१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ३७५ पुर्यष्टक सतत शान्त रहना चाहिए-घटाकाशं महाकाश इवात्मानं परमात्मनि .........तूष्णीं भव सदा मुने (अध्यात्मो० ७)। १७२. परमसिद्धान्तश्रवण - द्र०-निदिध्यासन। १७३. परमहंस - द्र०-अवधूत। १७४. परमात्मभाव - द्र०- अद्वयानन्द । १७५. परमानन्द - द्र०-अद्वयानन्द । १७६. परलोक - द्र०-ज्ञानखण्ड - परलोक, समलोक । १७७. परात्पर-द्र०-चिद्घन । १७८. परिव्राजक - द्र०-ज्ञानखण्ड-परिव्रज्या, परिव्राजक । १७९. पश्चिमलिङ्ग- भारतीय संस्कृति में चार आश्रम माने गये हैं, जो जीवन को चार भागों में विभाजित करते हैं। जीवन के प्रथम चरण का आश्रम ब्रह्मचर्य, द्वितीय चरण का गृहस्थ, तृतीय चरण का वानप्रस्थ और चतुर्थ चरण का आश्रम संन्यास कहलाता है। संन्यास आश्रम में रहने वाले व्यक्ति को परिव्राजक भी कहते हैं। इनका प्रमुख कार्य अपने को पूर्णरूपेण परिष्कृत करके सतत लोकोपयोगी कार्यों में अपने को निरत रखकर परिव्रज्या करना होता है। संन्यासियों के कुछ चिह्न भी होते हैं, जैसे- शिक्य, कमण्डलु, दण्ड आदि। इन चिह्नों को धारण करने वाले संन्यासी (परिव्राजक) व्यक्त विष्णुलिङ्ग कहलाते हैं। उल्लेखनीय है कि परिव्राजकों (संन्यासियो) को विष्णुरूप मानने के कारण उन्हें विष्णुलिङ्ग कहते हैं। इनमें कुछ पूर्व लिङ्ग तथा कुछ पश्चिम लिङ्ग परिव्राजक कहलाते हैं-परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः (निर्वाणो० ३)। पूर्वेोलिङ्ग (व्यक्त विष्णु लिङ्ग) परिव्राजक होते हैं, जो संन्यास के गुणों, दया, क्षमा, करुणा, निरहंकारिता, निर्विकारिता आदि गुणों को धारण करके संन्यासी के बाह्य लिङ्ग (चिह्न) शिक्य, कमण्डलु, दण्ड आदि भी धारण करते हैं। पश्चिम लिङ्ग अथवा (अव्यक्त विष्णुलिङ्ग) परिव्राजक (संन्यासी) उन्हें कहते हैं, जो बाह्य चिह्न धारण न करके भी अन्तःकरण में संन्यासियों के समस्त गुण धारण किये रहते हैं। इन्हें ही अव्यक्त विष्णु लिङ्ग परिव्राजक भी कहते हैं। अड्यार से प्रकाशित निर्वाणोपनिषद् की टीका में ब्रह्मयोगी ने लिखा है-पश्चिममन्तः संन्यासलक्षणमव्यक्तविष्णुलिङ्गिनश्चेति ....स्वबाह्यान्तर्विलसितविक्षेपग्रासव्याक्ताव्यक्तविष्णुलिङ्गधारिण इत्यर्थः (निर्वाणो० १.५८ टीका)। १८०. पाप-पुण्य - द्र०-ज्ञानखण्ड - पाप-पुण्य । १८१. पिङ्गला - द्र०-ज्ञानखण्ड - सुषुम्ना नाड़ी। १८२. पितर - द्र०-ज्ञानखण्ड । १८३. पुनर्जन्म-द्र०-ज्ञानखण्ड । १८४. पुराण-पुरुष- द्र०-चिद्घन। १८५. पुर्यष्टक - यह शरीर विभिन्न तत्त्वों से निर्मित है। प्रत्यक्षतः यह स्थूल शरीर ही दिखाई देता है। यह भी पृथिवी, जल, वायु, अग्नि और आकाश तत्त्वों के सम्मिलन से निर्मित है। इसके अतिरिक्त इसी के अन्दर दो अदृश्य शरीर और हैं, जिन्हें सूक्ष्म व कारण शरीर कहा जाता है। इन दोनों शरीरों की रचना में पृथिवी आदि स्थूल पञ्चतत्त्व न होकर इनके सूक्ष्म तत्त्व रहते हैं। वेदान्त में सूक्ष्म शरीर को लिङ्ग शरीर भी कहते हैं। इसे देखा या स्पर्श नहीं किया जा सकता; वरन् अनुमान किया जा सकता है। सुख-दुःखादि की अनुभूति सूक्ष्म शरीर द्वारा ही होती है। लिङ्ग शरीर का अर्थ करते हुए स्वामी रामतीर्थ ने लिखा है- लिङ्ग्यते ज्ञाप्यते प्रत्यगात्मसद्भाव एभिरिति लिङ्गानि, तानि च तानि शरीराणि च .... लिङ्गशरीराणि . (वे०सा० टीका खं० १३) अर्थात् जिसके माध्यम से प्रत्यगात्मा के सद्भाव का ज्ञान होता है, वह लिङ्ग शरीर है। स्थूल शरीर के अन्त हो जाने पर, यह सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) ही निकलकर अन्य स्थूल शरीर में प्रविष्ट होकर, नूतन जन्म धारण करता है। वेदान्त में सूक्ष्म शरीर के सत्रह तत्त्व (अंग) माने गये हैं। ये तत्त्व पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, पञ्च वायु (प्राण), मन और बुद्धि हैं। शारीरकोपनिषद् में सूक्ष्म शरोर के अंग इन शब्दों में वर्णित हैं- 'बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभिः सुसूक्ष्मं लिङ्गमुच्यते (शारीरको० ५)। ब्राह्मणग्रंथों में सूक्ष्म शरीर या लिंग शरीर के सत्रह अंगों की गणना एक अन्य प्रकार से भी की गई है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पाँच सूक्ष्मभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, एक अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) और पंच वृत्तियों (प्राण,