भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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मुनि ३८६ परिशिष्ट अभ्यास बन जाता है। इसका अभ्यास दृढ़ हो जाने पर स्त्री योनि में रेतस् विसर्जित करके उसके रज को ग्रहण किया जाता है; पर इस क्रिया में किसी अनुभवी का मार्गदर्शन अपेक्षित है, अन्यथा शारीरिक हानि के साथ ही आध्यात्मिक पतन की सम्भावना भी रहती है। वज्रोली के सन्दर्भ में योगतत्त्व उपनिषद् में उल्लेख है-किं नाम वज्रोली ? कांस्यपात्रे गोक्षीरं निक्षिप्य वज्रोलीतुल्य लिङ्गनालेन ग्रसित्वा पुनर्विरेंच्य पुनर्ग्रसनादिकमभ्यस्याथ स्त्रीयोनिमण्डले रेतो विसृज्य तच्छोणितेन साकं ग्रसेदिति यत्सेव वज्रोलीत्युच्यते (यो०त० १२६.१२७)। अमरोली मुद्रा वज्रोली का ही अगला चरण है। इसमें अमरी (मूत्र) की प्रथम और अन्तिम धारा को छोड़कर, मध्य धारा को हाथ या पात्र में लेकर प्रतिदिन पीकर तथा नस्य (नासिका द्वारा लेकर) करते हुए, वज्रोली क्रिया का अभ्यास किया जाता है। यही अमरोली मुद्रा कहलाती है- अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन् दिने-दिने। वज्रोलीमभ्य- सेन्नित्यममरोलीति कथ्यते (यो०त० १२८)। सहजोली मुद्रा वह कहलाती है, जिसमें अमरोलीसिद्ध को अमरीपान और नस्य के बिना ही (सहज ही) सिद्धि प्राप्त हो जाती है- एवममरोलीसिद्धस्यामरीपाननस्यं विना या सिद्धिरुदेति सैव सहजोलीत्युच्यते (यो०त० १२८ टीका)। षण्मुखी मुद्रा का प्रयोग योगमार्ग में, मन पर विजय प्राप्त करने, वायु को वश में करने आदि के लिए किया जाता है; जिससे प्राण ऊर्ध्वगामी हो चित्त एकाग्र होता है तथा आनन्दानुभूति होती है। जाबाल दर्शनोपनिषद् में इसका स्वरूप इस प्रकार निरूपित है-स्वस्तिकासनमास्थाय समाहितमनास्तथा। अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्रणवेन शनैःशनैः। हस्ताभ्यां धारयेत्सम्यक् कर्णादिकरणानि च........महामुने (जा०दर्शनो० ६.३२-३५) अर्थात् स्वस्तिक आसन पर बैठकर मन एकाग्र करके अपान वायु को ऊपर चढ़ाकर शनैः-शनैः प्रणव (ओंकार) का जप करते हुए दोनों अँगूठों से कानों को, तर्जनी से नेत्रों को और अन्य अँगुलियों से नासा पुटों को बन्द करके मूर्धा में मन (प्राण) को तब तक धारण करे (ध्यान लगाये), जब तक आनन्द की अनुभूति हो। इस प्रकार प्राण ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश कर जाता है। यही षण्मुखी मुद्रा है। साधक द्वारा वैष्णवी मुद्रा का प्रयोग मूलाधारादि चार चक्रों में मन को एकाग्र करने के लिए किया जाता है। इसमें मूलाधार, अनाहत, आज्ञा तथा सहस्रार चक्रों में विराजमान क्रमशः विराद् सूत्र, बीज, तुरीय अथवा अन्तर्लक्ष्य में बहिर्दृष्टि रखते हुए (खुले नेत्रों से) अपलक होकर मन को एकाग्र किया जाता है। इस सन्दर्भ में शाण्डिल्य उपनिषद् में उल्लेख है- मूलाधारानाहताज्ञा सहस्रारेषु यथाक्रमं विराट् सूत्रं बीजं तुरीयं वा अन्तर्लक्ष्यं तदेकतानं मनः बहिर्दृष्टिस्तु अन्तर्दृष्टिर्भूत्वा यदा निमेषोन्मेषवर्जिता भवति तदा दृष्टिरियं वैष्णवीमुद्रा भवतीत्यर्थः (शाण्डिल्यो० १.७. १४ टीका)। २४९. मुनि-संस्कृति के विकास में ऋषि-मुनियों का आदिकाल से ही योगदान रहा है। ये ही समय-समय पर विकृत परम्पराओं में संशोधन करके नया चिन्तन व साहित्य समाज को देकर उसे नई दिशा प्रदान करते रहे हैं। 'ऋषयोमन्त्र द्रष्टारः तथा दर्शनादृषिः'-यह परिभाषा ऋषि के स्वरूप का स्पष्ट बोध कराती है। ऋषि के संदर्भ में ज्ञानखण्ड के परिभाषा कोश परिशिष्ट में विस्तृत वर्णन किया जा चुका है। मुनि, ऋषियों से कुछ भिन्न होते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में मुनि की परिभाषा इस प्रकार निर्दिष्ट है-दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते (गी० २.५६) अर्थात् जो दुःख में उद्विग्न नहीं होता तथा सुख में अनासक्त रहता है, जिसे राग, भय, क्रोध-आदि स्पर्श भी नहीं कर सकते, वही मुनि कहलाता है। गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि मुनि समस्त वासनाओं को त्याग कर एकमात्र विष्णु में ही सतत लीन रहकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करते रहते हैं। वे होम, संध्यावन्दन, तर्पण आदि क्रियाएँ करके धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष प्रदाता भगवान् विष्णु को प्राप्त करते हैं। हिन्दी विश्वकोश खं० १८ पृ० ९० में मुनि की व्युत्पत्ति इस प्रकार वर्णित है-मनुते जानाति यः इति अर्थात् मौनव्रती, मननशील महात्मा। अभिप्राय यह है कि चित्त को एकाग्र करके (मौन रहकर) तपस्वी जीवन जीते हुए मनन करने वाला मुनि है। नैषध महाकाव्य में मुनि की सादृश्यता इन शब्दों में निर्दिष्ट है-फलेन मूलेन च वारिभूरुहां मुनेरिवेत्थं मम यस्य वृत्तयः (नैषधी० १.१३३)। महोपनिषद् में साधक को गुरु और शास्त्र वचन व स्वानुभूति से स्वयं को ब्रह्मरूप में जानने और शोकादि को त्यागकर मुनि बनने की आज्ञा दी गई है-गुरु शास्त्रोक्तमार्गेण स्वानुभूत्या च चिद्घने। ब्रह्मैवाहमिति ज्ञात्वा वीतशोको भवेन्मुनिः (महो० ४.२५)। मरीचि, नारद, कर्दम, अत्रि, दक्ष और वशिष्ठ आदि मुनियों की श्रेणी में ही आते हैं। साधकों की एक अन्य श्रेणी में मुमुक्षु का नाम भी आता है, जिसका अर्थ कोश ग्रन्थों में इस प्रकार विवेचित है-मुमुक्षु मोक्तुमिच्छतीति अर्थात् मुक्ति का अभिलाषी, मोक्ष की इच्छा रखने वाला अथवा वह व्यक्ति जो मुक्ति की कामना करता हो। श्रुति आदेश है कि मुक्तिकामी को चाहिए कि वह वर्जनीय और काम्य कर्म का त्याग करके श्रवण और मनन आदि