१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ३५७ सोम देहः सुखदुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥ गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय और पराजय में समान रहने का उपदेश दिया है- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि (गी० २.३८)। ३३८. सूक्ष्मशरीर - द्र०-पुर्यष्टक। ३३९. सूत्रात्मा - द्र०-ज्ञानखण्ड-तैजस। ३४०. सूर्य - विभिन्न ग्रहों में सूर्य महत्त्वपूर्ण ग्रह है। चारों वेदों में सूर्य की एक विशिष्ट देवता के रूप में स्तुति (प्रार्थना) की गई है। विराट् पुरुष के नेत्रों से सूर्य का प्रादुर्भाव हुआ है- चक्षोः सूर्यो अजायत (यजु० ३१.१२)। परब्रह्म के नेत्र स्वरूप होने के कारण सूर्य को सभी का कर्मद्रष्टा विवेचित किया गया है-सूर्य्य विचक्षसे (ऋ० १.५०.२)। समस्त जीव सूर्य से ही जीवित हैं, इसी कारण सूर्य सभी का आत्मा कहलाता है। ऋग्वेद में यह तथ्य इस प्रकार उपन्यस्त है- सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (ऋ० १.११५.१)। स्थिति भेद से सूर्य के अनेक नाम हैं, जैसे- सभी को अपने कर्म और उसके फल में स्थिर रखने के कारण सूर्य को ब्रह्मा, जगत् के पालक होने के कारण सूर्य को व्याप, देदीप्यमान होने से सूर्य को शुक्र और सबका प्रेरक होने से सूर्य को सविता आदि कहते हैं। आचार्य सायण ने उदित होने से पूर्व के सूर्य को सविता कहा है- उदयान् पूर्व भावी सविता (ऋ० ५.८.१४ सा०भा०)। शतपथ ब्राह्मण में सविता को सभी देवों का पिता कहा गया है- सविता वै देवानां प्रसविता (शत०ब्रा० १.१.२.१७) निरुक्तकार यास्क ने भी सविता को प्रसविता कहकर इस तथ्य की पुष्टि की है- सविता सर्वस्य प्रसविता (नि० १०.३.३१)। सूर्य वस्तुतः अग्नि का ही आकाशीय रूप है। विधिविधान का संरक्षक होने के कारण उसका चक्र नियमित चलता रहता है, जिससे गति, प्रखरता और सृजन की सभी को प्रेरणा मिलती है। अथर्वशिर उपनिषद् में देवों ने भगवान् रुद्र की स्तुति करते हुए तेजस्विता के कारण उन्हें सूर्य रूप कहा है- यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च सूर्यस्तस्मै वै नमो नमः (अथर्वशिर० २)। इसी प्रकार भगवान् रुद्र के विभिन्न गुणों के कारण अन्य नामों से भी उनकी स्तुति की गई है, जैसे- उन्हे वृद्धि रूप, शान्तिरूप, पुष्टिरूप, हुतरूप (होम किए गये), अहुतरूप (बिना होम किए गये), दत्त (दिए गये), अदत्त (बिना दिए गये), सर्व-असर्वरूप, विश्व-अविश्वरूप, पर-अपर रूप और परायण रूप कहा गया है-वृद्धिश्चत्वं शान्तिस्त्वं पुष्टिश्चत्वं हुतमहुतं दत्तमदत्तं विश्वमविश्वं कृतमकृतं परमपरं परायणं च त्वम् (अथर्वशिर० ३)। ३४१. सृष्टि - द्र०-ज्ञानखण्ड- सृष्टि-अतिसृष्टि। ३४२. सोम - सोम की स्तुति का उल्लेख चारों वेदों तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों में भी मिलता है। ऋषियों की दृष्टि में सोम एक पोषक तत्त्व है। इसका वर्णन कभी वनस्पति (सोम नामक लता) के रस के रूप में, कभी सूक्ष्म-प्रवाह के रूप में तथा कभी व्यक्तित्व सम्पन्न देव शक्ति के रूप में विभिन्न वेद मंत्रों में हुआ है। सोम को वनस्पति (सोमलता) रूप की अवधारणा के संदर्भ में यह मान्यता है कि सोमलता का उत्पत्ति-स्थल हिमाच्छादित उच्च पर्वतीय उपत्यकाएं हैं। सोमलता का मधुर रस दिव्य तथा अतिशय आनन्द प्रदान करने में समर्थ है-असाव्य ॐशुर्मदायाप्मु दक्षो गिरिष्ठाः ....... (सा० ४७३)। सोमरस हरितवर्ण का होता है, जो बल-वीर्यवर्धक है। देवगण चाव से इसका पान करते हैं-पवस्व दक्षसाधनो देवेभ्यः पीतये हरे। मरुद्भ्यो वायवे मदः (सा० ४७४)। सोमरस के अन्य गुणों-बुद्धि वृद्धि, जागृतिवृद्धि, शुक्रवृद्धि, दक्षतावृद्धि, मेधावृद्धि, तेजस्विता वृद्धि तथा मनः नियन्त्रण आदि का वर्णन सामवेद के विभिन्न मंत्रों में मिलता है। इसे साक्षात् अमृत मानकर राजा कहा गया है। सोमोऽराजायमल्लै सुत (यजु० १९.७२)। सोम की सोमलता के रूप में इस स्थूल अवधारणा के अतिरिक्त दूसरी अवधारणा सूक्ष्म प्रवाह के रूप में है। परमात्म शक्तियों के ऐसे प्रवाह को, जो सर्वत्र संचरित होकर सृष्टि के सन्तुलन, विकास आदि में अपना योगदान देता है, क्रान्तदर्शी ऋषियों ने 'सोम' संज्ञा प्रदान की है- उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे। उग्रं शर्म महि श्रवः (सा० ४६७) अर्थात् हे सोमदेव ! आपके पोषक रस का उद्भव सर्वोच्च द्युलोक में हुआ। द्युलोक में होने वाले आपके उस महिमामय प्रभाव और पोषण शक्ति को पृथिवी पर रहने वाले प्राणी प्राप्त करते हैं। सोम के सन्दर्भ में तीसरी अवधारणा विश्व ब्रह्माण्ड की संरचना, विकास और विलय की समूची प्रक्रिया के नियामक के रूप में है। एक मंत्र में सोम को सूर्य का प्रकाशक कहा गया है-अधा सूर्य्यमरोचयः (सा० ४९३)। स्थूल रूप में सोम (सोमलता) को वनस्पतियों का अधिपति कहा गया है- सोमं नमस्य राजानं यो यज्ञे वीरुधां पतिः (अथर्व० ३.२७.४)। दिव्य सोम के विषय में अथर्ववेद के एक मंत्र में एक वर्णन है कि