१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंध्या ३९६ परिशिष्ट
(आरुणि० २)। परमहंसोपनिषद्-२ में परमहंस के लक्षणों में उसे स्थूल शिखा, यज्ञोपवीत, दण्ड आदि से रहित होकर षडूर्मियों व अन्य कलुषों से रहित होना बताया गया है। उसी क्रम में आत्मा-परमात्मा में समभाव रखना और इनको एक ही दृष्टि से देखना उसकी संध्या बताया गया है-परमात्मात्मनोरेकत्वज्ञानेन तयोर्भेद एक एव विभग्नः सा सन्ध्या। ३२७. सन्ध्या-द्र०-सन्धि। ३२८. समाधि-द्र०-ज्ञानखण्ड। ३२९. सम्प्रसाद - विशेषतः 'सम्यक् प्रसन्नता' के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले 'सम्प्रसाद' शब्द का उल्लेख कई ग्रन्थों में मिलता है। हि०वि०को० खंड २३ पृ० ६३३ के अनुसार सम्-प्र-घञ् से निर्मित सम्प्रसाद शब्द के कई अर्थ हैं, जैसे-सम्यक् प्रसाद, चित्त की प्रसन्नता, योग शास्त्र के अनुसार चित्त की निर्मलता की एक साधना विशेष, सुषुप्ति, प्रसन्नता और विश्वासादि। परब्रह्मोपनिषद् में परब्रह्म के ध्यान की स्थिति और उसके स्वरूप के विषय में बताते हुए उसे देवों का संप्रसाद दाता, अन्तर्यामी, असङ्ग, चैतन्य स्वरूप पुरुष कहा है-य एष देवोऽन्यदेवस्य संप्रसादोऽन्तर्याम्य-सङ्गचिद्रूपः पुरुषः (परब्रह्मो० २)। सुबालोपनिषद् में सूक्ष्म कोश में स्वप्न के अनुभव प्रकरण में (आनन्दानुभूति के क्रम में) आत्मा को भी सम्प्रसाद कहा गया है-अथेमा...............लोकं परं च लोकं पश्यति सर्वाञ्छब्दान् विजानाति स संप्रसाद इत्याचक्षते प्राणः शरीरं परिरक्षति (सुबालो० ४.३) अर्थात् जिस द्वितीय कोश में आत्मा जब शयन करता है, लोक और परलोक का दर्शन करता है और समस्त शब्दों को जानता है, तब उसे सम्प्रसाद कहते हैं। ३३०. सहजौली मुद्रा - द्र०-मुद्रा। ३३१. सहस्रार चक्र - द्र०-ज्ञानखण्ड-सप्तचक्र। ३३२. सांसारिक विषय - द्र०-ज्ञानखण्ड-विषय-भोग। ३३३. सायुज्य पद - द्र०-ज्ञानखण्ड-पञ्चविधि मुक्ति। ३३४. सिंहासन - द्र०-आसन। ३३५. सिद्धासन - द्र०-आसन। ३३६. सुख-दुःख - सुख-दुःख एक ऐसी अनुभूति है, जो क्रमशः अनुकूलता और प्रतिकूलता के रूप में हर कोई अपने जीवन में परिस्थितियों के अनुसार अनुभव करता है। हि०वि०को० खं० २४ पृ०२६९ में सुख की व्युत्पत्ति इस प्रकार निर्दिष्ट है- सुखयतीति सुख-अच्। जिसका अर्थ है आत्मवृत्ति अथवा मनोवृत्ति-गुण विशेष। वह अनुकूल और प्रिय वेदना, जिसकी सभी को अभिलाषा रहती है। आत्मा के २४ गुणों में सुख भी एक गुण है, जो नित्य और जन्य भेद से दो प्रकार का होता है। सांख्य और योग के मत से सुख सत्त्वगुण का धर्म है। गीता के अनुसार सुख सात्त्विक, राजसी और तामसी होता है-सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति (गी० ४.३६)। इस श्लोक में तीन प्रकार के सुखों का संकेत करके गीताकार ने अगले तीन श्लोकों ३७, ३८ और ३९ में क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस सुख की परिभाषाएँ दी हैं। सुख के विपरीत अनुभूति को दुःख कहते हैं। हि०वि०को०खं० १० पृ० ४८७ में दुःख इन शब्दों में निर्दिष्ट है- दुर् दुष्टं खनतीति खन-उ वा दुःखयतीति दुःख अच्। इस व्युत्पत्ति से निर्मित दुःख शब्द के अर्थ-संसार, व्याधि, रोग, व्यथा, कष्ट, क्लेश आदि हैं। दुःख या क्लेश उत्पन्न होने के कई कारण हैं, जैसे- परतन्त्रता, दूसरे के अधीन रहकर जीवनयापन करना, आधि (मानसिक कष्ट), व्याधि (शारीरिक कष्ट-रोग आदि), मानहानि, शत्रुता, कुलटा पत्नी आदि। न्याय और वैशेषिक के अनुसार दुःख को आत्मा का धर्म तथा सांख्य और वेदान्त के मत से दुःख को बुद्धि का धर्म माना गया है, दुःख भी तीन प्रकार का कहा गया है- आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक। आध्यात्मिक दुःख के भी दो प्रकार हैं- शारीरिक और मानसिक। आधिदैविक दुःख उसे कहते हैं, जो देवता से उत्पन्न दुःख हो, जैसे- सर्दी-गर्मी, हवा, वर्षा, और वज्रपात से उत्पन्न दुःख। आधिभौतिक दुःख समस्त भूतों से उत्पन्न होने के कारण चार प्रकार का है, जैसे- जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज (मनुष्य, पशु-पक्षी, सर्पदंश, वनमक्षिका, स्थावर आदि) से उत्पन्न दुःख। उपनिषदों में योगी और परिव्राजक आदि को सुख-दुःख से दूर रहने या इससे ऊँचे उठने का परामर्श दिया गया है। नारद परिव्राजक उपनिषद् (३.२७) में उल्लेख है कि जिस प्रकार प्राणविहीन देह में सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता, उसी प्रकार कैवल्याश्रम में रहने वाले योगी प्राण रहते हुए भी सुख-दुःख से प्रभावित नहीं होते-प्राणे गते यथा