१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्राद्ध-तर्पण ३१४ परिशिष्ट ३०९. श्राद्ध -तर्पण - द्र०-ज्ञानखण्ड -श्राद्ध। ३१०. श्रुति-द्र०-ज्ञानखण्ड -श्रोत्रिय। ३११. श्रोत्रिय-द्र०-ज्ञानखण्ड। ३१२. षडूर्मियाँ-षड्भाव विकार - उपनिषदों में कई स्थलों पर षडूर्मियों और षड्भाव विकारों का वर्णन प्राप्त होता है। साधक के विभिन्न स्तरों के अनुरूप उनकी दिनचर्या और नियम भी भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे यति (संन्यासी) के लिए आचरणीय विभिन्न नियमों का उल्लेख करते हुए प्रजापति ब्रह्मा ने नारद से कहा कि यति को षडूर्मिरहित और षड्भाव विकारों से शून्य रहना चाहिए-अयत्नेन प्राप्तमाहरन् ........षडूर्मिरहितः, षड्भाव विकार शून्यः, ........स्वरुपानुसंधानेन वसेत् (ना०परि० ७.१)। कोशग्रन्थों में छः प्रकार की ऊर्मियाँ (तरङ्गैं) वर्णित हैं- बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य मनसः स्मृतौ । शोक मोहौ शरीरस्य जरामृत्यू षडूर्मयः (वाच०पृ० १३९३) अर्थात् भूख और प्यास प्राण से सम्बन्धित, शोक और मोह मन से सम्बन्धित तथा जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु, ये शरीर से सम्बन्धित छः ऊर्मियाँ हैं। इसी प्रकार छः प्रकार के भाव विकार भी होते हैं, जिनसे संन्यासी को दूर रहने का परामर्श दिया जाता है। छः भाव विकारों का उल्लेख निरुक्तकार यास्क ने इन शब्दों में किया है- षड् भावविकारा भवन्तीति वार्ष्यायणिः ॥ .......जायतेऽस्ति, विपरिणमते, वर्धते, ऽपक्षीयते, विनश्यतीति (नि० १.१.३) अर्थात् जन्म (उत्पन्न होना), अस्तित्व (विद्यमान रहना), विपरिणमन (परिवर्तित होना), विकास (बढ़ना या विकसित होना), अपक्षय (क्षीण होना) और विनाश (पूर्णतः विनष्ट हो जाना) - ये ही षड्भाव विकार हैं। संन्यासी (यति) को आत्मज्ञान प्राप्त करके इन भाव विकारों से ऊँचा उठना चाहिए। वैशेषिक दर्शन में पदार्थ के षड्भाव इस प्रकार निर्दिष्ट हैं-द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। इसी प्रकार ज्योतिष की दृष्टि से लज्जित, गर्वित, क्षुधित, तृषित, मुदित और क्षोभित ये षड्भाव कहलाते हैं; किन्तु उपनिषदों में जहाँ भी परमहंस, अवधूत, संन्यासी आदि को षड्भाव विकार शून्य होने का निर्देश दिया गया है, वहाँ उपर्युक्त जन्म, अस्तित्व आदि षड्भाव विकारों से ही तात्पर्य है। परमहंस परिव्राजकोपनिषद् में भी अयज्ञोपवीती, अशिखी तथा सर्व कर्म परित्यागी ब्रह्मनिष्ठ परमहंस परिव्राजक के लक्षण बताते हुए उसे निन्दा, अमर्ष (क्रोध), सहिष्णु, षडूर्मिवर्जित और षड्भाव विकार शून्य होकर ज्येष्ठ-अज्येष्ठ के व्यवधान से रहित होने वाला विवेचित किया गया है- लोके परमहंस परिव्राजको दुर्लभतरः ...........स निन्दामर्ष सहिष्णुः स षडूर्मिवर्जितः। षड्भाव विकार शून्यः। स ज्येष्ठाज्येष्ठव्यवधान रहितः ..... परमहंस परिव्राडित्युपनिषत् (परम० प० ५)। इस प्रकार परमहंस- संन्यासी को उपर्युक्त गुणों को अपनाकर समस्त इन्द्रियों पर संयम (नियंत्रण) रखते हुए सतत ब्रह्मभाव में ही स्थित रहना चाहिए, ऐसा परमहंस ब्रह्मरूप ही हो जाता है। ३१३. षड्भाव विकार-द्र०-षडूर्मियाँ-षड्भाव विकार। ३१४. षड्रिपु -द्र०-ज्ञानखण्ड षड्रिपु-षड्वर्ग। ३१५. षण्मुखी मुद्रा-द्र०-मुद्रा। ३१६. षोडश कला - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३१७. संन्यास - द्र०-ज्ञानखण्ड -चतुराश्रम। ३१८. संन्यासी - द्र०-ज्ञानखण्ड -संन्यासी-यति। ३१९. संयम -द्र०-षडूर्मियाँ-षड्भाव विकार। ३२०. संवत्सर - द्र०-ज्ञानखण्ड। ३२१. सत्य - द्र०-यम। ३२२. सदानन्द - द्र०-अद्वयानन्द। ३२३. सद्गति - द्र०- सद्गुरु। ३२४. सद्गुरु - ज्ञानाञ्जन शलाका से अज्ञान रूपी तिमिरान्धता को दूर करने वाले को गुरु शब्द से अभिहित किया गया है। इस सन्दर्भ में यह श्लोक प्रसिद्ध है- अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ कोशग्रन्थों में 'गु' शब्द को अन्धकार वाची और 'रु' को प्रकाशवाची माना गया है। इस मान्यता के अनुसार भी