्रह्मयोगी ने वासनात्रय को देहादि वासनात्रय कहकर वासना के तीनों रूपों की ओर संकेत किया है- न कदापि संसारमण्डले ..........देहादि वासनात्रय .... ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। इस प्रकार क्रमशः ब्रह्मचर्याश्रम से गृहस्थ, गृहस्थ से वानप्रस्थ और इसके पश्चात् संन्यास धारण करने के अतिरिक्त एक पथ और है कि जब कभी भी पूर्ण वैराग्य उत्पन्न हो जाये (वासनात्रय, एषणात्रय, आदि दोषों से मुक्त हो जाये), तभी प्रव्रज्या आश्रम अर्थात् संन्यास आश्रम ग्रहण किया जा सकता है। इस स्थिति में संन्यास ग्रहण करने के लिए क्रमशः आश्रम ग्रहण करना, व्रती (व्रतधारण करने वाला), पुनर्ब्रती, स्नातक, अस्नातक, अग्निहोत्री अथवा उससे रहित होना आवश्यक नहीं है।