भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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पूर्ण तत्त्व बनते हैं। जाबाल दर्शनोपनिषद् में शरीर स्थित अङ्ग विशेषों में तत्त्वों की प्रधानता के सन्दर्भ में इस प्रकार उल्लेख है- देहमध्यगते व्योम्नि बाह्याकाशं तु धारयेत्। प्राणे बाह्यानिलं तद्वज्ज्वलने चाग्निमौदरे। आकाशांशस्तथा प्राज्ञः मूर्धांशः परिकीर्तितः (जा०दर्शनो० ८.१-५) अर्थात् तत्त्वाधिक्य की दृष्टि से पाँव से घुटने तक का भाग (पृथिवी तत्त्व के आधिक्य के कारण) पृथिवी तत्त्व का भाग कहलाता है, घुटने से गुदा तक जलीय अंश, गुदा से हृदय तक का अग्न्यंश, हृदय से भौहों तक वाय्वंश तथा मस्तक क्षेत्र आकाशांश कहा गया है। इन तत्त्वों में देवों के ध्यान के सन्दर्भ में वर्णन है कि पृथिवी तत्त्वांश में ब्रह्मा का, जलतत्त्वांश में विष्णु का, अग्नितत्त्वांश में महेश का, वायुतत्त्वांश में ईश्वर का तथा आकाश तत्त्वांश में सदाशिव का ध्यान करना चाहिए-ब्रह्माणं पृथिवीभागे विष्णुं तोयांशके तथा। अग्न्यंशे च महेशानमीश्वरं चानिलांशके। आकाशांशे महाप्राज्ञ धारयेत्तु सदाशिवम् (जा०दर्शनो० ८.५-६)। १६३. पञ्चमहायज्ञ - द्र०-वानप्रस्थ । १६४. पञ्चमात्रा - द्र०-अवधूत। १६५. परब्रह्म - द्र०- ज्ञानखण्ड -ब्रह्म । १६६. परमगति - द्र०-ज्ञानखण्ड । १६७. परमज्योति - द्र०-चिद्घन । १६८. परम तत्त्व- द्र०चिद्घन । १६९. परम पद - द्र०-ज्ञानखण्ड । १७०. परमपुरुष-द्र०-चिद्घन। १७१. परम व्योम- वेद, उपनिषद् आदि आर्ष ग्रन्थों में परमव्योम शब्द का उल्लेख हुआ है। व्योम शब्द सामान्यतः अन्तरिक्ष या आकाश के लिए प्रयुक्त होता है; किन्तु इसमें परम विशेषण जोड़ देने से इसका अर्थ पराचेतना हो जाता है, जो सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति का मूल कारण है। ऋग्वेद १.१६४.३९ में वेदों की ऋचाओं के परमव्योम में स्थित होने का वर्णन है- ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः अर्थात् अविनाशी ऋचाएँ परमव्योम में विद्यमान हैं, जहाँ सम्पूर्ण देव शक्तियों का वास है। कहा जाता है कि प्रलय हो जाने पर भी यह दिव्य ज्ञान तथा सृष्टि के तत्त्व कभी नष्ट नहीं होते; वरन् अपनी परम चेतना, पराचेतना या परमव्योम में समाहित हो जाते हैं और जब पुनः सृष्टि का आविर्भाव होता है, तब प्रकट होते हैं। यों तो यह बात कल्पित जैसी लगती है; किन्तु इसकी यथार्थता को कम्प्यूटर तन्त्र के मास्टर कम्प्यूटर के उदाहरण से स्पष्टतया समझा जा सकता है- जिस प्रकार मास्टर कम्प्यूटर के साथ माइक्रोवेव टावर्स द्वारा विभिन्न कम्प्यूटर जुड़े रहते हैं। देश के किसी भी कम्प्यूटराइज्ड रेलवे स्टेशन से कहीं के भी रेलवे का टिकट बुक कराने से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय आँकड़ों को जानने तक में कम्प्यूटर की इस प्रणाली का उपयोग किया जाता है, किन्तु यदि किसी कम्प्यूटर में गड़बड़ी हो जाये, तो उसके पर्दे पर आँकड़े न आने पर भी वे पूर्णतः नष्ट नहीं होते, वरन् अपने मास्टर कम्प्यूटर में समा जाते हैं। जब मशीनरी ठीक हो जाती है, तो वे आँकड़े पुनः उस कम्प्यूटर पर भी आने लगते हैं, जो कुछ समय पहले खराब हो गया था। ठीक इसी तरह पराचेतना-परमव्योम में सम्पूर्ण ज्ञान व सृष्टि के सभी तत्त्व अवस्थित रहते हैं। पृथिवी आदि किसी एक केन्द्र (ग्रह) के नष्ट हो जाने पर भी वे नष्ट नहीं होते तथा परम व्योम में समाहित हो जाते हैं और नये सिरे से पुनः प्रकट होते हैं। ऋग्वेद में वाणीरूपी गौ के सहस्राक्षरों से युक्त होकर परम व्योम में संख्यात होने को बात इस मंत्र में द्रष्टव्य है- गौरीर्भिमाय ...सहस्राक्षरा परमे व्योम (ऋ० १.१६४. ४१)। एकाक्षरोपनिषद् में भी उस अक्षर ब्रह्म को संसार का आदि कारण, समस्त प्राणियों का स्वामी, पुराण पुरुष तथा समस्त भुवनों का रक्षक कहकर उस पराचेतना का ही संकेत दिया गया है- एकाक्षरंत्वक्षरेऽत्रास्ति ...भुवनस्य गोप्ता (एकाक्षरो० १)। उस एकाक्षर ब्रह्म को हिरण्यगर्भ स्वरूप कहकर प्राणियों के हृदय व्योम (हृदयाकाश) में प्रकाशित होने वाला विवेचित किया गया है- वितत्य बाणं तरुणार्कवर्णं व्योमान्तरे भासि हिरण्यगर्भः ...... अरिष्टनेमिः (एकाक्षरो०४) । ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में उस विराट् ब्रह्म को त्रिपादूर्ध्व कहकर यह बताया गया है कि उसके एक चरण में ये समस्त प्राणी हैं तथा तीन चरण अनन्त दिव्य लोक (परम व्योम) में स्थित हैं- ... पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि (ऋ० १०.९०.३) त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ....अभि (ऋ० १०.९०.४) । अध्यात्मोपनिषद् में उल्लेख है कि जिस प्रकार घटाकाश (शरीर स्थित आकाश), महाकाश (परमव्योम) में स्थित है, उसी प्रकार परमात्मा में आत्मा को एकरूप करके योगी को