भारतकोश
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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

धीरे श्वास खींचते हैं तथा अन्तः कुम्भक करते समय नाभिस्थित सूर्यचक्र के जाग्रत् और प्रकाशित होने का भाव करते हुए यह भावना करते हैं कि हमारा अंग-प्रत्यंग नवजीवन प्राप्त कर रहा है। रेचक के उपरान्त बाह्य कुम्भक के समय भी यह भाव किया जाता है कि नाभि स्थित सूर्यचक्र से अग्नि सदृश तेज लपटें उठ रही हैं, वे सुषुम्ना नाड़ी, फेफड़ों, हृदय, कण्ठ आदि अवयवों को तेजस्वी बना रही हैं। इसमें सूर्यचक्र जाग्रत् हो जाता है तथा हर कार्य में उत्साह, उमंग एवं शरीर में स्फूर्ति आती है। स. नाड़ी शोधन प्राणायाम- मनुष्य के अशुद्ध खान-पान व अनुपयुक्त रहन-सहन से शरीर में विभिन्न प्रकार के मल एकत्र हो जाते हैं। ये केवल मलाशय में ही एकत्र नहीं होते; वरन् दूषित गैसें प्रकट कर रक्त को भी दूषित कर समस्त नस- नाड़ियों में भी पहुँच जाते हैं। जिससे अनेक रोग हो जाते हैं, इसके लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम सर्वोत्तम है। इसके लिए भी पूर्वोक्त प्रकार से खुली वायु में बैठकर दायीं नासिका का छिद्र बन्द करके बायें से धीरे-धीरे श्वास को इतना खींचते हैं कि वह फेफड़ों के अतिरिक्त पेट में भी भर जाय (इससे नाभिचक्र भी प्रभावित होता है), साथ ही (श्वास खींचते समय) यह भावना की जाती है कि वह नाभिस्थित चन्द्रमा [बायें नथुनें से श्वास खींचते समय श्वास इड़ा नाड़ी (जिसे चन्द्र नाड़ी भी कहते हैं) द्वारा अन्दर जाती है] को स्पर्श कर शीतल और प्रकाशवान् बना रही है। इसमें अन्तः कुम्भक और बाह्य कुम्भक करने की आवश्यकता नहीं है। श्वास बाहर भी बायें नथुनें से ही यह भाव करते हुए निकाली जाती है कि इड़ा नाड़ी शैत्य और शुद्धि प्राप्त कर पुष्ट हो रही है। यह क्रम तीन बार दोहराते हैं। तदुपरान्त बायें नथुने को बन्द करके तीन बार वही उपक्रम दायें नथुने से करते हुए नाभि स्थित सूर्य चक्र को ऊष्मा और प्रकाश से पिंगला अथवा सूर्यनाड़ी के शुद्ध और सशक्त होने की भावना करते हैं। इसके बाद दोनों नथुनों से श्वास खींचकर एकबार मुख मार्ग से बाहर निकाल देते हैं। इस प्रकार यह सम्पूर्ण क्रिया करने पर एक नाड़ी शोधन प्राणायाम होता है। इससे नाड़ियाँ मलरहित, शरीर हल्का और शक्तिसम्पन्न बनता है। ये तीनों प्राणायाम सर्वोपयोगी और सरल हैं, इन्हें हर कोई सम्पन्न कर सकता है तथा खतरा कुछ भी नहीं। प्राणायाम के उपरान्त ही योग के अन्य अंग प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की ओर बढ़ सकना सम्भव होता है। २०५. प्रारब्ध —द्र०-ज्ञानखण्ड। २०६. प्लुतमात्रा —द्र०-भूचर सिद्धि। २०७. फेनप —द्र०-वानप्रस्थ। २०८. बन्ध— हठयोग के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के बन्धों का उल्लेख है। विभिन्न उपनिषदों जैसे योग कुण्डल्युपनिषद्, योग- चूड़ामणि उपनिषद्, योगतत्त्व उपनिषद्, योग शिखोपनिषद् और शाण्डिल्योपनिषद् में भी बन्धों का वर्णन है। इनका मूल उद्देश्य शरीरगत वायु को नियन्त्रित करना है। योग शिखोपनिषद् में इनकी महत्ता इन शब्दों में प्रतिपादित है-बन्धत्रयमथेदानीं प्रवक्ष्यामि यथाक्रमम्। नित्यं कृतेन तेनासौ वायोज्र्यमवाप्नुयात् (यो०शि० १०१)। पाँच बन्धों में प्रायः तीन बन्ध प्रमुख हैं। ये हैं मूलबन्ध, उड्डियानबन्ध और जालन्धर बन्ध, इसके अतिरिक्त महाबन्ध और महावेध का भी उल्लेख पाया जाता है। योगतत्त्वोपनिषद् में मूलबन्ध का यह स्वरूप प्रतिपादित है-पाष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्द्ढम्। अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य योनिबन्धोऽयमुच्यते। प्राणापानौ नादबिन्दू मूलबन्धेन चैकताम् (यो.त. १२०-१२१) अर्थात् लिङ्ग स्थान और मूल (गुदा) के रन्ध्र को बन्द करने एवं अपान वायु का ऊर्ध्वगमन करके प्राण वायु के साथ एकत्व ही मूलबन्ध है। इसमें बाएँ पैर की सीवन (एड़ी की गुदा और लिङ्ग के बीच) में दृढ़तापूर्वक लगाकर और उसे सिकोड़कर अधोगामी अपान वायु का ऊर्ध्वगमन किया जाता है। उससे कुण्डलिनी शक्ति ऊपर की ओर चढ़ती है। उड्डियान बन्ध का स्वरूप उपनिषदों में इस प्रकार निरूपित है-बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः। उड्डयाणाख्यो हि बन्धोऽयं योगिभिः समुदाहृतः (यो०त० ११९)। इस बन्ध में दोनों जानुओं को मोड़कर पैरों के तलुवों की आपस में मिलाकर नाभि से नीचे और आठ अंगुल ऊपर के पेट के हिस्से को बलपूर्वक खींचकर मेरुदण्ड में इस प्रकार लगाया जाता है, जिससे पेट में गड्ढा जैसा दीखने लगता है। इससे प्राण, पक्षी की तरह सुषुम्ना की ओर उड़ने लगता है। जिसके कारण ही इसका नाम उड्डियान बन्ध पड़ गया है। जालन्धर बन्ध के सन्दर्भ में योगतत्त्व उपनिषद् कहता है-कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेद्द्ढया धिया। बन्धो जालन्धराख्योऽयं मृत्युमातङ्गकेसरी (यो०त० ११८) अर्थात् कण्ठ का आकुञ्चन करके ठोड़ी को कण्ठ कूप में दृढ़तापूर्वक इस प्रकार स्थापित करे कि हृदय से ठोड़ी का अन्तर मात्र चार अंगुल का रह जाय और सीना आगे की ओर तना हुआ हो। कण्ठ क्षेत्र के समस्त नाड़ी जाल को बाँध कर उस प्रदेश को सभी विकृतियों

परिशिष्ट ३८१. ब्रह्मचारी को दूर करने के कारण ही इसे जालन्धर बन्ध कहते हैं। जालन्धर बन्ध के सन्दर्भ में विवेक मार्तण्ड में उल्लेख है- जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे । न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति (वि० मार्त० ६७) । महाबन्ध प्रायः पूर्वोक्त तीनों बन्धों का सम्मिलित स्वरूप होता है। योग तत्त्व उपनिषद् (११२-११४) में उल्लेख है- पाणिर्वामस्य पादस्य.....उभयत्रैवमभ्यसेत् । महावेध में मूलबन्धपूर्वक पद्मासन से बैठकर प्राण और अपान वायु को नाभि प्रदेश पर एक करके, दोनों हाथ तानकर नितम्बों से मिलाते हुए भूमि पर जमाकर नितम्बों को आसन के साथ ही उठाकर बार-बार भूमि पर ताड़ित किया जाता है। इससे प्राण सुषुम्ना में प्रविष्ट होकर कुण्डलिनी का जागरण होता है। २०१. बन्धन—द्र०-ज्ञानखण्ड । २१०. बहूदक—द्र०-अवधूत । २११. बिन्दु—सामान्यतः बिन्दु शब्द जल कण, बूंद के अर्थ में प्रयुक्त होता है। हाथी के मस्तक पर शोभा हेतु लगाई जाने वाली बिन्दी के अर्थ में तथा मनुष्यों द्वारा भी दोनों भौहों के बीच लगाये जाने वाले गोल तिलक के अर्थ में भी बिन्दु या विन्दु शब्द प्रयुक्त होता है। रेखा गणित में भी नियत स्थान पर जिसका विभाग न हो सके, उसे बिन्दु कहते हैं। शब्दों के ऊपर अनुस्वार रूप में लगने वाली बिन्दी को भी बिन्दु कहते हैं। ब्रह्मचर्य प्रकरण में वीर्य के अर्थ में भी बिन्दु का प्रयोग किया जाता है- एवं संरक्षयेद्विन्दुं मृत्युं जयति योगवित्। मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दु धारणात् (हठ०प्र० ३.८८) अर्थात् बिन्दु (वीर्य) का संरक्षण करने वाला योग तत्त्व का ज्ञाता मृत्यु को जीत लेता है, क्योंकि बिन्दु धारण ही जीवन तथा बिन्दु पतन ही मरण है। इसकी महत्ता यहाँ तक बतायी गयी है कि बिन्दुधारण से शरीर में सुगन्धि उत्पन्न हो जाती है तथा जिसके शरीर में वीर्य (बिन्दु) है, उसे मृत्यु का भय कहाँ-सुगन्धो योगिनो देहे जायते बिन्दुधारणात्। यावद्विन्दुः स्थिरो देहे तावत्कालभयं कुतः (हठ०प्र० ३.८९)। श्रीमद्भागवत और शारदा तिलक में उल्लेख है कि सच्चिदानन्द विभव परमेश्वर से शक्ति, शक्ति से नाद और नाद से बिन्दु का प्रादुर्भाव हुआ है-सच्चिदानन्दविभवात् सकलात् परमेश्वरात् । आसीच्छक्तिस्ततो नादो नादाद्विन्दुसमुद्भवः ॥ हिन्दी विश्वकोश खं० २९ पृष्ठ ४२६ में कुज्जिका तन्त्र में वर्णित बिन्दु को सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाला (अर्थात् ब्रह्म) माना गया है-आसीद्विन्दुस्ततो नादो नादाच्छक्तिः समुद्भवा । क्रियासार नामक ग्रन्थ में बिन्दु को शिवात्मक (कल्याणकारी) और बीज को शक्त्यात्मक माना गया है। इन दोनों के संयोग से ही नाद और नाद से त्रिशक्ति उत्पन्न हुई है- बिन्दुः शिवात्मकस्तत्र बीजं शक्त्यात्मकं स्मृतम्। तयोः ....जातास्त्रिशक्तयः ॥ (हि०वि० को०खं०२१ पृ० ४२६) नाद से बिन्दु का घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण ही प्रायः नाद और बिन्दु शब्दों का उल्लेख एक साथ ही मिलता है। मण्डल ब्राह्मण उपनिषद् में उस परब्रह्म को नाद बिन्दु-कलातीत और अखण्डमण्डलाकार कहा गया है- तन्नादबिन्दुकलातीतमखण्डमण्डलम् (मं० ब्रा०उ० २.१.४) । योगशिखोपनिषद् में नाद को ही बिन्दु और बिन्दु को ही चित्त कहा गया है, अर्थात् तीनों एक ही तत्त्व हैं-यो वै नादः स वै बिन्दुस्तद्वै चित्तं प्रकीर्तितम्। नादो बिन्दुश्च चित्तं च त्रिभिरेक्यं प्रसाधयेत् (यो०शि० ६.७२)। इसी प्रकार (बिन्दु की) उत्पत्ति, स्थिति और कारण वाला मन ही बिन्दु है; क्योंकि मन से बिन्दु उसी प्रकार उत्पन्न होता है, जिस प्रकार दूध से घृत-मन एव हि बिन्दुश्च उत्पत्तिस्थिति कारणम्। मनसोत्पद्यते बिन्दुर्यथा क्षीरं घृतात्मकम् (यो०शि० ६.७३)। इस प्रकार बिन्दु शब्द के अनेक अर्थ हैं। योग और ध्यान सन्दर्भों में यह ब्रह्म, चित्त, मन आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। २१२. बृहन् (बृहत्)-द्र०-ब्रह्मचारी। २१३. बोध-द्र०-ज्ञानखण्ड-बोध-प्रतिबोध। २१४. ब्रह्म-द्र०-ज्ञानखण्ड-ब्रह्म-परब्रह्म। २१५. ब्रह्मचर्य-द्र०-यम। २१६. ब्रह्मचारी- भारतीय आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत जीवन को चार भागों में बाँटा गया है। इन चारों भागों की अवधि को ही चार आश्रम कहते हैं, जो इस प्रकार हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। आर्ष मान्यता के आधार पर प्रत्येक आश्रम की अवधि २५ वर्ष मानी गई है; क्योंकि ऋषियों की परिकल्पना थी कि जीवन १०० वर्ष का होता है। प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य कहलाता है। ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले को ब्रह्मचारी कहते हैं। 'ब्रह्मचर्य' शब्द का विस्तृत विवेचन इसी खण्ड के परिभाषा कोश, परिशिष्ट में 'यम' शब्द के अन्तर्गत किया जा चुका है। ब्रह्मचारी की परिभाषा इस

ब्रह्मतत्त्व ३८२ परिशिष्ट एक ही वाक्य से स्पष्ट हो जाती है - ब्रह्मणि वेदे चरति इति ब्रह्मचारी अर्थात् जो वेद-ब्रह्म के चिन्तन-मनन में नित्य तल्लीन रहता है, वह ब्रह्मचारी है। आश्रमोपनिषद् के प्रथम मंत्र में ब्रह्मचारी के चार भेद वर्णित हैं। गायत्र, ब्राह्म (ब्राह्मण), प्राजापत्य और बृहन् (बृहत्)- तत्र ब्रह्मचारिणश्चतुर्विधा भवन्ति गायत्रो ब्राह्मः प्राजापत्यो बृहन्निति। इनमें जो ब्रह्मचारी उपनयनोपरान्त तीन रात्रि तक अलवण (बिना नमक का) भोजन ग्रहण करके गायत्री मंत्र का जप करते हैं, उन्हें गायत्र कहते हैं-यं उपनयनादूर्ध्वं ............गायत्रीमधीते स गायत्रः (आश्रमो० १)। जो अड़तालीस वर्ष पर्यन्त वेद के पठन्-पाठन हेतु ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं अर्थात् प्रत्येक वेद का पाठ १२ वर्ष तक करते हुए ब्रह्मचर्य पालते हैं, वे ब्राह्म या ब्राह्मण कहलाते हैं। जो २४ वर्ष तक गुरुकुल में रहे। (ध्यातव्य है कि प्रचलित ब्राह्मण शब्द की व्याख्या १०८ उपनिषद् के ज्ञानखण्ड के परिभाषाकोश परिशिष्ट में की जा चुकी है। यहाँ ब्राह्म के पर्याय स्वरूप लिखा गया ब्राह्मण शब्द ब्रह्मचारी के एक भेद के सन्दर्भ में आया है।) जो गृहस्थ होते हुए केवल ऋतुकाल में अपनी पत्नी से ही संसर्ग करने वाले तथा परदारा (दूसरे की स्त्री) को त्यागने या निषिद्ध मानने वाले हैं, उन्हें प्राजापत्य कहते हैं-स्वदारनिरत ऋतुकालाभिगामी सदा परदारवर्जी प्राजापत्यः (आश्रमो० १)। उन्हें भी प्राजापत्य ही कहा जाता है, जो ४८ वर्ष तक गुरुकुल में निवास करें। जो (ब्रह्मचारी) जीवन पर्यन्त गुरु का परित्याग न करे, ऐसा नैष्ठिक बृहन् या बृहत् कहलाता है- प्रायणाद्गुरोरपरित्यागी नैष्ठिको बृहन्निति (आश्रमो० १)। इस प्रकार आचरण भेद से ब्रह्मचारी के ये चार प्रकार हैं। २१७. ब्रह्मतत्त्व—द्र०-ज्ञानखण्ड-ब्रह्म-परब्रह्म। २१८. ब्रह्मनिष्ठ—द्र०-ज्ञानखण्ड-ब्रह्म विद्या। २१९. ब्रह्मपुर—द्र०-अष्टदल कमल। २२०. ब्रह्मयज्ञ—द्र०-वानप्रस्थ। २२१. ब्रह्मरन्ध्र—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२२. ब्रह्मलीन—द्र०-ज्ञानखण्ड-जीवन्मुक्त। २२३. ब्रह्मविद्या—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२४. ब्रह्मवेत्ता—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२५. ब्रह्माण्ड—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२६. ब्रह्मानन्द—द्र०-अद्वयानन्द। २२७. ब्राह्म—द्र०-ब्रह्मचारी। २२८. ब्राह्मण—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२९. भद्रासन—द्र०-आसन। २३०. भवसागर—द्र०-ज्ञानखण्ड- जीवन्मुक्त। २३१. भिक्षु—द्र०-अवधूत। २३२. भूचर सिद्धि—योग साधनाओं से विभिन्न प्रकार की सिद्धियों का वर्णन योग शास्त्रों में मिलता है। अष्टसिद्धियों का कई स्थलों पर उल्लेख है। ये हैं- अणिमा, गरिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। योग सम्बन्धी उपनिषदों में शरीर के नीरोग रहने की सिद्धि, दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, दूरस्थ व्यक्ति की प्राणशक्ति द्वारा सहायता करना आदि अनेकों सिद्धियों का विवेचन है। कुछ सिद्धियाँ ऐसी भी हैं, जिनका प्रयोग या तो निषिद्ध है अथवा इनका प्रयोग बहुत ही सावधानी पूर्वक करने का निर्देश दिया गया है। प्राणायाम के अनेक प्रकारों द्वारा अनेकप्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इन्हीं में से एक सिद्धि है- भूचर सिद्धि। दत्तात्रेय स्मृति और योगतत्त्वोपनिषद् में इसका उल्लेख है। केवल- कुम्भक प्राणायाम सिद्ध हो जाने पर योगी के लिए त्रिलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। केवल-कुम्भक प्राणायाम सिद्ध हो जाने पर रेचक और पूरक का त्याग कर दिया जाता है। उसके बाद अभ्यास के समय निकले पसीने को शरीर में ही मल लिया जाता है। देह में कम्प और दर्दुर भाव (मेंढक के उछलने जैसी चेष्टा) के बाद योगी का शरीर पद्मासन स्थिति

परिशिष्ट ३८३ मन्त्रयोग, लययोग, राजयोग में ही भूमि से ऊपर उठने लगता है। इसके पश्चात् और भी अतिमानुषी चेष्टाएँ होने लगती हैं; पर इन्हें किसी के समक्ष प्रदर्शन न करने का स्पष्ट निर्देश है- केवले कुम्भके सिद्धे ...... न दर्शयेच्च सामर्थ्यं दर्शनं वीर्यवत्तरम् (यो० त० ५०- ५६)। शरीर वृत्तियों में और भी अनेक परिवर्तन होने पर भूचर सिद्धि हो जाती है। इसके प्राप्त हो जाने पर सभी भूचरों (पृथ्वी पर चलने वाले) जीवों पर विजय प्राप्त हो जाती है। व्याघ्र, शरभ, गवय (नीलग्राय), सिंह आदि योगी के हस्त ताडन मात्र से हो मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। शरीर अनंग (कामदेव) के समान सुन्दर हो जाता है-येन भूचरसिद्धिः स्याद्भूचराणां जये क्षमः । व्याघ्रो वा शरभो वाऽपि गजो गवय एव वा ।। सिंहो वा योगिना तेन प्रियन्ते हस्तताडिताः । कन्दर्पस्य यथारूपं तथा स्यादपि योगिनः (यो०त० ५९-६०)। इस सिद्धि में अपेक्षित नैष्ठिक ब्रह्मचर्य धारण करने से शरीर सुगन्धित रहने लगता है, जिससे काम सम्बन्धी अनेक विघ्न आते हैं। अतः स्त्रियों का चिन्तन नहीं करना चाहिए और एकान्त स्थल में प्लुत मात्रा में (ॐ के उच्चारण में जितना समय लगता है, उससे तिगुने समय में) प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए, इससे पूर्वार्जित पापों का शमन होता है-वर्जयित्वा स्त्रियां संगं........ प्रणवं प्लुतमात्रया। जपेत्पूर्वार्जितानां तु पापानां नाशहेतवे (यो०त० ६२-६३)। २३३. भूमा - कोशग्रन्थों में भूमा शब्द का अर्थ है- भारी परिमाण, प्राचुर्य, यथेष्टता बड़ी संख्या आदि । दौलत, पृथ्वी, प्रदेश, प्राणी आदि अर्थों में भी भूमा शब्द का प्रयोग मिलता है। उपनिषदों में भूमा शब्द ब्रह्म (ईश्वर) की एक विशेषता के रूप में प्रतिपादित है। छान्दोग्योपनिषद् में ईश्वर को भूमा (निरतिशय) कहते हुए उसे सुख कहा गया है-यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमा भगवो विजिज्ञास इति (छान्दो० ७.२३.१) अर्थात् सुनिश्चित रूप से भूमा (आधिक्य, निरतिशयत्व) ही सुख है। अल्प में सुख नहीं है। भूमा ही विशिष्टतः जानने योग्य है। भूमा का लक्षण क्या है ? यह बताते हुए उपनिषद्कार ने लिखा है- (किं लक्षणोऽसौ भूमेत्याह) यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ ... महिम्रीति (छान्दो० ७.२४.१) अर्थात् जहाँ कुछ अन्य नहीं देखता, कुछ अन्य श्रवण नहीं करता तथा न ही कुछ जानता है, वही भूमा है; किन्तु जहाँ कुछ और देखता, सुनता व जानता है वह अल्प है; क्योंकि जो अल्प है, वह मरणधर्मा और जो भूमा (निरतिशय) है, वह अमृत है। वह भूमा कहाँ प्रतिष्ठित है, इसके उत्तर में कहा गया है वह भूमा अपनी महिमा में प्रतिष्ठित है। वस्तुतः वह अपनी महिमा में भी प्रतिष्ठित नहीं है; क्योंकि संसार में गौ, अश्वादि को भी महिमा कहते हैं; वह भूमा इनमें प्रतिष्ठित नहीं है, वह तो निरालम्ब अर्थात् अवल- म्बन रहित है। वह भूमा नीचे-ऊपर, बायें-दायें,आगे-पीछे सभी ओर है। उसी भूमा में (व्यक्तिभाव से) अहंकारवश इस प्रकार कहा जाता कि मैं ही ऊपर-नीचे, दायें-बायें और सब ओर हूँ-स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स ...ऽहमुत्तरतोऽहमेवेद १९सर्वमिति (छान्दो० ७.२५.१)। जिसका विभाजन न हो सके, जिसकी सीमा न हो या जो अन्तर रहित हो ऐसा भूमा है और ऐसे अखण्ड आनन्द को भूमानन्द कहा गया है। तेजोबिन्दूपनिषद् में उपनिषदकार ने ब्रह्मसाक्षात्कार हो जाने पर अथवा ब्रह्म से एकीभूत हो जाने पर आत्म स्वरूप का वर्णन करते हुए एक साधक का कथन इन शब्दों में उद्धृत किया है-नित्यशेषस्वरूपोऽस्मि सर्वातीतोऽस्म्यहं सदा। रूपातीतस्वरूपोऽस्मि परमाकाश विग्रहः । भूमानन्दस्वरूपोऽस्मि भाषाहीनोऽस्म्यहं सदा । सर्वाधिष्ठानरूपोऽस्मि सर्वदा चिद्धनोस्म्यहम् (ते०बि०३.१२-१३)। इसी रूप में आत्मबोधोपनिषद् में भी आत्मबोध प्राप्त व्यक्ति अपने को भूमा स्वरूप बताता है .........परमानन्द घनोऽहं परमानन्दैकभूमरूपोऽहं (आत्मबोधो० २.८)। शतपथ ब्राह्मण में श्री को ही भूमा कहा गया है-श्रीर्वै भूमा (श०ब्रा० ३.१.१.१२)। इसी प्रकार तैत्तिरीय ब्राह्मण में पुष्टि को भूमा की संज्ञा प्रदान की गई है- पुष्टिवैं भूमा (तैत्ति०ब्रा० ३.९.८.३)। भूमा स्थिति प्राप्त कर लेने वाले साधु-सन्तों को भी कई लोग भूमा कहने लगते हैं। २३४. भ्रुकुटि - द्र०-त्रिदण्ड-त्रिपुण्ड्र। २३५. मन- द्र०-ज्ञानखण्ड-मानस। २३६. मनन - द्र०-निदिध्यासन । २३७. मन्त्रयोग, लययोग, राजयोग - भारतीय दर्शन में विभिन्न प्रकार के योगों का वर्णन मिलता है। योग का सामान्य अर्थ जोड़ना, मिलाना, संयोग संबंधी, संगति, ध्यान, युक्ति और चित्तवृत्ति निरोध आदि है। व्यावहारिक दृष्टि से योग के कई प्रकार हैं, जैसे- मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग, राजयोग आदि। योगतत्त्वोपनिषद् में इनका उल्लेख इन शब्दों में हुआ है- योगो हि बहुधा ब्रह्मन् भिद्यते व्यवहारतः। मन्त्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगकः (यो०त० १९)। ये सभी

ममता ३८४ परिशिष्ट मिलकर महायोग कहलाते हैं "मन्त्रो लयो .......महायोगोऽभिधीयते" (यो०शि० १२९)। सभी योगों की चार अवस्थाएँ होती हैं। ये हैं- आरम्भावस्था, घटावस्था, परिचयावस्था तथा निष्पत्ति अवस्था-आरम्भश्च घटश्चैव .........परिकीर्तिता (यो०त० २०)। मन्त्रयोग के लक्षण का उपनिषद्कार ने इन शब्दों में उल्लेख किया है....मातृकादियुतं मन्त्रं द्वादशाब्दं तु यो जपेत् । क्रमेण लभते ज्ञानमणिमादिगुणान्वितम् । अल्पबुद्धिरिमं योगं सेवते साधकाधमः (यो०त०२१-२२) अर्थात् जो साधक मातृकायुक्त बारह सौ मन्त्र का जप करता हुआ मन्त्रयोग सिद्ध करता है, वह क्रमशः अणिमा आदि सिद्धियों का ज्ञान प्राप्त करता है। योगशिखोपनिषद् में मंत्रयोग को हंस (सोऽहम्) मंत्र पर आधृत होने का विवेचन है। समस्त प्राणियों द्वारा निरन्तर श्वास-प्रश्वास के द्वारा हंस मंत्र का जप होता रहता है; किन्तु जब गुरु उपदेश से साधक सुषुम्ना नाड़ी में (प्राण प्रविष्ट हो जाने पर) इसी मंत्र का उल्टा (हंस के स्थान पर) सोऽहम् का जप करता है, तब इसे मन्त्र योग कहते हैं- हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः । हंसहंसेति मन्त्रोऽयं सर्वैर्जीवैश्च जप्यते ॥ गुरुवाक्यात् ..... मन्त्रयोगः स उच्यते (यो०शि० १.१३०-१३१)। जो साधक चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-खाते, चित्त को निष्कल परमात्मा में लगाते हैं अर्थात् परमात्मा में ध्यान को एकाग्र करते हैं, वे लययोग करते हैं-लययोगश्चित्तलयः कोटिशः परिकीर्तितः । गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्भुञ्जन्ध्या-येन्निष्कलमीश्वरम्। स एव लययोगः .........शृणु (यो०त० २३-२४)। अन्यत्र भी लययोग का यही स्वरूप निर्दिष्ट है कि जब जीव और परमात्मा का ऐक्य होकर साधक का चित्त ब्रह्म में विलीन हो जाता है, तब शरीर स्थित पवन (प्राण) स्थैर्य को प्राप्त हो जाता है और लययोग का उदय होता है। लययोग से सुख और आत्मानन्दपूर्वक परम पद की प्राप्ति होती है- ....क्षेत्रज्ञः परमात्मा च तयोरैक्यं यदा भवेत् । ......पवनः स्थैर्यमायाति लय योगोदये सति ॥ लयात् .......परं पदम् (यो०शि० १.१३४-१३६) । यमनियमादि योग के आठ अंगों, मुद्रा-बन्ध आदि के साथ जो योग करते हैं, वह हठ योग है। इसमें हठ पूर्वक इन्द्रियों को सहजधारा से अलग हटाकर निश्चित धारा में लगाने के कारण इसे हठ योग कहते हैं। हठयोग का विस्तृत वर्णन इसी परिभाषा कोश परिशिष्ट के 'हठयोग' प्रकरण में किया जा चुका है, विशेष जानकारी हेतु उसे देखना चाहिए। विभिन्न अंग-उपाङ्गों सहित हठयोग द्वारा जब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, तब उनके (योगियों के) लिए हठयोग की क्रियाओं की आवश्यकता नहीं रहती। वे सिद्धियाँ उनके लिए सहज हो जाती हैं। इसी को राजयोग कहते हैं- हठयोगसिद्धोऽयं राजयोगः योगराजत्वात् (यो०त० १३० टीका) अर्थात् हठयोग द्वारा जो पुरुष सिद्ध हो जाता है, वही राजयोगी है। एक अन्य उपनिषद् में राजयोग की परिभाषा इस प्रकार को गई है-योनिमध्ये महाक्षेत्रे जपाबन्धूकसंनिभम् । रजो वसति जन्तूनां देवीतत्त्वं समावृतम् । रजसो रेतसो योगाद्राजयोग इति स्मृतः । अणिमादिपदं प्राप्य राजते राजयोगतः (यो०शि० १.१३६-१३८) अर्थात् प्रत्येक जन्तु (जीव)के योनि मध्य (मूलाधार और स्वाधिष्ठान के बीच स्थित कन्द), जिसे महाक्षेत्र की संज्ञा प्रदान की गई है,में जपा और बन्धूक के पुष्पों के समान लाल रंग वाला रज निवास करता है, जो देवी तत्त्व से समावृत है। जब यौगिक क्रियाओं (कुण्डलिनी साधना) द्वारा साधक शरीर के ऊर्ध्व भाग स्थित शिवस्वरूप रेतस् और अधोभाग स्थित रज का योग करता है, तब प्राण और अपान भी उन्हीं में लीन हो जाते हैं, इससे वह समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। रज और रेतस् योग की इस क्रिया को ही राजयोग कहते हैं- प्रकृत्यष्टकरूपं च स्थानं गच्छति कुण्डली । .........इत्यथोर्ध्वरजः शुक्ले शिवे तदनु मारुतः । प्राणापानौ समौ याति सह जातौ तथैव च (यो०कु० १.७४-७५)। भौतिक जगत् में भी नारी के शरीर में स्थित रज और पुरुष के शरीर में स्थित रेतस् (वीर्य) के योग से ही नूतन जीवन (शिशु) का प्रादुर्भाव होता है; किन्तु योगी जनों के एक ही शरीर में यह प्रक्रिया सम्पन्न होती है और वे शनैः-शनैः इस अभ्यास से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं-एकेनैव शरीरेण योगाभ्यासाच्छनैः शनैः । चिरात्संप्राप्यते मुक्तिर्मर्कटक्रम एव सः (यो०शि० १.१४०) । राजयोग की प्रशंसा कई ग्रन्थों में उल्लिखित है। हठयोग प्रदीपिका में उल्लेख है कि आत्मज्ञान, विदेहमुक्ति, अणिमा आदि सिद्धियाँ, गुरु कृपा से प्राप्त राजयोग द्वारा उपलब्ध होती हैं-राजयोगस्य माहात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः । ज्ञानं मुक्तिः स्थितिः सिद्धिर्गुरुवाक्येन लभ्यते (हठ०प्र० ४.८)। २३८. ममता-द्र०-ज्ञानखण्ड - मोह-ममता-आसक्ति। २३९. महापातक- पातक शब्द पाप का पर्यायवाची है। किसी को किसी भी प्रकार से पीड़ा पहुँचाना ही पाप है। इसी प्रकार किसी को सुख पहुँचाना अथवा परोपकार करना ही पुण्य है। पाप-पुण्य को सामान्यतः इस श्लोक से स्पष्ट समझा जा सकता है- अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ पाप कई प्रकार के

परिशिष्ट ३८५ मुद्रा होते हैं। उनकी श्रेणी के अनुसार उनके अलग-अलग नामकरण किये गये हैं, जैसे- उपपातक, महापातक आदि। छोटे पापों को उपपातक कहते हैं। कोशग्रन्थों के अनुसार इनकी संख्या प्रायः पचास है; जिनमें गोवध, परदारगमन, मातृत्याग, पितृत्याग, गुरुत्याग, आत्मविक्रय, अपत्यविक्रय, दारविक्रय, स्त्रीवध आदि प्रमुख हैं। महान् या बड़े पापों को महापातक कहते हैं, जिसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- महदतिशयितं पातकं इति महापातकम्। महापातक पाँच प्रकार के माने गये हैं- ब्रह्महत्या, सुरापान, गुरुपत्नीगमन, चोरी करना तथा इन सभी पापियों के साथ संसर्ग। मनुस्मृति में यह तथ्य इन शब्दों में विवेचित है-ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः। महान्ति पातकान्याहुःसंसर्गश्चापि तैः सह (मनु० ११.५४)। 'जो पापी उपर्युक्त इन पापों को करते हैं, उनको नरक भोग के बाद असाध्य रोगों का भी भोग करना पड़ता है। इस प्रकार सात जन्मों तक यह क्रम चलता रहता है, तब महापातक से निवृत्ति मिलती है। प्राचीन ग्रन्थों में महापातक शमन के अनेक उपाय वर्णित हैं। कार्तिक, वैशाख और माघ मास में नित्य प्रातःकाल स्नानादि करके हविष्य भोजन व नैष्ठिक ब्रह्मचर्य पालन से महापातक का विनाश होता है-तुलामकरमेषेषु प्रातः स्नानं विधीयते। हविष्यं ब्रह्मचर्यञ्च महापातकनाशनम् (हि०वि०को०खंड १७ पृ० १४७)। इसी प्रकार कृष्ण नाम जप को भी महापातक का शामक कहा गया है- कृष्णोति मङ्गलं नाम ......महापातककोटयः (हि०वि०को०पृ० १४७)। जाबाल्युपनिषद् में भी विद्वान्, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी अथवा यति द्वारा भस्म का त्रिपुण्ड्र (ललाट पर तीन आड़ी रेखाएँ) धारण करने और उन तीनों रेखाओं के तत्त्वदर्शन को समझने व जीवन में धारण करने से (जिसका वर्णन जाबाल्युपनिषद् के ही २१ वें मंत्र में है) महापातकों और उपपातकों के शमन का उल्लेख है- त्रिपुण्ड्रं भस्मना करोति यो विद्वान् ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिर्वा स महापातकोपपातकेभ्यः पूतो भवति (जाबाल्यु० २१)। २४०. महाबन्ध - द्र०-बन्ध। २४१. महामुद्रा- द्र०-मुद्रा। २४२. महावाक्य - द्र०-ज्ञानखण्ड। २४३. महावेध - द्र०-बन्ध। २४४. महेश्वर - द्र०-त्र्यम्बक। २४५. माया- द्र०-ज्ञानखण्ड -अविद्या, माया, अज्ञान। २४६. मुक्तात्मा - द्र०-ज्ञानखण्ड-जीवनमुक्त। २४७. मुक्ति-द्र०-ज्ञानखण्ड-मुक्ति-मोक्ष। २४८. मुद्रा - योग के अन्तर्गत चित्तशोधन व प्राण के ऊर्ध्वगमन के निमित्त विभिन्न मुद्राएँ प्रतिपादित की गयी हैं- जैसे खेचरी मुद्रा, महामुद्रा, अश्विनीमुद्रा, शक्तिचालिनी मुद्रा, योनिमुद्रा, योगमुद्रा, शाम्भवी मुद्रा, तड़ागीमुद्रा, विपरीतकरणी मुद्रा, वज्रोली, अमरोली, सहजोली मुद्रा आदि। इनमें कुछ प्रमुख मुद्राएँ इस प्रकार हैं- खेचरी मुद्रा में जीभ को उलट कर कपाल कुहर में प्रविष्ट कराकर दृष्टि को भ्रूमध्य में एकाग्र किया जाता है। ध्यान की स्थिरता में इस मुद्रा से बहुत सहायता मिलती है। इसके अभ्यासी को क्षुधा, निद्रा, तृष्णा, मूर्च्छा आदि से त्राण मिलता है। चित्तशून्य (अन्तरिक्ष-खे) में रमण (चर) करने के कारण इसका नाम खेचरी मुद्रा पड़ा है। उपनिषदकार ने इस मुद्रा के विषय में लिखा है-अन्तः कपाल कुहरे जिह्वां व्यावृत्त्य धारयेत्। भ्रूमध्यदृष्टिरप्येषा मुद्रा भवति खेचरी (यो०त० ११७)। इस मुद्रा की सिद्धि के लिए जिह्वा वृद्धि हेतु छेदन, दोहन व चालन आदि कृत्य किये जाते हैं। महामुद्रा में मूलबन्धपूर्वक वाम पाद की एड़ी से गुदा और उपस्थ के बीच का स्थान (सीवन) दबाते हैं और दक्षिण पाद को फैलाकर उसकी अँगुलियों को दोनों हाथों से पकड़ते हैं। इसके बाद बायें नथुने से पूरक करके जालन्धर बन्ध लगाते हैं, तत्पश्चात् जालन्धर बन्ध खोलकर दाहिने नथुने से रेचक करते हैं। इसी प्रकार दाहिने ओर से भी यही मुद्रा करनी चाहिए। अश्विनी मुद्रा में पद्मासन अथवा सिद्धासन से बैठकर योनि प्रदेश को अश्व (घोड़े) की तरह बारम्बार आकुंचन-प्रकुंचन किया जाता है। इससे प्राण का उत्थान व कुण्डलिनी शक्ति के जागरण में सहायता मिलती है। शाम्भवी मुद्रा में मूल और उड्डियानबन्धपूर्वक पद्म अथवा सिद्ध आसन में बैठकर नासाग्र अथवा भ्रूमध्य में दृष्टि को स्थिर करके ध्यान लगाया जाता है। वज्रोली मुद्रा में साधक प्रारम्भ में उपस्थेन्द्रिय द्वारा मूत्र को ऊपर खींचने और पुनर्विसर्जित करने का अभ्यास करता है। बाद में जल, दूध, तेल, घृत, शहद और पारे को भी खींचने और छोड़ने का

मुनि ३८६ परिशिष्ट अभ्यास बन जाता है। इसका अभ्यास दृढ़ हो जाने पर स्त्री योनि में रेतस् विसर्जित करके उसके रज को ग्रहण किया जाता है; पर इस क्रिया में किसी अनुभवी का मार्गदर्शन अपेक्षित है, अन्यथा शारीरिक हानि के साथ ही आध्यात्मिक पतन की सम्भावना भी रहती है। वज्रोली के सन्दर्भ में योगतत्त्व उपनिषद् में उल्लेख है-किं नाम वज्रोली ? कांस्यपात्रे गोक्षीरं निक्षिप्य वज्रोलीतुल्य लिङ्गनालेन ग्रसित्वा पुनर्विरेंच्य पुनर्ग्रसनादिकमभ्यस्याथ स्त्रीयोनिमण्डले रेतो विसृज्य तच्छोणितेन साकं ग्रसेदिति यत्सेव वज्रोलीत्युच्यते (यो०त० १२६.१२७)। अमरोली मुद्रा वज्रोली का ही अगला चरण है। इसमें अमरी (मूत्र) की प्रथम और अन्तिम धारा को छोड़कर, मध्य धारा को हाथ या पात्र में लेकर प्रतिदिन पीकर तथा नस्य (नासिका द्वारा लेकर) करते हुए, वज्रोली क्रिया का अभ्यास किया जाता है। यही अमरोली मुद्रा कहलाती है- अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन् दिने-दिने। वज्रोलीमभ्य- सेन्नित्यममरोलीति कथ्यते (यो०त० १२८)। सहजोली मुद्रा वह कहलाती है, जिसमें अमरोलीसिद्ध को अमरीपान और नस्य के बिना ही (सहज ही) सिद्धि प्राप्त हो जाती है- एवममरोलीसिद्धस्यामरीपाननस्यं विना या सिद्धिरुदेति सैव सहजोलीत्युच्यते (यो०त० १२८ टीका)। षण्मुखी मुद्रा का प्रयोग योगमार्ग में, मन पर विजय प्राप्त करने, वायु को वश में करने आदि के लिए किया जाता है; जिससे प्राण ऊर्ध्वगामी हो चित्त एकाग्र होता है तथा आनन्दानुभूति होती है। जाबाल दर्शनोपनिषद् में इसका स्वरूप इस प्रकार निरूपित है-स्वस्तिकासनमास्थाय समाहितमनास्तथा। अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्रणवेन शनैःशनैः। हस्ताभ्यां धारयेत्सम्यक् कर्णादिकरणानि च........महामुने (जा०दर्शनो० ६.३२-३५) अर्थात् स्वस्तिक आसन पर बैठकर मन एकाग्र करके अपान वायु को ऊपर चढ़ाकर शनैः-शनैः प्रणव (ओंकार) का जप करते हुए दोनों अँगूठों से कानों को, तर्जनी से नेत्रों को और अन्य अँगुलियों से नासा पुटों को बन्द करके मूर्धा में मन (प्राण) को तब तक धारण करे (ध्यान लगाये), जब तक आनन्द की अनुभूति हो। इस प्रकार प्राण ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश कर जाता है। यही षण्मुखी मुद्रा है। साधक द्वारा वैष्णवी मुद्रा का प्रयोग मूलाधारादि चार चक्रों में मन को एकाग्र करने के लिए किया जाता है। इसमें मूलाधार, अनाहत, आज्ञा तथा सहस्रार चक्रों में विराजमान क्रमशः विराद् सूत्र, बीज, तुरीय अथवा अन्तर्लक्ष्य में बहिर्दृष्टि रखते हुए (खुले नेत्रों से) अपलक होकर मन को एकाग्र किया जाता है। इस सन्दर्भ में शाण्डिल्य उपनिषद् में उल्लेख है- मूलाधारानाहताज्ञा सहस्रारेषु यथाक्रमं विराट् सूत्रं बीजं तुरीयं वा अन्तर्लक्ष्यं तदेकतानं मनः बहिर्दृष्टिस्तु अन्तर्दृष्टिर्भूत्वा यदा निमेषोन्मेषवर्जिता भवति तदा दृष्टिरियं वैष्णवीमुद्रा भवतीत्यर्थः (शाण्डिल्यो० १.७. १४ टीका)। २४९. मुनि-संस्कृति के विकास में ऋषि-मुनियों का आदिकाल से ही योगदान रहा है। ये ही समय-समय पर विकृत परम्पराओं में संशोधन करके नया चिन्तन व साहित्य समाज को देकर उसे नई दिशा प्रदान करते रहे हैं। 'ऋषयोमन्त्र द्रष्टारः तथा दर्शनादृषिः'-यह परिभाषा ऋषि के स्वरूप का स्पष्ट बोध कराती है। ऋषि के संदर्भ में ज्ञानखण्ड के परिभाषा कोश परिशिष्ट में विस्तृत वर्णन किया जा चुका है। मुनि, ऋषियों से कुछ भिन्न होते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में मुनि की परिभाषा इस प्रकार निर्दिष्ट है-दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते (गी० २.५६) अर्थात् जो दुःख में उद्विग्न नहीं होता तथा सुख में अनासक्त रहता है, जिसे राग, भय, क्रोध-आदि स्पर्श भी नहीं कर सकते, वही मुनि कहलाता है। गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि मुनि समस्त वासनाओं को त्याग कर एकमात्र विष्णु में ही सतत लीन रहकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करते रहते हैं। वे होम, संध्यावन्दन, तर्पण आदि क्रियाएँ करके धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष प्रदाता भगवान् विष्णु को प्राप्त करते हैं। हिन्दी विश्वकोश खं० १८ पृ० ९० में मुनि की व्युत्पत्ति इस प्रकार वर्णित है-मनुते जानाति यः इति अर्थात् मौनव्रती, मननशील महात्मा। अभिप्राय यह है कि चित्त को एकाग्र करके (मौन रहकर) तपस्वी जीवन जीते हुए मनन करने वाला मुनि है। नैषध महाकाव्य में मुनि की सादृश्यता इन शब्दों में निर्दिष्ट है-फलेन मूलेन च वारिभूरुहां मुनेरिवेत्थं मम यस्य वृत्तयः (नैषधी० १.१३३)। महोपनिषद् में साधक को गुरु और शास्त्र वचन व स्वानुभूति से स्वयं को ब्रह्मरूप में जानने और शोकादि को त्यागकर मुनि बनने की आज्ञा दी गई है-गुरु शास्त्रोक्तमार्गेण स्वानुभूत्या च चिद्घने। ब्रह्मैवाहमिति ज्ञात्वा वीतशोको भवेन्मुनिः (महो० ४.२५)। मरीचि, नारद, कर्दम, अत्रि, दक्ष और वशिष्ठ आदि मुनियों की श्रेणी में ही आते हैं। साधकों की एक अन्य श्रेणी में मुमुक्षु का नाम भी आता है, जिसका अर्थ कोश ग्रन्थों में इस प्रकार विवेचित है-मुमुक्षु मोक्तुमिच्छतीति अर्थात् मुक्ति का अभिलाषी, मोक्ष की इच्छा रखने वाला अथवा वह व्यक्ति जो मुक्ति की कामना करता हो। श्रुति आदेश है कि मुक्तिकामी को चाहिए कि वह वर्जनीय और काम्य कर्म का त्याग करके श्रवण और मनन आदि

परिशिष्ट ३८७ यम के द्वारा ईश्वराराधना में ही निरत रहे। श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म के प्रति स्पृहा न रखने के संदर्भ में भगवान् कृष्ण अर्जुन को उनके पूर्वज मुमुक्षुओं के पदचिह्नों पर चलने का उपदेश देते हैं-एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् (गी० ४.१५)। २५०. मुमुक्षु- द्र०-मुनि। २५१. मूलबन्ध- द्र०-बन्ध। २५२. मूलाधार- द्र०-कुण्डलिनी। २५३. मृत्यु-द्र०-ज्ञानखण्ड-अमृत-मृत्यु। २५४. मोक्ष-द्र०-ज्ञानखण्ड-मुक्ति-मोक्ष। २५५. यज्ञ-द्र०-ज्ञानखण्ड-यज्ञ-अग्निहोत्र। २५६. यज्ञसूत्र (जनेऊ-ब्रह्मसूत्र)-द्र०-ज्ञानखण्ड-यज्ञोपवीत उपनयन। २५७. यज्वा - यज् धातु से निर्मित यज्वा शब्द का प्रयोग याज्ञिक अथवा यज्ञकर्त्ता के अर्थ में किया जाता है। कोश ग्रन्थ में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार निर्दिष्ट है- यज्वन्-यज्+क्वनिप् अर्थात् सविधि (शास्त्रोक्त ढंग से) यज्ञ करने वाला। ब्रह्मोपनिषद् में उपनिषदकार ने शिखा और यज्ञोपवीत धारण करने का मर्म समझाते हुए कहा है कि जो ज्ञानरूपी शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं, सच्चे अर्थों में वे ही ब्राह्मण हैं-शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुः (ब्रह्मो० १४)। यहाँ ज्ञान को ही यज्ञोपवीत की विशेषता बताया गया है; (वैसे सामान्यतः यज्ञोपवीत को यज्ञ का धागा माना जाता है) इसलिए अगले मंत्र में ज्ञान को यज्ञोपवीत और परम परायण कहा गया है। वस्तुतः ज्ञानी और यज्ञमय-त्याग परायण जीवन जीने वाला ही यज्ञोपवीती (यज्ञोपवीतधारी) है। ऐसे साधक को ही यज्ञरूप और यज्वा (यज्वन्) कहा गया है-इदं यज्ञोपवीतं तु परमं यत्परायणम्। स विद्वान्यज्ञोपवीती स्यात्स यज्ञस्तं यज्वानं विदुः (ब्रह्मो० १५)। २५८. यति-द्र०-ज्ञानखण्ड-संन्यासी-यति। २५९. यम - आर्षग्रन्थों में प्रमुखतः योग के आठ अंग प्रतिपादित हैं। ये हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यम और नियमों के अन्तर्गत भी पाँच-पाँच गुण समाविष्ट हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह--ये यम कहलाते हैं- अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः (पातं०यो०प्र०सा०पा०सूत्र-३०)। प्रथम-यम अहिंसा शब्द का अर्थ है-अद्रोह, अनपकार, किसी प्रकार भी किसी को पीड़ा न पहुँचाना। वाचस्पत्यम् में इसका अर्थ इन शब्दों में परिभाषित किया गया है-वेदोक्तेन प्रकारेण विना सत्यं तपोधन। कायेन मनसा वाचा हिंसा हिंसा न चान्यथा।। आत्मा ....वेदान्त वेदिभिः अर्थात् वेदोक्त रीति के बिना मन, वाणी और शरीर के द्वारा किसी को कष्ट पहुँचाना ही हिंसा है; किन्तु किसी के कल्याण के लिए यदि उसे उक्त तीनों प्रकार से कष्ट पहुँचे, तो वह अहिंसा ही कही जायेगी, जैसे-शिक्षार्थ किसी को ताड़ना देना या रोग निवारण हेतु किसी को कटु औषधि देना, आपरेशन करना अहिंसा ही है, वस्तुतः समस्त यम नियमों का मूल अहिंसा है, क्योंकि अहिंसा को परम धर्म कहा गया है-अहिंसा परमोधर्मः। दूसरा-यम सत्य है। किसी वस्तु का यथार्थ ज्ञान सत्य कहलाता है। शरीर द्वारा इसका प्रयोग शरीर का सत्य है। वाणी द्वारा इसका प्रयोग वाणी का सत्य, मन के द्वारा इसका प्रयोग मन का सत्य है। साधारणतः सत्य को वाणी द्वारा व्यक्त करने का ही विषय माना जाता है। इन्द्रियों द्वारा जैसा देखा, सुना और सूँघा है, उसे वाणी द्वारा वैसा कह देना सत्य है- चक्षुरादीन्द्रियैर्दृष्टं श्रुतं घ्रातं मुनीश्वर। तस्यैवोक्तिर्भवेत् सत्यं विप्र तन्नान्यथा भवेत् (जा०दर्शनो० १.२)। वेदान्त में परब्रह्म को ही सत्य माना गया है; क्योंकि वह सर्वकाल में शाश्वत है। उसके अतिरिक्त अन्य कोई सत्य नहीं है-सर्वं सत्यं परं ब्रह्म ...... (जा०दर्शनो १.१०)। वाणी द्वारा यदि ऐसा सत्य कहा जाता है, जो किसी का अहित करता है, तो इसे ऋषियों ने सत्य नहीं माना है। इसीलिए उसने सत्य की मर्यादा सुनिश्चित कर दी है-सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् (मनु०) अर्थात् वह सत्य बोले जो प्रिय (हितकर) हो। अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए। महाभारत ने भी इसी प्रकार के सत्य की पुष्टि की है- सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् यद्भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यं मतं मम। तृतीय- यम अस्तेय अर्थात् चोरी न करना है; किन्तु यह स्थूल धन की चोरी न करने तक ही सीमित नहीं है। किसी के अधिकारों का हनन न करना तथा नैतिक मूल्यों की रक्षा करना भी अस्तेय है। इसके विपरीत अधिकारियों द्वारा

यायावर ३८८ परिशिष्ट रिश्वत लेना, दुकानदारों द्वारा निश्चित या उचित मूल्य से अधिक लेना, कम तौलना, मिलावट करना ये सभी अस्तेय विरोधी हैं। जाबाल दर्शनोपनिषद् में अस्तेय इन शब्दों में निरूपित है- अन्यदीये तृणे रत्ने काञ्चने मौक्तिकेऽपि च। मनसा विनिवृत्तिर्या तदस्तेयं विदुर्बुधाः। आत्मन्यानात्मभावेन ......मुने (जा०दर्शनो० १.१०-१२) अर्थात् किसी दूसरे के तृण (तिनके), रत्न, मणि, मुक्ता, सुवर्ण, धन सम्पदा पर मन भी न चलना अस्तेय है। संसार के सभी व्यवहार अनात्म हैं अर्थात् आत्मा से भिन्न हैं, ऐसा मानने वाले ज्ञानीजन अस्तेय का ही पालन करते हैं। चौथा-यम ब्रह्मचर्य है। शास्त्रों में इसकी बहुत महिमा गायी गई है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार ब्रह्म अर्थात् वेदार्थ का आचरण ही ब्रह्मचर्य है- ब्रह्मचर्यं, क्ली; (ब्राह्मणे वेदार्थे चर्य्यं आचरणीयम्)। सामान्यतः ब्रह्मचर्य का अर्थ अष्ट प्रकार के मैथुन का प्रतिषेध है- ब्रह्मचर्य्यं अष्टाङ्गमैथुन प्रतिषेधः (श०क० खं० ३ पृ० ४४४)। किसी भी प्रकार से वीर्य का क्षय न करना ब्रह्मचर्य माना जाता है। इसकी महिमा बताते हुए हठयोग प्रदीपिकाकार ने कहा है- मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणम् अर्थात् बिन्दु (वीर्य) का पात मरण तथा बिन्दु की रक्षा ही जीवन है। जाबाल दर्शनोपनिषद् में ब्रह्मचर्य इन शब्दों में विवेचित है- कायेन वाचा मनसा स्त्रीणां परिविवर्जनम्। ऋतौ भार्या तदा स्वस्य ब्रह्मचर्यं तदुच्यते ॥ ब्रह्मभावे मनश्चारं ब्रह्मचर्यं परन्तप (जा०दर्शनो० १.१३) अर्थात् मन, वाणी और शरीर से नारी प्रसंग का परित्याग तथा धर्म बुद्धि से ऋतु काल में ही स्त्री प्रसंग ब्रह्मचर्य है। अथर्ववेद में उल्लेख है कि ब्रह्मचर्य तप के द्वारा ही देवों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है- ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत (अथर्व० ११.७.१९) पाँचवाँ-यम अपरिग्रह है। अपनी अनिवार्य आवश्यकता से अधिक वस्तुओं, धनादि का परित्याग अपरिग्रह कहलाता है। विषय वस्तुओं की अस्वीकार करना भी अपरिग्रह है। महर्षि व्यास के अनुसार विषयों में विभिन्न दोष देखकर उन्हें ग्रहण न करना ही अपरिग्रह है-विषयाणामर्जंनरक्षणक्षयसंगहिंसादोषदर्शनादस्वीकरणमपरिग्रहः (साङ्ख्य दर्शन-व्यास भाष्य)। इस प्रकार प्रमुखतः ये पाँच यम ही प्रचलित हैं। कुछ ग्रन्थों में दशविध यम वर्णित हैं। ये अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव (सभी के प्रति समान भाव), क्षमा, धृति, मिताहार और शौच हैं- अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयाऽऽर्जवम्। क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश (जा०दर्शनो० १.६)। २६०. यायावर- द्र०-गृहस्थ। २६१. योग -द्र०-ज्ञानखण्ड। २६२. योगनिद्रा- यौगिक क्रियाओं में योगनिद्रा का भी उल्लेख मिलता है। सामान्यतः निद्रा सुषुप्तावस्था को कहते हैं; किन्तु यौगिक प्रक्रिया से उत्पन्न निद्रा योगनिद्रा कहलाती है,जिसे कोश ग्रन्थों में समाधि का एक अंग कहा गया है। हिन्दी विश्वकोश खं० १८ पृ० ६२२ में उल्लेख है-योगश्चित्तवृत्ति निरोधलक्षणः समाधिस्तद्रूपा निद्रा अर्थात् योग, चित्त वृत्ति का निरोध है, उसका चरमोत्कर्ष समाधि है। समाधि में बाह्यज्ञान नहीं रहता। इसलिए यह अवस्था योगनिद्रा कहलाती है। मण्डलब्राह्मण उपनिषद में भी शुद्ध, अद्वैत, चैतन्य और सहज अमनस्क स्थिति की योगनिद्रा की उपमा दी गई है- शुद्धाद्वैताजाड्यसहजामनस्कयोगनिद्रा.....जीवन्मुक्तो भवति (मं०ब्रा०उ० २.५.२)। इस मंत्र की टीका में ब्रह्मयोगी ने उपर्युक्त स्थिति को निर्विकल्प समाधि कहा है-अजाड्य.....निर्विकल्प समाधिः (मं०ब्रा०उ० २.५.२ टीका)। २६३. योगी- द्र०-ज्ञानखण्ड -योग। २६४. योनि- द्र०-ज्ञानखण्ड। २६५. राजयोग- द्र०-मन्त्रयोग। २६६. रुद्र- द्र०-त्र्यम्बक। २६७. लक्ष्यत्रय- इस शब्द का उल्लेख उपनिषदों में प्राप्त होता है। भ्रूमध्य स्थित सच्चिदानन्द स्वरूप चेतन पुञ्ज ब्रह्म (तारक ब्रह्म) का दर्शन प्राप्त करने के लिए लक्ष्यत्रय का अवलोकन करने का विवेचन मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् में इन शब्दों में निर्दिष्ट है-भ्रूमध्ये सच्चिदानन्दतेजः कूटरूपं .....तदाप्त्युपायं लक्ष्यत्रयावलोकनम् (मं०ब्रा० उ० १.२.४- ५)। ब्रह्मदर्शन में जिन तीन प्रकार की दर्शन प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाता है और उनमें जिन रंग विशेषों व स्थितियों का दर्शन होता है, वे ही तीन प्रकार के दर्शन लक्ष्यत्रय के नाम से जाने जाते हैं। बाह्य लक्ष्य, मध्य लक्ष्य और अन्तर्लक्ष्य- ये ही त्रिलक्ष्य (लक्ष्यत्रय) हैं। ज्योति (ब्रह्मज्योति) के दर्शन में सर्वप्रथम योगी को नासिका के अग्रभाग से चार, छः, आठ, दस और बारह अंगुल की दूरी पर क्रमशः नीला, काला, रक्त, पीत और दो रंगों के संमिश्रण जैसे रंग का आकाश

दिखाई पड़ता है, यही बाह्य लक्ष्य है-बहिर्लक्ष्यं तु नासाग्रे चतुःषडष्टदश-द्वादशाङ्गुलीभिः .......व्योमत्वं पश्यति स तु योगी (मं० ब्रा०उ० १.२.८)। मध्य लक्ष्य का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है- प्रातः काल में (ध्यान करने पर) सूर्य, चन्द्र और अग्नि को ज्वालाओं के समान और उससे रहित अन्तरिक्ष-सम दिखाई पड़ता है। वह उसी के आकारवत् आकारयुक्त हो जाता है। यही मध्य लक्ष्य है-मध्यलक्ष्यं तु प्रातःश्चित्रादिवर्णसूर्य चन्द्र वह्निज्वालावलीवन्न- द्विहीनान्तरिक्षवत्पश्यति। तदाकाराकारी भवति (म०ब्रा०उ०१.२.११-१२)। इसी उपनिषद् में अन्तर्लक्ष्य का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है कि अन्तर्लक्ष्य दीप्तिमान् ज्योति के समतुल्य है, बाह्य और आन्तरिक इन्द्रियों द्वारा अगोचर इसे महर्षिगण ही (पूर्णतः) जान सकते हैं-अन्तर्लक्ष्यं जलज्योतिः स्वरूपं भवति। महर्षिवेद्यं अन्तर्बाह्येन्द्रियैरदृश्यम् (मं०ब्रा०उ० १.३.६)। अन्तर्लक्ष्य के विषय में विभिन्न विद्वानों के पृथक्-पृथक् मत हैं। कोई इसे सहस्रार दल में दीप्तिमान् ज्योति के समतुल्य मानते है, कोई बुद्धि रूपी गुहा में सर्वाङ्ग सुन्दर पुरुष के रूप को अन्तर्लक्ष्य मानते हैं, कोई शीर्ष के अन्तर्गत स्थित मण्डल के बीच में स्थित पंचमुखी और उमा सहित महेश्वर का प्रशान्त रूप ही अन्तर्लक्ष्य मानते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष ही अन्तर्लक्ष्य है-सहस्रारे जलज्योतिरान्तर्लक्ष्यम्। बुद्धिगुहायां ...........अङ्गुष्ठ मात्रः पुरुषोऽन्तर्लक्ष्यमित्येके (मं०ब्रा०उ० १.४.१)। उपर्युक्त समस्त विकल्प आत्मा के ही हैं। अस्तु, उस अन्तर्लक्ष्य का जो पुरुष शुद्धात्मा दृष्टि से दर्शन करता है, वह ब्रह्मनिष्ठ कहलाता है-उक्तविकल्पं सर्वमात्मैव। तल्लक्ष्यं शुद्धात्मदृष्ट्या वा यः पश्यति स एव ब्रह्मनिष्ठो भवति (मं०ब्रा०उ० १.४.२)। अन्तर्लक्ष्य का दर्शन कर लेने से जीव जीवन्मुक्त स्थिति की ओर अग्रसर होकर, स्वयं अन्तर्लक्ष्य होकर परमाकाश स्वरूप अखण्ड मण्डलाकार हो जाता है। २६८. लययोग- द्र०-मन्त्रयोग। २६९. लिङ्ग शरीर - द्र०-पुर्यष्टक। २७०. लोक- द्र०- ज्ञानखण्ड-लोक-परलोक-समलोक। २७१. वज्रोली मुद्रा- द्र०-मुद्रा। २७२. वर्णाश्रम- द्र०-ज्ञानखण्ड-चतुराश्रम एवं चतुर्वर्ग। २७३. वानप्रस्थ - चारों आश्रमों में ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के पश्चात् तीसरा आश्रम वानप्रस्थ कहलाता है। इसमें गृहस्थ व्यक्ति परिवार को जिम्मेदारियों को निपटाकर पुत्रादि पर परिवार के दायित्व सौंप कर अगले चरण में पत्नी सहित पवित्र जीवन जीकर आत्म कल्याण और लोक सेवा के कार्यों में अपने जीवन के पच्चीस वर्ष लगाता है। हलायुध कोश में वानप्रस्थ को परिभाषा इन शब्दों में विवेचित है-वानप्रस्थः पुं० (वनप्रस्थे भवः, अण्) वैखानसः, तृतीयाश्रमः पुत्रमुत्याद्य वनवासं कृत्वा अकृष्टपच्यफलादिभक्षयित्वा ईश्वराराधन करोति यःसः (हला० पृ० ६००) अर्थात् वानप्रस्थी पुत्रोत्पत्ति के पश्चात् वन में निवास करता हुआ स्वयं उत्पन्न तथा स्वयं पके फलादि का सेवन करके ईश्वराराधन करता है। आश्रम उपनिषद् मंत्र ३ में वानप्रस्थी के चार भेद बताये गये हैं- वैखानस, उदुम्बर, वालखिल्य तथा फेनप-वानप्रस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वैखानसा उदुम्बरा बालखिल्याः फेनपाश्चेति। इनमें वैखानस वानप्रस्थी वे कहलाते हैं, जो स्वयं उत्पन्न तथा पकी हुई औषधियों तथा वनस्पतियों, जो ग्रामीणों द्वारा उपेक्षित है, में अग्नि संचार कर उदरपूर्ति करते हुए नियमित पञ्च महायज्ञ [वानप्रस्थी के लिए नियमित पाँच यज्ञ ब्रह्मयज्ञ (वेदाध्ययन व वेदाध्यापन), देवयज्ञ (अग्निहोत्र), पितृयज्ञ (श्राद्ध-तर्पण), अतिथि यज्ञ अथवा मनुष्य यज्ञ (अतिथिसेवा) और भूतयज्ञ (बलिवैश्व आदि- चींटी, कीड़े, कुत्ते, गौ व मछलियों आदि को भोजन कराना) करने का विधान है] सम्पन्न करते हुए आत्मा को साधना करते हैं-तत्र वैखानसा अकृष्ट पच्यौषधिवनस्पतिभिर्ग्रामबहिष्कृताभिरग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ३)। उदुम्बर वानप्रस्थी उन्हें कहते हैं, जो प्रातः उठकर जिस दिशा में भी देखें उधर जाकर उदुगरि (गूलर), बदर (बेर), नीवार और श्यामाक (साँवाँ) आदि का संग्रह करके उनमें अग्नि संचार करके पञ्च महायज्ञों को क्रियाएँ सम्पन्न करते हुए जीवन को साधना करते हैं-उदुम्बराः प्रातरुत्थाय यां दिशमभिप्रेक्षन्ते.....आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ३)। उल्लेखनीय है कि गूलर आदि का सेवन करने के कारण इन वानप्रस्थियों का नाम उदुम्बर पड़ा है। कुछ उपनिषदों में 'औदुम्बर' पाठ भी मिलता है।

वार्त्ताक वृत्ति ३१० परिशिष्ट

बालखिल्य वानप्रस्थी वे कहलाते हैं, जो जटाधारण करके फटे वस्त्र और वृक्ष की छालों को शरीर का आवरण बनाते हुए, आठ मास (मार्गशीर्ष मास से आषाढ़ मास) तक उपार्जित पुष्प-फल आदि (शाक-कन्दमूलादि फल और अन्नों) को ग्रहण करते हुए (उन आठ मासों के अतिरिक्त आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिकी पूर्णिमा के चार महीने-चातुर्मास्य तक भी वही आठ मास में उपार्जित पदार्थ ग्रहण करते हुए) कार्तिकी पूर्णिमा को सभी संचित भक्ष्य पदार्थ त्याग देते हैं अर्थात् कार्तिकी पूर्णिमा के बाद फिर नया उपार्जन करके ही ग्रहण करते हैं। इस तरह वे इन संचित भोज्य पदार्थों में अग्नि संचरण करते हुए पञ्चमहायज्ञों को सम्पन्न करते हुए आत्मा को प्रार्थना (साधना) करते हैं। आश्रम उपनिषदकार ने यह तथ्य इन शब्दों में प्रतिपादित किया है-वालखिल्य जटाधराश्चीरचर्मवल्कल-परिवृताः कार्त्तिक्यां पौर्णमास्यां पुष्पफलमुत्सृजन्तः शेषानष्टौ...प्रार्थयन्ते (आश्रामो० ३)। उल्लेखनीय है कि कुछ ग्रन्थों में वालखिल्य के स्थान पर बालखिल्य और बालिखिल्य पाठ भी मिलते हैं। फेनप वानप्रस्थी के लक्षण यह हैं कि वे विक्षिप्तवत् रहते हुए, शीर्ण पर्ण-फल (अपने आप गिरे हुए पत्ते और फल) ग्रहण कर उनमें अग्नि परिचरण करते हुए, जहाँ कहीं भी स्थान मिल जाये, वहीं निवास करते हुए, नियमित पञ्च महायज्ञादि क्रियाएँ सम्पन्न करते हुए आत्म साधना में निरत रहते हैं- फेनपा उन्मत्तकाः शीर्णपर्णफलभोजिनो यत्र तत्र वसन्तोऽग्निपरिचरणं कृत्वा आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो०३)। इन वानप्रस्थियों का नाम फेनप पड़ने का कारण अड्यार प्रकाशित माइनर उपनिषद् में आश्रमो०की टिप्पणी में लिखा है- फेनपाः स्वयं पतित पर्णफलादिकं फेनो नामेति केचित् अर्थात् कुछ विद्वानों का मानना है कि स्वयं गिरने वाले पत्ते और फलों को फेन कहते हैं। अतः इन्हें ग्रहण करने के कारण इन वानप्रस्थियों का नाम भी फेनप पड़ गया है। श्रीमद्भागवत के ३.१२. ४३ वें श्लोक की व्याख्या में फेनप उन्हें बताया गया है, जो (दूध पीते समय) बछड़े के मुख से गिरने वाले दूध के फेन से जीवनयापन करते हैं-फेनपा ........वत्समुखगलितपयःफेनपानेन जीवन्त इति। २७४. वार्त्ताक वृत्ति — द्र०-गृहस्थ। २७५. वालखिल्य — द्र०-वानप्रस्थ। २७६. वासनात्रय- वासना शब्द का उपयोग सामान्यतः आसक्ति अथवा विषम लिङ्गियों (स्त्री-पुरुषों) में परस्पर काम वासना को प्रगाढ़ता के अर्थ में किया जाता है; किन्तु कोश ग्रन्थों में इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार प्रतिपादित है-वासयति कर्मणा योजयति जीवमनांसीति वस-णिच्-युच्-टाप् (हि० वि० को० खं० २१ पृ० २३०) जिसके अनेक अर्थ है, जैसे-प्रत्याशा, ज्ञान, संस्कार, स्मृति, हेतु, भावना, इच्छा, कामना आदि। किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति अत्यधिक स्नेह या मोह के कारण उससे सम्बन्धित कोई प्रसङ्ग उपस्थित होते ही उसका संस्कार अथवा वासना जाग पड़ती है, जिससे वह तत्सम्बन्धित कार्य करने को समुद्यत हो उठता है। जैसे कोई लेखक या कवि जो नदी, सरोवर, बगीचे आदि के निकट लेख या कविता लिखने का अभ्यासी है। यदि वह कहीं बाहर गया हुआ है और वहाँ भी उसे ऐसा ही वातावरण मिल जाए, तो उसके अन्दर कुछ लिखने के भाव जाग्रत् होने लगते हैं; इसे ही उसका संस्कार या वासना का जागना कहेंगे। वासनाएँ तीन प्रकार को मानी गयी है, जिन्हें उपनिषदों में वासनात्रय के नाम से जाना जाता है। ये हैं-देह सम्बन्धी वासना, मन सम्बन्धी वासना और बुद्धि सम्बन्धी वासना। संन्यासोपनिषद् (२-२०) के वासनात्रय के अन्तर्गत देह वासना, शास्त्र वासना तथा लोक वासना का भी उल्लेख किया गया है। परमहंस परिव्राजकोपनिषद् में मुमुक्षु को निर्देश दिया गया है कि वह सद्गुरु से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर इहलोक और परलोक के सुखों के वास्तविक स्वरूप को समझकर एषणात्रय, वासनात्रय, ममता और अहंकारादि को वमन किए (उल्टी किए) हुए अन्न के समतुल्य समझकर मोक्ष के एक मात्र साधन ब्रह्मचर्याश्रम को पूरा करके गृहस्थ बने, तदुपरान्त वानप्रस्थी और इसके पश्चात् संन्यास आश्रम ग्रहण कर प्रव्रज्या करे-सद्गुरु समीपे ....... ज्ञात्वैषणात्रय वासनात्रय ममत्वाहंकारादिकं वमनान्नमिव ......प्रव्रजेत् (परम० प० २)। इस मंत्र को टीका में ब्रह्मयोगी ने वासनात्रय को देहादि वासनात्रय कहकर वासना के तीनों रूपों की ओर संकेत किया है- न कदापि संसारमण्डले ..........देहादि वासनात्रय .... ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। इस प्रकार क्रमशः ब्रह्मचर्याश्रम से गृहस्थ, गृहस्थ से वानप्रस्थ और इसके पश्चात् संन्यास धारण करने के अतिरिक्त एक पथ और है कि जब कभी भी पूर्ण वैराग्य उत्पन्न हो जाये (वासनात्रय, एषणात्रय, आदि दोषों से मुक्त हो जाये), तभी प्रव्रज्या आश्रम अर्थात् संन्यास आश्रम ग्रहण किया जा सकता है। इस स्थिति में संन्यास ग्रहण करने के लिए क्रमशः आश्रम ग्रहण करना, व्रती (व्रतधारण करने वाला), पुनर्ब्रती, स्नातक, अस्नातक, अग्निहोत्री अथवा उससे रहित होना आवश्यक नहीं है।

परिशिष्ट ३९१ विरज २७७. विक्षेप — द्र०-अज्ञान-आवरण। २७८. विज्ञान—द्र०-ज्ञानखण्ड -ज्ञान-विज्ञान। २७९. विज्ञानात्मा— विज्ञानात्मा शब्द वस्तुतः विशेषण सहित जीवात्मा के स्वरूप का बोधक है। इसका उल्लेख उपनिषदों में मिलता है। विज्ञानात्मा शब्द का सामान्य अभिप्राय विज्ञान अर्थात् विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न जीवात्मा से है। वेदान्त के अनुसार स्थिति भेद से इस जीवात्मा की ही प्राज्ञ, विश्व और तैजस संज्ञाएँ होती हैं। १०८ उपनिषद् ज्ञानखण्ड के परिशिष्ट के 'प्राज्ञ' प्रकरण में यह द्रष्टव्य है। इनमें स्थूल शरीर के व्यष्टि उपहित चैतन्य को विश्व कहते हैं। (यही समष्टि उपहित चैतन्य के रूप में वैश्वानर कहलाता है।) इसी विश्वसंज्ञक जीवात्मा को प्रज्ञात्मा की संज्ञा प्रदान की गई है। विराट् पुरुष (समष्टिगत वैश्वानर) ही ईश्वर की आज्ञा से व्यष्टि रूप देह में प्रविष्ट होकर बुद्धि तत्त्व में निवास करके विश्व कहलाता है। इसी विश्व को विज्ञानात्मा, चिदाभास, व्यावहारिक, जाग्रत्, स्थूल देहाभिमानी और कर्म-भू आदि कहते हैं। इस सन्दर्भ में पैङ्गलोपनिषद् में उल्लेख है-ईशाज्ञया विराजो व्यष्टिदेहं प्रविश्य बुद्धिमधिष्ठाय विश्वत्वमगमत्। विज्ञानात्मा चिदाभासो विश्वो व्यावहारिको ......... नाम भवति (पैङ्गलो० २.६) अर्थात् व्यष्टि देह में प्रविष्ट होने पर बुद्धि में वास करके विश्व अथवा प्रज्ञात्मा कहलाता है। वेदान्त के मत में यह विराट् ही सूक्ष्म शरीर का परित्याग किये बिना स्थूल शरीर में प्रविष्ट हो जाता है और विश्व के सभी शरीरों में प्रवेश करने की क्षमता के कारण ही इसे विश्व कहते हैं। इस तथ्य की पुष्टि करने हुए स्वामी रामतीर्थ लिखते हैं-सर्वंथा विश्वशरीरवर्तित्वाद् विश्व इत्युक्तं भवति (वे०सा०विद्व०खं०१७)। विषयों का ज्ञान और उपभोग जाग्रत् स्थिति में यही विश्व या विज्ञानात्मा १९ मुखों (पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच प्राणों, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) द्वारा करता है- जागरित स्थानो बहिः प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूल भुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः (माण्डू०३)। प्रश्नोपनिषद् में इस विज्ञानात्मा को द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता और घ्राता आदि कहकर इसी तथ्य की पुष्टि की गई है- एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षरे आत्मनि संप्रतिष्ठते (प्रश्नो०४.९)। २८०. विद्या-ज्ञान— द्र०-ज्ञानखण्ड। २८१. विधाता— द्र०-ज्ञानखण्ड -विधाता-धाता। २८२. विनियोग— वि-नि-युज् और घञ् से निर्मित विनियोग शब्द के कई अर्थ हैं। जैसे-किसी फल के उद्देश्य से किसी वस्तु का उपयोग, किसी विषय में लगाना, प्रयोग, वैदिक कृत्य में मन्त्र विशेष का प्रयोग, प्रेषण, प्रवेश आदि। इन कई अर्थों में से 'वैदिक कृत्य में किसी मन्त्र के प्रयोग' के सन्दर्भ में पहले से ही गायत्री साधना करते समय विश्वामित्र और वसिष्ठ के शाप विमोचन हेतु एक विशेष मन्त्र द्वारा विनियोग किया जाता रहा है। (वर्तमान में तो युग ऋषि द्वारा गायत्री साधना को शाप मुक्त कर देने के कारण इसकी आवश्यकता नहीं पड़ती)। कई उपनिषदों में किसी वस्तु या साधना प्रक्रिया के प्रयोग के अर्थ में विनियोग शब्द प्रयुक्त हुआ है। जैसे-जाबालदर्शनोपनिषद् में प्राणायाम के विभिन्न प्रकारों का विनियोग (प्रयोग) विभिन्न रोगों के निरसन हेतु निर्दिष्ट है-विनियोगान् प्रवक्ष्यामि प्राणायामस्य सुव्रत। ...........सर्वरोग विनिर्मुक्तो जीवेद्वर्षशतं नरः (जा०दर्शनो० ६.२१,२३)। २८३. विपर्यास ( विपर्यय ) — द्र०-अध्यारोप-अपवाद। २८४. विभु— कोश ग्रन्थों में विभु शब्द के कई अर्थ संप्राप्य हैं, यथा-प्रभु, स्वामी, शंकर, ब्रह्मा, भृत्य, विष्णु, आत्मा, जीवात्मा, ईश्वर, सर्वव्यापक, सर्वत्रगमनशील, रात, दिन, बहुत बड़ा, विस्तृत, महान् और ऐश्वर्ययुक्त आदि। वेद, पुराणों और उपनिषदों में इस जगत् में उस विराट् ब्रह्म की सर्वव्यापकता के प्रतिपादन में भी कई स्थलों पर विभु शब्द का प्रयोग मिलता है। पैङ्गलोपनिषद् में ईश्वर के ऐश्वर्य, महानता और स्वामित्व को प्रदर्शित करने के लिए ईश्वर के साथ विभु विशेषण प्रयुक्त हुआ है। पैङ्गल ऋषि ने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया कि समस्त लोकों की सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाला विभु ईश्वर किस प्रकार जीवत्व को प्राप्त हुआ-अथ पैङ्गलो याज्ञवल्क्यमुवाच सर्वलोकानां सृष्टिस्थित्यन्तकृद्विभुरीशः कथं जीवत्वमगमदिति (पैङ्गलो० २.१)। इसके उत्तर में याज्ञवल्क्य जी ने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की उत्पत्ति सहित विभु ईश्वर के स्वरूप का विवेचन किया। इस प्रकार सर्वव्यापकत्व, विराट्, महान् आदि अर्थों में विभु शब्द का प्रयोग अनेक स्थलों पर प्राप्त होता है। २८५. विरज— सामान्यतः रज (धूल) रहित वस्तु को विरज कहते हैं; किन्तु आध्यात्मिक सन्दर्भों में रज अर्थात् रजोगुण

श्राद्ध-तर्पण ३१४ परिशिष्ट ३०९. श्राद्ध -तर्पण - द्र०-ज्ञानखण्ड -श्राद्ध। ३१०. श्रुति-द्र०-ज्ञानखण्ड -श्रोत्रिय। ३११. श्रोत्रिय-द्र०-ज्ञानखण्ड। ३१२. षडूर्मियाँ-षड्भाव विकार - उपनिषदों में कई स्थलों पर षडूर्मियों और षड्भाव विकारों का वर्णन प्राप्त होता है। साधक के विभिन्न स्तरों के अनुरूप उनकी दिनचर्या और नियम भी भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे यति (संन्यासी) के लिए आचरणीय विभिन्न नियमों का उल्लेख करते हुए प्रजापति ब्रह्मा ने नारद से कहा कि यति को षडूर्मिरहित और षड्भाव विकारों से शून्य रहना चाहिए-अयत्नेन प्राप्तमाहरन् ........षडूर्मिरहितः, षड्भाव विकार शून्यः, ........स्वरुपानुसंधानेन वसेत् (ना०परि० ७.१)। कोशग्रन्थों में छः प्रकार की ऊर्मियाँ (तरङ्गैं) वर्णित हैं- बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य मनसः स्मृतौ । शोक मोहौ शरीरस्य जरामृत्यू षडूर्मयः (वाच०पृ० १३९३) अर्थात् भूख और प्यास प्राण से सम्बन्धित, शोक और मोह मन से सम्बन्धित तथा जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु, ये शरीर से सम्बन्धित छः ऊर्मियाँ हैं। इसी प्रकार छः प्रकार के भाव विकार भी होते हैं, जिनसे संन्यासी को दूर रहने का परामर्श दिया जाता है। छः भाव विकारों का उल्लेख निरुक्तकार यास्क ने इन शब्दों में किया है- षड् भावविकारा भवन्तीति वार्ष्यायणिः ॥ .......जायतेऽस्ति, विपरिणमते, वर्धते, ऽपक्षीयते, विनश्यतीति (नि० १.१.३) अर्थात् जन्म (उत्पन्न होना), अस्तित्व (विद्यमान रहना), विपरिणमन (परिवर्तित होना), विकास (बढ़ना या विकसित होना), अपक्षय (क्षीण होना) और विनाश (पूर्णतः विनष्ट हो जाना) - ये ही षड्भाव विकार हैं। संन्यासी (यति) को आत्मज्ञान प्राप्त करके इन भाव विकारों से ऊँचा उठना चाहिए। वैशेषिक दर्शन में पदार्थ के षड्भाव इस प्रकार निर्दिष्ट हैं-द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। इसी प्रकार ज्योतिष की दृष्टि से लज्जित, गर्वित, क्षुधित, तृषित, मुदित और क्षोभित ये षड्भाव कहलाते हैं; किन्तु उपनिषदों में जहाँ भी परमहंस, अवधूत, संन्यासी आदि को षड्भाव विकार शून्य होने का निर्देश दिया गया है, वहाँ उपर्युक्त जन्म, अस्तित्व आदि षड्भाव विकारों से ही तात्पर्य है। परमहंस परिव्राजकोपनिषद् में भी अयज्ञोपवीती, अशिखी तथा सर्व कर्म परित्यागी ब्रह्मनिष्ठ परमहंस परिव्राजक के लक्षण बताते हुए उसे निन्दा, अमर्ष (क्रोध), सहिष्णु, षडूर्मिवर्जित और षड्भाव विकार शून्य होकर ज्येष्ठ-अज्येष्ठ के व्यवधान से रहित होने वाला विवेचित किया गया है- लोके परमहंस परिव्राजको दुर्लभतरः ...........स निन्दामर्ष सहिष्णुः स षडूर्मिवर्जितः। षड्भाव विकार शून्यः। स ज्येष्ठाज्येष्ठव्यवधान रहितः ..... परमहंस परिव्राडित्युपनिषत् (परम० प० ५)। इस प्रकार परमहंस- संन्यासी को उपर्युक्त गुणों को अपनाकर समस्त इन्द्रियों पर संयम (नियंत्रण) रखते हुए सतत ब्रह्मभाव में ही स्थित रहना चाहिए, ऐसा परमहंस ब्रह्मरूप ही हो जाता है। ३१३. षड्भाव विकार-द्र०-षडूर्मियाँ-षड्भाव विकार। ३१४. षड्रिपु -द्र०-ज्ञानखण्ड षड्रिपु-षड्वर्ग। ३१५. षण्मुखी मुद्रा-द्र०-मुद्रा। ३१६. षोडश कला - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३१७. संन्यास - द्र०-ज्ञानखण्ड -चतुराश्रम। ३१८. संन्यासी - द्र०-ज्ञानखण्ड -संन्यासी-यति। ३१९. संयम -द्र०-षडूर्मियाँ-षड्भाव विकार। ३२०. संवत्सर - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३२१. सत्य - द्र०-यम। ३२२. सदानन्द - द्र०-अद्वयानन्द। ३२३. सद्गति - द्र०- सद्गुरु। ३२४. सद्गुरु - ज्ञानाञ्जन शलाका से अज्ञान रूपी तिमिरान्धता को दूर करने वाले को गुरु शब्द से अभिहित किया गया है। इस सन्दर्भ में यह श्लोक प्रसिद्ध है- अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ कोशग्रन्थों में 'गु' शब्द को अन्धकार वाची और 'रु' को प्रकाशवाची माना गया है। इस मान्यता के अनुसार भी

परिशिष्ट ३९५ सन्धि अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला गुरु होता है। गायत्री मंत्र के उपदेष्टा को भी गुरु कहते हैं; क्योंकि प्राचीनकाल में कोई भी गुरु अपने शिष्य को सर्वप्रथम गायत्री मंत्र ही दिया करता था। इसीलिए गायत्री मंत्र को गुरुमंत्र कहा जाने लगा और गुरु को गायत्रीरूप। इसी सन्दर्भ में आचार्य शंकर का यह श्लोक द्रष्टव्य है-नमोऽस्तु गुरवे तस्मै, गायत्रीरूपिणे सदा। यस्य वागमृतं हन्ति विषं संसार संज्ञकम् ॥ मनुस्मृति में गुरु की परिभाषा इस प्रकार निर्दिष्ट है- निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि । सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते (मनु० २.१४२) अर्थात् जो निषेक (गर्भाधान) आदि संस्कारों को विधिवत् कराकर अन्नादि से पालन-पोषण करता है, उसे गुरु कहते हैं। इस परिभाषा के अनुसार माता-पिता प्रथम गुरु हैं, तत्पश्चात् पुरोहित आदि। तप, पुण्य, ज्ञान आदि समस्त गुणों से सम्पन्न तथा शिष्य का हर प्रकार से कल्याण करने वाले को सद्गुरु कहते हैं। दूसरे शब्दों में उत्तम गुण युक्त विशिष्ट गुरु को 'सद्गुरु' कहते हैं। जिसके पास समस्त सद्गुण, विद्वत्ता और क्रियाशीलता (तपश्चर्या) होती है, वे ही सच्चे अर्थों में सद्गुरु कहलाते हैं। तन्त्र सार में सद्गुरु के लक्षण इस प्रकार विवेचित हैं- जो शान्त, दान्त, कुलीन, विनीत, शुद्ध भाव सम्पन्न, पवित्र स्वभाव, कार्यदक्ष, तन्त्र-मन्त्रज्ञ, शिष्य को अनुशासन में रखने तथा उन पर अनुग्रह करने आदि में समर्थ है, वही सद्गुरु कहलाने योग्य है-सिद्ध तपस्वी कुशलः तन्त्रज्ञः सत्यभाषिता। निग्रहानुग्रहे शक्तो गुरुरित्यभिधीयते ॥ शान्तो दान्तः ..............कर्मभिः (तं०सा०सं० १.२६-२७)। बहुत जन्मों के पुण्य फल से सद्गुरु की प्राप्ति होती है। वेदान्त सार में उल्लेख है कि जिन मुमुक्षुओं के शम, दम, उपरति, तितिक्षा आदि साधन सिद्ध हो चुके हों, उन्हें ब्रह्मनिष्ठ-श्रोत्रिय सद्गुरु के पास जाकर 'तत्त्वमस्यादि' का उपदेश प्राप्त करना चाहिए। नारद परिव्राजकोपनिषद् में भी गुरु-सद्गुरु के गुण निर्दिष्ट हैं। संन्यास धारण के क्रम में ब्रह्मा ने नारद से कहा कि जिस श्रेष्ठ कुलोत्पन्न और माता-पिता के आज्ञाकारी बालक का उपनयन न हुआ हो, उसका उपनयन कराकर माता-पिता उस बालक को किसी श्रोत्रिय, शास्त्रों के अनुरागी, श्रद्धावान्, गुणवान् और श्रेष्ठ कुलोत्पन्न सद्गुरु के पास रहने के लिए भेजें-भो नारद .....श्रद्धावन्तं सत्कुलभवं श्रोत्रियं .....सद्गुरुमासाद्य नत्वा संन्यस्तुमर्हतीत्युपनिषद (ना० परि० २.२)। सद्गुरु पाकर शिष्य का जीवन धन्य हो जाता है और वह इहलोक में सब तरह समुन्नत होकर परलोक में भी सद्गति प्राप्त करता है। हिन्दी विश्वकोश के अनुसार- सती गतिर्यस्य अर्थात् जिसकी उत्तम विशिष्ट गति हो वह सद्गति सम्पन्न कहा जाएगा। मुक्ति, निर्वाण आदि को भी सद्गति माना गया है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा की उच्च लोकों में जो गति होती है, उसे ही सद्गति कहते हैं। पाप से असद्गति और पुण्य करने से सद्गति प्राप्त होती है, ऐसा शास्त्रों में उल्लेख है। वटुकोपनिषद् में परब्रह्म का एक नाम 'एक' भी बताया गया है। उस एक में ही समस्त प्राणी विलीन होते तथा एक से ही सृजित होते हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिणादि तीर्थों में भ्रमण करने वाले उस 'एक' ब्रह्म हेतु ही वहाँ जाते हैं और उन सभी की सद्गति होती है-अथ कस्मादुच्यत .......... तीर्थमेके व्रजन्ति ........तेषां सर्वेषामिह सद्गतिः (वदुको०)। इस प्रकार जो साधक सद्गुरु की आज्ञा से सत्पथ पर चलते हैं, उनकी सद्गति सुनिश्चित है। ३२५. सन्तोष - द्र०-नियम । ३२६. सन्धि- सन्धि शब्द का प्रयोग कई प्रयोजनों के निमित्त होता है। हिन्दी विश्वकोश सं० २३ पृ० ५५१ में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार प्रतिपादित है- सन्धानमिति-सम्-धा-कि। इस व्युत्पत्ति के अनुसार सन्धि शब्द के अनेक अर्थ हैं, जैसे राजाओं के बीच कुछ विवादों को निपटाने के लिए परस्पर कुछ समझौता कर लेना सन्धि कहलाती है। इसी प्रकार शरीर में अस्थियों के विभिन्न जोड़ों को भी सन्धि कहते हैं। व्याकरण की दृष्टि से दो वर्णों (स्वर, व्यंजन या विसर्ग) के मिलन को भी सन्धि कहते हैं। व्याकरण में इन्हें क्रमशः स्वर-सन्धि, व्यंजन सन्धि और विसर्ग सन्धि कहा जाता है। दो युगों के मध्य को भी सन्धि अथवा सन्ध्या कहते हैं। दिन और रात्रि के मिलन काल को भी सन्धि या सन्ध्या कहते हैं। सन्ध्याएँ तीन होती हैं - प्रातः काल, मध्याह्न और सायंकाल । इन्हें त्रिसन्ध्या या त्रिसन्धि भी कहते हैं। प्रत्येक सन्धि या सन्ध्या में गायत्री जप अथवा ईश्वर उपासना का विधान है। सन्धिकालों अथवा सन्ध्याओं में की गई उपासनाएँ विशेष रूप से फलित होती हैं। इसमें ध्यान सम्यक् रूप से लगता है, इसीलिए सन्ध्या शब्द की व्युत्पत्ति में यह भाव ध्वनित होता है-सन्ध्या (सं० स्त्री) सं सम्यक् ध्यायत्यस्यामिति सं+ध्यै चिन्तने+आतश्चोपसर्गे (श०क० खं० ५ पृ० २४१)। द्विजातियों के लिए नियमित रूप से सन्ध्या करना अनिवार्य माना गया है। श्रुति में उल्लेख है- अहरहः सन्ध्यामुपासीत (हि०वि०को०खं० २३ पृ० ५५४)। आरुण्युपनिषद् में संन्यासी के कर्तव्यों के क्रम में निर्दिष्ट है कि उसे तीन सन्ध्याओं में स्नान करके समाधिस्थ होकर आत्मा में रमण करना चाहिए- त्रिसंध्यां स्नानमाचरेत् संधिं समाधावात्मन्याचरेत्

संध्या ३९६ परिशिष्ट

(आरुणि० २)। परमहंसोपनिषद्-२ में परमहंस के लक्षणों में उसे स्थूल शिखा, यज्ञोपवीत, दण्ड आदि से रहित होकर षडूर्मियों व अन्य कलुषों से रहित होना बताया गया है। उसी क्रम में आत्मा-परमात्मा में समभाव रखना और इनको एक ही दृष्टि से देखना उसकी संध्या बताया गया है-परमात्मात्मनोरेकत्वज्ञानेन तयोर्भेद एक एव विभग्नः सा सन्ध्या। ३२७. सन्ध्या-द्र०-सन्धि। ३२८. समाधि-द्र०-ज्ञानखण्ड। ३२९. सम्प्रसाद - विशेषतः 'सम्यक् प्रसन्नता' के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले 'सम्प्रसाद' शब्द का उल्लेख कई ग्रन्थों में मिलता है। हि०वि०को० खंड २३ पृ० ६३३ के अनुसार सम्-प्र-घञ् से निर्मित सम्प्रसाद शब्द के कई अर्थ हैं, जैसे-सम्यक् प्रसाद, चित्त की प्रसन्नता, योग शास्त्र के अनुसार चित्त की निर्मलता की एक साधना विशेष, सुषुप्ति, प्रसन्नता और विश्वासादि। परब्रह्मोपनिषद् में परब्रह्म के ध्यान की स्थिति और उसके स्वरूप के विषय में बताते हुए उसे देवों का संप्रसाद दाता, अन्तर्यामी, असङ्ग, चैतन्य स्वरूप पुरुष कहा है-य एष देवोऽन्यदेवस्य संप्रसादोऽन्तर्याम्य-सङ्गचिद्रूपः पुरुषः (परब्रह्मो० २)। सुबालोपनिषद् में सूक्ष्म कोश में स्वप्न के अनुभव प्रकरण में (आनन्दानुभूति के क्रम में) आत्मा को भी सम्प्रसाद कहा गया है-अथेमा...............लोकं परं च लोकं पश्यति सर्वाञ्छब्दान् विजानाति स संप्रसाद इत्याचक्षते प्राणः शरीरं परिरक्षति (सुबालो० ४.३) अर्थात् जिस द्वितीय कोश में आत्मा जब शयन करता है, लोक और परलोक का दर्शन करता है और समस्त शब्दों को जानता है, तब उसे सम्प्रसाद कहते हैं। ३३०. सहजौली मुद्रा - द्र०-मुद्रा। ३३१. सहस्रार चक्र - द्र०-ज्ञानखण्ड-सप्तचक्र। ३३२. सांसारिक विषय - द्र०-ज्ञानखण्ड-विषय-भोग। ३३३. सायुज्य पद - द्र०-ज्ञानखण्ड-पञ्चविधि मुक्ति। ३३४. सिंहासन - द्र०-आसन। ३३५. सिद्धासन - द्र०-आसन। ३३६. सुख-दुःख - सुख-दुःख एक ऐसी अनुभूति है, जो क्रमशः अनुकूलता और प्रतिकूलता के रूप में हर कोई अपने जीवन में परिस्थितियों के अनुसार अनुभव करता है। हि०वि०को० खं० २४ पृ०२६९ में सुख की व्युत्पत्ति इस प्रकार निर्दिष्ट है- सुखयतीति सुख-अच्। जिसका अर्थ है आत्मवृत्ति अथवा मनोवृत्ति-गुण विशेष। वह अनुकूल और प्रिय वेदना, जिसकी सभी को अभिलाषा रहती है। आत्मा के २४ गुणों में सुख भी एक गुण है, जो नित्य और जन्य भेद से दो प्रकार का होता है। सांख्य और योग के मत से सुख सत्त्वगुण का धर्म है। गीता के अनुसार सुख सात्त्विक, राजसी और तामसी होता है-सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति (गी० ४.३६)। इस श्लोक में तीन प्रकार के सुखों का संकेत करके गीताकार ने अगले तीन श्लोकों ३७, ३८ और ३९ में क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस सुख की परिभाषाएँ दी हैं। सुख के विपरीत अनुभूति को दुःख कहते हैं। हि०वि०को०खं० १० पृ० ४८७ में दुःख इन शब्दों में निर्दिष्ट है- दुर् दुष्टं खनतीति खन-उ वा दुःखयतीति दुःख अच्। इस व्युत्पत्ति से निर्मित दुःख शब्द के अर्थ-संसार, व्याधि, रोग, व्यथा, कष्ट, क्लेश आदि हैं। दुःख या क्लेश उत्पन्न होने के कई कारण हैं, जैसे- परतन्त्रता, दूसरे के अधीन रहकर जीवनयापन करना, आधि (मानसिक कष्ट), व्याधि (शारीरिक कष्ट-रोग आदि), मानहानि, शत्रुता, कुलटा पत्नी आदि। न्याय और वैशेषिक के अनुसार दुःख को आत्मा का धर्म तथा सांख्य और वेदान्त के मत से दुःख को बुद्धि का धर्म माना गया है, दुःख भी तीन प्रकार का कहा गया है- आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक। आध्यात्मिक दुःख के भी दो प्रकार हैं- शारीरिक और मानसिक। आधिदैविक दुःख उसे कहते हैं, जो देवता से उत्पन्न दुःख हो, जैसे- सर्दी-गर्मी, हवा, वर्षा, और वज्रपात से उत्पन्न दुःख। आधिभौतिक दुःख समस्त भूतों से उत्पन्न होने के कारण चार प्रकार का है, जैसे- जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज (मनुष्य, पशु-पक्षी, सर्पदंश, वनमक्षिका, स्थावर आदि) से उत्पन्न दुःख। उपनिषदों में योगी और परिव्राजक आदि को सुख-दुःख से दूर रहने या इससे ऊँचे उठने का परामर्श दिया गया है। नारद परिव्राजक उपनिषद् (३.२७) में उल्लेख है कि जिस प्रकार प्राणविहीन देह में सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता, उसी प्रकार कैवल्याश्रम में रहने वाले योगी प्राण रहते हुए भी सुख-दुःख से प्रभावित नहीं होते-प्राणे गते यथा

परिशिष्ट ३५७ सोम देहः सुखदुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥ गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय और पराजय में समान रहने का उपदेश दिया है- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि (गी० २.३८)। ३३८. सूक्ष्मशरीर - द्र०-पुर्यष्टक। ३३९. सूत्रात्मा - द्र०-ज्ञानखण्ड-तैजस। ३४०. सूर्य - विभिन्न ग्रहों में सूर्य महत्त्वपूर्ण ग्रह है। चारों वेदों में सूर्य की एक विशिष्ट देवता के रूप में स्तुति (प्रार्थना) की गई है। विराट् पुरुष के नेत्रों से सूर्य का प्रादुर्भाव हुआ है- चक्षोः सूर्यो अजायत (यजु० ३१.१२)। परब्रह्म के नेत्र स्वरूप होने के कारण सूर्य को सभी का कर्मद्रष्टा विवेचित किया गया है-सूर्य्य विचक्षसे (ऋ० १.५०.२)। समस्त जीव सूर्य से ही जीवित हैं, इसी कारण सूर्य सभी का आत्मा कहलाता है। ऋग्वेद में यह तथ्य इस प्रकार उपन्यस्त है- सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (ऋ० १.११५.१)। स्थिति भेद से सूर्य के अनेक नाम हैं, जैसे- सभी को अपने कर्म और उसके फल में स्थिर रखने के कारण सूर्य को ब्रह्मा, जगत् के पालक होने के कारण सूर्य को व्याप, देदीप्यमान होने से सूर्य को शुक्र और सबका प्रेरक होने से सूर्य को सविता आदि कहते हैं। आचार्य सायण ने उदित होने से पूर्व के सूर्य को सविता कहा है- उदयान् पूर्व भावी सविता (ऋ० ५.८.१४ सा०भा०)। शतपथ ब्राह्मण में सविता को सभी देवों का पिता कहा गया है- सविता वै देवानां प्रसविता (शत०ब्रा० १.१.२.१७) निरुक्तकार यास्क ने भी सविता को प्रसविता कहकर इस तथ्य की पुष्टि की है- सविता सर्वस्य प्रसविता (नि० १०.३.३१)। सूर्य वस्तुतः अग्नि का ही आकाशीय रूप है। विधिविधान का संरक्षक होने के कारण उसका चक्र नियमित चलता रहता है, जिससे गति, प्रखरता और सृजन की सभी को प्रेरणा मिलती है। अथर्वशिर उपनिषद् में देवों ने भगवान् रुद्र की स्तुति करते हुए तेजस्विता के कारण उन्हें सूर्य रूप कहा है- यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च सूर्यस्तस्मै वै नमो नमः (अथर्वशिर० २)। इसी प्रकार भगवान् रुद्र के विभिन्न गुणों के कारण अन्य नामों से भी उनकी स्तुति की गई है, जैसे- उन्हे वृद्धि रूप, शान्तिरूप, पुष्टिरूप, हुतरूप (होम किए गये), अहुतरूप (बिना होम किए गये), दत्त (दिए गये), अदत्त (बिना दिए गये), सर्व-असर्वरूप, विश्व-अविश्वरूप, पर-अपर रूप और परायण रूप कहा गया है-वृद्धिश्चत्वं शान्तिस्त्वं पुष्टिश्चत्वं हुतमहुतं दत्तमदत्तं विश्वमविश्वं कृतमकृतं परमपरं परायणं च त्वम् (अथर्वशिर० ३)। ३४१. सृष्टि - द्र०-ज्ञानखण्ड- सृष्टि-अतिसृष्टि। ३४२. सोम - सोम की स्तुति का उल्लेख चारों वेदों तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों में भी मिलता है। ऋषियों की दृष्टि में सोम एक पोषक तत्त्व है। इसका वर्णन कभी वनस्पति (सोम नामक लता) के रस के रूप में, कभी सूक्ष्म-प्रवाह के रूप में तथा कभी व्यक्तित्व सम्पन्न देव शक्ति के रूप में विभिन्न वेद मंत्रों में हुआ है। सोम को वनस्पति (सोमलता) रूप की अवधारणा के संदर्भ में यह मान्यता है कि सोमलता का उत्पत्ति-स्थल हिमाच्छादित उच्च पर्वतीय उपत्यकाएं हैं। सोमलता का मधुर रस दिव्य तथा अतिशय आनन्द प्रदान करने में समर्थ है-असाव्य ॐशुर्मदायाप्मु दक्षो गिरिष्ठाः ....... (सा० ४७३)। सोमरस हरितवर्ण का होता है, जो बल-वीर्यवर्धक है। देवगण चाव से इसका पान करते हैं-पवस्व दक्षसाधनो देवेभ्यः पीतये हरे। मरुद्भ्यो वायवे मदः (सा० ४७४)। सोमरस के अन्य गुणों-बुद्धि वृद्धि, जागृतिवृद्धि, शुक्रवृद्धि, दक्षतावृद्धि, मेधावृद्धि, तेजस्विता वृद्धि तथा मनः नियन्त्रण आदि का वर्णन सामवेद के विभिन्न मंत्रों में मिलता है। इसे साक्षात् अमृत मानकर राजा कहा गया है। सोमोऽराजायमल्लै सुत (यजु० १९.७२)। सोम की सोमलता के रूप में इस स्थूल अवधारणा के अतिरिक्त दूसरी अवधारणा सूक्ष्म प्रवाह के रूप में है। परमात्म शक्तियों के ऐसे प्रवाह को, जो सर्वत्र संचरित होकर सृष्टि के सन्तुलन, विकास आदि में अपना योगदान देता है, क्रान्तदर्शी ऋषियों ने 'सोम' संज्ञा प्रदान की है- उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे। उग्रं शर्म महि श्रवः (सा० ४६७) अर्थात् हे सोमदेव ! आपके पोषक रस का उद्भव सर्वोच्च द्युलोक में हुआ। द्युलोक में होने वाले आपके उस महिमामय प्रभाव और पोषण शक्ति को पृथिवी पर रहने वाले प्राणी प्राप्त करते हैं। सोम के सन्दर्भ में तीसरी अवधारणा विश्व ब्रह्माण्ड की संरचना, विकास और विलय की समूची प्रक्रिया के नियामक के रूप में है। एक मंत्र में सोम को सूर्य का प्रकाशक कहा गया है-अधा सूर्य्यमरोचयः (सा० ४९३)। स्थूल रूप में सोम (सोमलता) को वनस्पतियों का अधिपति कहा गया है- सोमं नमस्य राजानं यो यज्ञे वीरुधां पतिः (अथर्व० ३.२७.४)। दिव्य सोम के विषय में अथर्ववेद के एक मंत्र में एक वर्णन है कि

सोऽहं ३९८ परिशिष्ट लोग सोम नामक जिस ओषधि का पान करते हैं, वे वास्तविक सोम को नहीं जानते; परन्तु ब्राह्मण (विद्वान् पुरुष) जिस सोम को जानते हैं, उसे कोई देहधारी मर्त्य ग्रहण नहीं कर सकता। उस सोम का पान देवगण करते हैं; क्योंकि वह (सोम) पुनः प्रबुद्ध हो जाता है। पवित्र और पवित्रकारक होने से सोम को पवमान सोम कहा गया है-पवमानो अजीजनद्दिवश्चित्रं .......(सा० ४८४)। सामवेद में एक स्थल पर सोम को महान् जल-प्रवाहों में मिला हुआ विवेचित किया गया है-परि प्रासिष्यदत्कविः सिन्धोरूर्मान्वधिश्रितः ............(सा० ४८६)। अथर्वशिर उपनिषद् में देवों ने रुद्र भगवान् की स्तुति करते हुए उन्हें सोम कहा है- यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च सोमस्तस्मै वै नमो नमः (अथर्वशिर० २)। ३४३. सोऽहं - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३४४. स्तुति - द्र०-ज्ञानखण्ड-स्तोम। ३४५. स्वर्ग-नरक - द्र०-ज्ञानखण्ड-पाप-पुण्य। ३४६. स्वाहा - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३४७. हंस - द्र०-अवधूत। ३४८. हंस-परमहंस--द्र०-ज्ञानखण्ड। ३४९. हठयोग - भारतीय ऋषियों ने योग पर बहुत से अनुसन्धान किये हैं। योग शब्द बहुत विराट् है, जिसमें विभिन्न धाराएँ समाहित हैं। दो अंकों के जोड़ को योग कहते हैं। आत्मा और परमात्मा का मिलन भी योग के द्वारा ही सम्भव है। इसके विभिन्न प्रकार हैं, जैसे- ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, सांख्ययोग, राजयोग, हठयोग आदि। हठयोग के माध्यम से (हठपूर्वक) चित्तवृत्तियों को बाह्य विषयों से हटाकर अन्तर्मुखी करके ब्रह्म साक्षात्कार या ब्रह्म से एकाकार करते हैं। हठयोग के माध्यम से ही शरीर और नाड़ी संस्थान की शुद्धि करके शारीरिक स्वास्थ्य रक्षा और व्याधिशमन करते हैं। इसके (हठयोग के) अन्तर्गत विभिन्न क्रियाएँ, जिनमें छः प्रमुख क्रियाएँ-नेति, धौति, वस्ति, नौली, त्राटक और कपालभाति आती हैं- धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिर्नौलिकिस्त्राटकस्तथा। कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् (गोरक्षसंहिता)। इसके अतिरिक्त हठयोग में विभिन्न प्रकार के प्राणायाम, आसन, बन्ध और मुद्राएँ भी समाविष्ट हैं, जिनसे चित्तवृत्तियों को ऊर्ध्वमुखी करके तीनों शरीरों की शुद्धि करके आत्मानन्द, ब्रह्मानन्द की प्राप्ति की जा सकती है। हठयोग का शाब्दिक अर्थ भी शरीर स्थित सूर्य और चन्द्र नाड़ियों के शोधन और उनके ऐक्य को प्रतिपादित करता है- हकारेण तु सूर्यः स्यात्सकारेणेन्दुरुच्यते। सूर्याचन्द्रमसौरैक्यं हठ इत्यभिधीयते (यो० शि० १३३)। इस व्युत्पत्ति परक अर्थ में प्रथमतः 'ह' और तत्पश्चात् 'स' का अर्थ बताया गया है। जबकि हठ में 'ह' और 'ठ' वर्ण होते हैं। इस मन्त्र के साथ इसका सम्बन्ध होने से सम्भवतः ऐसा हुआ हो, अतः सर्वत्र 'ठ' के स्थान पर 'स' पाठ ही मिलता है। हठयोग के आसन, बन्ध, मुद्राओं का वर्णन अलग से उन-उन क्रमांकों पर किया गया है। ३५०. हविष्य - द्र०-ज्ञानखण्ड-हुत-प्रहुत। ३५१. हिरण्यगर्भ-द्र०-ज्ञानखण्ड। ३५२. हुत-अहुत - द्र०-सूर्य। ३५३. हृदय कमल - द्र०-अष्टदल कमल। ३५४. हृदयाकाश - द्र०-परमव्योम।

मन्त्रानुक्रमणिका - ब्रह्मविद्याखण्ड

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
अङ्गुष्ठाभ्यांजा०द० ६.३४अथ कस्मात् ......आत्मेतिशाण्डिल्य० ३.२.३
अङ्गुष्ठेन निबध्नीयात्शाण्डि० १.३.३अथ कस्मात् ...दत्तात्रेयशाण्डिल्य० ३.२.७
अकर्ताऽहमभोक्ता०अध्या० ७०अथ कस्मात् .....महेश्वरःशाण्डिल्य० ३.२.५
अकर्म मन्त्ररहितंना०परि० ३.८अथ कस्मादुच्यतेअथर्व० ४
अकस्मान्मुद्गरपैंग० २.१४अथ किमेतैर्वन्यानाम्मैत्रे० १.२
अकारादित्रयाणाम्शाण्डि० १.६.४अथ कुम्भकःशाण्डि० १.७.१३-५
अकारोकाररूपोऽस्मिमैत्रे० ३.११अथ खलु ....कुटीचकोशाट्या० ११
अक्षयोऽहम्ब्र०वि० ८३अथ खलु ...नासमाप्यशाट्या० ३६
अक्षरत्वात्अव० २अथ खलु ...नैष्ठिकम्शाट्या० २८
अखण्डाकाश रूपोऽस्मिमैत्रे०३.२०अथ खलु ....परिव्राजकाःशाट्या० १९
अखण्डानन्दमात्मानम्अध्या० २७अथ खलु ...लब्ध्वाशाट्या० ३२
अगोचरंमैत्रे० १.१३अथ गार्ग्यो ह वैकौ०ब्रा० ४.१
अग्नीषोमाभ्याम्हंस० १२अथ जनको ह वैदेहोयाज्ञ० १
अग्नीषोमौ पक्षावोंकारःहंस० १४अथ जाग्रत्स्वप्नपैंग० २.११
अग्नेरिव शिखाप०ब्र०१३, ब्रह्म० १२अथ ज्ञानेन्द्रिय पञ्चकंपैंग २.५
अग्नेरिव शिखा नान्याना०परि० ३.८७अथ तुरीयातीतावधूतानाम्तुरी० १
अन्यंशे चजा०द० ८.६अथ धारणाःशाण्डि० १.९.१
अघोरं सलिलम्पं०ब्र० ७अथ ध्यानम्शाण्डि० १.१०.१
अच्युतोऽहम्ब्र०वि० ८१अथ नारदः पितामहंना०परि० ४.३७
अजरोऽस्म्यमरो०अध्या० ५५अथ नारद पितामहमुवाचना०परि० ६.१
अजिह्वः षण्डकःना०परि० ३.६२अथ निर्वाणोपनिषद्निर्वा० १-११
अज्ञातमपि चैतन्यम्कं० रु० ४५अथ परमहंसा नामभिक्षु० ५
अज्ञानहृदय ग्रन्थेःअध्या० १७अथ परमात्मा नामआत्मो० १-घ
अज्ञानादेव संसारोअध्या० ५५अथ पितामहःप०प० १
अज्ञानान्मलिनोजा०द० ५.१४अथ पैङ्गलोपैंग० २.१
अणोरणीयानहमेवकैव० २०अथ पैप्पलादोपं०ब्र० १
अणोरणीयान्महतोना०परि० ९.१५अथ पौर्णमास्याम्कौ०ब्रा० २.९
अण्डं ज्ञानाग्निनापैंग ३.८अथ प्रत्याहारःशाण्डि० १.८.१
अण्डस्थानिपैंग० १.११अथ प्रोष्यान्यन्पुत्रस्यकौ०ब्रा० २.११
अतः सर्वं जगत्मं०ब्रा० ५.१.२अथ बहूदका नामभिक्षु० ३
अतिवादांस्तितिक्षेतना०परि० ३.४२अथ ब्रह्मविद्या ...ब्र०वि० १
अतिसूक्ष्मां च तन्वींक्षुरि० ९अथ ब्रह्मस्वरूपं कथमितिना०परि०९.१
अतीतान्नना०परि० ३.२५अथ भगवाञ्छाकायन्यःमैत्रे० १.४
अत्यन्तमलिनोजा०द० १.२१अथ भगवान्मैत्रेयःमैत्रे० २.१
अत्रात्मत्वम्अध्या० १८अथ भिक्षूणाम्भिक्षु० १
अत्रैतेश्लोका भवन्तिशाण्डि० ३.२.११अथ मासि मास्यकौ०ब्रा० २.८
अथ कदाचित्परिव्राजकना०परि० १.१अथ यतेर्नियमःना०परि० ७.१

४०० मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण अथ यदिदम् | आ०वो० १.२ | अथ हैनँ ब्रह्मचारिणः | जाबा० ३.१ अथ योगिनां परमहंसानां | प०हं० १ | अथ हैनँ भगवन्तं | ना०परि० २.१ अथ योऽस्य निरुक्तानि | शाण्डि० ३.२.९ | अथ हैनँ महाशालः | ए०ब्रा० १ अथ यो ह वै विद्वानेम् | शाण्डि० ३.२.१० | अथ हैनँ शाण्डिल्यो | शाण्डि० ३.२.१ अथवा कृतकृत्योऽपि | अव० २६ | अथ हैनँ .... संप्रतिष्ठिता | सुबा० १०१ अथ वा तत्र | जा०द० ८.७ | अथ होवाच.... ब्रह्म | म०वो० १ अश्वत्थं परिगृह्य | याज्ञ० ५ | अथाङ्गिरसिशिविधः | आत्मो १-क अथवा सत्यमीशानं | जा०द० ९.३ | अथात एकत्रमवरोधनम् | कौ०ब्रा० २.३ अथवैतच्छरीरत्यज्य | जा०द० ५.१३ | अथातः .... ध्यानम् | जा०द० ९.१ अथ शैवपदं | क्षुरिण्ड० २० | अथातः परमहंस .... | आरु० ४ अथ षण्ढः पतितो | संन्या० २.४ | अथातः पितापुत्रीयं | कौ०ब्रा० २ १५ अथ संवेशनम् जाथायै | कौ०ब्रा० २.१० | अथातः पृथिव्यादि | शारी० १ अथ संसृतिबन्ध ..... | म०वो० ३ | अथातश्चत्वार आश्रमाः | आत्रे० १ अथ सनत्कुमारः | जाबालि० २० | अथातः श्रीमद् | हय० १ अथ समाधिः | शाण्डि० १.११.१ | अथातः संन्यासोपनिषदम् | संन्या० १.१ अथ हंसऋषिः | हंस १० | अथातः संप्रवक्ष्यामि धारणाः | जा०द० ८.१ अथ हंस परमहंस ...... | हंस० ४ | अथातः संप्रवक्ष्यामि | जा०द० ७.१ अथ हंसा नाम .... | भिक्षु० ४ | अथातः ... समाधिम् | जा०द० १०.१ अथ ह जनको ह | जाबा० ४.१ | अथातः सर्वजितः | कौ०ब्रा० २.७ अथ ह पैङ्गलो | पैङ्ग० १.१ | अथातः सांयमनम् | कौ०ब्रा० २.५ अथ ह यात्परं ब्रह्म | शाट्या० ५ | अथातो दैवः परिमरः | कौ०ब्रा० २.१२ अथ ह याज्ञवल्क्य... | मं०ब्रा० २.१.१ | अथातो दैवम् | कौ०ब्रा० २.४ अथ ह याज्ञवल्क्यो | मं०ब्रा० ४.१.१ | अथातो निःश्रेयसादानम् | कौ०ब्रा० २.१४ अथ ह शाण्डिल्यो | शाण्डि० २.१ | अथात्रैतदहरं | सुबा० ४.४ अथ ह संकृतिर्भगवान्वम् | अव० १ | अथावान्तरात्मा नाम | आत्मो १-ग अथ हैनमत्रिः पप्रच्छ | याज्ञ० ४ | अथावभव प्राणमप ... | पैङ्ग २.४ अथ हैनमत्रिः पृच्छामि | जाबा० ५.१ | अथापञ्चीकृतमहाभूत .. | पैङ्ग० २.३ अथ हैनमत्रिः ..... य एषो | जाबा० २.१ | अथापानात्कटिद्वन्द्वे | जा०द० ७.८ अथ हैनमथर्वाणं केनोपायेन | शाण्डि० १.४.१ | अथाप्यस्यारूपस्य | शाण्डि० ३.१.३ अथ हैनमथर्वाणं ....भगवान् | शाण्डि० ३.२.१ | अथाश्रमं चरमम् | शाट्या० ६ अथ हैनँ ....क्रामतीति | सुबा० ११.१ | अथाश्वलायनो० | कैव० १ अथ हैनँ ....गच्छन्तीति | सुबा० ९.१ | अथासन्नद्धो योगी | शाण्डि० १.७.१ अथ हैनँ .....जाबालि | जाबालि० १ | अथास्य पुरुषस्य | ब्रह्म० १ अथ हैनँ ....दहतीति | सुबा० १५.१ | अथास्य या सहजोऽस्ति | शाण्डि० ३.१.५ अथ हैनँ नारदः | ना०परि० ३.१ | अधेमा दश दश | सुबा० ४.३ अथ हैनँ ....पप्रच्छ | पैङ्ग० ४.१ | अथैष ज्ञानमयेन | शाण्डि० १.३६ अथ हैनँ परमेष्ठिनं | ना० परि० ८.१ | अथो नाद आधारात् | हंस० ९ अथ हैनँ पितामहं नारदः | ना०परि० ५.१ | अदग्धमहतम् | संन्या० २.१४ अथ हैनँ पैङ्गलः | पैङ्ग० ३.१ | अदृश्यं नलग्ने | हंस० २०

मन्त्रानुक्रमणिका ४०१ मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण अदृश्योऽहम् | ब्र०वि०८५ | अन्योन्यस्याविरोधेन | यो०त० ६६ अद्यजातां यथा नारीम् | ना०परि० ३.६४ | अपकारिणि | याज्ञ० २९ अद्वयब्रह्मरूपेण | आ०बो० २.१४ | अपाणिपादो | कैव० २१ अद्वयानन्द विज्ञान | ब्र०वि० ८९ | अप्राणिपादो जवनो | ना०परि०१.१६ अद्वैत भावना | मैत्रे० २.१० | अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्रणवेन | जाबा० ६.३३ अद्वैतोऽहम् | ब्र०वि० ८८ | अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्राणं | शाण्डि० १.७.१३ अधस्तात्कुञ्चनेनाशु | शाण्डि० १.७.१२ | अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य योनि | यो०त० १२१ अध्यस्तस्य | अध्या०५८ | अपानाख्यस्य | जा०द० ४.३१ अध्यात्मरतिरासीनो | ना०परि० ३.४४ | अपानान्त्रिषादा | सुबा० २.१ अध्यापिता ये गुरुम् | शाट्या० ३८ | अपानो वर्तते | जा०द० ४.२७ अनन्तकर्म शौचम् | पैङ्ग० ४.२४ | अपापमशठम् | ना०परि० ३.७४ अनन्तानन्द संभोगा | संन्या० २.४० | अपूर्वमपरं | जा०द० ४.६० अनाख्येयदिदं गुह्यम् | हंस० ३ | अप्रमत्तः कर्म भक्तिज्ञान .. | ना०परि०३.७७ अनात्मकमसत्तुच्छम् | आत्मो० ९ | अप्राणममुखम् | सुबा० ३.२ अनादाविह संसारे | अध्या० ३७ | अभिव्दधृतमर्यादा | ना०परि० ५.३७ अनास्थायाम् | शाण्डि० १.७.२७ | अभयं सर्वभूतेभ्यो | ना०परि० ५.४३ अनाहतस्य शब्दस्य | मं०ब्रा० ५.१४ | अभिपूजितलाभांश्च | ना०परि० ५.३४ अनिन्द्यं वै व्रजेत् | ना०परि० ५.३९ | अभिशस्तं च पतितम् | संन्या० २.९२ अनिर्वाच्यम् | यो०त० ७ | अभेददर्शनम् | मैत्रे० २.२ अनुज्ञाप्य गुरूशैव | ना०परि० ६.३३ | अभ्यासकाले | शाण्डि० १.७.५ अनुभूतिं विना | मैत्रे० २.२२ | अभ्यासान्निर्विकारं | मं०ब्रा० १.२.१३ अनेन ज्ञानमाप्नोति | कैव० २६ | अमानित्व ..... | शारी० ९ अनेन विधिना | ना०परि० ३.५२ | अमावास्या | जा०द० ४.४३ अन्तःकरण प्रतिबिम्बित | पैङ्ग० २.१० | अमरों यः पिबेत् | यो०त० १२८ अन्तःकरणसम्बन्धात् | कं०रु० ४४ | अमुना वासना जाले | अध्या० ३९ अन्तः पूर्णो बहिः | मैत्रे० २.२७ | अमुष्य ब्रह्मभूतत्वाद्व्रह्मणः | आत्म० २६ अन्तर्याम्यहम् | ब्र०वि० ८४ | अमृतत्वं समाप्नोति | क्षुरि० २५ अन्तर्लक्ष्यं | शाण्डि० १.७.१४ | अमृतेन तृप्तस्य | पैङ्ग ४.१३ अन्तर्लक्ष्यं जलज्योतिः | मं०ब्रा० १.३.६ | अयं ते योनिर्ऋत्वियो | ना०परि० ३.७८ अन्तर्लक्ष्य विलीन .... | शाण्डि० १.७.१५ | अयं हृदि स्थितः | पं०ब्र० ४१ अन्तः शरीरे निहितो | अध्या० १ | अयने द्वे च | ब्र०वि० ५५ अन्तः शरीरे... एको | सुबा० ७.१ | अयमेव महाबन्धः | यो०त० ११५ अन्तः शरीरे ...शुद्धः | सुबा० ८.१ | अयमेव महावेधः | यो०त० ११७ अन्तःसङ्ग परित्यागो | ना०परि० ६.४१ | अयाचितं यथालाभम् | ना०परि० ५.३१ अन्तःस्थं मां | जा०द० ४.५८ | अरजस्कोऽतमस्को | ब्र०वि० ८७ अन्तः स्थानीन्द्रियाणि | ना०परि० ३.२६ | अर्धमात्रा परा | ब्र०वि०४० अन्नपानपरो | संन्या० २.११४ | अर्धोन्मीलितलोचनः | शाण्डि० १.७.१६ अन्यदीये तृणे | जा०द०१.११ | अलभ्यमानस्तनयः | याज्ञ० २४ अन्यानथाष्टौ | शाट्या० २३ | अलम्बुसा | जा०द० ४.८