१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंयायावर ३८८ परिशिष्ट रिश्वत लेना, दुकानदारों द्वारा निश्चित या उचित मूल्य से अधिक लेना, कम तौलना, मिलावट करना ये सभी अस्तेय विरोधी हैं। जाबाल दर्शनोपनिषद् में अस्तेय इन शब्दों में निरूपित है- अन्यदीये तृणे रत्ने काञ्चने मौक्तिकेऽपि च। मनसा विनिवृत्तिर्या तदस्तेयं विदुर्बुधाः। आत्मन्यानात्मभावेन ......मुने (जा०दर्शनो० १.१०-१२) अर्थात् किसी दूसरे के तृण (तिनके), रत्न, मणि, मुक्ता, सुवर्ण, धन सम्पदा पर मन भी न चलना अस्तेय है। संसार के सभी व्यवहार अनात्म हैं अर्थात् आत्मा से भिन्न हैं, ऐसा मानने वाले ज्ञानीजन अस्तेय का ही पालन करते हैं। चौथा-यम ब्रह्मचर्य है। शास्त्रों में इसकी बहुत महिमा गायी गई है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार ब्रह्म अर्थात् वेदार्थ का आचरण ही ब्रह्मचर्य है- ब्रह्मचर्यं, क्ली; (ब्राह्मणे वेदार्थे चर्य्यं आचरणीयम्)। सामान्यतः ब्रह्मचर्य का अर्थ अष्ट प्रकार के मैथुन का प्रतिषेध है- ब्रह्मचर्य्यं अष्टाङ्गमैथुन प्रतिषेधः (श०क० खं० ३ पृ० ४४४)। किसी भी प्रकार से वीर्य का क्षय न करना ब्रह्मचर्य माना जाता है। इसकी महिमा बताते हुए हठयोग प्रदीपिकाकार ने कहा है- मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणम् अर्थात् बिन्दु (वीर्य) का पात मरण तथा बिन्दु की रक्षा ही जीवन है। जाबाल दर्शनोपनिषद् में ब्रह्मचर्य इन शब्दों में विवेचित है- कायेन वाचा मनसा स्त्रीणां परिविवर्जनम्। ऋतौ भार्या तदा स्वस्य ब्रह्मचर्यं तदुच्यते ॥ ब्रह्मभावे मनश्चारं ब्रह्मचर्यं परन्तप (जा०दर्शनो० १.१३) अर्थात् मन, वाणी और शरीर से नारी प्रसंग का परित्याग तथा धर्म बुद्धि से ऋतु काल में ही स्त्री प्रसंग ब्रह्मचर्य है। अथर्ववेद में उल्लेख है कि ब्रह्मचर्य तप के द्वारा ही देवों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है- ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत (अथर्व० ११.७.१९) पाँचवाँ-यम अपरिग्रह है। अपनी अनिवार्य आवश्यकता से अधिक वस्तुओं, धनादि का परित्याग अपरिग्रह कहलाता है। विषय वस्तुओं की अस्वीकार करना भी अपरिग्रह है। महर्षि व्यास के अनुसार विषयों में विभिन्न दोष देखकर उन्हें ग्रहण न करना ही अपरिग्रह है-विषयाणामर्जंनरक्षणक्षयसंगहिंसादोषदर्शनादस्वीकरणमपरिग्रहः (साङ्ख्य दर्शन-व्यास भाष्य)। इस प्रकार प्रमुखतः ये पाँच यम ही प्रचलित हैं। कुछ ग्रन्थों में दशविध यम वर्णित हैं। ये अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव (सभी के प्रति समान भाव), क्षमा, धृति, मिताहार और शौच हैं- अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयाऽऽर्जवम्। क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश (जा०दर्शनो० १.६)। २६०. यायावर- द्र०-गृहस्थ। २६१. योग -द्र०-ज्ञानखण्ड। २६२. योगनिद्रा- यौगिक क्रियाओं में योगनिद्रा का भी उल्लेख मिलता है। सामान्यतः निद्रा सुषुप्तावस्था को कहते हैं; किन्तु यौगिक प्रक्रिया से उत्पन्न निद्रा योगनिद्रा कहलाती है,जिसे कोश ग्रन्थों में समाधि का एक अंग कहा गया है। हिन्दी विश्वकोश खं० १८ पृ० ६२२ में उल्लेख है-योगश्चित्तवृत्ति निरोधलक्षणः समाधिस्तद्रूपा निद्रा अर्थात् योग, चित्त वृत्ति का निरोध है, उसका चरमोत्कर्ष समाधि है। समाधि में बाह्यज्ञान नहीं रहता। इसलिए यह अवस्था योगनिद्रा कहलाती है। मण्डलब्राह्मण उपनिषद में भी शुद्ध, अद्वैत, चैतन्य और सहज अमनस्क स्थिति की योगनिद्रा की उपमा दी गई है- शुद्धाद्वैताजाड्यसहजामनस्कयोगनिद्रा.....जीवन्मुक्तो भवति (मं०ब्रा०उ० २.५.२)। इस मंत्र की टीका में ब्रह्मयोगी ने उपर्युक्त स्थिति को निर्विकल्प समाधि कहा है-अजाड्य.....निर्विकल्प समाधिः (मं०ब्रा०उ० २.५.२ टीका)। २६३. योगी- द्र०-ज्ञानखण्ड -योग। २६४. योनि- द्र०-ज्ञानखण्ड। २६५. राजयोग- द्र०-मन्त्रयोग। २६६. रुद्र- द्र०-त्र्यम्बक। २६७. लक्ष्यत्रय- इस शब्द का उल्लेख उपनिषदों में प्राप्त होता है। भ्रूमध्य स्थित सच्चिदानन्द स्वरूप चेतन पुञ्ज ब्रह्म (तारक ब्रह्म) का दर्शन प्राप्त करने के लिए लक्ष्यत्रय का अवलोकन करने का विवेचन मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् में इन शब्दों में निर्दिष्ट है-भ्रूमध्ये सच्चिदानन्दतेजः कूटरूपं .....तदाप्त्युपायं लक्ष्यत्रयावलोकनम् (मं०ब्रा० उ० १.२.४- ५)। ब्रह्मदर्शन में जिन तीन प्रकार की दर्शन प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाता है और उनमें जिन रंग विशेषों व स्थितियों का दर्शन होता है, वे ही तीन प्रकार के दर्शन लक्ष्यत्रय के नाम से जाने जाते हैं। बाह्य लक्ष्य, मध्य लक्ष्य और अन्तर्लक्ष्य- ये ही त्रिलक्ष्य (लक्ष्यत्रय) हैं। ज्योति (ब्रह्मज्योति) के दर्शन में सर्वप्रथम योगी को नासिका के अग्रभाग से चार, छः, आठ, दस और बारह अंगुल की दूरी पर क्रमशः नीला, काला, रक्त, पीत और दो रंगों के संमिश्रण जैसे रंग का आकाश