१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदिखाई पड़ता है, यही बाह्य लक्ष्य है-बहिर्लक्ष्यं तु नासाग्रे चतुःषडष्टदश-द्वादशाङ्गुलीभिः .......व्योमत्वं पश्यति स तु योगी (मं० ब्रा०उ० १.२.८)। मध्य लक्ष्य का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है- प्रातः काल में (ध्यान करने पर) सूर्य, चन्द्र और अग्नि को ज्वालाओं के समान और उससे रहित अन्तरिक्ष-सम दिखाई पड़ता है। वह उसी के आकारवत् आकारयुक्त हो जाता है। यही मध्य लक्ष्य है-मध्यलक्ष्यं तु प्रातःश्चित्रादिवर्णसूर्य चन्द्र वह्निज्वालावलीवन्न- द्विहीनान्तरिक्षवत्पश्यति। तदाकाराकारी भवति (म०ब्रा०उ०१.२.११-१२)। इसी उपनिषद् में अन्तर्लक्ष्य का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है कि अन्तर्लक्ष्य दीप्तिमान् ज्योति के समतुल्य है, बाह्य और आन्तरिक इन्द्रियों द्वारा अगोचर इसे महर्षिगण ही (पूर्णतः) जान सकते हैं-अन्तर्लक्ष्यं जलज्योतिः स्वरूपं भवति। महर्षिवेद्यं अन्तर्बाह्येन्द्रियैरदृश्यम् (मं०ब्रा०उ० १.३.६)। अन्तर्लक्ष्य के विषय में विभिन्न विद्वानों के पृथक्-पृथक् मत हैं। कोई इसे सहस्रार दल में दीप्तिमान् ज्योति के समतुल्य मानते है, कोई बुद्धि रूपी गुहा में सर्वाङ्ग सुन्दर पुरुष के रूप को अन्तर्लक्ष्य मानते हैं, कोई शीर्ष के अन्तर्गत स्थित मण्डल के बीच में स्थित पंचमुखी और उमा सहित महेश्वर का प्रशान्त रूप ही अन्तर्लक्ष्य मानते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष ही अन्तर्लक्ष्य है-सहस्रारे जलज्योतिरान्तर्लक्ष्यम्। बुद्धिगुहायां ...........अङ्गुष्ठ मात्रः पुरुषोऽन्तर्लक्ष्यमित्येके (मं०ब्रा०उ० १.४.१)। उपर्युक्त समस्त विकल्प आत्मा के ही हैं। अस्तु, उस अन्तर्लक्ष्य का जो पुरुष शुद्धात्मा दृष्टि से दर्शन करता है, वह ब्रह्मनिष्ठ कहलाता है-उक्तविकल्पं सर्वमात्मैव। तल्लक्ष्यं शुद्धात्मदृष्ट्या वा यः पश्यति स एव ब्रह्मनिष्ठो भवति (मं०ब्रा०उ० १.४.२)। अन्तर्लक्ष्य का दर्शन कर लेने से जीव जीवन्मुक्त स्थिति की ओर अग्रसर होकर, स्वयं अन्तर्लक्ष्य होकर परमाकाश स्वरूप अखण्ड मण्डलाकार हो जाता है। २६८. लययोग- द्र०-मन्त्रयोग। २६९. लिङ्ग शरीर - द्र०-पुर्यष्टक। २७०. लोक- द्र०- ज्ञानखण्ड-लोक-परलोक-समलोक। २७१. वज्रोली मुद्रा- द्र०-मुद्रा। २७२. वर्णाश्रम- द्र०-ज्ञानखण्ड-चतुराश्रम एवं चतुर्वर्ग। २७३. वानप्रस्थ - चारों आश्रमों में ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के पश्चात् तीसरा आश्रम वानप्रस्थ कहलाता है। इसमें गृहस्थ व्यक्ति परिवार को जिम्मेदारियों को निपटाकर पुत्रादि पर परिवार के दायित्व सौंप कर अगले चरण में पत्नी सहित पवित्र जीवन जीकर आत्म कल्याण और लोक सेवा के कार्यों में अपने जीवन के पच्चीस वर्ष लगाता है। हलायुध कोश में वानप्रस्थ को परिभाषा इन शब्दों में विवेचित है-वानप्रस्थः पुं० (वनप्रस्थे भवः, अण्) वैखानसः, तृतीयाश्रमः पुत्रमुत्याद्य वनवासं कृत्वा अकृष्टपच्यफलादिभक्षयित्वा ईश्वराराधन करोति यःसः (हला० पृ० ६००) अर्थात् वानप्रस्थी पुत्रोत्पत्ति के पश्चात् वन में निवास करता हुआ स्वयं उत्पन्न तथा स्वयं पके फलादि का सेवन करके ईश्वराराधन करता है। आश्रम उपनिषद् मंत्र ३ में वानप्रस्थी के चार भेद बताये गये हैं- वैखानस, उदुम्बर, वालखिल्य तथा फेनप-वानप्रस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वैखानसा उदुम्बरा बालखिल्याः फेनपाश्चेति। इनमें वैखानस वानप्रस्थी वे कहलाते हैं, जो स्वयं उत्पन्न तथा पकी हुई औषधियों तथा वनस्पतियों, जो ग्रामीणों द्वारा उपेक्षित है, में अग्नि संचार कर उदरपूर्ति करते हुए नियमित पञ्च महायज्ञ [वानप्रस्थी के लिए नियमित पाँच यज्ञ ब्रह्मयज्ञ (वेदाध्ययन व वेदाध्यापन), देवयज्ञ (अग्निहोत्र), पितृयज्ञ (श्राद्ध-तर्पण), अतिथि यज्ञ अथवा मनुष्य यज्ञ (अतिथिसेवा) और भूतयज्ञ (बलिवैश्व आदि- चींटी, कीड़े, कुत्ते, गौ व मछलियों आदि को भोजन कराना) करने का विधान है] सम्पन्न करते हुए आत्मा को साधना करते हैं-तत्र वैखानसा अकृष्ट पच्यौषधिवनस्पतिभिर्ग्रामबहिष्कृताभिरग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ३)। उदुम्बर वानप्रस्थी उन्हें कहते हैं, जो प्रातः उठकर जिस दिशा में भी देखें उधर जाकर उदुगरि (गूलर), बदर (बेर), नीवार और श्यामाक (साँवाँ) आदि का संग्रह करके उनमें अग्नि संचार करके पञ्च महायज्ञों को क्रियाएँ सम्पन्न करते हुए जीवन को साधना करते हैं-उदुम्बराः प्रातरुत्थाय यां दिशमभिप्रेक्षन्ते.....आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ३)। उल्लेखनीय है कि गूलर आदि का सेवन करने के कारण इन वानप्रस्थियों का नाम उदुम्बर पड़ा है। कुछ उपनिषदों में 'औदुम्बर' पाठ भी मिलता है।