१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ३८७ यम के द्वारा ईश्वराराधना में ही निरत रहे। श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म के प्रति स्पृहा न रखने के संदर्भ में भगवान् कृष्ण अर्जुन को उनके पूर्वज मुमुक्षुओं के पदचिह्नों पर चलने का उपदेश देते हैं-एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् (गी० ४.१५)। २५०. मुमुक्षु- द्र०-मुनि। २५१. मूलबन्ध- द्र०-बन्ध। २५२. मूलाधार- द्र०-कुण्डलिनी। २५३. मृत्यु-द्र०-ज्ञानखण्ड-अमृत-मृत्यु। २५४. मोक्ष-द्र०-ज्ञानखण्ड-मुक्ति-मोक्ष। २५५. यज्ञ-द्र०-ज्ञानखण्ड-यज्ञ-अग्निहोत्र। २५६. यज्ञसूत्र (जनेऊ-ब्रह्मसूत्र)-द्र०-ज्ञानखण्ड-यज्ञोपवीत उपनयन। २५७. यज्वा - यज् धातु से निर्मित यज्वा शब्द का प्रयोग याज्ञिक अथवा यज्ञकर्त्ता के अर्थ में किया जाता है। कोश ग्रन्थ में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार निर्दिष्ट है- यज्वन्-यज्+क्वनिप् अर्थात् सविधि (शास्त्रोक्त ढंग से) यज्ञ करने वाला। ब्रह्मोपनिषद् में उपनिषदकार ने शिखा और यज्ञोपवीत धारण करने का मर्म समझाते हुए कहा है कि जो ज्ञानरूपी शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं, सच्चे अर्थों में वे ही ब्राह्मण हैं-शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुः (ब्रह्मो० १४)। यहाँ ज्ञान को ही यज्ञोपवीत की विशेषता बताया गया है; (वैसे सामान्यतः यज्ञोपवीत को यज्ञ का धागा माना जाता है) इसलिए अगले मंत्र में ज्ञान को यज्ञोपवीत और परम परायण कहा गया है। वस्तुतः ज्ञानी और यज्ञमय-त्याग परायण जीवन जीने वाला ही यज्ञोपवीती (यज्ञोपवीतधारी) है। ऐसे साधक को ही यज्ञरूप और यज्वा (यज्वन्) कहा गया है-इदं यज्ञोपवीतं तु परमं यत्परायणम्। स विद्वान्यज्ञोपवीती स्यात्स यज्ञस्तं यज्वानं विदुः (ब्रह्मो० १५)। २५८. यति-द्र०-ज्ञानखण्ड-संन्यासी-यति। २५९. यम - आर्षग्रन्थों में प्रमुखतः योग के आठ अंग प्रतिपादित हैं। ये हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यम और नियमों के अन्तर्गत भी पाँच-पाँच गुण समाविष्ट हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह--ये यम कहलाते हैं- अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः (पातं०यो०प्र०सा०पा०सूत्र-३०)। प्रथम-यम अहिंसा शब्द का अर्थ है-अद्रोह, अनपकार, किसी प्रकार भी किसी को पीड़ा न पहुँचाना। वाचस्पत्यम् में इसका अर्थ इन शब्दों में परिभाषित किया गया है-वेदोक्तेन प्रकारेण विना सत्यं तपोधन। कायेन मनसा वाचा हिंसा हिंसा न चान्यथा।। आत्मा ....वेदान्त वेदिभिः अर्थात् वेदोक्त रीति के बिना मन, वाणी और शरीर के द्वारा किसी को कष्ट पहुँचाना ही हिंसा है; किन्तु किसी के कल्याण के लिए यदि उसे उक्त तीनों प्रकार से कष्ट पहुँचे, तो वह अहिंसा ही कही जायेगी, जैसे-शिक्षार्थ किसी को ताड़ना देना या रोग निवारण हेतु किसी को कटु औषधि देना, आपरेशन करना अहिंसा ही है, वस्तुतः समस्त यम नियमों का मूल अहिंसा है, क्योंकि अहिंसा को परम धर्म कहा गया है-अहिंसा परमोधर्मः। दूसरा-यम सत्य है। किसी वस्तु का यथार्थ ज्ञान सत्य कहलाता है। शरीर द्वारा इसका प्रयोग शरीर का सत्य है। वाणी द्वारा इसका प्रयोग वाणी का सत्य, मन के द्वारा इसका प्रयोग मन का सत्य है। साधारणतः सत्य को वाणी द्वारा व्यक्त करने का ही विषय माना जाता है। इन्द्रियों द्वारा जैसा देखा, सुना और सूँघा है, उसे वाणी द्वारा वैसा कह देना सत्य है- चक्षुरादीन्द्रियैर्दृष्टं श्रुतं घ्रातं मुनीश्वर। तस्यैवोक्तिर्भवेत् सत्यं विप्र तन्नान्यथा भवेत् (जा०दर्शनो० १.२)। वेदान्त में परब्रह्म को ही सत्य माना गया है; क्योंकि वह सर्वकाल में शाश्वत है। उसके अतिरिक्त अन्य कोई सत्य नहीं है-सर्वं सत्यं परं ब्रह्म ...... (जा०दर्शनो १.१०)। वाणी द्वारा यदि ऐसा सत्य कहा जाता है, जो किसी का अहित करता है, तो इसे ऋषियों ने सत्य नहीं माना है। इसीलिए उसने सत्य की मर्यादा सुनिश्चित कर दी है-सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् (मनु०) अर्थात् वह सत्य बोले जो प्रिय (हितकर) हो। अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए। महाभारत ने भी इसी प्रकार के सत्य की पुष्टि की है- सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् यद्भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यं मतं मम। तृतीय- यम अस्तेय अर्थात् चोरी न करना है; किन्तु यह स्थूल धन की चोरी न करने तक ही सीमित नहीं है। किसी के अधिकारों का हनन न करना तथा नैतिक मूल्यों की रक्षा करना भी अस्तेय है। इसके विपरीत अधिकारियों द्वारा