भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३८५ मुद्रा होते हैं। उनकी श्रेणी के अनुसार उनके अलग-अलग नामकरण किये गये हैं, जैसे- उपपातक, महापातक आदि। छोटे पापों को उपपातक कहते हैं। कोशग्रन्थों के अनुसार इनकी संख्या प्रायः पचास है; जिनमें गोवध, परदारगमन, मातृत्याग, पितृत्याग, गुरुत्याग, आत्मविक्रय, अपत्यविक्रय, दारविक्रय, स्त्रीवध आदि प्रमुख हैं। महान् या बड़े पापों को महापातक कहते हैं, जिसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- महदतिशयितं पातकं इति महापातकम्। महापातक पाँच प्रकार के माने गये हैं- ब्रह्महत्या, सुरापान, गुरुपत्नीगमन, चोरी करना तथा इन सभी पापियों के साथ संसर्ग। मनुस्मृति में यह तथ्य इन शब्दों में विवेचित है-ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः। महान्ति पातकान्याहुःसंसर्गश्चापि तैः सह (मनु० ११.५४)। 'जो पापी उपर्युक्त इन पापों को करते हैं, उनको नरक भोग के बाद असाध्य रोगों का भी भोग करना पड़ता है। इस प्रकार सात जन्मों तक यह क्रम चलता रहता है, तब महापातक से निवृत्ति मिलती है। प्राचीन ग्रन्थों में महापातक शमन के अनेक उपाय वर्णित हैं। कार्तिक, वैशाख और माघ मास में नित्य प्रातःकाल स्नानादि करके हविष्य भोजन व नैष्ठिक ब्रह्मचर्य पालन से महापातक का विनाश होता है-तुलामकरमेषेषु प्रातः स्नानं विधीयते। हविष्यं ब्रह्मचर्यञ्च महापातकनाशनम् (हि०वि०को०खंड १७ पृ० १४७)। इसी प्रकार कृष्ण नाम जप को भी महापातक का शामक कहा गया है- कृष्णोति मङ्गलं नाम ......महापातककोटयः (हि०वि०को०पृ० १४७)। जाबाल्युपनिषद् में भी विद्वान्, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी अथवा यति द्वारा भस्म का त्रिपुण्ड्र (ललाट पर तीन आड़ी रेखाएँ) धारण करने और उन तीनों रेखाओं के तत्त्वदर्शन को समझने व जीवन में धारण करने से (जिसका वर्णन जाबाल्युपनिषद् के ही २१ वें मंत्र में है) महापातकों और उपपातकों के शमन का उल्लेख है- त्रिपुण्ड्रं भस्मना करोति यो विद्वान् ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिर्वा स महापातकोपपातकेभ्यः पूतो भवति (जाबाल्यु० २१)। २४०. महाबन्ध - द्र०-बन्ध। २४१. महामुद्रा- द्र०-मुद्रा। २४२. महावाक्य - द्र०-ज्ञानखण्ड। २४३. महावेध - द्र०-बन्ध। २४४. महेश्वर - द्र०-त्र्यम्बक। २४५. माया- द्र०-ज्ञानखण्ड -अविद्या, माया, अज्ञान। २४६. मुक्तात्मा - द्र०-ज्ञानखण्ड-जीवनमुक्त। २४७. मुक्ति-द्र०-ज्ञानखण्ड-मुक्ति-मोक्ष। २४८. मुद्रा - योग के अन्तर्गत चित्तशोधन व प्राण के ऊर्ध्वगमन के निमित्त विभिन्न मुद्राएँ प्रतिपादित की गयी हैं- जैसे खेचरी मुद्रा, महामुद्रा, अश्विनीमुद्रा, शक्तिचालिनी मुद्रा, योनिमुद्रा, योगमुद्रा, शाम्भवी मुद्रा, तड़ागीमुद्रा, विपरीतकरणी मुद्रा, वज्रोली, अमरोली, सहजोली मुद्रा आदि। इनमें कुछ प्रमुख मुद्राएँ इस प्रकार हैं- खेचरी मुद्रा में जीभ को उलट कर कपाल कुहर में प्रविष्ट कराकर दृष्टि को भ्रूमध्य में एकाग्र किया जाता है। ध्यान की स्थिरता में इस मुद्रा से बहुत सहायता मिलती है। इसके अभ्यासी को क्षुधा, निद्रा, तृष्णा, मूर्च्छा आदि से त्राण मिलता है। चित्तशून्य (अन्तरिक्ष-खे) में रमण (चर) करने के कारण इसका नाम खेचरी मुद्रा पड़ा है। उपनिषदकार ने इस मुद्रा के विषय में लिखा है-अन्तः कपाल कुहरे जिह्वां व्यावृत्त्य धारयेत्। भ्रूमध्यदृष्टिरप्येषा मुद्रा भवति खेचरी (यो०त० ११७)। इस मुद्रा की सिद्धि के लिए जिह्वा वृद्धि हेतु छेदन, दोहन व चालन आदि कृत्य किये जाते हैं। महामुद्रा में मूलबन्धपूर्वक वाम पाद की एड़ी से गुदा और उपस्थ के बीच का स्थान (सीवन) दबाते हैं और दक्षिण पाद को फैलाकर उसकी अँगुलियों को दोनों हाथों से पकड़ते हैं। इसके बाद बायें नथुने से पूरक करके जालन्धर बन्ध लगाते हैं, तत्पश्चात् जालन्धर बन्ध खोलकर दाहिने नथुने से रेचक करते हैं। इसी प्रकार दाहिने ओर से भी यही मुद्रा करनी चाहिए। अश्विनी मुद्रा में पद्मासन अथवा सिद्धासन से बैठकर योनि प्रदेश को अश्व (घोड़े) की तरह बारम्बार आकुंचन-प्रकुंचन किया जाता है। इससे प्राण का उत्थान व कुण्डलिनी शक्ति के जागरण में सहायता मिलती है। शाम्भवी मुद्रा में मूल और उड्डियानबन्धपूर्वक पद्म अथवा सिद्ध आसन में बैठकर नासाग्र अथवा भ्रूमध्य में दृष्टि को स्थिर करके ध्यान लगाया जाता है। वज्रोली मुद्रा में साधक प्रारम्भ में उपस्थेन्द्रिय द्वारा मूत्र को ऊपर खींचने और पुनर्विसर्जित करने का अभ्यास करता है। बाद में जल, दूध, तेल, घृत, शहद और पारे को भी खींचने और छोड़ने का