भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 385

परिशिष्ट ३९५ सन्धि अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला गुरु होता है। गायत्री मंत्र के उपदेष्टा को भी गुरु कहते हैं; क्योंकि प्राचीनकाल में कोई भी गुरु अपने शिष्य को सर्वप्रथम गायत्री मंत्र ही दिया करता था। इसीलिए गायत्री मंत्र को गुरुमंत्र कहा जाने लगा और गुरु को गायत्रीरूप। इसी सन्दर्भ में आचार्य शंकर का यह श्लोक द्रष्टव्य है-नमोऽस्तु गुरवे तस्मै, गायत्रीरूपिणे सदा। यस्य वागमृतं हन्ति विषं संसार संज्ञकम् ॥ मनुस्मृति में गुरु की परिभाषा इस प्रकार निर्दिष्ट है- निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि । सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते (मनु० २.१४२) अर्थात् जो निषेक (गर्भाधान) आदि संस्कारों को विधिवत् कराकर अन्नादि से पालन-पोषण करता है, उसे गुरु कहते हैं। इस परिभाषा के अनुसार माता-पिता प्रथम गुरु हैं, तत्पश्चात् पुरोहित आदि। तप, पुण्य, ज्ञान आदि समस्त गुणों से सम्पन्न तथा शिष्य का हर प्रकार से कल्याण करने वाले को सद्गुरु कहते हैं। दूसरे शब्दों में उत्तम गुण युक्त विशिष्ट गुरु को 'सद्गुरु' कहते हैं। जिसके पास समस्त सद्गुण, विद्वत्ता और क्रियाशीलता (तपश्चर्या) होती है, वे ही सच्चे अर्थों में सद्गुरु कहलाते हैं। तन्त्र सार में सद्गुरु के लक्षण इस प्रकार विवेचित हैं- जो शान्त, दान्त, कुलीन, विनीत, शुद्ध भाव सम्पन्न, पवित्र स्वभाव, कार्यदक्ष, तन्त्र-मन्त्रज्ञ, शिष्य को अनुशासन में रखने तथा उन पर अनुग्रह करने आदि में समर्थ है, वही सद्गुरु कहलाने योग्य है-सिद्ध तपस्वी कुशलः तन्त्रज्ञः सत्यभाषिता। निग्रहानुग्रहे शक्तो गुरुरित्यभिधीयते ॥ शान्तो दान्तः ..............कर्मभिः (तं०सा०सं० १.२६-२७)। बहुत जन्मों के पुण्य फल से सद्गुरु की प्राप्ति होती है। वेदान्त सार में उल्लेख है कि जिन मुमुक्षुओं के शम, दम, उपरति, तितिक्षा आदि साधन सिद्ध हो चुके हों, उन्हें ब्रह्मनिष्ठ-श्रोत्रिय सद्गुरु के पास जाकर 'तत्त्वमस्यादि' का उपदेश प्राप्त करना चाहिए। नारद परिव्राजकोपनिषद् में भी गुरु-सद्गुरु के गुण निर्दिष्ट हैं। संन्यास धारण के क्रम में ब्रह्मा ने नारद से कहा कि जिस श्रेष्ठ कुलोत्पन्न और माता-पिता के आज्ञाकारी बालक का उपनयन न हुआ हो, उसका उपनयन कराकर माता-पिता उस बालक को किसी श्रोत्रिय, शास्त्रों के अनुरागी, श्रद्धावान्, गुणवान् और श्रेष्ठ कुलोत्पन्न सद्गुरु के पास रहने के लिए भेजें-भो नारद .....श्रद्धावन्तं सत्कुलभवं श्रोत्रियं .....सद्गुरुमासाद्य नत्वा संन्यस्तुमर्हतीत्युपनिषद (ना० परि० २.२)। सद्गुरु पाकर शिष्य का जीवन धन्य हो जाता है और वह इहलोक में सब तरह समुन्नत होकर परलोक में भी सद्गति प्राप्त करता है। हिन्दी विश्वकोश के अनुसार- सती गतिर्यस्य अर्थात् जिसकी उत्तम विशिष्ट गति हो वह सद्गति सम्पन्न कहा जाएगा। मुक्ति, निर्वाण आदि को भी सद्गति माना गया है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा की उच्च लोकों में जो गति होती है, उसे ही सद्गति कहते हैं। पाप से असद्गति और पुण्य करने से सद्गति प्राप्त होती है, ऐसा शास्त्रों में उल्लेख है। वटुकोपनिषद् में परब्रह्म का एक नाम 'एक' भी बताया गया है। उस एक में ही समस्त प्राणी विलीन होते तथा एक से ही सृजित होते हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिणादि तीर्थों में भ्रमण करने वाले उस 'एक' ब्रह्म हेतु ही वहाँ जाते हैं और उन सभी की सद्गति होती है-अथ कस्मादुच्यत .......... तीर्थमेके व्रजन्ति ........तेषां सर्वेषामिह सद्गतिः (वदुको०)। इस प्रकार जो साधक सद्गुरु की आज्ञा से सत्पथ पर चलते हैं, उनकी सद्गति सुनिश्चित है। ३२५. सन्तोष - द्र०-नियम । ३२६. सन्धि- सन्धि शब्द का प्रयोग कई प्रयोजनों के निमित्त होता है। हिन्दी विश्वकोश सं० २३ पृ० ५५१ में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार प्रतिपादित है- सन्धानमिति-सम्-धा-कि। इस व्युत्पत्ति के अनुसार सन्धि शब्द के अनेक अर्थ हैं, जैसे राजाओं के बीच कुछ विवादों को निपटाने के लिए परस्पर कुछ समझौता कर लेना सन्धि कहलाती है। इसी प्रकार शरीर में अस्थियों के विभिन्न जोड़ों को भी सन्धि कहते हैं। व्याकरण की दृष्टि से दो वर्णों (स्वर, व्यंजन या विसर्ग) के मिलन को भी सन्धि कहते हैं। व्याकरण में इन्हें क्रमशः स्वर-सन्धि, व्यंजन सन्धि और विसर्ग सन्धि कहा जाता है। दो युगों के मध्य को भी सन्धि अथवा सन्ध्या कहते हैं। दिन और रात्रि के मिलन काल को भी सन्धि या सन्ध्या कहते हैं। सन्ध्याएँ तीन होती हैं - प्रातः काल, मध्याह्न और सायंकाल । इन्हें त्रिसन्ध्या या त्रिसन्धि भी कहते हैं। प्रत्येक सन्धि या सन्ध्या में गायत्री जप अथवा ईश्वर उपासना का विधान है। सन्धिकालों अथवा सन्ध्याओं में की गई उपासनाएँ विशेष रूप से फलित होती हैं। इसमें ध्यान सम्यक् रूप से लगता है, इसीलिए सन्ध्या शब्द की व्युत्पत्ति में यह भाव ध्वनित होता है-सन्ध्या (सं० स्त्री) सं सम्यक् ध्यायत्यस्यामिति सं+ध्यै चिन्तने+आतश्चोपसर्गे (श०क० खं० ५ पृ० २४१)। द्विजातियों के लिए नियमित रूप से सन्ध्या करना अनिवार्य माना गया है। श्रुति में उल्लेख है- अहरहः सन्ध्यामुपासीत (हि०वि०को०खं० २३ पृ० ५५४)। आरुण्युपनिषद् में संन्यासी के कर्तव्यों के क्रम में निर्दिष्ट है कि उसे तीन सन्ध्याओं में स्नान करके समाधिस्थ होकर आत्मा में रमण करना चाहिए- त्रिसंध्यां स्नानमाचरेत् संधिं समाधावात्मन्याचरेत्