भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३७७ प्रजापत्य इष्टि

हो जाते हैं, तब ॐ कार स्वरूप परब्रह्म के साथ अपनी आत्मा के एकत्व का चिन्तन (ध्यान) करने से नादरूपी स्व प्रकाशित शिव (कल्याणकारी तत्त्व) का प्रादुर्भाव उसी प्रकार हो जाता है, जिस प्रकार मेघाच्छादन हट जाने से स्वयं सूर्य भगवान् प्रकाशित हो जाने हैं- ब्रह्मप्रणवसंधानं नादो ज्योतिर्मयः शिवः । स्वयमाविर्भवेदात्मा मेघापायेंऽशुमानिव (नादबिन्दु० ३०) अर्थात् प्रणव ही ब्रह्मरूप है और वही नादरूप ब्रह्म है, उसे ही ॐ कार कहते हैं। इस ॐ कार की नाद साधना को ही प्रणव सन्धान कहते हैं। नादबिन्दूपनिषद् में ही प्रणव सन्धान प्रक्रिया का उल्लेख इस प्रकार है कि साधक को सिद्धासन में बैठकर वैष्णवी मुद्रा धारण करके दाहिने कान के अर्न्तगत उठती अनाहत ध्वनि (नाद) का निरन्तर श्रवण करना चाहिए। १९२. प्रतिष्ठा— द्र०-ज्ञानखण्ड । १९३. प्रत्यगात्मा— द्र०-ज्ञानखण्ड । १९४. प्रत्याहार— द्र०-ज्ञानखण्ड । १९५. प्रपञ्च— आध्यात्मिक सन्दर्भों में 'प्रपञ्च' शब्द का उपयोग बहुत होता है, जिसे भवसागर या संसार के अर्थ से लिया जाता है। कोशग्रन्थों में प्रपञ्च शब्द की रचना इस प्रकार वर्णित है- प्रपञ्च्यते इति प्र-पचि व्यक्तीकरणे घञ् (हिन्दी विश्व कोष)। इसके कई अर्थ हैं १. विस्तार, फैलाव। २. उलट-पलट, इधर का उधर। ३. पञ्चतत्त्वों का उत्तरोत्तर अनेक भेदों में विस्तार। ४. संसार, भवजाल। ५. सांसारिक व्यवहारों का विस्तार, दुनिया का जंजाल आदि। इनमें से तृतीय क्रमांक वाले अर्थ में ही इसका सर्वाधिक उपयोग किया जाता है। सम्भवतः जगत् का निर्माण- विस्तार वेदान्तवर्णित पञ्चीकरण (पंचभूतों के पञ्चीकृत विभाजन) प्रक्रिया द्वारा होने से इसे प्रपञ्च कहा जाने लगा होगा। उपनिषद् ग्रन्थों में 'प्रपञ्च' शब्द का उपयोग भवसागर, माया आदि के रूप में हुआ है। आत्मबोधोपनिषद् में आत्मबोध प्राप्त साधक का कथन है कि आत्मबोध हो जाने पर यह प्रपञ्च (जगत् या माया) मुझे सत्य (ब्रह्मरूप) ही लगता है। मिथ्या होने पर ही बन्ध-मोक्षादि व्यवहार सत्य जान पड़ते हैं। जिस प्रकार सर्पादि से रज्जु (रस्सी) का अस्तित्व है, उसी प्रकार प्रपञ्च आदि से केवल ब्रह्म सत्ता ही आधारभूत होकर वर्तती है-विवेके युक्ति बुद्ध्याऽहं ......प्रतीयते। निवृत्तोऽपि प्रपञ्चो मे .....ब्रह्मसत्तैव केवलम् (आत्मबोधो० २.११-१२)। महोपनिषद में इस जगत् रूप प्रपञ्च को अस्थिर और क्षणिक बताते हुए ऋषिपुत्र निदाघ ने अपने पिता से इस संसार से विरक्त होने की अपनी इच्छा प्रकट की है- जायते मृतये लोको ध्रियते जननाय च। अस्थिराः सर्व एवेमे सचराचर चेष्टिताः । ....आयुः पल्लवकोणाग्रलम्बाम्बुकणभङ्गुरम्। उन्मत्त इव संत्यज्य यात्यकाण्डे शरीरकम् (महो० ३.४,९)। १९६. प्रमेय-अप्रमेय— प्रमेय शब्द की संरचना से हो स्पष्ट है कि जो वस्तु या पदार्थ प्रमा योग्य अर्थात् अपना वास्तविक ज्ञान कराने के योग्य अथवा प्रमाणों द्वारा सिद्ध किये जाने योग्य है, उसे प्रमेय कहते हैं अथवा दूसरे शब्दों में जगत् का प्रत्येक पदार्थ जो प्रत्यक्ष, शब्द या अनुमान प्रमाण से सिद्ध किया जा सकता है, उसे प्रमेय कहेंगे। जैसे अग्नि में से धूम्र निकलता प्रत्यक्ष दिखाई दे, तो यह प्रत्यक्ष प्रमाणित हो गया कि वह धूम्र अग्नि से ही निकल रहा है। इसी प्रकार यदि कहीं केवल धूम्र निकलता दिखाई दे, तो अनुमान द्वारा यह प्रमाणित हो जाता है कि वहाँ अग्नि सुनिश्चित रूप से होगी ही। अनुमान प्रमाण का 'यत्र-यत्र धूमः तत्र-तत्र वह्निः' का सिद्धान्त सर्वविदित है। इस जगत् के कारण रूप परब्रह्म को प्रमाणों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रमाणित करना बुद्धिगम्य है और परब्रह्म बुद्धि से परे है, इसलिए उसका एक विशेषण अप्रमेय है। वेद, शास्त्र, उपनिषदों आदि में ईश्वर अथवा ब्रह्म की जो व्याख्याएँ की गई हैं, वे उसके स्वरूप के बहुत निकट तो हैं, किन्तु पूर्ण नहीं; क्योंकि इन आर्षग्रन्थों में भी अन्ततः नेति-नेति (इतना ही नहीं, इतना ही नहीं) लिखा है। इस प्रकार परब्रह्म का अप्रमेय नाम सार्थक ही है। मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् में परब्रह्म को सर्वेश, अप्रमेय, अज, शिव, परमाकाश, निराश्रय, अद्वैत, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र आदि का लक्षण स्वरूप और सबका कारण कहा गया है— .......तदनु सर्वेशमप्रमेयमजं शिवं परमाकाशं निरालम्बमद्वयं ब्रह्मविष्णुरुद्रादीनामेकलक्ष्यं सर्वकारणं परं ब्रह्मात्मन्येव .........प्राप्नोति (मं० ब्रा०उ० ३.१.३)। १९७. प्रव्रज्या— द्र०-अवधूत। १९८. प्रजापत्य— द्र०-ब्रह्मचारी। १९९. प्रजापत्य इष्टि— द्र०-आग्नेयी इष्टि।

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