१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंधीरे श्वास खींचते हैं तथा अन्तः कुम्भक करते समय नाभिस्थित सूर्यचक्र के जाग्रत् और प्रकाशित होने का भाव करते हुए यह भावना करते हैं कि हमारा अंग-प्रत्यंग नवजीवन प्राप्त कर रहा है। रेचक के उपरान्त बाह्य कुम्भक के समय भी यह भाव किया जाता है कि नाभि स्थित सूर्यचक्र से अग्नि सदृश तेज लपटें उठ रही हैं, वे सुषुम्ना नाड़ी, फेफड़ों, हृदय, कण्ठ आदि अवयवों को तेजस्वी बना रही हैं। इसमें सूर्यचक्र जाग्रत् हो जाता है तथा हर कार्य में उत्साह, उमंग एवं शरीर में स्फूर्ति आती है। स. नाड़ी शोधन प्राणायाम- मनुष्य के अशुद्ध खान-पान व अनुपयुक्त रहन-सहन से शरीर में विभिन्न प्रकार के मल एकत्र हो जाते हैं। ये केवल मलाशय में ही एकत्र नहीं होते; वरन् दूषित गैसें प्रकट कर रक्त को भी दूषित कर समस्त नस- नाड़ियों में भी पहुँच जाते हैं। जिससे अनेक रोग हो जाते हैं, इसके लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम सर्वोत्तम है। इसके लिए भी पूर्वोक्त प्रकार से खुली वायु में बैठकर दायीं नासिका का छिद्र बन्द करके बायें से धीरे-धीरे श्वास को इतना खींचते हैं कि वह फेफड़ों के अतिरिक्त पेट में भी भर जाय (इससे नाभिचक्र भी प्रभावित होता है), साथ ही (श्वास खींचते समय) यह भावना की जाती है कि वह नाभिस्थित चन्द्रमा [बायें नथुनें से श्वास खींचते समय श्वास इड़ा नाड़ी (जिसे चन्द्र नाड़ी भी कहते हैं) द्वारा अन्दर जाती है] को स्पर्श कर शीतल और प्रकाशवान् बना रही है। इसमें अन्तः कुम्भक और बाह्य कुम्भक करने की आवश्यकता नहीं है। श्वास बाहर भी बायें नथुनें से ही यह भाव करते हुए निकाली जाती है कि इड़ा नाड़ी शैत्य और शुद्धि प्राप्त कर पुष्ट हो रही है। यह क्रम तीन बार दोहराते हैं। तदुपरान्त बायें नथुने को बन्द करके तीन बार वही उपक्रम दायें नथुने से करते हुए नाभि स्थित सूर्य चक्र को ऊष्मा और प्रकाश से पिंगला अथवा सूर्यनाड़ी के शुद्ध और सशक्त होने की भावना करते हैं। इसके बाद दोनों नथुनों से श्वास खींचकर एकबार मुख मार्ग से बाहर निकाल देते हैं। इस प्रकार यह सम्पूर्ण क्रिया करने पर एक नाड़ी शोधन प्राणायाम होता है। इससे नाड़ियाँ मलरहित, शरीर हल्का और शक्तिसम्पन्न बनता है। ये तीनों प्राणायाम सर्वोपयोगी और सरल हैं, इन्हें हर कोई सम्पन्न कर सकता है तथा खतरा कुछ भी नहीं। प्राणायाम के उपरान्त ही योग के अन्य अंग प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की ओर बढ़ सकना सम्भव होता है। २०५. प्रारब्ध —द्र०-ज्ञानखण्ड। २०६. प्लुतमात्रा —द्र०-भूचर सिद्धि। २०७. फेनप —द्र०-वानप्रस्थ। २०८. बन्ध— हठयोग के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के बन्धों का उल्लेख है। विभिन्न उपनिषदों जैसे योग कुण्डल्युपनिषद्, योग- चूड़ामणि उपनिषद्, योगतत्त्व उपनिषद्, योग शिखोपनिषद् और शाण्डिल्योपनिषद् में भी बन्धों का वर्णन है। इनका मूल उद्देश्य शरीरगत वायु को नियन्त्रित करना है। योग शिखोपनिषद् में इनकी महत्ता इन शब्दों में प्रतिपादित है-बन्धत्रयमथेदानीं प्रवक्ष्यामि यथाक्रमम्। नित्यं कृतेन तेनासौ वायोज्र्यमवाप्नुयात् (यो०शि० १०१)। पाँच बन्धों में प्रायः तीन बन्ध प्रमुख हैं। ये हैं मूलबन्ध, उड्डियानबन्ध और जालन्धर बन्ध, इसके अतिरिक्त महाबन्ध और महावेध का भी उल्लेख पाया जाता है। योगतत्त्वोपनिषद् में मूलबन्ध का यह स्वरूप प्रतिपादित है-पाष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्द्ढम्। अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य योनिबन्धोऽयमुच्यते। प्राणापानौ नादबिन्दू मूलबन्धेन चैकताम् (यो.त. १२०-१२१) अर्थात् लिङ्ग स्थान और मूल (गुदा) के रन्ध्र को बन्द करने एवं अपान वायु का ऊर्ध्वगमन करके प्राण वायु के साथ एकत्व ही मूलबन्ध है। इसमें बाएँ पैर की सीवन (एड़ी की गुदा और लिङ्ग के बीच) में दृढ़तापूर्वक लगाकर और उसे सिकोड़कर अधोगामी अपान वायु का ऊर्ध्वगमन किया जाता है। उससे कुण्डलिनी शक्ति ऊपर की ओर चढ़ती है। उड्डियान बन्ध का स्वरूप उपनिषदों में इस प्रकार निरूपित है-बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः। उड्डयाणाख्यो हि बन्धोऽयं योगिभिः समुदाहृतः (यो०त० ११९)। इस बन्ध में दोनों जानुओं को मोड़कर पैरों के तलुवों की आपस में मिलाकर नाभि से नीचे और आठ अंगुल ऊपर के पेट के हिस्से को बलपूर्वक खींचकर मेरुदण्ड में इस प्रकार लगाया जाता है, जिससे पेट में गड्ढा जैसा दीखने लगता है। इससे प्राण, पक्षी की तरह सुषुम्ना की ओर उड़ने लगता है। जिसके कारण ही इसका नाम उड्डियान बन्ध पड़ गया है। जालन्धर बन्ध के सन्दर्भ में योगतत्त्व उपनिषद् कहता है-कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेद्द्ढया धिया। बन्धो जालन्धराख्योऽयं मृत्युमातङ्गकेसरी (यो०त० ११८) अर्थात् कण्ठ का आकुञ्चन करके ठोड़ी को कण्ठ कूप में दृढ़तापूर्वक इस प्रकार स्थापित करे कि हृदय से ठोड़ी का अन्तर मात्र चार अंगुल का रह जाय और सीना आगे की ओर तना हुआ हो। कण्ठ क्षेत्र के समस्त नाड़ी जाल को बाँध कर उस प्रदेश को सभी विकृतियों