भारतकोश
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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

दिखाई पड़ता है, यही बाह्य लक्ष्य है-बहिर्लक्ष्यं तु नासाग्रे चतुःषडष्टदश-द्वादशाङ्गुलीभिः .......व्योमत्वं पश्यति स तु योगी (मं० ब्रा०उ० १.२.८)। मध्य लक्ष्य का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है- प्रातः काल में (ध्यान करने पर) सूर्य, चन्द्र और अग्नि को ज्वालाओं के समान और उससे रहित अन्तरिक्ष-सम दिखाई पड़ता है। वह उसी के आकारवत् आकारयुक्त हो जाता है। यही मध्य लक्ष्य है-मध्यलक्ष्यं तु प्रातःश्चित्रादिवर्णसूर्य चन्द्र वह्निज्वालावलीवन्न- द्विहीनान्तरिक्षवत्पश्यति। तदाकाराकारी भवति (म०ब्रा०उ०१.२.११-१२)। इसी उपनिषद् में अन्तर्लक्ष्य का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है कि अन्तर्लक्ष्य दीप्तिमान् ज्योति के समतुल्य है, बाह्य और आन्तरिक इन्द्रियों द्वारा अगोचर इसे महर्षिगण ही (पूर्णतः) जान सकते हैं-अन्तर्लक्ष्यं जलज्योतिः स्वरूपं भवति। महर्षिवेद्यं अन्तर्बाह्येन्द्रियैरदृश्यम् (मं०ब्रा०उ० १.३.६)। अन्तर्लक्ष्य के विषय में विभिन्न विद्वानों के पृथक्-पृथक् मत हैं। कोई इसे सहस्रार दल में दीप्तिमान् ज्योति के समतुल्य मानते है, कोई बुद्धि रूपी गुहा में सर्वाङ्ग सुन्दर पुरुष के रूप को अन्तर्लक्ष्य मानते हैं, कोई शीर्ष के अन्तर्गत स्थित मण्डल के बीच में स्थित पंचमुखी और उमा सहित महेश्वर का प्रशान्त रूप ही अन्तर्लक्ष्य मानते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष ही अन्तर्लक्ष्य है-सहस्रारे जलज्योतिरान्तर्लक्ष्यम्। बुद्धिगुहायां ...........अङ्गुष्ठ मात्रः पुरुषोऽन्तर्लक्ष्यमित्येके (मं०ब्रा०उ० १.४.१)। उपर्युक्त समस्त विकल्प आत्मा के ही हैं। अस्तु, उस अन्तर्लक्ष्य का जो पुरुष शुद्धात्मा दृष्टि से दर्शन करता है, वह ब्रह्मनिष्ठ कहलाता है-उक्तविकल्पं सर्वमात्मैव। तल्लक्ष्यं शुद्धात्मदृष्ट्या वा यः पश्यति स एव ब्रह्मनिष्ठो भवति (मं०ब्रा०उ० १.४.२)। अन्तर्लक्ष्य का दर्शन कर लेने से जीव जीवन्मुक्त स्थिति की ओर अग्रसर होकर, स्वयं अन्तर्लक्ष्य होकर परमाकाश स्वरूप अखण्ड मण्डलाकार हो जाता है। २६८. लययोग- द्र०-मन्त्रयोग। २६९. लिङ्ग शरीर - द्र०-पुर्यष्टक। २७०. लोक- द्र०- ज्ञानखण्ड-लोक-परलोक-समलोक। २७१. वज्रोली मुद्रा- द्र०-मुद्रा। २७२. वर्णाश्रम- द्र०-ज्ञानखण्ड-चतुराश्रम एवं चतुर्वर्ग। २७३. वानप्रस्थ - चारों आश्रमों में ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के पश्चात् तीसरा आश्रम वानप्रस्थ कहलाता है। इसमें गृहस्थ व्यक्ति परिवार को जिम्मेदारियों को निपटाकर पुत्रादि पर परिवार के दायित्व सौंप कर अगले चरण में पत्नी सहित पवित्र जीवन जीकर आत्म कल्याण और लोक सेवा के कार्यों में अपने जीवन के पच्चीस वर्ष लगाता है। हलायुध कोश में वानप्रस्थ को परिभाषा इन शब्दों में विवेचित है-वानप्रस्थः पुं० (वनप्रस्थे भवः, अण्) वैखानसः, तृतीयाश्रमः पुत्रमुत्याद्य वनवासं कृत्वा अकृष्टपच्यफलादिभक्षयित्वा ईश्वराराधन करोति यःसः (हला० पृ० ६००) अर्थात् वानप्रस्थी पुत्रोत्पत्ति के पश्चात् वन में निवास करता हुआ स्वयं उत्पन्न तथा स्वयं पके फलादि का सेवन करके ईश्वराराधन करता है। आश्रम उपनिषद् मंत्र ३ में वानप्रस्थी के चार भेद बताये गये हैं- वैखानस, उदुम्बर, वालखिल्य तथा फेनप-वानप्रस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वैखानसा उदुम्बरा बालखिल्याः फेनपाश्चेति। इनमें वैखानस वानप्रस्थी वे कहलाते हैं, जो स्वयं उत्पन्न तथा पकी हुई औषधियों तथा वनस्पतियों, जो ग्रामीणों द्वारा उपेक्षित है, में अग्नि संचार कर उदरपूर्ति करते हुए नियमित पञ्च महायज्ञ [वानप्रस्थी के लिए नियमित पाँच यज्ञ ब्रह्मयज्ञ (वेदाध्ययन व वेदाध्यापन), देवयज्ञ (अग्निहोत्र), पितृयज्ञ (श्राद्ध-तर्पण), अतिथि यज्ञ अथवा मनुष्य यज्ञ (अतिथिसेवा) और भूतयज्ञ (बलिवैश्व आदि- चींटी, कीड़े, कुत्ते, गौ व मछलियों आदि को भोजन कराना) करने का विधान है] सम्पन्न करते हुए आत्मा को साधना करते हैं-तत्र वैखानसा अकृष्ट पच्यौषधिवनस्पतिभिर्ग्रामबहिष्कृताभिरग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ३)। उदुम्बर वानप्रस्थी उन्हें कहते हैं, जो प्रातः उठकर जिस दिशा में भी देखें उधर जाकर उदुगरि (गूलर), बदर (बेर), नीवार और श्यामाक (साँवाँ) आदि का संग्रह करके उनमें अग्नि संचार करके पञ्च महायज्ञों को क्रियाएँ सम्पन्न करते हुए जीवन को साधना करते हैं-उदुम्बराः प्रातरुत्थाय यां दिशमभिप्रेक्षन्ते.....आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ३)। उल्लेखनीय है कि गूलर आदि का सेवन करने के कारण इन वानप्रस्थियों का नाम उदुम्बर पड़ा है। कुछ उपनिषदों में 'औदुम्बर' पाठ भी मिलता है।

वार्त्ताक वृत्ति ३१० परिशिष्ट

बालखिल्य वानप्रस्थी वे कहलाते हैं, जो जटाधारण करके फटे वस्त्र और वृक्ष की छालों को शरीर का आवरण बनाते हुए, आठ मास (मार्गशीर्ष मास से आषाढ़ मास) तक उपार्जित पुष्प-फल आदि (शाक-कन्दमूलादि फल और अन्नों) को ग्रहण करते हुए (उन आठ मासों के अतिरिक्त आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिकी पूर्णिमा के चार महीने-चातुर्मास्य तक भी वही आठ मास में उपार्जित पदार्थ ग्रहण करते हुए) कार्तिकी पूर्णिमा को सभी संचित भक्ष्य पदार्थ त्याग देते हैं अर्थात् कार्तिकी पूर्णिमा के बाद फिर नया उपार्जन करके ही ग्रहण करते हैं। इस तरह वे इन संचित भोज्य पदार्थों में अग्नि संचरण करते हुए पञ्चमहायज्ञों को सम्पन्न करते हुए आत्मा को प्रार्थना (साधना) करते हैं। आश्रम उपनिषदकार ने यह तथ्य इन शब्दों में प्रतिपादित किया है-वालखिल्य जटाधराश्चीरचर्मवल्कल-परिवृताः कार्त्तिक्यां पौर्णमास्यां पुष्पफलमुत्सृजन्तः शेषानष्टौ...प्रार्थयन्ते (आश्रामो० ३)। उल्लेखनीय है कि कुछ ग्रन्थों में वालखिल्य के स्थान पर बालखिल्य और बालिखिल्य पाठ भी मिलते हैं। फेनप वानप्रस्थी के लक्षण यह हैं कि वे विक्षिप्तवत् रहते हुए, शीर्ण पर्ण-फल (अपने आप गिरे हुए पत्ते और फल) ग्रहण कर उनमें अग्नि परिचरण करते हुए, जहाँ कहीं भी स्थान मिल जाये, वहीं निवास करते हुए, नियमित पञ्च महायज्ञादि क्रियाएँ सम्पन्न करते हुए आत्म साधना में निरत रहते हैं- फेनपा उन्मत्तकाः शीर्णपर्णफलभोजिनो यत्र तत्र वसन्तोऽग्निपरिचरणं कृत्वा आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो०३)। इन वानप्रस्थियों का नाम फेनप पड़ने का कारण अड्यार प्रकाशित माइनर उपनिषद् में आश्रमो०की टिप्पणी में लिखा है- फेनपाः स्वयं पतित पर्णफलादिकं फेनो नामेति केचित् अर्थात् कुछ विद्वानों का मानना है कि स्वयं गिरने वाले पत्ते और फलों को फेन कहते हैं। अतः इन्हें ग्रहण करने के कारण इन वानप्रस्थियों का नाम भी फेनप पड़ गया है। श्रीमद्भागवत के ३.१२. ४३ वें श्लोक की व्याख्या में फेनप उन्हें बताया गया है, जो (दूध पीते समय) बछड़े के मुख से गिरने वाले दूध के फेन से जीवनयापन करते हैं-फेनपा ........वत्समुखगलितपयःफेनपानेन जीवन्त इति। २७४. वार्त्ताक वृत्ति — द्र०-गृहस्थ। २७५. वालखिल्य — द्र०-वानप्रस्थ। २७६. वासनात्रय- वासना शब्द का उपयोग सामान्यतः आसक्ति अथवा विषम लिङ्गियों (स्त्री-पुरुषों) में परस्पर काम वासना को प्रगाढ़ता के अर्थ में किया जाता है; किन्तु कोश ग्रन्थों में इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार प्रतिपादित है-वासयति कर्मणा योजयति जीवमनांसीति वस-णिच्-युच्-टाप् (हि० वि० को० खं० २१ पृ० २३०) जिसके अनेक अर्थ है, जैसे-प्रत्याशा, ज्ञान, संस्कार, स्मृति, हेतु, भावना, इच्छा, कामना आदि। किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति अत्यधिक स्नेह या मोह के कारण उससे सम्बन्धित कोई प्रसङ्ग उपस्थित होते ही उसका संस्कार अथवा वासना जाग पड़ती है, जिससे वह तत्सम्बन्धित कार्य करने को समुद्यत हो उठता है। जैसे कोई लेखक या कवि जो नदी, सरोवर, बगीचे आदि के निकट लेख या कविता लिखने का अभ्यासी है। यदि वह कहीं बाहर गया हुआ है और वहाँ भी उसे ऐसा ही वातावरण मिल जाए, तो उसके अन्दर कुछ लिखने के भाव जाग्रत् होने लगते हैं; इसे ही उसका संस्कार या वासना का जागना कहेंगे। वासनाएँ तीन प्रकार को मानी गयी है, जिन्हें उपनिषदों में वासनात्रय के नाम से जाना जाता है। ये हैं-देह सम्बन्धी वासना, मन सम्बन्धी वासना और बुद्धि सम्बन्धी वासना। संन्यासोपनिषद् (२-२०) के वासनात्रय के अन्तर्गत देह वासना, शास्त्र वासना तथा लोक वासना का भी उल्लेख किया गया है। परमहंस परिव्राजकोपनिषद् में मुमुक्षु को निर्देश दिया गया है कि वह सद्गुरु से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर इहलोक और परलोक के सुखों के वास्तविक स्वरूप को समझकर एषणात्रय, वासनात्रय, ममता और अहंकारादि को वमन किए (उल्टी किए) हुए अन्न के समतुल्य समझकर मोक्ष के एक मात्र साधन ब्रह्मचर्याश्रम को पूरा करके गृहस्थ बने, तदुपरान्त वानप्रस्थी और इसके पश्चात् संन्यास आश्रम ग्रहण कर प्रव्रज्या करे-सद्गुरु समीपे ....... ज्ञात्वैषणात्रय वासनात्रय ममत्वाहंकारादिकं वमनान्नमिव ......प्रव्रजेत् (परम० प० २)। इस मंत्र को टीका में ब्रह्मयोगी ने वासनात्रय को देहादि वासनात्रय कहकर वासना के तीनों रूपों की ओर संकेत किया है- न कदापि संसारमण्डले ..........देहादि वासनात्रय .... ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। इस प्रकार क्रमशः ब्रह्मचर्याश्रम से गृहस्थ, गृहस्थ से वानप्रस्थ और इसके पश्चात् संन्यास धारण करने के अतिरिक्त एक पथ और है कि जब कभी भी पूर्ण वैराग्य उत्पन्न हो जाये (वासनात्रय, एषणात्रय, आदि दोषों से मुक्त हो जाये), तभी प्रव्रज्या आश्रम अर्थात् संन्यास आश्रम ग्रहण किया जा सकता है। इस स्थिति में संन्यास ग्रहण करने के लिए क्रमशः आश्रम ग्रहण करना, व्रती (व्रतधारण करने वाला), पुनर्ब्रती, स्नातक, अस्नातक, अग्निहोत्री अथवा उससे रहित होना आवश्यक नहीं है।

परिशिष्ट ३९१ विरज २७७. विक्षेप — द्र०-अज्ञान-आवरण। २७८. विज्ञान—द्र०-ज्ञानखण्ड -ज्ञान-विज्ञान। २७९. विज्ञानात्मा— विज्ञानात्मा शब्द वस्तुतः विशेषण सहित जीवात्मा के स्वरूप का बोधक है। इसका उल्लेख उपनिषदों में मिलता है। विज्ञानात्मा शब्द का सामान्य अभिप्राय विज्ञान अर्थात् विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न जीवात्मा से है। वेदान्त के अनुसार स्थिति भेद से इस जीवात्मा की ही प्राज्ञ, विश्व और तैजस संज्ञाएँ होती हैं। १०८ उपनिषद् ज्ञानखण्ड के परिशिष्ट के 'प्राज्ञ' प्रकरण में यह द्रष्टव्य है। इनमें स्थूल शरीर के व्यष्टि उपहित चैतन्य को विश्व कहते हैं। (यही समष्टि उपहित चैतन्य के रूप में वैश्वानर कहलाता है।) इसी विश्वसंज्ञक जीवात्मा को प्रज्ञात्मा की संज्ञा प्रदान की गई है। विराट् पुरुष (समष्टिगत वैश्वानर) ही ईश्वर की आज्ञा से व्यष्टि रूप देह में प्रविष्ट होकर बुद्धि तत्त्व में निवास करके विश्व कहलाता है। इसी विश्व को विज्ञानात्मा, चिदाभास, व्यावहारिक, जाग्रत्, स्थूल देहाभिमानी और कर्म-भू आदि कहते हैं। इस सन्दर्भ में पैङ्गलोपनिषद् में उल्लेख है-ईशाज्ञया विराजो व्यष्टिदेहं प्रविश्य बुद्धिमधिष्ठाय विश्वत्वमगमत्। विज्ञानात्मा चिदाभासो विश्वो व्यावहारिको ......... नाम भवति (पैङ्गलो० २.६) अर्थात् व्यष्टि देह में प्रविष्ट होने पर बुद्धि में वास करके विश्व अथवा प्रज्ञात्मा कहलाता है। वेदान्त के मत में यह विराट् ही सूक्ष्म शरीर का परित्याग किये बिना स्थूल शरीर में प्रविष्ट हो जाता है और विश्व के सभी शरीरों में प्रवेश करने की क्षमता के कारण ही इसे विश्व कहते हैं। इस तथ्य की पुष्टि करने हुए स्वामी रामतीर्थ लिखते हैं-सर्वंथा विश्वशरीरवर्तित्वाद् विश्व इत्युक्तं भवति (वे०सा०विद्व०खं०१७)। विषयों का ज्ञान और उपभोग जाग्रत् स्थिति में यही विश्व या विज्ञानात्मा १९ मुखों (पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच प्राणों, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) द्वारा करता है- जागरित स्थानो बहिः प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूल भुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः (माण्डू०३)। प्रश्नोपनिषद् में इस विज्ञानात्मा को द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता और घ्राता आदि कहकर इसी तथ्य की पुष्टि की गई है- एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षरे आत्मनि संप्रतिष्ठते (प्रश्नो०४.९)। २८०. विद्या-ज्ञान— द्र०-ज्ञानखण्ड। २८१. विधाता— द्र०-ज्ञानखण्ड -विधाता-धाता। २८२. विनियोग— वि-नि-युज् और घञ् से निर्मित विनियोग शब्द के कई अर्थ हैं। जैसे-किसी फल के उद्देश्य से किसी वस्तु का उपयोग, किसी विषय में लगाना, प्रयोग, वैदिक कृत्य में मन्त्र विशेष का प्रयोग, प्रेषण, प्रवेश आदि। इन कई अर्थों में से 'वैदिक कृत्य में किसी मन्त्र के प्रयोग' के सन्दर्भ में पहले से ही गायत्री साधना करते समय विश्वामित्र और वसिष्ठ के शाप विमोचन हेतु एक विशेष मन्त्र द्वारा विनियोग किया जाता रहा है। (वर्तमान में तो युग ऋषि द्वारा गायत्री साधना को शाप मुक्त कर देने के कारण इसकी आवश्यकता नहीं पड़ती)। कई उपनिषदों में किसी वस्तु या साधना प्रक्रिया के प्रयोग के अर्थ में विनियोग शब्द प्रयुक्त हुआ है। जैसे-जाबालदर्शनोपनिषद् में प्राणायाम के विभिन्न प्रकारों का विनियोग (प्रयोग) विभिन्न रोगों के निरसन हेतु निर्दिष्ट है-विनियोगान् प्रवक्ष्यामि प्राणायामस्य सुव्रत। ...........सर्वरोग विनिर्मुक्तो जीवेद्वर्षशतं नरः (जा०दर्शनो० ६.२१,२३)। २८३. विपर्यास ( विपर्यय ) — द्र०-अध्यारोप-अपवाद। २८४. विभु— कोश ग्रन्थों में विभु शब्द के कई अर्थ संप्राप्य हैं, यथा-प्रभु, स्वामी, शंकर, ब्रह्मा, भृत्य, विष्णु, आत्मा, जीवात्मा, ईश्वर, सर्वव्यापक, सर्वत्रगमनशील, रात, दिन, बहुत बड़ा, विस्तृत, महान् और ऐश्वर्ययुक्त आदि। वेद, पुराणों और उपनिषदों में इस जगत् में उस विराट् ब्रह्म की सर्वव्यापकता के प्रतिपादन में भी कई स्थलों पर विभु शब्द का प्रयोग मिलता है। पैङ्गलोपनिषद् में ईश्वर के ऐश्वर्य, महानता और स्वामित्व को प्रदर्शित करने के लिए ईश्वर के साथ विभु विशेषण प्रयुक्त हुआ है। पैङ्गल ऋषि ने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया कि समस्त लोकों की सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाला विभु ईश्वर किस प्रकार जीवत्व को प्राप्त हुआ-अथ पैङ्गलो याज्ञवल्क्यमुवाच सर्वलोकानां सृष्टिस्थित्यन्तकृद्विभुरीशः कथं जीवत्वमगमदिति (पैङ्गलो० २.१)। इसके उत्तर में याज्ञवल्क्य जी ने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की उत्पत्ति सहित विभु ईश्वर के स्वरूप का विवेचन किया। इस प्रकार सर्वव्यापकत्व, विराट्, महान् आदि अर्थों में विभु शब्द का प्रयोग अनेक स्थलों पर प्राप्त होता है। २८५. विरज— सामान्यतः रज (धूल) रहित वस्तु को विरज कहते हैं; किन्तु आध्यात्मिक सन्दर्भों में रज अर्थात् रजोगुण

श्राद्ध-तर्पण ३१४ परिशिष्ट ३०९. श्राद्ध -तर्पण - द्र०-ज्ञानखण्ड -श्राद्ध। ३१०. श्रुति-द्र०-ज्ञानखण्ड -श्रोत्रिय। ३११. श्रोत्रिय-द्र०-ज्ञानखण्ड। ३१२. षडूर्मियाँ-षड्भाव विकार - उपनिषदों में कई स्थलों पर षडूर्मियों और षड्भाव विकारों का वर्णन प्राप्त होता है। साधक के विभिन्न स्तरों के अनुरूप उनकी दिनचर्या और नियम भी भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे यति (संन्यासी) के लिए आचरणीय विभिन्न नियमों का उल्लेख करते हुए प्रजापति ब्रह्मा ने नारद से कहा कि यति को षडूर्मिरहित और षड्भाव विकारों से शून्य रहना चाहिए-अयत्नेन प्राप्तमाहरन् ........षडूर्मिरहितः, षड्भाव विकार शून्यः, ........स्वरुपानुसंधानेन वसेत् (ना०परि० ७.१)। कोशग्रन्थों में छः प्रकार की ऊर्मियाँ (तरङ्गैं) वर्णित हैं- बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य मनसः स्मृतौ । शोक मोहौ शरीरस्य जरामृत्यू षडूर्मयः (वाच०पृ० १३९३) अर्थात् भूख और प्यास प्राण से सम्बन्धित, शोक और मोह मन से सम्बन्धित तथा जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु, ये शरीर से सम्बन्धित छः ऊर्मियाँ हैं। इसी प्रकार छः प्रकार के भाव विकार भी होते हैं, जिनसे संन्यासी को दूर रहने का परामर्श दिया जाता है। छः भाव विकारों का उल्लेख निरुक्तकार यास्क ने इन शब्दों में किया है- षड् भावविकारा भवन्तीति वार्ष्यायणिः ॥ .......जायतेऽस्ति, विपरिणमते, वर्धते, ऽपक्षीयते, विनश्यतीति (नि० १.१.३) अर्थात् जन्म (उत्पन्न होना), अस्तित्व (विद्यमान रहना), विपरिणमन (परिवर्तित होना), विकास (बढ़ना या विकसित होना), अपक्षय (क्षीण होना) और विनाश (पूर्णतः विनष्ट हो जाना) - ये ही षड्भाव विकार हैं। संन्यासी (यति) को आत्मज्ञान प्राप्त करके इन भाव विकारों से ऊँचा उठना चाहिए। वैशेषिक दर्शन में पदार्थ के षड्भाव इस प्रकार निर्दिष्ट हैं-द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। इसी प्रकार ज्योतिष की दृष्टि से लज्जित, गर्वित, क्षुधित, तृषित, मुदित और क्षोभित ये षड्भाव कहलाते हैं; किन्तु उपनिषदों में जहाँ भी परमहंस, अवधूत, संन्यासी आदि को षड्भाव विकार शून्य होने का निर्देश दिया गया है, वहाँ उपर्युक्त जन्म, अस्तित्व आदि षड्भाव विकारों से ही तात्पर्य है। परमहंस परिव्राजकोपनिषद् में भी अयज्ञोपवीती, अशिखी तथा सर्व कर्म परित्यागी ब्रह्मनिष्ठ परमहंस परिव्राजक के लक्षण बताते हुए उसे निन्दा, अमर्ष (क्रोध), सहिष्णु, षडूर्मिवर्जित और षड्भाव विकार शून्य होकर ज्येष्ठ-अज्येष्ठ के व्यवधान से रहित होने वाला विवेचित किया गया है- लोके परमहंस परिव्राजको दुर्लभतरः ...........स निन्दामर्ष सहिष्णुः स षडूर्मिवर्जितः। षड्भाव विकार शून्यः। स ज्येष्ठाज्येष्ठव्यवधान रहितः ..... परमहंस परिव्राडित्युपनिषत् (परम० प० ५)। इस प्रकार परमहंस- संन्यासी को उपर्युक्त गुणों को अपनाकर समस्त इन्द्रियों पर संयम (नियंत्रण) रखते हुए सतत ब्रह्मभाव में ही स्थित रहना चाहिए, ऐसा परमहंस ब्रह्मरूप ही हो जाता है। ३१३. षड्भाव विकार-द्र०-षडूर्मियाँ-षड्भाव विकार। ३१४. षड्रिपु -द्र०-ज्ञानखण्ड षड्रिपु-षड्वर्ग। ३१५. षण्मुखी मुद्रा-द्र०-मुद्रा। ३१६. षोडश कला - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३१७. संन्यास - द्र०-ज्ञानखण्ड -चतुराश्रम। ३१८. संन्यासी - द्र०-ज्ञानखण्ड -संन्यासी-यति। ३१९. संयम -द्र०-षडूर्मियाँ-षड्भाव विकार। ३२०. संवत्सर - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३२१. सत्य - द्र०-यम। ३२२. सदानन्द - द्र०-अद्वयानन्द। ३२३. सद्गति - द्र०- सद्गुरु। ३२४. सद्गुरु - ज्ञानाञ्जन शलाका से अज्ञान रूपी तिमिरान्धता को दूर करने वाले को गुरु शब्द से अभिहित किया गया है। इस सन्दर्भ में यह श्लोक प्रसिद्ध है- अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ कोशग्रन्थों में 'गु' शब्द को अन्धकार वाची और 'रु' को प्रकाशवाची माना गया है। इस मान्यता के अनुसार भी

परिशिष्ट ३९५ सन्धि अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला गुरु होता है। गायत्री मंत्र के उपदेष्टा को भी गुरु कहते हैं; क्योंकि प्राचीनकाल में कोई भी गुरु अपने शिष्य को सर्वप्रथम गायत्री मंत्र ही दिया करता था। इसीलिए गायत्री मंत्र को गुरुमंत्र कहा जाने लगा और गुरु को गायत्रीरूप। इसी सन्दर्भ में आचार्य शंकर का यह श्लोक द्रष्टव्य है-नमोऽस्तु गुरवे तस्मै, गायत्रीरूपिणे सदा। यस्य वागमृतं हन्ति विषं संसार संज्ञकम् ॥ मनुस्मृति में गुरु की परिभाषा इस प्रकार निर्दिष्ट है- निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि । सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते (मनु० २.१४२) अर्थात् जो निषेक (गर्भाधान) आदि संस्कारों को विधिवत् कराकर अन्नादि से पालन-पोषण करता है, उसे गुरु कहते हैं। इस परिभाषा के अनुसार माता-पिता प्रथम गुरु हैं, तत्पश्चात् पुरोहित आदि। तप, पुण्य, ज्ञान आदि समस्त गुणों से सम्पन्न तथा शिष्य का हर प्रकार से कल्याण करने वाले को सद्गुरु कहते हैं। दूसरे शब्दों में उत्तम गुण युक्त विशिष्ट गुरु को 'सद्गुरु' कहते हैं। जिसके पास समस्त सद्गुण, विद्वत्ता और क्रियाशीलता (तपश्चर्या) होती है, वे ही सच्चे अर्थों में सद्गुरु कहलाते हैं। तन्त्र सार में सद्गुरु के लक्षण इस प्रकार विवेचित हैं- जो शान्त, दान्त, कुलीन, विनीत, शुद्ध भाव सम्पन्न, पवित्र स्वभाव, कार्यदक्ष, तन्त्र-मन्त्रज्ञ, शिष्य को अनुशासन में रखने तथा उन पर अनुग्रह करने आदि में समर्थ है, वही सद्गुरु कहलाने योग्य है-सिद्ध तपस्वी कुशलः तन्त्रज्ञः सत्यभाषिता। निग्रहानुग्रहे शक्तो गुरुरित्यभिधीयते ॥ शान्तो दान्तः ..............कर्मभिः (तं०सा०सं० १.२६-२७)। बहुत जन्मों के पुण्य फल से सद्गुरु की प्राप्ति होती है। वेदान्त सार में उल्लेख है कि जिन मुमुक्षुओं के शम, दम, उपरति, तितिक्षा आदि साधन सिद्ध हो चुके हों, उन्हें ब्रह्मनिष्ठ-श्रोत्रिय सद्गुरु के पास जाकर 'तत्त्वमस्यादि' का उपदेश प्राप्त करना चाहिए। नारद परिव्राजकोपनिषद् में भी गुरु-सद्गुरु के गुण निर्दिष्ट हैं। संन्यास धारण के क्रम में ब्रह्मा ने नारद से कहा कि जिस श्रेष्ठ कुलोत्पन्न और माता-पिता के आज्ञाकारी बालक का उपनयन न हुआ हो, उसका उपनयन कराकर माता-पिता उस बालक को किसी श्रोत्रिय, शास्त्रों के अनुरागी, श्रद्धावान्, गुणवान् और श्रेष्ठ कुलोत्पन्न सद्गुरु के पास रहने के लिए भेजें-भो नारद .....श्रद्धावन्तं सत्कुलभवं श्रोत्रियं .....सद्गुरुमासाद्य नत्वा संन्यस्तुमर्हतीत्युपनिषद (ना० परि० २.२)। सद्गुरु पाकर शिष्य का जीवन धन्य हो जाता है और वह इहलोक में सब तरह समुन्नत होकर परलोक में भी सद्गति प्राप्त करता है। हिन्दी विश्वकोश के अनुसार- सती गतिर्यस्य अर्थात् जिसकी उत्तम विशिष्ट गति हो वह सद्गति सम्पन्न कहा जाएगा। मुक्ति, निर्वाण आदि को भी सद्गति माना गया है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा की उच्च लोकों में जो गति होती है, उसे ही सद्गति कहते हैं। पाप से असद्गति और पुण्य करने से सद्गति प्राप्त होती है, ऐसा शास्त्रों में उल्लेख है। वटुकोपनिषद् में परब्रह्म का एक नाम 'एक' भी बताया गया है। उस एक में ही समस्त प्राणी विलीन होते तथा एक से ही सृजित होते हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिणादि तीर्थों में भ्रमण करने वाले उस 'एक' ब्रह्म हेतु ही वहाँ जाते हैं और उन सभी की सद्गति होती है-अथ कस्मादुच्यत .......... तीर्थमेके व्रजन्ति ........तेषां सर्वेषामिह सद्गतिः (वदुको०)। इस प्रकार जो साधक सद्गुरु की आज्ञा से सत्पथ पर चलते हैं, उनकी सद्गति सुनिश्चित है। ३२५. सन्तोष - द्र०-नियम । ३२६. सन्धि- सन्धि शब्द का प्रयोग कई प्रयोजनों के निमित्त होता है। हिन्दी विश्वकोश सं० २३ पृ० ५५१ में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार प्रतिपादित है- सन्धानमिति-सम्-धा-कि। इस व्युत्पत्ति के अनुसार सन्धि शब्द के अनेक अर्थ हैं, जैसे राजाओं के बीच कुछ विवादों को निपटाने के लिए परस्पर कुछ समझौता कर लेना सन्धि कहलाती है। इसी प्रकार शरीर में अस्थियों के विभिन्न जोड़ों को भी सन्धि कहते हैं। व्याकरण की दृष्टि से दो वर्णों (स्वर, व्यंजन या विसर्ग) के मिलन को भी सन्धि कहते हैं। व्याकरण में इन्हें क्रमशः स्वर-सन्धि, व्यंजन सन्धि और विसर्ग सन्धि कहा जाता है। दो युगों के मध्य को भी सन्धि अथवा सन्ध्या कहते हैं। दिन और रात्रि के मिलन काल को भी सन्धि या सन्ध्या कहते हैं। सन्ध्याएँ तीन होती हैं - प्रातः काल, मध्याह्न और सायंकाल । इन्हें त्रिसन्ध्या या त्रिसन्धि भी कहते हैं। प्रत्येक सन्धि या सन्ध्या में गायत्री जप अथवा ईश्वर उपासना का विधान है। सन्धिकालों अथवा सन्ध्याओं में की गई उपासनाएँ विशेष रूप से फलित होती हैं। इसमें ध्यान सम्यक् रूप से लगता है, इसीलिए सन्ध्या शब्द की व्युत्पत्ति में यह भाव ध्वनित होता है-सन्ध्या (सं० स्त्री) सं सम्यक् ध्यायत्यस्यामिति सं+ध्यै चिन्तने+आतश्चोपसर्गे (श०क० खं० ५ पृ० २४१)। द्विजातियों के लिए नियमित रूप से सन्ध्या करना अनिवार्य माना गया है। श्रुति में उल्लेख है- अहरहः सन्ध्यामुपासीत (हि०वि०को०खं० २३ पृ० ५५४)। आरुण्युपनिषद् में संन्यासी के कर्तव्यों के क्रम में निर्दिष्ट है कि उसे तीन सन्ध्याओं में स्नान करके समाधिस्थ होकर आत्मा में रमण करना चाहिए- त्रिसंध्यां स्नानमाचरेत् संधिं समाधावात्मन्याचरेत्

संध्या ३९६ परिशिष्ट

(आरुणि० २)। परमहंसोपनिषद्-२ में परमहंस के लक्षणों में उसे स्थूल शिखा, यज्ञोपवीत, दण्ड आदि से रहित होकर षडूर्मियों व अन्य कलुषों से रहित होना बताया गया है। उसी क्रम में आत्मा-परमात्मा में समभाव रखना और इनको एक ही दृष्टि से देखना उसकी संध्या बताया गया है-परमात्मात्मनोरेकत्वज्ञानेन तयोर्भेद एक एव विभग्नः सा सन्ध्या। ३२७. सन्ध्या-द्र०-सन्धि। ३२८. समाधि-द्र०-ज्ञानखण्ड। ३२९. सम्प्रसाद - विशेषतः 'सम्यक् प्रसन्नता' के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले 'सम्प्रसाद' शब्द का उल्लेख कई ग्रन्थों में मिलता है। हि०वि०को० खंड २३ पृ० ६३३ के अनुसार सम्-प्र-घञ् से निर्मित सम्प्रसाद शब्द के कई अर्थ हैं, जैसे-सम्यक् प्रसाद, चित्त की प्रसन्नता, योग शास्त्र के अनुसार चित्त की निर्मलता की एक साधना विशेष, सुषुप्ति, प्रसन्नता और विश्वासादि। परब्रह्मोपनिषद् में परब्रह्म के ध्यान की स्थिति और उसके स्वरूप के विषय में बताते हुए उसे देवों का संप्रसाद दाता, अन्तर्यामी, असङ्ग, चैतन्य स्वरूप पुरुष कहा है-य एष देवोऽन्यदेवस्य संप्रसादोऽन्तर्याम्य-सङ्गचिद्रूपः पुरुषः (परब्रह्मो० २)। सुबालोपनिषद् में सूक्ष्म कोश में स्वप्न के अनुभव प्रकरण में (आनन्दानुभूति के क्रम में) आत्मा को भी सम्प्रसाद कहा गया है-अथेमा...............लोकं परं च लोकं पश्यति सर्वाञ्छब्दान् विजानाति स संप्रसाद इत्याचक्षते प्राणः शरीरं परिरक्षति (सुबालो० ४.३) अर्थात् जिस द्वितीय कोश में आत्मा जब शयन करता है, लोक और परलोक का दर्शन करता है और समस्त शब्दों को जानता है, तब उसे सम्प्रसाद कहते हैं। ३३०. सहजौली मुद्रा - द्र०-मुद्रा। ३३१. सहस्रार चक्र - द्र०-ज्ञानखण्ड-सप्तचक्र। ३३२. सांसारिक विषय - द्र०-ज्ञानखण्ड-विषय-भोग। ३३३. सायुज्य पद - द्र०-ज्ञानखण्ड-पञ्चविधि मुक्ति। ३३४. सिंहासन - द्र०-आसन। ३३५. सिद्धासन - द्र०-आसन। ३३६. सुख-दुःख - सुख-दुःख एक ऐसी अनुभूति है, जो क्रमशः अनुकूलता और प्रतिकूलता के रूप में हर कोई अपने जीवन में परिस्थितियों के अनुसार अनुभव करता है। हि०वि०को० खं० २४ पृ०२६९ में सुख की व्युत्पत्ति इस प्रकार निर्दिष्ट है- सुखयतीति सुख-अच्। जिसका अर्थ है आत्मवृत्ति अथवा मनोवृत्ति-गुण विशेष। वह अनुकूल और प्रिय वेदना, जिसकी सभी को अभिलाषा रहती है। आत्मा के २४ गुणों में सुख भी एक गुण है, जो नित्य और जन्य भेद से दो प्रकार का होता है। सांख्य और योग के मत से सुख सत्त्वगुण का धर्म है। गीता के अनुसार सुख सात्त्विक, राजसी और तामसी होता है-सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति (गी० ४.३६)। इस श्लोक में तीन प्रकार के सुखों का संकेत करके गीताकार ने अगले तीन श्लोकों ३७, ३८ और ३९ में क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस सुख की परिभाषाएँ दी हैं। सुख के विपरीत अनुभूति को दुःख कहते हैं। हि०वि०को०खं० १० पृ० ४८७ में दुःख इन शब्दों में निर्दिष्ट है- दुर् दुष्टं खनतीति खन-उ वा दुःखयतीति दुःख अच्। इस व्युत्पत्ति से निर्मित दुःख शब्द के अर्थ-संसार, व्याधि, रोग, व्यथा, कष्ट, क्लेश आदि हैं। दुःख या क्लेश उत्पन्न होने के कई कारण हैं, जैसे- परतन्त्रता, दूसरे के अधीन रहकर जीवनयापन करना, आधि (मानसिक कष्ट), व्याधि (शारीरिक कष्ट-रोग आदि), मानहानि, शत्रुता, कुलटा पत्नी आदि। न्याय और वैशेषिक के अनुसार दुःख को आत्मा का धर्म तथा सांख्य और वेदान्त के मत से दुःख को बुद्धि का धर्म माना गया है, दुःख भी तीन प्रकार का कहा गया है- आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक। आध्यात्मिक दुःख के भी दो प्रकार हैं- शारीरिक और मानसिक। आधिदैविक दुःख उसे कहते हैं, जो देवता से उत्पन्न दुःख हो, जैसे- सर्दी-गर्मी, हवा, वर्षा, और वज्रपात से उत्पन्न दुःख। आधिभौतिक दुःख समस्त भूतों से उत्पन्न होने के कारण चार प्रकार का है, जैसे- जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज (मनुष्य, पशु-पक्षी, सर्पदंश, वनमक्षिका, स्थावर आदि) से उत्पन्न दुःख। उपनिषदों में योगी और परिव्राजक आदि को सुख-दुःख से दूर रहने या इससे ऊँचे उठने का परामर्श दिया गया है। नारद परिव्राजक उपनिषद् (३.२७) में उल्लेख है कि जिस प्रकार प्राणविहीन देह में सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता, उसी प्रकार कैवल्याश्रम में रहने वाले योगी प्राण रहते हुए भी सुख-दुःख से प्रभावित नहीं होते-प्राणे गते यथा

परिशिष्ट ३५७ सोम देहः सुखदुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥ गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय और पराजय में समान रहने का उपदेश दिया है- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि (गी० २.३८)। ३३८. सूक्ष्मशरीर - द्र०-पुर्यष्टक। ३३९. सूत्रात्मा - द्र०-ज्ञानखण्ड-तैजस। ३४०. सूर्य - विभिन्न ग्रहों में सूर्य महत्त्वपूर्ण ग्रह है। चारों वेदों में सूर्य की एक विशिष्ट देवता के रूप में स्तुति (प्रार्थना) की गई है। विराट् पुरुष के नेत्रों से सूर्य का प्रादुर्भाव हुआ है- चक्षोः सूर्यो अजायत (यजु० ३१.१२)। परब्रह्म के नेत्र स्वरूप होने के कारण सूर्य को सभी का कर्मद्रष्टा विवेचित किया गया है-सूर्य्य विचक्षसे (ऋ० १.५०.२)। समस्त जीव सूर्य से ही जीवित हैं, इसी कारण सूर्य सभी का आत्मा कहलाता है। ऋग्वेद में यह तथ्य इस प्रकार उपन्यस्त है- सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (ऋ० १.११५.१)। स्थिति भेद से सूर्य के अनेक नाम हैं, जैसे- सभी को अपने कर्म और उसके फल में स्थिर रखने के कारण सूर्य को ब्रह्मा, जगत् के पालक होने के कारण सूर्य को व्याप, देदीप्यमान होने से सूर्य को शुक्र और सबका प्रेरक होने से सूर्य को सविता आदि कहते हैं। आचार्य सायण ने उदित होने से पूर्व के सूर्य को सविता कहा है- उदयान् पूर्व भावी सविता (ऋ० ५.८.१४ सा०भा०)। शतपथ ब्राह्मण में सविता को सभी देवों का पिता कहा गया है- सविता वै देवानां प्रसविता (शत०ब्रा० १.१.२.१७) निरुक्तकार यास्क ने भी सविता को प्रसविता कहकर इस तथ्य की पुष्टि की है- सविता सर्वस्य प्रसविता (नि० १०.३.३१)। सूर्य वस्तुतः अग्नि का ही आकाशीय रूप है। विधिविधान का संरक्षक होने के कारण उसका चक्र नियमित चलता रहता है, जिससे गति, प्रखरता और सृजन की सभी को प्रेरणा मिलती है। अथर्वशिर उपनिषद् में देवों ने भगवान् रुद्र की स्तुति करते हुए तेजस्विता के कारण उन्हें सूर्य रूप कहा है- यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च सूर्यस्तस्मै वै नमो नमः (अथर्वशिर० २)। इसी प्रकार भगवान् रुद्र के विभिन्न गुणों के कारण अन्य नामों से भी उनकी स्तुति की गई है, जैसे- उन्हे वृद्धि रूप, शान्तिरूप, पुष्टिरूप, हुतरूप (होम किए गये), अहुतरूप (बिना होम किए गये), दत्त (दिए गये), अदत्त (बिना दिए गये), सर्व-असर्वरूप, विश्व-अविश्वरूप, पर-अपर रूप और परायण रूप कहा गया है-वृद्धिश्चत्वं शान्तिस्त्वं पुष्टिश्चत्वं हुतमहुतं दत्तमदत्तं विश्वमविश्वं कृतमकृतं परमपरं परायणं च त्वम् (अथर्वशिर० ३)। ३४१. सृष्टि - द्र०-ज्ञानखण्ड- सृष्टि-अतिसृष्टि। ३४२. सोम - सोम की स्तुति का उल्लेख चारों वेदों तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों में भी मिलता है। ऋषियों की दृष्टि में सोम एक पोषक तत्त्व है। इसका वर्णन कभी वनस्पति (सोम नामक लता) के रस के रूप में, कभी सूक्ष्म-प्रवाह के रूप में तथा कभी व्यक्तित्व सम्पन्न देव शक्ति के रूप में विभिन्न वेद मंत्रों में हुआ है। सोम को वनस्पति (सोमलता) रूप की अवधारणा के संदर्भ में यह मान्यता है कि सोमलता का उत्पत्ति-स्थल हिमाच्छादित उच्च पर्वतीय उपत्यकाएं हैं। सोमलता का मधुर रस दिव्य तथा अतिशय आनन्द प्रदान करने में समर्थ है-असाव्य ॐशुर्मदायाप्मु दक्षो गिरिष्ठाः ....... (सा० ४७३)। सोमरस हरितवर्ण का होता है, जो बल-वीर्यवर्धक है। देवगण चाव से इसका पान करते हैं-पवस्व दक्षसाधनो देवेभ्यः पीतये हरे। मरुद्भ्यो वायवे मदः (सा० ४७४)। सोमरस के अन्य गुणों-बुद्धि वृद्धि, जागृतिवृद्धि, शुक्रवृद्धि, दक्षतावृद्धि, मेधावृद्धि, तेजस्विता वृद्धि तथा मनः नियन्त्रण आदि का वर्णन सामवेद के विभिन्न मंत्रों में मिलता है। इसे साक्षात् अमृत मानकर राजा कहा गया है। सोमोऽराजायमल्लै सुत (यजु० १९.७२)। सोम की सोमलता के रूप में इस स्थूल अवधारणा के अतिरिक्त दूसरी अवधारणा सूक्ष्म प्रवाह के रूप में है। परमात्म शक्तियों के ऐसे प्रवाह को, जो सर्वत्र संचरित होकर सृष्टि के सन्तुलन, विकास आदि में अपना योगदान देता है, क्रान्तदर्शी ऋषियों ने 'सोम' संज्ञा प्रदान की है- उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे। उग्रं शर्म महि श्रवः (सा० ४६७) अर्थात् हे सोमदेव ! आपके पोषक रस का उद्भव सर्वोच्च द्युलोक में हुआ। द्युलोक में होने वाले आपके उस महिमामय प्रभाव और पोषण शक्ति को पृथिवी पर रहने वाले प्राणी प्राप्त करते हैं। सोम के सन्दर्भ में तीसरी अवधारणा विश्व ब्रह्माण्ड की संरचना, विकास और विलय की समूची प्रक्रिया के नियामक के रूप में है। एक मंत्र में सोम को सूर्य का प्रकाशक कहा गया है-अधा सूर्य्यमरोचयः (सा० ४९३)। स्थूल रूप में सोम (सोमलता) को वनस्पतियों का अधिपति कहा गया है- सोमं नमस्य राजानं यो यज्ञे वीरुधां पतिः (अथर्व० ३.२७.४)। दिव्य सोम के विषय में अथर्ववेद के एक मंत्र में एक वर्णन है कि

सोऽहं ३९८ परिशिष्ट लोग सोम नामक जिस ओषधि का पान करते हैं, वे वास्तविक सोम को नहीं जानते; परन्तु ब्राह्मण (विद्वान् पुरुष) जिस सोम को जानते हैं, उसे कोई देहधारी मर्त्य ग्रहण नहीं कर सकता। उस सोम का पान देवगण करते हैं; क्योंकि वह (सोम) पुनः प्रबुद्ध हो जाता है। पवित्र और पवित्रकारक होने से सोम को पवमान सोम कहा गया है-पवमानो अजीजनद्दिवश्चित्रं .......(सा० ४८४)। सामवेद में एक स्थल पर सोम को महान् जल-प्रवाहों में मिला हुआ विवेचित किया गया है-परि प्रासिष्यदत्कविः सिन्धोरूर्मान्वधिश्रितः ............(सा० ४८६)। अथर्वशिर उपनिषद् में देवों ने रुद्र भगवान् की स्तुति करते हुए उन्हें सोम कहा है- यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च सोमस्तस्मै वै नमो नमः (अथर्वशिर० २)। ३४३. सोऽहं - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३४४. स्तुति - द्र०-ज्ञानखण्ड-स्तोम। ३४५. स्वर्ग-नरक - द्र०-ज्ञानखण्ड-पाप-पुण्य। ३४६. स्वाहा - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३४७. हंस - द्र०-अवधूत। ३४८. हंस-परमहंस--द्र०-ज्ञानखण्ड। ३४९. हठयोग - भारतीय ऋषियों ने योग पर बहुत से अनुसन्धान किये हैं। योग शब्द बहुत विराट् है, जिसमें विभिन्न धाराएँ समाहित हैं। दो अंकों के जोड़ को योग कहते हैं। आत्मा और परमात्मा का मिलन भी योग के द्वारा ही सम्भव है। इसके विभिन्न प्रकार हैं, जैसे- ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, सांख्ययोग, राजयोग, हठयोग आदि। हठयोग के माध्यम से (हठपूर्वक) चित्तवृत्तियों को बाह्य विषयों से हटाकर अन्तर्मुखी करके ब्रह्म साक्षात्कार या ब्रह्म से एकाकार करते हैं। हठयोग के माध्यम से ही शरीर और नाड़ी संस्थान की शुद्धि करके शारीरिक स्वास्थ्य रक्षा और व्याधिशमन करते हैं। इसके (हठयोग के) अन्तर्गत विभिन्न क्रियाएँ, जिनमें छः प्रमुख क्रियाएँ-नेति, धौति, वस्ति, नौली, त्राटक और कपालभाति आती हैं- धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिर्नौलिकिस्त्राटकस्तथा। कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् (गोरक्षसंहिता)। इसके अतिरिक्त हठयोग में विभिन्न प्रकार के प्राणायाम, आसन, बन्ध और मुद्राएँ भी समाविष्ट हैं, जिनसे चित्तवृत्तियों को ऊर्ध्वमुखी करके तीनों शरीरों की शुद्धि करके आत्मानन्द, ब्रह्मानन्द की प्राप्ति की जा सकती है। हठयोग का शाब्दिक अर्थ भी शरीर स्थित सूर्य और चन्द्र नाड़ियों के शोधन और उनके ऐक्य को प्रतिपादित करता है- हकारेण तु सूर्यः स्यात्सकारेणेन्दुरुच्यते। सूर्याचन्द्रमसौरैक्यं हठ इत्यभिधीयते (यो० शि० १३३)। इस व्युत्पत्ति परक अर्थ में प्रथमतः 'ह' और तत्पश्चात् 'स' का अर्थ बताया गया है। जबकि हठ में 'ह' और 'ठ' वर्ण होते हैं। इस मन्त्र के साथ इसका सम्बन्ध होने से सम्भवतः ऐसा हुआ हो, अतः सर्वत्र 'ठ' के स्थान पर 'स' पाठ ही मिलता है। हठयोग के आसन, बन्ध, मुद्राओं का वर्णन अलग से उन-उन क्रमांकों पर किया गया है। ३५०. हविष्य - द्र०-ज्ञानखण्ड-हुत-प्रहुत। ३५१. हिरण्यगर्भ-द्र०-ज्ञानखण्ड। ३५२. हुत-अहुत - द्र०-सूर्य। ३५३. हृदय कमल - द्र०-अष्टदल कमल। ३५४. हृदयाकाश - द्र०-परमव्योम।

मन्त्रानुक्रमणिका - ब्रह्मविद्याखण्ड

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
अङ्गुष्ठाभ्यांजा०द० ६.३४अथ कस्मात् ......आत्मेतिशाण्डिल्य० ३.२.३
अङ्गुष्ठेन निबध्नीयात्शाण्डि० १.३.३अथ कस्मात् ...दत्तात्रेयशाण्डिल्य० ३.२.७
अकर्ताऽहमभोक्ता०अध्या० ७०अथ कस्मात् .....महेश्वरःशाण्डिल्य० ३.२.५
अकर्म मन्त्ररहितंना०परि० ३.८अथ कस्मादुच्यतेअथर्व० ४
अकस्मान्मुद्गरपैंग० २.१४अथ किमेतैर्वन्यानाम्मैत्रे० १.२
अकारादित्रयाणाम्शाण्डि० १.६.४अथ कुम्भकःशाण्डि० १.७.१३-५
अकारोकाररूपोऽस्मिमैत्रे० ३.११अथ खलु ....कुटीचकोशाट्या० ११
अक्षयोऽहम्ब्र०वि० ८३अथ खलु ...नासमाप्यशाट्या० ३६
अक्षरत्वात्अव० २अथ खलु ...नैष्ठिकम्शाट्या० २८
अखण्डाकाश रूपोऽस्मिमैत्रे०३.२०अथ खलु ....परिव्राजकाःशाट्या० १९
अखण्डानन्दमात्मानम्अध्या० २७अथ खलु ...लब्ध्वाशाट्या० ३२
अगोचरंमैत्रे० १.१३अथ गार्ग्यो ह वैकौ०ब्रा० ४.१
अग्नीषोमाभ्याम्हंस० १२अथ जनको ह वैदेहोयाज्ञ० १
अग्नीषोमौ पक्षावोंकारःहंस० १४अथ जाग्रत्स्वप्नपैंग० २.११
अग्नेरिव शिखाप०ब्र०१३, ब्रह्म० १२अथ ज्ञानेन्द्रिय पञ्चकंपैंग २.५
अग्नेरिव शिखा नान्याना०परि० ३.८७अथ तुरीयातीतावधूतानाम्तुरी० १
अन्यंशे चजा०द० ८.६अथ धारणाःशाण्डि० १.९.१
अघोरं सलिलम्पं०ब्र० ७अथ ध्यानम्शाण्डि० १.१०.१
अच्युतोऽहम्ब्र०वि० ८१अथ नारदः पितामहंना०परि० ४.३७
अजरोऽस्म्यमरो०अध्या० ५५अथ नारद पितामहमुवाचना०परि० ६.१
अजिह्वः षण्डकःना०परि० ३.६२अथ निर्वाणोपनिषद्निर्वा० १-११
अज्ञातमपि चैतन्यम्कं० रु० ४५अथ परमहंसा नामभिक्षु० ५
अज्ञानहृदय ग्रन्थेःअध्या० १७अथ परमात्मा नामआत्मो० १-घ
अज्ञानादेव संसारोअध्या० ५५अथ पितामहःप०प० १
अज्ञानान्मलिनोजा०द० ५.१४अथ पैङ्गलोपैंग० २.१
अणोरणीयानहमेवकैव० २०अथ पैप्पलादोपं०ब्र० १
अणोरणीयान्महतोना०परि० ९.१५अथ पौर्णमास्याम्कौ०ब्रा० २.९
अण्डं ज्ञानाग्निनापैंग ३.८अथ प्रत्याहारःशाण्डि० १.८.१
अण्डस्थानिपैंग० १.११अथ प्रोष्यान्यन्पुत्रस्यकौ०ब्रा० २.११
अतः सर्वं जगत्मं०ब्रा० ५.१.२अथ बहूदका नामभिक्षु० ३
अतिवादांस्तितिक्षेतना०परि० ३.४२अथ ब्रह्मविद्या ...ब्र०वि० १
अतिसूक्ष्मां च तन्वींक्षुरि० ९अथ ब्रह्मस्वरूपं कथमितिना०परि०९.१
अतीतान्नना०परि० ३.२५अथ भगवाञ्छाकायन्यःमैत्रे० १.४
अत्यन्तमलिनोजा०द० १.२१अथ भगवान्मैत्रेयःमैत्रे० २.१
अत्रात्मत्वम्अध्या० १८अथ भिक्षूणाम्भिक्षु० १
अत्रैतेश्लोका भवन्तिशाण्डि० ३.२.११अथ मासि मास्यकौ०ब्रा० २.८
अथ कदाचित्परिव्राजकना०परि० १.१अथ यतेर्नियमःना०परि० ७.१

४०० मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण अथ यदिदम् | आ०वो० १.२ | अथ हैनँ ब्रह्मचारिणः | जाबा० ३.१ अथ योगिनां परमहंसानां | प०हं० १ | अथ हैनँ भगवन्तं | ना०परि० २.१ अथ योऽस्य निरुक्तानि | शाण्डि० ३.२.९ | अथ हैनँ महाशालः | ए०ब्रा० १ अथ यो ह वै विद्वानेम् | शाण्डि० ३.२.१० | अथ हैनँ शाण्डिल्यो | शाण्डि० ३.२.१ अथवा कृतकृत्योऽपि | अव० २६ | अथ हैनँ .... संप्रतिष्ठिता | सुबा० १०१ अथ वा तत्र | जा०द० ८.७ | अथ होवाच.... ब्रह्म | म०वो० १ अश्वत्थं परिगृह्य | याज्ञ० ५ | अथाङ्गिरसिशिविधः | आत्मो १-क अथवा सत्यमीशानं | जा०द० ९.३ | अथात एकत्रमवरोधनम् | कौ०ब्रा० २.३ अथवैतच्छरीरत्यज्य | जा०द० ५.१३ | अथातः .... ध्यानम् | जा०द० ९.१ अथ शैवपदं | क्षुरिण्ड० २० | अथातः परमहंस .... | आरु० ४ अथ षण्ढः पतितो | संन्या० २.४ | अथातः पितापुत्रीयं | कौ०ब्रा० २ १५ अथ संवेशनम् जाथायै | कौ०ब्रा० २.१० | अथातः पृथिव्यादि | शारी० १ अथ संसृतिबन्ध ..... | म०वो० ३ | अथातश्चत्वार आश्रमाः | आत्रे० १ अथ सनत्कुमारः | जाबालि० २० | अथातः श्रीमद् | हय० १ अथ समाधिः | शाण्डि० १.११.१ | अथातः संन्यासोपनिषदम् | संन्या० १.१ अथ हंसऋषिः | हंस १० | अथातः संप्रवक्ष्यामि धारणाः | जा०द० ८.१ अथ हंस परमहंस ...... | हंस० ४ | अथातः संप्रवक्ष्यामि | जा०द० ७.१ अथ हंसा नाम .... | भिक्षु० ४ | अथातः ... समाधिम् | जा०द० १०.१ अथ ह जनको ह | जाबा० ४.१ | अथातः सर्वजितः | कौ०ब्रा० २.७ अथ ह पैङ्गलो | पैङ्ग० १.१ | अथातः सांयमनम् | कौ०ब्रा० २.५ अथ ह यात्परं ब्रह्म | शाट्या० ५ | अथातो दैवः परिमरः | कौ०ब्रा० २.१२ अथ ह याज्ञवल्क्य... | मं०ब्रा० २.१.१ | अथातो दैवम् | कौ०ब्रा० २.४ अथ ह याज्ञवल्क्यो | मं०ब्रा० ४.१.१ | अथातो निःश्रेयसादानम् | कौ०ब्रा० २.१४ अथ ह शाण्डिल्यो | शाण्डि० २.१ | अथात्रैतदहरं | सुबा० ४.४ अथ ह संकृतिर्भगवान्वम् | अव० १ | अथावान्तरात्मा नाम | आत्मो १-ग अथ हैनमत्रिः पप्रच्छ | याज्ञ० ४ | अथावभव प्राणमप ... | पैङ्ग २.४ अथ हैनमत्रिः पृच्छामि | जाबा० ५.१ | अथापञ्चीकृतमहाभूत .. | पैङ्ग० २.३ अथ हैनमत्रिः ..... य एषो | जाबा० २.१ | अथापानात्कटिद्वन्द्वे | जा०द० ७.८ अथ हैनमथर्वाणं केनोपायेन | शाण्डि० १.४.१ | अथाप्यस्यारूपस्य | शाण्डि० ३.१.३ अथ हैनमथर्वाणं ....भगवान् | शाण्डि० ३.२.१ | अथाश्रमं चरमम् | शाट्या० ६ अथ हैनँ ....क्रामतीति | सुबा० ११.१ | अथाश्वलायनो० | कैव० १ अथ हैनँ ....गच्छन्तीति | सुबा० ९.१ | अथासन्नद्धो योगी | शाण्डि० १.७.१ अथ हैनँ .....जाबालि | जाबालि० १ | अथास्य पुरुषस्य | ब्रह्म० १ अथ हैनँ ....दहतीति | सुबा० १५.१ | अथास्य या सहजोऽस्ति | शाण्डि० ३.१.५ अथ हैनँ नारदः | ना०परि० ३.१ | अधेमा दश दश | सुबा० ४.३ अथ हैनँ ....पप्रच्छ | पैङ्ग० ४.१ | अथैष ज्ञानमयेन | शाण्डि० १.३६ अथ हैनँ परमेष्ठिनं | ना० परि० ८.१ | अथो नाद आधारात् | हंस० ९ अथ हैनँ पितामहं नारदः | ना०परि० ५.१ | अदग्धमहतम् | संन्या० २.१४ अथ हैनँ पैङ्गलः | पैङ्ग० ३.१ | अदृश्यं नलग्ने | हंस० २०

मन्त्रानुक्रमणिका ४०१ मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण अदृश्योऽहम् | ब्र०वि०८५ | अन्योन्यस्याविरोधेन | यो०त० ६६ अद्यजातां यथा नारीम् | ना०परि० ३.६४ | अपकारिणि | याज्ञ० २९ अद्वयब्रह्मरूपेण | आ०बो० २.१४ | अपाणिपादो | कैव० २१ अद्वयानन्द विज्ञान | ब्र०वि० ८९ | अप्राणिपादो जवनो | ना०परि०१.१६ अद्वैत भावना | मैत्रे० २.१० | अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्रणवेन | जाबा० ६.३३ अद्वैतोऽहम् | ब्र०वि० ८८ | अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्राणं | शाण्डि० १.७.१३ अधस्तात्कुञ्चनेनाशु | शाण्डि० १.७.१२ | अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य योनि | यो०त० १२१ अध्यस्तस्य | अध्या०५८ | अपानाख्यस्य | जा०द० ४.३१ अध्यात्मरतिरासीनो | ना०परि० ३.४४ | अपानान्त्रिषादा | सुबा० २.१ अध्यापिता ये गुरुम् | शाट्या० ३८ | अपानो वर्तते | जा०द० ४.२७ अनन्तकर्म शौचम् | पैङ्ग० ४.२४ | अपापमशठम् | ना०परि० ३.७४ अनन्तानन्द संभोगा | संन्या० २.४० | अपूर्वमपरं | जा०द० ४.६० अनाख्येयदिदं गुह्यम् | हंस० ३ | अप्रमत्तः कर्म भक्तिज्ञान .. | ना०परि०३.७७ अनात्मकमसत्तुच्छम् | आत्मो० ९ | अप्राणममुखम् | सुबा० ३.२ अनादाविह संसारे | अध्या० ३७ | अभिव्दधृतमर्यादा | ना०परि० ५.३७ अनास्थायाम् | शाण्डि० १.७.२७ | अभयं सर्वभूतेभ्यो | ना०परि० ५.४३ अनाहतस्य शब्दस्य | मं०ब्रा० ५.१४ | अभिपूजितलाभांश्च | ना०परि० ५.३४ अनिन्द्यं वै व्रजेत् | ना०परि० ५.३९ | अभिशस्तं च पतितम् | संन्या० २.९२ अनिर्वाच्यम् | यो०त० ७ | अभेददर्शनम् | मैत्रे० २.२ अनुज्ञाप्य गुरूशैव | ना०परि० ६.३३ | अभ्यासकाले | शाण्डि० १.७.५ अनुभूतिं विना | मैत्रे० २.२२ | अभ्यासान्निर्विकारं | मं०ब्रा० १.२.१३ अनेन ज्ञानमाप्नोति | कैव० २६ | अमानित्व ..... | शारी० ९ अनेन विधिना | ना०परि० ३.५२ | अमावास्या | जा०द० ४.४३ अन्तःकरण प्रतिबिम्बित | पैङ्ग० २.१० | अमरों यः पिबेत् | यो०त० १२८ अन्तःकरणसम्बन्धात् | कं०रु० ४४ | अमुना वासना जाले | अध्या० ३९ अन्तः पूर्णो बहिः | मैत्रे० २.२७ | अमुष्य ब्रह्मभूतत्वाद्व्रह्मणः | आत्म० २६ अन्तर्याम्यहम् | ब्र०वि० ८४ | अमृतत्वं समाप्नोति | क्षुरि० २५ अन्तर्लक्ष्यं | शाण्डि० १.७.१४ | अमृतेन तृप्तस्य | पैङ्ग ४.१३ अन्तर्लक्ष्यं जलज्योतिः | मं०ब्रा० १.३.६ | अयं ते योनिर्ऋत्वियो | ना०परि० ३.७८ अन्तर्लक्ष्य विलीन .... | शाण्डि० १.७.१५ | अयं हृदि स्थितः | पं०ब्र० ४१ अन्तः शरीरे निहितो | अध्या० १ | अयने द्वे च | ब्र०वि० ५५ अन्तः शरीरे... एको | सुबा० ७.१ | अयमेव महाबन्धः | यो०त० ११५ अन्तः शरीरे ...शुद्धः | सुबा० ८.१ | अयमेव महावेधः | यो०त० ११७ अन्तःसङ्ग परित्यागो | ना०परि० ६.४१ | अयाचितं यथालाभम् | ना०परि० ५.३१ अन्तःस्थं मां | जा०द० ४.५८ | अरजस्कोऽतमस्को | ब्र०वि० ८७ अन्तः स्थानीन्द्रियाणि | ना०परि० ३.२६ | अर्धमात्रा परा | ब्र०वि०४० अन्नपानपरो | संन्या० २.११४ | अर्धोन्मीलितलोचनः | शाण्डि० १.७.१६ अन्यदीये तृणे | जा०द०१.११ | अलभ्यमानस्तनयः | याज्ञ० २४ अन्यानथाष्टौ | शाट्या० २३ | अलम्बुसा | जा०द० ४.८

४०२ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण अलाभे न विषादी ना०परि० ५.३३ अहंकारो ममत्वं च ना०परि० ४.६ अल्पमूत्रपुरीषश्च यो०त० ५७ अहं ब्रह्मेति अध्या० ५० अल्पमृष्टाशनाभ्यां जा०द० १.१९ अहं ब्रह्मेति नियतम् पैङ्ग० ४.२५ 'अल्पाहारो यदि यो०त० १२४ अहं मनुष्यः अव० २० अवधूतः संन्या० २.२९ अहं ममेति मैत्रे० २.८ अवधूतस्त्वनियमः ना०परि० ५.१७ अहमस्मि परश्चास्मि मैत्रे० ३.१ अवबोधैकरसोऽहं आ०बो० २.४ अहमेवाक्षरं ब्रह्म ना०परि० ३.२० अवष्टभ्य धराम् शाण्डि० १.३.१० अहमेवास्मि मैत्रे० ३.२ अवस्थात्रितयातीतम् पं०ब्र० १८ अहिंसा नियमैष्वेका यो०त० २९ अवायुरप्यनाकाशो ब्र०वि० ८६ अहिंसा सत्यमस्तेय.....अक्रोधो शारी० ८ अविचारकृतो बन्धो पैङ्ग० २.१८ अहिंसा सत्यमस्तेय....अनौद्धत्य ना०परि० ४.१० अविद्याकार्यहीनो ब्र०वि० ९० अहिंसा सत्यमस्तेय ब्रह्मचर्यं जा०द० १.६ अव्यक्तलिङ्ग ..... ना०परि० ५.५० अहेयमनुपादेयम् मैत्रे० १.१४ अव्यक्तलेशाज्ञान .... पैङ्ग० २.९ अहो ज्ञानमहो अव० ३५ अशब्दमस्पर्शमरूपम् पैङ्ग० ३.१२ अहो पुण्यमहो अव० ३४ अशब्दोऽहम् ब्र०वि० ८२ आकाशधारणात्तस्य यो०त० १०२ अशरीरं शरीरेषु ना०परि०९.१७ आकाशवत्कल्पविदूरगः कुण्डि० १६ अशरीरं शरीरेषु महान्तं जा०द० ४.६२ आकाशवत् सूक्ष्मशरीरः पैङ्ग० ४.१८ अशुभाशुभ संकल्पः संन्या० २.६५ आकाशवद्वायुसंज्ञस्तु कं०रु० १८ अष्टाक्षर समायुक्तम् पं०ब्र० १४ आकाशांशस्तथा जा०द० ८.५ असङ्गोऽहमनङ्गोऽहम् अध्या० ६९ आकाशे वायुमारोप्य यो०त० ९९ असत्कल्पो विकल्पोऽयम् अध्या० २२ आकुञ्चनेन शाण्डि० १.७.३६ ख असत्यत्वेन आत्म० ५ आगच्छ गच्छ ना०परि० ४.७ असद्वा इदमग्र सुबा० ३.१ आचिनोति हि द्वय० ३ असंशयवताम् मैत्रे० २.१६ आजानोः पायुपर्यन्तम् यो०त० ८८ असावादित्यो म०वा० आज्यं रुधिरमिव संन्या० २.९७ अस्तेयं नाम शाण्डि० १.१.७ आतिथ्य श्राद्धयज्ञेषु ना०परि० ६.७ अस्ति चर्म नाडी... शारी० ५ आतुरकालः ना०परि० ३.५ अस्थिस्थूणं ना०परि० ३.४६ आतुरकुटीचकयोः ना०परि० ५.२२ अस्थिस्नाय्वादिरूपोऽयम् कं०रु० २१ आंतुरेऽपि क्रमे वापि ना०परि० ३.७ अस्नेहो गुरुशुश्रूषा ना०परि० ४.११ आंतुरेऽपि च संन्यासे ना०परि० ३.६ अस्मिन् ब्रह्मपुरे पं०ब्र० ४० आतुरो जीवति ना०परि० ५.१८ अस्यैव जपकोट्यां हंस० १६ आतुरो जीवति ..शूद्रस्त्री संन्या० २.७४ अहं कर्त्ताऽस्म्यहं शारी० १० आत्मतापरते संन्या० २.६६ अहङ्कारग्रहान्मुक्तः अध्या० ११ आत्मतीर्थम् जा०द० ४.५० अहंकारमेवाप्येति सुबा० ९.१३ आत्मनेऽस्तु संन्या० २.४७ अहंकारसुतम् मैत्रे० २.१२ आत्मन्यनात्मभावेन जा०द० १.१२ अहंकारादिदेहान्तम् आ०बो० २.३० आत्मन्यात्मानमिडया शाण्डि० १.७.४८ अहंकारोऽध्यात्मम सबा० ५.८ आत्मवत् सर्वभूतानि ना०परि० ४.२१

मन्त्रानुक्रमणिका [L1_right] ४०३


मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
आत्मविद्यातपोमूलंना०परि० ९.१३आस्यनासिकयोःजा०द० ४.२६
आत्मसंज्ञः शिवःआत्मो० १-ङआस्यनासिका ...शाण्डि० १.४.१३
आत्मस्वरूप ...जा०द० ६.५०आस्येन तुसंन्या० २.९६
आत्मानमन्विच्छेत्ना०परि० ३.९२आस्येन तु यदाहारंना०परि० ५.३८
आत्मानमपि दृष्ट्वाआ०बो० २.१८आहारस्य च भागौसंन्या० २.७७
आत्मानमरणिम्ब्रह्म० १८आहिताग्निविरक्त.....ना०परि० ३.१०
आत्मानमरणिं कृत्वाकैव० ११आहृदयाद्भ्रुवोर्मध्यम्यो०त० ९५
आत्मानमात्मनाब्र०वि० २९इच्छाद्वेषसमुत्थेनसंन्या० २.४६
आत्मानं चेद्शाट्या० २४इडया ...निरोधयेत्जा०द० ६.२७
आत्मानं रथिनम्पैङ्ग० ४.३इडया प्राणमाकृष्यजा०द० ५.७
आत्मानं सच्चिदानन्दम्जा०द० ९.५इडया वायुमारोप्ययो०त० ४१
आत्मा सर्वगतोऽच्छेद्योजा०द० १.८इडया वेदतत्त्वज्ञस्तथाजा०द० ६.२८
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्पैङ्ग० ४.५इडया ....स्थितम्जा०द० ६.३
आदावग्रिमण्डलंमं०ब्रा० २.१.५इडा तु सव्यनासान्तम्जा०द० ४.१९
आदित्यवर्णम्म०वा० ८इडादिमार्गद्वयंशाण्डि० १.७.३६-ङ
आदित्या रुद्रासुबा० ६.३इडापिङ्गलयोर्मध्येशाण्डि० १.७.४१
आदिमध्यान्तहीनोब्र०वि० ९१इडायाः कुण्डली ...जा०द० ४.४६
आदौ विनायकम्शाण्डि० १.५.२इतस्ततश्चाल्यमानोआत्म० १८
आनन्दत्वान्नआ०बो० २.३१इति य इदमधीतेअव० ३६
आनन्दबुद्धिपूर्णस्यआ०बो० २.२१इत्थं वाक्यैस्तथाऽर्थ०अध्या० ३३
आनन्दमन्तर्निजम्मैत्रे० १.१६इत्यनेन मन्त्रेणाग्निम्ना०परि० ३.७९
आनन्दयतिकं०रु० ३०इत्युक्तस्तान्सना०परि० १.२
आनन्दामृतरूपोब्र०वि० ९२इत्येतद्ब्रह्मपं०ब्र० २९
आनन्दाविर्भवोजा०द० ६.३५इत्येवं चिन्तयन्भिक्षुःसंन्या० २.७३
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंअव० १०इत्येषां त्रिविधोब्र०वि० ५२
आभूमध्यात्तुयो०त० ९८इत्यों सत्यमित्युपनिषद्शाण्डि० ३.२.१५
आरब्धकर्मणिअव० २१इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयम्पैङ्ग० ४.२२
आरभ्य चासनंजा०द० ५.५इदं मृष्टमिदम्ना०परि० ३.६३
आरम्भश्च घटश्चैवयो०त० २०इदं यज्ञोपवीतम्ब्रह्म० १५
आरुणिः प्रजापतेआरु० १इदं यज्ञोपवीतं तुप०ब्र० १७
आरूढपतितापत्यम्संन्या० २.५इन्द्रवज्रमितिक्षुरि० १३
आलम्बनतया भातिअध्या० ३१इन्द्रियाणां निरोधेनना०परि० ३.४५
आशाम्बरोयाज्ञ० ९इन्द्रियाणां प्रसंगेनना०परि० ३.३६
आशाम्बरो न नमस्कारोप०हं० ४इन्द्रियाणिपैङ्ग० ४.४
आशीर्युक्तानि कर्माणिना०परि०५.४७इह तेनाप्यज्ञानेनस्व० १ ख
आश्रयाश्रयहीनोऽस्मिमैत्रे० ३.९ईशः पञ्चीकृत ...पैङ्ग० ३.६
आसनं पात्रलोपश्चसंन्या० २.९८ईशाज्ञया मायोपाधिर ...पैङ्ग०२.८
आसनं विजितंजा०द० ३.१३ईशाज्ञया विराजोपैङ्ग० २.६
आसां मुख्यतमजा०द० ४.९ईशाज्ञया सूत्रात्मापैङ्ग० २.७

४०४ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण ईशाधिष्ठितावरण | पैङ्ग० १.५ | ऋतुक्षौरं कुटी .... | ना०परि० ७.४ ईशानं परमम् | पं०ब्र०१९ | ऋतुरास्म्यार्तवो | कौ०ब्रा० १.६ ईशानोऽस्मि | ब्र०वि० ९३ | ऋतुसन्धौ मुण्डयेत् | शाट्या० २२ ईश्वरत्वमवाप्नोति | ब्र०वि० २५ | एक एव चरेन्नित्यम् | ना०परि० ३.५३ ईश्वरो जीवकलया | याज्ञ० १३ | एक एव हि | ब्र०बि० १२ ईहानीहामयैरन्तर्या | संन्या० २.४५ | एक एवात्मा | ब्र०बि० ११ ईहितानीहितैः | संन्या० २.६७ | एक तत्त्वदृढाभ्यासात् | शाण्डि० १.७.२८ उक्तविकल्पं | मं०ब्रा० १.४.२ | एकं पादम् | शाण्डि० १.३.४ उक्थं ब्रह्मेति ह स्माह | कौ०ब्रा० ६ | एकमेवाद्वितीयम् | मैत्रे० २.१५ उच्चैर्जपश्व | जा०द० २.१६ | एकरात्रं .... नगरे | ना०परि० ४.१४ उच्चैर्जपादुप्रांशुश्च | जा०द० २.१५ | 'एकरात्रं ... पत्तने | ना०परि० ४.२० उड्ड्यानाख्यो हि | यो०त० १२० | एकवारं प्रतिदिनम् | यो०त० ६८ उत्तमा तत्त्वचिन्तैव | मैत्रे० २.२१ | एकवासा ... चरेत् | ना०परि० ४.१७ उत्तरं त्वमनस्कम् | मं०ब्रा० १.३.४ | एकवासा-संवसेत् | ना०परि० ३.३१ उत्थानं च | जा०द० ६.४४ | एकशूरेन्महीमेतां | ना०परि० ५.५२ उत्पत्तिस्थितिं | यो०त० १८ | एकसंख्याविहीनोऽस्मि | मैत्रे० ३.७ उदान ऊर्ध्वगमनं | जा०द० ४.३२ | एकाकी चिन्तयेद्ब्रह्म | ना०परि० ३.६० उदान संज्ञो | जा०द० ४.२९ | एकाकी निःस्पृहस्तिष्ठेन्न | ना०परि० ३.५९ उद्गारादिगुणः | जा०द० ४.३३ | एकात्मके परे | अध्या० २५ उद्गीथमेतत्परमं तु | ना०परि० ९.७ | एकान्त ध्यानयोगाच्च | शाण्डि० १.७.२९ उद्भूतोऽस्मि | संन्या० २.४८ | एकात्रं मदमात्सर्यम् | संन्या० २.१०४ उन्मीलित .... | शारी० १५ | एकीभूतः सुषुप्तस्थः | ना०परि० ८.१५ उपस्थमेवाप्येति | सुबा० ९.२० | एकेन लोहमणिना | पं०ब्र० ३६ उपस्थानेन | संन्या० २.८७ | एकेनैवस्तु पिण्डेन | पं०ब्र० ३५ उपस्थोऽध्यात्मम् | सुबा० ५.१४ | एको देवः सर्वभूतेषु | ब्रह्म० १६ उपाधिनाशाद्ब्रह्मैव | आत्म० २१ | एकोनविंशति मुखः | ना०परि० ८.१५ उभयमपि मनोयुक्तम् | मं०ब्रा० १.३.२ | एकोभिक्षुर्यथोक्तम् | ना०परि० ३.५६ उल्काहस्तो यथा | ब्र०वि० ३६ | एको वशी | ब्रह्म० १७ ऊर्णनाभिर्यथा | ब्रह्म० २० | एकोऽहमविकलोऽहम् | आ०बो० २.६ ऊर्ध्वनालमधोबिन्दु | यो०त० १३८ | एतच्चतुष्टयम् | ना०परि० ४.४ ऊर्ध्वपुण्ड्रं कुटी ... | ना०परि० ७.३ | एतज्ज्ञेयं नित्यमेव | ना०परि० ९.१२ ऊर्ध्वाम्नायः | निर्वा० १२-२४ | एतत्तु परमम् | ब्र०वि० ४५ ऊर्ध्वरेतम् | जा०द० ९.२ | एतद्वै ब्रह्म दीप्यते | कौ०ब्रा० २.१३ ऊर्ध्वं सात्त्विको | शारी० १२ | एतद्वै सत्येन | सुबा० ३.३ ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्र | जा०द० ३.५ | एतन्निर्वाणदर्शनं | निर्वा० ६१ ऊर्वोर्मध्ये | क्षुरि० १४ | एतस्माज्जायते प्राणो | कैव० १५ ऋग्वेदो गार्हपत्यम् च पृथिवी | ब्र०वि० ४ | एतस्मिन्वसते | ब्र०वि १९ ऋग्वेदो गार्हपत्यम् च मन्त्राः | पं०ब्र० ६ | एतां विद्याम् | सुबा० ७.२ ऋजुकायः | यो० त० ३६ | एतां विद्यामपात्तरतमाय | अध्या० ७१

मन्त्रानुक्रमणिका ४०५ मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण एतानि सर्वथा | यो० त० ५८ | ऐक्यस्थानन्द | ना० परि० ८.१० एते गुणाः प्रवर्तन्ते | ब्र० वि० ५८ | ऐहिकामुष्मिकप्राप्तिसिद्धये | अध० १२ एते च नियमाः | जा० द० २.२ | ओं तस्य निश्चिन्तनम् | आ० पू० १ एते विघ्नाः | यो० त० ७६ | ओं भूः स्वाहेति | संन्या० २.८ एतेषां ...तत्त्वतः | गो० त० २८ | ओं सत्यमित्युपनिषत् | पैङ्ग० ४.३२ एतेषां....समासतः | यो० त० २१ | ओत्रातुजात्रनुज्ञाए.... | ना० परि० ८.२० एभिः क्रमैस्तथाऽऽनैश्च | शाण्डि० १.७.३६-क | ओमिति ब्रह्म। ओमित्येक.. | ना० परि० ८.२ एवं कृत्वा हृदये | हंस० १३ | ओमित्येकाक्षरम् | ब्र० वि० २ एवं च धारणाः | यो० त० १०३ | ओमित्येव | शाण्डि० १.७.३४ एवं चिरसमाधि .. | मं० ब्रा० ५.१.९ | कटिसूत्रं च कौपीनम् | ना० परि० ३.९१ एवं ज्ञानेन्द्रियाणां | यो० त० ७२ | कति वर्णाः | पं० ब्र० २ एवं तत्तल्लक्ष्यदर्शनात् | मं० ब्रा० ४.१.४ | कत्थनं कुत्सनम् | संन्या० २.१०५ एवं त्रिपुट्याम् | मं० ब्रा० २.३.१ | कदोपशान्तमन्मने | संन्या० २.६८ एवं द्वारेषु सर्वेषु | यो० त० १४१ | कनीयांसि भवेत् | शाण्डि० १.७.३ एवं नाडीस्थानम् | शाण्डि० १.४.१४ | कपालं वृक्षमूलानि | ना० परि० ३.५४ एवं भवेत्तदवस्था | यो० त० ८० | करणोपरमे जाग्रत् | पैङ्ग० २.१२ एवं मासत्रयाभ्यासात्नाडी | यो० त० ४४ | कर्तृत्वमद्य | आ० म्बो० २.२१ एवं मुमुक्षुः सर्वदा | ना० परि० ७.११ | कर्पूरमनले | शाण्डि० १.७.२१ एवं यः सततम् | शाण्डि० ३.२.१४ | कर्मणा बध्यते | संन्या० २.११७ एवं विदित्वा | कैव० २४ | कर्मण्यधिकृता ....ब्राह्मणादयः | ब्रह्म० १३ एवं शुभाशुभैर्भावैः | क्षुरि० २० | कर्मण्यधिकृता ये तु | ना० परि० ३.८८ एवं षण्मासाभ्यासत्सत्वं | शाण्डि० १.७.४७ | कर्मण्यधिकृता...लौकिकेऽपि | पं० ब्र० १४ एवं स एव | मं० ब्रा० २.४.३ | कर्मत्यागान्न | मैत्रे० २.१७ एवं सम्भ्यसेन्नित्यम् | जा० द० ६.१० | कर्मसंन्यासोऽपि | ना० परि० ५.८-९ एवं सहजानन्दे | मं० ब्रा० २.१.८ | कर्मेन्द्रियाणि | पैङ्ग० २.१६ एवं सूक्ष्माङ्गानि | मं० ब्रा० १.१.११ | कल्पसूत्रे तथा | जा० द० २.१२ एवं हंसवशान्मनो | हंस० १५ | कविं पुराणं पुरुषोत्तमोत्तमम् | ना० परि० ९.१९ एवमन्तर्लक्ष्यदर्शनेन | मं० ब्रा० १.४.४ | कांस्यघण्टानिनादस्तु | ब्र० वि० १२ एवमभ्यस्ततस्तस्य | जा० द० ६.४३ | कामं कामयते यावद् | ना० परि० ८.१४ एवमभ्यासयुक्तस्य | जा० द० ९.६ | कामक्रोधभयम् | यो० त० १२ एवमभ्यासी तन्मयो | मं० ब्रा० १.२.१४ | कामः क्रोधस्तथा | ना० परि० ३.३३ एवममनस्काभ्यासैनैव | मं० ब्रा० ५.१.८ | कामक्रोधौ तथा | ना० परि० ५.५९ एवमुक्त्वा | पं० ब्र० ३३ | कामनाम्ना किरातेन | याज्ञ० २० एवमुक्त्वा स भगवान् | जा० द० १०.१३ | काम्यानि | जा० द० ७.५ एवमेतान् लोकान् | सुबा० १०.२ | कायिकादिविमुक्तोऽस्मि | मैत्रे० ३.२२ एष सर्वज्ञ एष | सुबा० ५.१५ | कायेन मनसा वाचा | जा० द० १.१७ एष सर्वेश्वरश्चैष | ना० परि० ८.१७ | कायेन वाचा | जा० द० १.१३ एषोऽसौ परमहंसो | हंस० ७ | कालत्रयमुपेक्ष्या | संन्या० २.४३ एषो ह देवः | अथर्व० ५ | कालमेव प्रतीक्षेत | ना० परि० ३.६१

४०६ मन्त्रानुक्रमणिका

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
कालः स्वभावोना०परि० ९.२क्षरं प्रधानममृताक्षरम्ना०परि० ९.१०
कालान्तरोपभोगार्थम्संन्या० २.१०१क्षिप्तोऽवमानितोऽसद्भिःना०परि० ५.५४
काषायवासाः सततंना०परि० ५.६१क्षीणेन्द्रियमनोवृत्तिःना०परि० ३.७५
किं तत्त्वं को जीवःजाबालि० २क्षुरिकां संप्रवक्ष्यामिक्षुरि० १
किं वा दुःखमनुःकुण्डि० ८खमध्ये कुरुशाण्डि० १.७.१९
किं हेयं किमुपादेयंअध्या० ६७खल्वहं ब्रह्मसूत्रम्आरु० ३
कुटीचक ...अधिकारःना०परि० ७.८खेगतिस्तस्ययो०त० ७५
कुटीचक..देवार्चनम्ना०परि० ७.७गच्छंस्तिष्ठन्नुपविशञ्छयानोकुण्डि० २८
कुटीचक...प्रणवःना०परि० ७.९गत्वा योगस्ययो०त० १२२
कुटीचकबहूदकहंसानाम्ना०परि० ५.१९गर्जति गायतिसुबा० ६.६
कुटीचक... श्रवणम्ना०परि० ७.१०गवामनेकवर्णानाम्ब्र०बि० १९
कुटीचकस्यैकात्रम्ना०परि० ७.५गान्धारायाःजा०द० ४.१७
कुटीचकः शिखाना०परि० ५.१३; संन्या० २.२४गुदमवष्टभ्याधारात्हंस० ६
गुदाद्द्व्यङ्गुलादूर्ध्वम्शाण्डि० १.४.५
कुटीचका नामभिक्षु० २गुरुणा चोपदिष्टोऽपिजा०द० २.११
कुटुम्बं पुत्रदारांश्चना०परि० ३.३२गुरुभक्तिसमायुक्तःद्वय० २
कुण्डिकां चमसम्कं०रु० ५गुरुभक्तिः सत्यमार्गा..मं०ब्रा० १.१.४
कुरुक्षेत्रम्जा०द० ४.४९गुरुरेव परः कामःद्वय० ६
कुहोः क्षुद्देवताजा०द० ४.३८गुरुरेव परं ब्रह्मद्वय० ५
कूटान्ता हंस एवब्र०वि० ६३गुरुरेव परो धर्मोशाट्या० ३९
कूर्पराग्रे मुनिश्रेष्ठजा०द० ३.१०गुरुरेव हरिःब्र०वि० ३१
कूर्मोऽज्ञानीवक्षुरि० ३गुरुशिष्यादिभेदेनआत्मो० ३
कृतकृत्यतयाअव० २९गुरूणां च हितेना०परि० ६.३०
कृत्स्नमेतच्चित्रम्अव० ८गुल्फौ तुजा०द० ३.७
कृशत्वं च शरीरस्ययो०त० ४६गुल्फौ तु वृषणस्याधःशाण्डि० १.३.८; जा०द० ३.६-१
के पशव इतिजाबालि० १२
केवलोऽहं कविःब्र०वि० ९४गुशब्दस्त्वन्धकारःद्वय० ४
केशकज्जलधारिण्योयाज्ञ० १८गुहां प्रवेष्टुमिच्छामिकुण्डि० ९
को जीवति नरो जातुकं०रु० २९गुहाद्गुह्यम०वा० २
को वा मोक्षःजा०द० २.४गृहस्था अपिआश्र० २
कौपीनयुगलम्ना०परि० ३.२८गृहस्थो ब्रह्मचारी...अलौकिकाआरु० २
क्रमेण लभते ज्ञानम्यो०त० २२गृहस्थो ब्रह्मचारी...भिक्षुकःब्र०वि० ४९
क्रमेण सर्वमभ्यस्यना०परि० ५.५गोत्रादिचरणम्संन्या० २.१०८
क्रमेण सर्वमभ्यस्य..देहमात्रासंन्या० २.२१गोधूममुद्गशाल्यन्नम्यो०त० ४९
क्रियानाशाद्भवेच्चिन्तानाशोअध्या० १२गोवालसदृशम्अव० ५
क्रुध्यन्तं नना०परि० ३.४३गोप्याद्गोप्यतरम्पं०ब्र० ५
क्व गतं केनअध्या० ६६ग्रन्थमभ्यस्य मेधावीब्र०बि० १८
क्व शरीरं अशेषाणांना०परि० ४.२६ग्रस्त इच्युच्यतेआत्म० १६
क्षणात्तु किञ्चिदधिकम्यो०त० १२५ग्रामादग्रिमाहृत्ययाज्ञ०३, जाबा० ४.३

मन्त्रानुक्रमणिका ४०७

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
ग्रामान्ते निर्जनेना०परि० ४.१६चैत्यवर्जित ....संन्या० २.३७
ग्राह्यग्राहकसंबंधेसंन्या० २.५८छिन्देन्नाडीशतम्क्षुरि० १९
घटमध्ये यथा दीपोयो०त० १४२छिन्द्यते ध्यानयोगेनक्षुरि० १८
घटवद्विविधाकारम्ब्र०बि० १४छेदन चालनदोहैःशाण्डि० १.७.४२ ख
घटसंवृतमाकाशम्ब्र०बि० १३जगज्जीवनम्संन्या० २.१६
घटाकाशं महाकाशःअध्या० ७जगत्तावदिदम्संन्या० २.३०
घटाकाशमिवात्मानम्पैङ्ग ४.२०जगद्रूपतयाप्येतद्ब्रह्मैवआत्म० २
घृतमिव पयसिब्र०बि० २०जडया कर्णशष्कुल्यासंन्या० २.३१
घृतं श्मश्रुत्रसद्दशम्संन्या० २.९३जन्मपल्वलमत्सयानाम्याज्ञ० २१
घृतसूपानिसंन्या० २.९५जपस्तु द्विविधःजा० द० २.१३
चक्री लिङ्गी च पाषण्डीना०परि० ३.४जरामरणरोगादिब्र०वि० २४
चक्षुरादीन्द्रियैर्दृष्टिंजा०द० १.९जरायुजाण्डजादीनाम्ना०परि० ५.५८
चक्षुश्च द्रष्टव्यम्सुबा० ६.२जराशोक समाविष्टम्ना०परि० ३.४७
चतुरङ्गुलमायामविस्तारम्जा०द०४.४जलेन श्रमजातेनशाण्डि० १.७.४
चतुर्थश्चतुरात्मापिना०परि० ८.१९जले वापिकुण्डि० २४
चतुर्विंशतिरव्यक्तम्शारी० २०जाग्रति प्रवृत्तोमं०ब्रा० २.४.२
चतुष्कला समायुक्तोब्र०वि० १८जाग्रत्स्वप्न..तुरीया..शारी० १४
चत्वारिंशत्संस्कार ....संन्या० २.१जाग्रत्स्वप्न ...मूर्छापैङ्ग० २.१५
चरेन्माधूकराम्संन्या० २.८९जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादिकैव० १७
चर्मखण्डं द्विधा ...ना०परि० ४.२९जाग्रन्निन्द्रान्तःमं०ब्रा० २.३.२
चलनदृष्ट्यामं०ब्रा० १.२.९जातं मृतमिदम्मैत्रे० २.४
चित्तमध्यात्मम्सुबा० ५.९जातस्य ग्रहरोगारियाज्ञ० २५
चित्तमन्तर्गतम्जा०द० ४.५४जानु प्रदक्षिणीकृत्ययो०त० ४०
चित्तमूलो विकल्पोऽयम्अध्या० २६जान्वन्तम्जा०द० ८.४
चित्तमेव हिमैत्रे० १.९जायन्ते योगिनोयो०त० ४५
चित्तमेव हि संसारःशाट्या०३जायाभ्रातृसुतादीनाम्ना०परि० ४.९
चित्तमेवाप्येतिसुबा० ९.१४जिह्वया ...जिह्वामूलेजा०द० ६.२६
चित्तशुद्धिःना०परि० ५.६२जिह्वया.... पिबेत्स्रततम्जा०द० ६.२५
चित्तशुद्धिकरम्मैत्रे० २.९जिह्वया यद्रसम्यो०त० ७१
चित्तस्य हि प्रसादेनमैत्रे० १.१०जिह्वया वायुम्शाण्डि० १.७.१३-४
चित्तादिसर्वहीनोऽस्मिमैत्रे० ३.१०जिह्वाऽध्यात्मम्सुबा० ५.४
चित्तैककरणापैङ्ग० २.१३जिह्वामेवाप्येतिसुबा० ९.४
चित्रो ह वैकौ०ब्रा० १.१जीर्ण कौपीनवासाःना०परि० ६.२८
चिदात्मनि सदानन्देअध्या० ९जीवति वागपेतोकौ०ब्रा० ३.३
चिदानन्दोऽस्म्यहम्ब्र०वि० ९५जीवतो यस्यअध्या० १६
चिदिहास्तीतियाज्ञ० ३२जीवदवस्था प्रथमम्ना०परि० ६.४
चिरकालम्शाण्डि० १.७.३५जीवन्मुक्तः स विज्ञेयःपैङ्ग० ३.११
चुबुकं हृदियो०त० ११३जीवः पञ्चविंशकःमं०ब्रा० १.४.३
चेतनं चित्तरिक्तम्संन्या० २.६१जीवाः पशवःजाबालि० १३

४०८ मन्त्रानुक्रमणिका

मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण

ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशा .... ना०परि० ९.९ ततः शुष्कवृक्ष... मं० ब्रा० ३.१.४ ज्ञातं येन निजम् यो०त० १७ ततः संवत्सरस्यान्ते ना०परि० ६.३२ ज्ञात्वा देवं मुच्यते ना०परि० ९.११ ततो जलाद्भयम् यो०त० ९१ ज्ञात्वा स्वम् अध्या० २ ततोऽधिकतराभ्यासाद् यो०त० ५३ ज्ञात्वैवं मनोदण्डम् ना०परि० ५.६६ ततोऽपि धारणाद्वायोः यो०त० ५२ ज्ञानं शरीरं वैराग्यम् ना०परि० ६.२ ततो भवेद्वटावस्था यो०त० ६५ ज्ञान दण्डो धृतो ना०परि० ५.२९ ततो भवेद्राजयोगो यो०त० १२९ ज्ञाननेत्रं समादाय ब्र०बि० २१ ततो भेदाभावात् मं०ब्रा० २.३.५ ज्ञानयज्ञः स विज्ञेयः शाट्या० १७ ततो रक्तोत्पलाभासम् क्षुरि० १० ज्ञानयोगनिधिम् शाण्डि० ३.२.१३ ततो रहस्युपाविष्टः यो०त० ६३ ज्ञानयोगपराणाय जा०द० ४.५६ ततो विज्ञान आत्मा कं०रु० २३ ज्ञानशिखा ज्ञाननिष्ठा ना०परि० ३.८६ तत्कुर्यादविचारेण ब्र०वि० २८ ज्ञानशिखिनो ज्ञाननिष्ठा ब्रह्म० ११ तत्त्वज्ञानं गुहायाम् स्व०१-ग ज्ञानशिखिनो.. ज्ञानमीरितम् प०ब्र० १२ तत्त्वमसीत्यहम् पैङ्ग० ३.४ ज्ञानशौचं जा०द० १.२२ तत्त्वमार्गे यथा यो०त० १३१ ज्ञानसंहार .... पं०ब्र० १२ तत्प्रकारः कथमिति जाबालि० १८ ज्ञान स्वरूपम् जा०द० ६.४९ तत्र-तत्र परंब्रह्म पैङ्ग० ४.२८ ज्ञानाम्मृतरसो जा०द० ६.४८ तत्र देवास्त्रयः ब्र०वि० ३ ज्ञानाम्मृतेन तृप्तस्य जा०द० १.२३ तत्र नाडी सुषुम्ना क्षुरि० ८ ज्ञानेनाज्ञानकार्यस्य अध्या० ५९ तत्र परमहंसा याज्ञ० ६ ज्ञानोदयात्पुरा० अध्या० ५३ तत्र परमहंसा नाम जाबा० ६.१ ज्ञेयं सर्वप्रतीतम् शाण्डि० १.७.१२ तत्र पारोक्ष्यशबलः पैङ्ग० ३.३ ज्ञेयवस्तु शाण्डि० १.७.२३ तत्र प्रथमो जीवो व०सू० ३ ज्वराः सर्वे शाण्डि० १.७.५१ तत्र सुषुम्ना शाण्डि० १.४.१० ज्वलिता अतिदूरेऽपि, याज्ञ० १९ तत्सर्वम् शाण्डि० ७.४ तं दृष्ट्वा शान्तमनसम् ना०परि० ४.३६ तत्सूत्रं विदितम् प०ब्र० ८ तं पञ्चशतान्यप्सरसाम् कौ०ब्रा० १.४ तथा चरेत वै योगी ना०परि० ५.५७ तं पश्चाद्दिग्बलिम् पैङ्ग० ४.८ तथाऽज्ञानावृतो आ०बो० २.२७ होवाचाजातशत्रुः कौ०ब्रा० ४.१९ तथानन्दमयश्चापि कं०रु० २६ तच्चानन्दसमुद्रमग्ना मं०ब्रा० २.५.३ तथाप्यानन्दभुक् ना०परि० ८.१६ तच्छिह्नानि आदौ मं०ब्रा० २.१.१० तथाभ्रान्तैर्द्विधा जा०द० १०.४ तज्ज्ञानप्लवाधिरूढेन मं०ब्रा० २.१.३ तथा मनोमयो कं० रु० २५ तज्ज्ञानम् जाबा० १६ तथाऽस्थूलमनाकाशम् जा०द० ९.४ तत उ ह बालाकि कौ०ब्रा० ४.१८ तथेति मण्डलपुरुषः मं०ब्रा० ३.१.२ ततः कण्ठान्तरे क्षुरि० १५ तथैव ब्रह्मविच्छ्रेष्ठः आत्म० २२ ततः कृशवपुः शाण्डि० १.७.१३-६ तथैव विद्वात्रमते निर्ममो आत्म० ११ ततः पवित्रम् पैङ्ग० ४.१७ तथैवोपाधिविलये आत्मो० २३ ततः प्राणमयो कं०रु० २२ तदण्डं सम्भवत्तत् सुबा० १.३ ततः शरीरे लघु शाण्डि० १.५.४ तदधिकारी न भवेद्यदि प०प० ३ ख

मन्त्रानुक्रमणिका ४०९

मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण

तदनुनित्यशुद्धः मं०ब्रा० ३.१.६ तपः सन्तोषमास्तिक्यम् जा०द० २.१ तदन्त्यं विषुवं जा०द० ४.४५ तपसा प्राप्यते मैत्रे० १.६ तदपेक्षया इन्द्रादयः मं०ब्रा० २.५.४ तपेद्वर्षसहस्राणि पैङ्ग० ४.२१ तदभ्यासात् मं०ब्रा० २.१.९ तपो विजितचित्तस्तु क्षुरि० २१ तदभ्यासेन कुण्डि० १८ तमसः साक्ष्यहम् ब्र०वि० ९६ तदलक्षणम् ना०परि० ८.२३ तमादि मध्यान्त ... कैव० ७ तदाकाराकारी मं०ब्रा० १.२.१२ तमाराध्य जगन्नाथम् यो०त० ३ तदाद्यं विषुवम् जा०द० ४.४४ तमुवाच हृषीकेशो यो०त० ४ तदानीमात्मगोचरा वृत्तयः पैङ्ग० ३.५ तमेकस्मिन् त्रिवृतं ना०परि० ९.४ तदा पश्चिमाभिमुखप्रकाशः मं०ब्रा० २.२.१ तमेतमात्मानम् कौ०ब्रा० ४.२० तदा विवेकवैराग्यम् यो०त० १३० तमेव धीरो विज्ञाय शाट्या० २५ तदाहुः किं तदासीत् सुबा० १.१ तमेवात्मानम् ना०परि० ८.७ तदुत्तरायणम् जा०द० ४.४१ तमो हि शारीरं प्रपञ्चं म०वा० ४ तदुपायं लक्ष्यत्रय मं०ब्रा० १.२.५ तयोर्मध्ये वरम् क्षुरि० १७ तदु होवाच मं०ब्रा० २.१.२ तर्जन्यग्रोन्मीलित ... मं०ब्रा० १.२.७ तदेके प्राजापत्यामेवेष्टिम् याज्ञ० २ तर्हि कर्म ब्राह्मणः व०सू० ७ तदेतद्द्विजाय ब्राह्मणः ना०परि० ३.१० तर्हि को वा ब्राह्मणो व०सू०९ तदेवं ज्ञात्वा स्वरूपं ना०परि० ५.२४ तर्हि जातिर्ब्राह्मणः व०सू० ५ तदेव कृतकृत्यत्वम् अव० १३ तर्हि ज्ञानं ब्राह्मणः व०सू० ६ तदेव निष्कलं ब्रह्म ब्र०बि० ८ तर्हि देहो ब्राह्मणः व०सू० ४ तद्दर्शने तिस्रो मं०ब्रा० २.१.६ तर्हि धार्मिको ब्राह्मणः व०सू० ८ तद्धेके प्राजापत्यामेवेष्टिं जाबा० ४.२ तल्लक्ष्यं नासाग्रं मं०ब्रा० २.१.७ तद्वित्त्वा कण्ठमायाति क्षुरि० ११ तल्लयं परिपूर्णं मं०ब्रा० ५.१.३ तद्यथेति। दुष्टमदनाभाव ... ना०परि० ५.३ तल्लयाच्छुद्धाद्वैत ... मं०ब्रा० ५.१.६ तद्यथेति दृष्टानुश्रविक ... संन्या० २.१९ तस्मात्खेचरी शाण्डि०१.७.१७-१ तद्योगं च द्विधा मं०ब्रा० १.३.१ तस्मात्तमः संजायते सुबा० १.२ तद्रूपवशगा नार्यः यो०त० ६१ तस्मात्फलविशुद्धाङ्गी कुण्डि० ६ तद्रूपेण सदा पं०ब्र० ३८ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मुनेऽहिंसा जा०द० १.२५ तद्वद् ब्रह्मविदोऽप्यस्य आत्म० ८ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन..मोक्षापेक्षी प०ब्र० १९ तद्द्वांशकुरादि मं०ब्रा० २.४.६ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ..योगमेव यो०त० ८१ तद्विद्याविषयम् कं०रु० १४ तस्मादद्वैतमेवास्ति जा०द० १०.३ तद्विप्रासो विपन्यवो पैङ्ग० ४.३१ तस्मादन्यगता वर्णा ना०परि० ६.१८ तद्विष्णोः परमम् पैङ्ग० ४.३० तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञो ना०परि० ४.३४ तन्तुपञ्जरमध्यस्थ शाण्डि० १.४.७ तस्मादेतन्मनः कं०रु० ३७ तन्निरासस्तु मं०ब्रा० १.२.२ तस्माद्दोष विनाशार्थं यो०त० १४ तन्मध्ये जा०द० ४.५ तस्मान्मनो विलीने हंस० २१ तन्मध्ये जगल्लीनं मं०ब्रा० २.१.४ तस्मिन्निरोधिते शाण्डि० १.७.२५ तन्मध्ये नाभिः शाण्डि० १.४.६ तस्मिन् मरुशुक्तिकास्थाणुः पैङ्ग० १.३ तपः सन्तोष.... शाण्डि० १.२.१ तस्मै नमो पं०ब्र०३

४१० मन्त्रानुक्रमणिका

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
तस्मै स होवाच पिताकैव० २तेषु प्राणादयःजा०द० ४.२५
तस्य दास्यं सदाब्र०वि २७त्यक्तसङ्गो जितक्रोधोना०परि० ६.५
तस्य न कर्मलेपःमं०ब्रा० २.२.३त्यक्त्वा लोकांश्चना०परि० ४.१
तस्य निश्चिन्तामं०ब्रा० २.२.५त्यक्त्वा विष्णोर्लिङ्गम्शाट्या० १९
. तस्य प्रियम्अव० ४त्यक्त्वा सर्वाश्रमान्धीरोशाट्या० ३०
तस्य ब्रह्मा बिभेतिसुबा० १.५त्यज धर्ममधर्मम्संन्या० २.१७
तस्य शिष्यो भुविकरःजा०द० १.१त्रयोऽग्नयश्चयो० त० १३५
तस्याह्वयाहंस० ८त्रिकोणं मनुजानाम्जा०द० ४.२
यस्यै तस्य भवतौसुबा० २.२त्रिचतुर्वासरम्जा०द० ५.१०
तानि सर्वाणि सूक्ष्माणिकं०ह० १९त्रिचतुस्त्रिचतुःशाण्डि० १.५.३
ताभ्यां निर्वि चिकित्सोऽर्थेअध्या० ३४त्रिदण्डं कमण्डलुम्जा०द० ६.२
तारं ज्योतिर्मयिशाण्डि० १.७.१७त्रिदण्डं वैष्णवम्शाट्या० १०
तार संधभात्शाण्डि० १.७.५२त्रिदण्डमुपवीतं चशाट्या० ७
तालुमूलगताम्शाण्डि० १.७.३०त्रिपुण्ड्रं भस्मनाजाबालि० २२
तावदेव निरोद्धव्यम्ब्र०वि० ५त्रियक्षं वरदं रुद्रम्यो०त० ९३
तितिक्षाज्ञान...ना०परि० ५.२७त्रिशङ्कुवज्रोकारम्ब्र०वि० ७४
तिलमध्ये यथायो०त० १३७त्रिंशत्परांस्त्विहेशत्शाट्या० ३४
तिलेषु च यथाब्र०वि० ३५त्रिषवणस्नानम्ना०परि० ७.२
तिलेषु तैलम्ब्रह्म० १९त्रिषु धामसु यद्भोग्यम्कैव० १८
तिष्ठतो व्रजतो वापिना०परि० ३.३६त्रिसन्ध्यं शक्तितःशाण्डि० १३
तिष्ठन्ति परितस्तस्याःजा०द० ४.६त्वक् चर्ममांस ...आत्मो० १-ख
तीर्थानि तोयपूर्णानिजा०द० ४.५२त्वगध्यात्मम्सुबा० ५.५
तीर्थे दानेजा०द० ४.५७त्वङ्मांसरक्तमज्जास्थियाज्ञ० १५
तीर्थे श्वपचगृहेपैङ्ग० ४.७त्वङ्मांसरुधिर ...ना०परि० ४.२५
तुरीयमक्षरमिति ज्ञात्वाना०परि० ५.२६त्वचमेश्राप्येतिसुबा० ९.५
तुरीयातीतो गोमुखःना०परि० ५.१६त्वचा क्षणविनाशिन्यासंन्या० २.३२
तुरीयातीतो गोमुखबुल्यासंन्या० २.२८त्वमेवाहं नमं०ब्रा० ३.२.२
तुल्यातुत्याविहीनोऽस्मिमैत्रे० ३ ६दक्षिणं सव्यगुल्फेनशाण्डि० १.३.५
तृष्णाक्रोधोऽकृतम्ना०परि० ४.५दक्षिणायनमित्युक्तम्जा०द० ४.४२
तृष्णारज्जुगणम्संन्या० २.५४दक्षिणेतरपादम्जा०द० ३.६
तृष्णा लज्जायो०त० १३दक्षिणेऽपिजा०द० ३.४
तेजसोव तमो यत्रअध्या० २४दग्धस्य दहनम्पैङ्ग० ४.१०
ते ध्यान योगानुगताना०परि० १.३दण्डं तु वैष्णवम्संन्या० २.१३
तेन सर्वमिदम्यो०त० १३६दण्डभिक्षां च यःना०परि० ६.११
तेनेदं निष्कलम्ब्र०वि०१७दण्डातद्येोत्तुसंन्या० २.१५
तेनेहूता स नतेब्र०वि० ५४दत्तात्रेयो महायोगीजा०द० १.१
ते वर्णात्मकाःशाण्डि० १.६.२दम्भाहंकारनिर्मुक्ताना०परि० ३.३५
तेषां मुक्तिकरम्यो०त० ५दर्भाभिः प्रणवैःशाट्या० १४