१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ३७१ लोम-विलोम
पर्वतधातूनां दह्यन्ते धमनान्मलाः । तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते प्राणधारणात् (अमृतनादो० ७)। इसी उपनिषद् के ग्यारहवें मंत्र में प्राणायाम की परिभाषा इन शब्दों में निर्दिष्ट है- सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह। त्रिः पठेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते अर्थात् ॐ कार और व्याहृतियों सहित गायत्री मंत्र का तीन बार पाठ करते हुए पूरक-कुम्भक और रेचक प्रक्रिया करने को (एक) प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम को प्रणव ही माना गया है; क्योंकि प्रणव (ॐ या ॐ कार) में तीन अक्षर अ,उ और म् हैं तथा रेचक, पूरक और कुम्भक में भी तीन-तीन वर्ण ही हैं। अतः यह प्रत्यक्ष प्रणव उपासना ही है-वर्णत्रयात्मकाः प्रोक्ता रेचक पूरक कुम्भकाः। स एष प्रणवः प्रोक्तः प्राणायामश्च तन्मयः (जा०दर्शनो० ६.२)। यों तो पूरक-कुम्भक और रेचक एक ही प्राणायाम की प्रक्रियाएँ हैं; किन्तु कुछ योग शास्त्रों व उपनिषदों में रेचक, पूरक और कुम्भक को प्राणायाम के ही प्रकार माने गये हैं। अमृतनादोपनिषद् (१२) में रेचक प्राणायाम का स्वरूप इस तरह बताया है-उत्क्षिप्य वायुमाकाशे शून्यं कृत्वा निरात्मकम्। शून्यभावे नियुञ्जीयाद्रेचकस्येति लक्षणम् अर्थात् जिस प्राणायाम में प्राणवायु को आकाश में निकालकर हृदय को वायु से रहित और मन को चिन्तन शून्य कर दिया जाता है, वह रेचक प्राणायाम है। इसी प्रकार पूरक प्राणायाम का स्वरूप इस तरह बताया है-वक्त्रेणोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः। एवं वायुर्ग्रहीतव्यः पूरकस्येति लक्षणम् (अमृतनादो० १३)। इसका अभिप्राय है कि जिस प्रकार मुख से कमल नाल द्वारा जल को खींचते हैं, उसी प्रकार धीरे-धीरे वायु को अपने अन्दर खींचना पूरक प्राणायाम है। इसी उपनिषद् में कुम्भक प्राणायाम का लक्षण इस प्रकार उल्लिखित है-नोच्छ्वसेन्न च निःश्वसेनेव गात्राणि चालयेत्। एवं भावं नियुञ्जीयात् कुम्भकस्येति लक्षणम् अर्थात् कुम्भक प्राणायाम में न तो श्वास खींचते हैं और न ही निकालते हैं; वरन् शरीर को निश्चल करके स्थिर रखकर प्राणवायु को (अन्दर या बाहर) रोके रखते हैं। कुम्भक प्राणायाम आठ प्रकार के होते हैं-सहितः सूर्यभेदश्च उज्जायी शीतली तथा। भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा केवली चाष्टकुम्भकाः (गोरक्ष सं० १९५, घेर० सं०) अर्थात् क्रिया भेद से कुम्भक प्राणायाम के आठ प्रकार-सहित, सूर्यभेदी, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और केवली हैं। कुछ विद्वानों ने सहितकुम्भक और केवली कुम्भक के स्थान पर सीत्कारी (शीतकारी) और प्लावनी कुम्भक नामक प्राणायाम का उल्लेख किया है। वैसे तो ९६ प्रकार के प्राणायाम होते हैं; पर इन सबका सविस्तार वर्णन यहाँ सम्भव नहीं है; वर्तमान समयानुरूप सरल और उपयोगी कुछ प्राणायामों का संक्षिप्त वर्णन करना यहाँ उचित प्रतीत होता है। ये प्राणायाम हैं- अ. प्राणाकर्षण प्राणायाम - जिन्होंने कभी प्राणायाम की किसी विधि का अभ्यास नहीं किया, उनके लिए सर्वप्रथम प्राणाकर्षण प्राणायाम का अभ्यास करना आवश्यक है। यह अन्य साधनाओं से पूर्व उसी प्रकार उपयोगी है, जिस प्रकार बीज बोने से पूर्व भूमि की कई बार जोतकर पौधों की जड़ें सुगमता से भूमि के अन्दर जाने योग्य बनाया जाता है। इससे नस-नाड़ियाँ सशक्त बनतीं और शरीर इस योग्य हो जाता है कि अन्य शक्तिशाली साधना विधियों के प्रभाव को ग्रहण कर सके। इसकी प्रक्रिया यह है- प्रातःकाल किसी शांत और एकान्त स्थल पर सुखासन में कमर सीधी करके बैठकर नेत्र बन्द करके दोनों नासिका छिद्रों से श्वास खींचते हुए यह भावना की जाती है कि हमारे चारों ओर प्राण का दिव्य सागर लहरा रहा है और वह (प्राण) श्वास के माध्यम से हमारे शरीर के अंग-प्रत्यंग में पहुँच रहा है। इस पूरक प्रक्रिया के बाद कुछ (एकाध मिनट) देर तक अन्दर ही रोक कर अन्तःकुम्भक करके उस प्राण तत्त्व को अंग-प्रत्यंग में स्थापित होने का भाव किया जाता है; तदुपरान्त रेचक करते हुए, श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते समय यह भावना भी की जाती है कि अन्दर के दोष-दुर्गुण, कषाय-कल्मष बाहर निकल रहे हैं। इसमें ध्यान रखने की बात यह है कि पूरक से रेचक में अधिक समय लगे। यदि यह न बन पड़े, तो पूरक जितना समय तो रेचक में लगना ही चाहिए। श्वास खींचने व निकालने की प्रक्रिया धीरे-धीरे ही की जाती है, जल्दी से या झटके से नहीं। श्वास बाहर निकल जाने के पश्चात् कुछ सेकेण्ड बाह्य कुम्भक अर्थात् थोड़ी देर श्वास को बाहर ही रोका जाता है। प्रारंभ में यह प्राणायाम ५ बार से अधिक नहीं किया जाता। बाद में बढ़ाते-बढ़ाते २० तक भी किया जा सकता है। इस प्राणायाम से सुस्ती, निरुत्साह, झिझक आदि दूर होकर अन्दर एक प्रचण्ड शक्ति का अनुभव होने लगता है। ब. लोम-विलोम (सूर्यभेदन) प्राणायाम - जब प्राणाकर्षण प्राणायाम द्वारा पूरक, कुम्भक और रेचक का अभ्यास दृढ़ हो जाता है, तब लोम-विलोम अथवा सूर्य भेदन (सूर्यभेदी) प्राणायाम किया जाता है। इसमें भी पूर्वोक्त प्रकार से बैठकर कमर सीधी करके दायें हाथ की अँगुलियों और अँगूठे की सहायता से सर्वप्रथम बायें नथुने को बन्द करके, दायें से धीरे-