१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपौर्णमास्य यज्ञ ३७६ परिशिष्ट
अपान, उदान, व्यान और समान) वाला एक प्राण ये सूक्ष्म शरीर के सत्रह अवयव हैं। सूक्ष्म शरीर या लिङ्ग शरीर के इन सत्रह अवयवों को आठ अंगों में भी समाहित किया जाता है, इसीलिए इसे पुर्यष्टक भी कहते हैं। पुर्यष्टक का शाब्दिक अर्थ आठ पुरियों का समूह है। आठ अंगों को सम्भवतः आलंकारिक रूप से आठ पुरियाँ कहा गया होगा, इसलिए इसे पुर्यष्टक नाम दिया गया। पुर्यष्टक (सूक्ष्म शरीर या लिङ्ग शरीर) के आठ अंग इस प्रकार वर्णित हैं-ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च। मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेति चतुष्टयम्॥ प्राणोऽपानस्तथा ........अविद्याकामकर्माणि लिङ्गं पुर्यष्टकं विदुः (पंच०) अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय पञ्चक, कर्मेन्द्रिय पञ्चक, प्राण पञ्चक, सूक्ष्म पञ्चभूत, अन्तःकरण चतुष्टय इन सभी को एक-एक इकाई मानकर कुल पाँच हुए। इसके अतिरिक्त काम, कर्म और अविद्या ये तीन मिलकर कुल आठ होते हैं। इन्हीं आठ अवयवों से मिलकर बने सूक्ष्म शरीर को पुर्यष्टक कहते हैं। पैङ्गलोपनिषद् में पुर्यष्टक इन शब्दों में विवेचित है-अथ ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं कर्मेन्द्रियपञ्चकं प्राणादिपञ्चकं वियदादिपञ्चकमन्तःकरणं चतुष्टयं कामकर्मतमांस्यष्टपुरम् (पैङ्गलो० २.५)। १८६. पौर्णमास्य यज्ञ - द्र०-दर्शयज्ञ। १८७ प्रज्ञा - द्र०-ज्ञानखण्ड-प्रज्ञा-प्रज्ञान। १८८. प्रज्ञात्मा - उपनिषदों में कई स्थलों पर 'प्रज्ञा' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका सामान्य अर्थ प्रकृष्ट ज्ञान या श्रेष्ठ बुद्धि है। विवेकवान्, विद्वान् या चैतन्य पुरुष को प्रज्ञावान् अथवा प्रज्ञान कहते हैं। इस प्रकार जिसके द्वारा बौद्धिक वृत्तियों, ज्ञातव्य विषयों तथा कामनाओं को ग्रहण किया जाता है, उसी का नाम प्रज्ञा है-केन धियो विज्ञातव्यं कामानिति। प्रज्ञयेति प्रब्रूयात् (कौ०ब्रा०उ० १.६)। प्रज्ञा+आत्मा दो शब्दों से मिलकर प्रज्ञात्मा शब्द विनिर्मित हुआ है। सामान्यतः इसका अर्थ प्रकृष्ट ज्ञान सम्पन्न अथवा विवेकवान् व्यक्ति हुआ; किन्तु कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् के तृतीय अध्याय में इसे एक विशेष अर्थ में लिया गया है, वहाँ प्रज्ञा को ही प्राण और प्राण को ही प्रज्ञा कहा गया है; क्योंकि दोनों एक ही साथ रहते व एक साथ ही शरीर से उत्क्रमण करते हैं-यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः स ह ह्येतावस्मिन् शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः (कौ०ब्रा०उ० ३.४)। इन्द्र-प्रतर्दन वार्तालाप में इन्द्र ने अपने को प्राणस्वरूप, आयुस्वरूप और अमृत स्वरूप बताते हुए, इसी रूप में उन्हें जानने के लिए कहते हुए, अपने को प्राण और प्रज्ञारूप आत्मा (प्रज्ञात्मा) कहा है- स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञाऽऽत्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्स्वायुः प्राणः प्राणो वा आयुः प्राण एवामृतम् ......ऽमृतत्वमाप्नोति (कौ०ब्रा०उ० ३.२) अर्थात् प्राण ही आयु है; क्योंकि जब तक प्राण रहता है, तभी तक आयु रहती है। शरीर से प्राण निकल जाने पर आयु भी समाप्त हो जाती है। प्राण ही अमृत है; क्योंकि शरीर के मृत हो जाने पर भी प्राण मृत नहीं होता। इसी प्रकार प्राण को ही प्रज्ञा (प्रकृष्ट ज्ञान) भी कहा गया है; क्योंकि समस्त इन्द्रियाँ अपने विषयों को प्राण अथवा प्रज्ञा के द्वारा ही ग्रहण करती हैं। समस्त इन्द्रियाँ रहते हुए भी यदि शरीर में प्राण नहीं है अथवा मरणासन्न स्थिति में अल्प मात्रा में ही प्राण शेष रह गया है, तो न आँखें देख सकती हैं (अर्थात् अपने प्रियजन को भी पहचानने में समर्थ नहीं हो सकतीं), न कान शब्द सुनते हैं, न मुख (वाणी) से शब्द निकलते हैं, न घ्राणेन्द्रिय गन्ध ले सकती है, न त्वचा को स्पर्शज्ञान होता है, न हाथ-पैर चलते हैं, न उपस्थ और गुदा ही अपना कार्य समुचित रूप से कर पाते हैं तथा मन भी सोच-विचार नहीं कर पाता। दूसरे शब्दों में क्रिया शक्ति का बोधक प्राण (प्रज्ञा) ही है, जो ज्ञान में प्रवृत्त करने वाला प्रज्ञा से युक्त आत्मा अर्थात् प्रज्ञात्मा है। यही शरीर को सभी ओर से आबद्ध करके विभिन्न क्रियाएँ कराता रहता है। जिस प्रकार रथ को नेमि अरों से तथा अरे उसकी नाभि से जुड़े होते हैं, उसी प्रकार समस्त भूत मात्राएँ (पंचभूत या तन्मात्राएँ) प्रज्ञामात्राओं (इन्द्रियों में विद्यमान प्रज्ञा के अंश) में अर्पित हैं तथा प्रज्ञामात्राएँ मुख्य प्राण (उक्थ) में अर्पित हैं। यह प्राण-प्रज्ञात्मा ही अजर-अमर और आनन्द स्वरूप है-तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पितो नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः। स एष प्राण एव प्रज्ञाऽऽत्माऽऽनन्दोऽजरोऽमृतः .......स म आत्मेति विद्यात् (कौ० ब्रा०उ० ३.९)। १८९. प्रज्ञान - द्र०-ज्ञानखण्ड-प्रज्ञा-प्रज्ञान। १९०. प्रणव - द्र०-प्रणव सन्धान। १९१ प्रणव सन्धान - योग शास्त्रों में विभिन्न प्रकार की साधनाओं का वर्णन है। ब्रह्म प्राप्ति या ब्रह्म सान्निध्य हेतु अनेक प्रकार को नाद साधनाएँ भी बतायी गई हैं। नादबिन्दूपनिषद् में उल्लेख है कि तत्त्वज्ञान हो जाने पर जब प्रारब्ध कर्म क्षीण