भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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प्रजापत्य यज्ञ ३७८ परिशिष्ट २००. प्रजापत्य यज्ञ - द्र०-आग्नेयी इष्टि। २०१. प्राज्ञ- द्र०-ज्ञानखण्ड । २०२. प्राण - द्र०-ज्ञानखण्ड-प्राण-सञ्चय । २०३. प्राणहंस - प्रणवहंस (मुख्यप्राण) - आर्षग्रन्थों में जीवात्मा के लिए अनेक स्थलों पर 'हंस' शब्द का प्रयोग हुआ है-प्राणिनां देहमध्ये तु स्थितो हंसः सदाऽच्युतः। हंस एव परं सत्यं हंस एव तु सत्यकम् (ब्रह्मविद्यो० ६०); पर कुछ स्थलों पर प्रणव हंस अथवा प्राण हंस का उल्लेख मुख्य प्राण के लिए भी मिलता है। मुख्य प्राण के विषय में कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में उल्लेख है कि प्राणी के अन्दर निवास करने वाले मुख्य प्राण से ही उसकी इन्द्रियों में निवास करने वाले अन्य समस्त प्राण सम्बद्ध हैं। इसीलिए व्यक्ति एक ही समय में बोल, देख, सुन और सूँघ नहीं सकता; क्योंकि जिस समय वह बोलता है, उस समय मुख्य प्राण तो वाणी में सक्रिय रहता ही है; साथ ही अन्य इन्द्रियों के प्राण भी उसी के सहयोग में लग जाते हैं। इसीलिए किसी वस्तु को ध्यान से देखते समय वह कुछ बोल, सुन या सूँघ नहीं सकता; क्योंकि समस्त प्राणों की शक्ति देखने में ही लग जाती है-तद्वैक आहुरेकभूयं वै प्राणा गच्छन्तीति न हि कश्चन शक्नुयात् सकृद्वाचा नाम प्रज्ञापयितुं चक्षुषा रूपं श्रोत्रेण शब्दं मनसा ध्यातमित्येकभूयं वै प्राणा एकैकं सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञापयन्ति (कौ० ब्रा० उ० ३.२) चूँकि जीवात्मा को हंस कहा जाता है और वह जीवात्मा वस्तुतः मुख्य प्राण ही है, अतः मुख्य प्राण को भी प्राण हंस कहते हैं। इसी प्रकार प्रणव अर्थात् ॐ (अ, उ और म्) का उच्चारण भी मुख्य प्राण की स्वसंचालित प्रक्रिया (श्वास-प्रश्वास) द्वारा होता रहता है। यह अजपा जप सोऽहं अर्थात् हंस (अहं सः) ही कहलाता है। इसीलिए मुख्य प्राण को प्रणव हंस भी कहते हैं। हंस और प्रणव में अभेद है; क्योंकि ॐ और सोऽहं मंत्र का अजपाजप एक साथ चलता रहता है, इसीलिए पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् में इन दोनों का अभेद वर्णित है-हंस प्रणवयोरभेदः (पाशुपत० पूर्व १९)। प्रणव हंस को ब्रह्म सूत्र अथवा यज्ञ सूत्र भी कहा गया है; क्योंकि प्रणव ॐ ही ब्रह्मप्राप्ति का उपाय अथवा स्वयं ब्रह्म है- प्रणवं ब्रह्मसूत्रं ब्रह्म यज्ञमयम्। प्रणवान्तवर्ती हंसो ब्रह्मसूत्रम् (पाशुपत० पूर्व १७)। परब्रह्मोपनिषद् में परब्रह्म की स्थिति निरूपित करते हुए उपनिषद्कार ने उसे सदैव प्रसन्नता देने वाला, असङ्ग, चिद्रूप, पुरुष और प्रणवहंस (परब्रह्म) बताया गया है। यहाँ प्रणव हंस प्राणहंस (मुख्य प्राण) के रूप में विवक्षित नहीं है; वरन् परब्रह्म के रूप में विवक्षित है। इसका स्पष्टीकरण देते हुए ब्रह्मयोगी ने लिखा है-संप्रसादः अन्तर्याम्यसङ्गचिद्रूपः पुरुषः स एव प्रणवार्थ तुर्य-तुर्य हंसः परं ब्रह्मेत्युच्यते। अत्र न प्राणहंसो मुख्यः प्राणो विवक्षितः परब्रह्मप्रकरणत्वात् (परब्रह्मो० २ टीका)। २०४. प्राणायाम - योग शास्त्रों में प्राणायाम की महिमा सर्वत्र गायी गयी है। कोशग्रन्थों में प्राणायाम शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार विवेचित है- प्राणस्य वायुविशेषस्य आयामः रोधः यद्वा प्राण आयम्यन्तेऽनेनेति- अर्थात् प्राण वायु का गति- विच्छेद कारक व्यापार भेद। अष्टाङ्गयोग में यम, नियम, आसन के उपरान्त प्राणायाम का क्रम आता है। चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग कहा गया है-'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' । चित्तवृत्तियों अथवा मन की एकाग्रता में प्राणायाम बहुत सहायक सिद्ध होता है। योग सूत्र के अनुसार वायु प्रच्छर्दन करके अर्थात् प्राणवायु आकर्षण सहित त्याग करके विधारण करना (अर्थात् खींची हुई वायु को शास्त्रोक्त विधान के अनुसार धारण करना) प्राणायाम कहलाता है-प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य (पातं० योग० सू०स०पा०-३४)। पातञ्जल योग में प्राणायाम की परिभाषा इन शब्दों में उल्लिखित है- तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः। अर्थात् आसन के स्थिर होने के पश्चात् श्वास-प्रश्वास की गति रोकने को प्राणायाम कहते हैं। अधिक स्पष्ट शब्दों में इसका अभिप्राय यह है कि श्वास-प्रश्वास की गतियों के प्रवाह को रेचक, पूरक और कुम्भक के माध्यम से बाहर और भीतर दोनों स्थानों में रोकना (विराम देना) ही प्राणायाम है। श्वास के भीतर जाने को श्वास (पूरक), बाहर निकलने को प्रश्वास (रेचक) तथा अन्दर और बाहर रुकने को विराम (कुम्भक) कहते हैं। प्राण के पाँच भेद हैं, इन्हें प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान कहते हैं। प्राणायाम प्रक्रिया में प्राण और अपान का मिलन होता है। इसीलिए योगाचार्यों ने प्राण और अपान का मिलन ही प्राणायाम का लक्षण बताया है। इस सन्दर्भ में योगी याज्ञवल्क्य नामक ग्रन्थ में उल्लेख है- प्राणापानसमायोगः प्राणायाम इतीरितः। प्राणायाम इति प्रोक्तो रेचकपूरककुम्भकैः (योगियाज्ञ० ६.२)। उपनिषदों में भी प्राणायाम का महत्त्व विवेचित है। अमृतनादोपनिषद् में प्राणायाम को समस्त इन्द्रियों के दोष उसी तरह दूर करने वाला बताया गया है, जिस प्रकार स्वर्ण को तपाने से उसके समस्त दोष दूर हो जाते हैं-यथा