१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंममता ३८४ परिशिष्ट मिलकर महायोग कहलाते हैं "मन्त्रो लयो .......महायोगोऽभिधीयते" (यो०शि० १२९)। सभी योगों की चार अवस्थाएँ होती हैं। ये हैं- आरम्भावस्था, घटावस्था, परिचयावस्था तथा निष्पत्ति अवस्था-आरम्भश्च घटश्चैव .........परिकीर्तिता (यो०त० २०)। मन्त्रयोग के लक्षण का उपनिषद्कार ने इन शब्दों में उल्लेख किया है....मातृकादियुतं मन्त्रं द्वादशाब्दं तु यो जपेत् । क्रमेण लभते ज्ञानमणिमादिगुणान्वितम् । अल्पबुद्धिरिमं योगं सेवते साधकाधमः (यो०त०२१-२२) अर्थात् जो साधक मातृकायुक्त बारह सौ मन्त्र का जप करता हुआ मन्त्रयोग सिद्ध करता है, वह क्रमशः अणिमा आदि सिद्धियों का ज्ञान प्राप्त करता है। योगशिखोपनिषद् में मंत्रयोग को हंस (सोऽहम्) मंत्र पर आधृत होने का विवेचन है। समस्त प्राणियों द्वारा निरन्तर श्वास-प्रश्वास के द्वारा हंस मंत्र का जप होता रहता है; किन्तु जब गुरु उपदेश से साधक सुषुम्ना नाड़ी में (प्राण प्रविष्ट हो जाने पर) इसी मंत्र का उल्टा (हंस के स्थान पर) सोऽहम् का जप करता है, तब इसे मन्त्र योग कहते हैं- हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः । हंसहंसेति मन्त्रोऽयं सर्वैर्जीवैश्च जप्यते ॥ गुरुवाक्यात् ..... मन्त्रयोगः स उच्यते (यो०शि० १.१३०-१३१)। जो साधक चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-खाते, चित्त को निष्कल परमात्मा में लगाते हैं अर्थात् परमात्मा में ध्यान को एकाग्र करते हैं, वे लययोग करते हैं-लययोगश्चित्तलयः कोटिशः परिकीर्तितः । गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्भुञ्जन्ध्या-येन्निष्कलमीश्वरम्। स एव लययोगः .........शृणु (यो०त० २३-२४)। अन्यत्र भी लययोग का यही स्वरूप निर्दिष्ट है कि जब जीव और परमात्मा का ऐक्य होकर साधक का चित्त ब्रह्म में विलीन हो जाता है, तब शरीर स्थित पवन (प्राण) स्थैर्य को प्राप्त हो जाता है और लययोग का उदय होता है। लययोग से सुख और आत्मानन्दपूर्वक परम पद की प्राप्ति होती है- ....क्षेत्रज्ञः परमात्मा च तयोरैक्यं यदा भवेत् । ......पवनः स्थैर्यमायाति लय योगोदये सति ॥ लयात् .......परं पदम् (यो०शि० १.१३४-१३६) । यमनियमादि योग के आठ अंगों, मुद्रा-बन्ध आदि के साथ जो योग करते हैं, वह हठ योग है। इसमें हठ पूर्वक इन्द्रियों को सहजधारा से अलग हटाकर निश्चित धारा में लगाने के कारण इसे हठ योग कहते हैं। हठयोग का विस्तृत वर्णन इसी परिभाषा कोश परिशिष्ट के 'हठयोग' प्रकरण में किया जा चुका है, विशेष जानकारी हेतु उसे देखना चाहिए। विभिन्न अंग-उपाङ्गों सहित हठयोग द्वारा जब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, तब उनके (योगियों के) लिए हठयोग की क्रियाओं की आवश्यकता नहीं रहती। वे सिद्धियाँ उनके लिए सहज हो जाती हैं। इसी को राजयोग कहते हैं- हठयोगसिद्धोऽयं राजयोगः योगराजत्वात् (यो०त० १३० टीका) अर्थात् हठयोग द्वारा जो पुरुष सिद्ध हो जाता है, वही राजयोगी है। एक अन्य उपनिषद् में राजयोग की परिभाषा इस प्रकार को गई है-योनिमध्ये महाक्षेत्रे जपाबन्धूकसंनिभम् । रजो वसति जन्तूनां देवीतत्त्वं समावृतम् । रजसो रेतसो योगाद्राजयोग इति स्मृतः । अणिमादिपदं प्राप्य राजते राजयोगतः (यो०शि० १.१३६-१३८) अर्थात् प्रत्येक जन्तु (जीव)के योनि मध्य (मूलाधार और स्वाधिष्ठान के बीच स्थित कन्द), जिसे महाक्षेत्र की संज्ञा प्रदान की गई है,में जपा और बन्धूक के पुष्पों के समान लाल रंग वाला रज निवास करता है, जो देवी तत्त्व से समावृत है। जब यौगिक क्रियाओं (कुण्डलिनी साधना) द्वारा साधक शरीर के ऊर्ध्व भाग स्थित शिवस्वरूप रेतस् और अधोभाग स्थित रज का योग करता है, तब प्राण और अपान भी उन्हीं में लीन हो जाते हैं, इससे वह समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। रज और रेतस् योग की इस क्रिया को ही राजयोग कहते हैं- प्रकृत्यष्टकरूपं च स्थानं गच्छति कुण्डली । .........इत्यथोर्ध्वरजः शुक्ले शिवे तदनु मारुतः । प्राणापानौ समौ याति सह जातौ तथैव च (यो०कु० १.७४-७५)। भौतिक जगत् में भी नारी के शरीर में स्थित रज और पुरुष के शरीर में स्थित रेतस् (वीर्य) के योग से ही नूतन जीवन (शिशु) का प्रादुर्भाव होता है; किन्तु योगी जनों के एक ही शरीर में यह प्रक्रिया सम्पन्न होती है और वे शनैः-शनैः इस अभ्यास से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं-एकेनैव शरीरेण योगाभ्यासाच्छनैः शनैः । चिरात्संप्राप्यते मुक्तिर्मर्कटक्रम एव सः (यो०शि० १.१४०) । राजयोग की प्रशंसा कई ग्रन्थों में उल्लिखित है। हठयोग प्रदीपिका में उल्लेख है कि आत्मज्ञान, विदेहमुक्ति, अणिमा आदि सिद्धियाँ, गुरु कृपा से प्राप्त राजयोग द्वारा उपलब्ध होती हैं-राजयोगस्य माहात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः । ज्ञानं मुक्तिः स्थितिः सिद्धिर्गुरुवाक्येन लभ्यते (हठ०प्र० ४.८)। २३८. ममता-द्र०-ज्ञानखण्ड - मोह-ममता-आसक्ति। २३९. महापातक- पातक शब्द पाप का पर्यायवाची है। किसी को किसी भी प्रकार से पीड़ा पहुँचाना ही पाप है। इसी प्रकार किसी को सुख पहुँचाना अथवा परोपकार करना ही पुण्य है। पाप-पुण्य को सामान्यतः इस श्लोक से स्पष्ट समझा जा सकता है- अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ पाप कई प्रकार के