भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३९१ विरज २७७. विक्षेप — द्र०-अज्ञान-आवरण। २७८. विज्ञान—द्र०-ज्ञानखण्ड -ज्ञान-विज्ञान। २७९. विज्ञानात्मा— विज्ञानात्मा शब्द वस्तुतः विशेषण सहित जीवात्मा के स्वरूप का बोधक है। इसका उल्लेख उपनिषदों में मिलता है। विज्ञानात्मा शब्द का सामान्य अभिप्राय विज्ञान अर्थात् विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न जीवात्मा से है। वेदान्त के अनुसार स्थिति भेद से इस जीवात्मा की ही प्राज्ञ, विश्व और तैजस संज्ञाएँ होती हैं। १०८ उपनिषद् ज्ञानखण्ड के परिशिष्ट के 'प्राज्ञ' प्रकरण में यह द्रष्टव्य है। इनमें स्थूल शरीर के व्यष्टि उपहित चैतन्य को विश्व कहते हैं। (यही समष्टि उपहित चैतन्य के रूप में वैश्वानर कहलाता है।) इसी विश्वसंज्ञक जीवात्मा को प्रज्ञात्मा की संज्ञा प्रदान की गई है। विराट् पुरुष (समष्टिगत वैश्वानर) ही ईश्वर की आज्ञा से व्यष्टि रूप देह में प्रविष्ट होकर बुद्धि तत्त्व में निवास करके विश्व कहलाता है। इसी विश्व को विज्ञानात्मा, चिदाभास, व्यावहारिक, जाग्रत्, स्थूल देहाभिमानी और कर्म-भू आदि कहते हैं। इस सन्दर्भ में पैङ्गलोपनिषद् में उल्लेख है-ईशाज्ञया विराजो व्यष्टिदेहं प्रविश्य बुद्धिमधिष्ठाय विश्वत्वमगमत्। विज्ञानात्मा चिदाभासो विश्वो व्यावहारिको ......... नाम भवति (पैङ्गलो० २.६) अर्थात् व्यष्टि देह में प्रविष्ट होने पर बुद्धि में वास करके विश्व अथवा प्रज्ञात्मा कहलाता है। वेदान्त के मत में यह विराट् ही सूक्ष्म शरीर का परित्याग किये बिना स्थूल शरीर में प्रविष्ट हो जाता है और विश्व के सभी शरीरों में प्रवेश करने की क्षमता के कारण ही इसे विश्व कहते हैं। इस तथ्य की पुष्टि करने हुए स्वामी रामतीर्थ लिखते हैं-सर्वंथा विश्वशरीरवर्तित्वाद् विश्व इत्युक्तं भवति (वे०सा०विद्व०खं०१७)। विषयों का ज्ञान और उपभोग जाग्रत् स्थिति में यही विश्व या विज्ञानात्मा १९ मुखों (पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच प्राणों, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) द्वारा करता है- जागरित स्थानो बहिः प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूल भुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः (माण्डू०३)। प्रश्नोपनिषद् में इस विज्ञानात्मा को द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता और घ्राता आदि कहकर इसी तथ्य की पुष्टि की गई है- एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षरे आत्मनि संप्रतिष्ठते (प्रश्नो०४.९)। २८०. विद्या-ज्ञान— द्र०-ज्ञानखण्ड। २८१. विधाता— द्र०-ज्ञानखण्ड -विधाता-धाता। २८२. विनियोग— वि-नि-युज् और घञ् से निर्मित विनियोग शब्द के कई अर्थ हैं। जैसे-किसी फल के उद्देश्य से किसी वस्तु का उपयोग, किसी विषय में लगाना, प्रयोग, वैदिक कृत्य में मन्त्र विशेष का प्रयोग, प्रेषण, प्रवेश आदि। इन कई अर्थों में से 'वैदिक कृत्य में किसी मन्त्र के प्रयोग' के सन्दर्भ में पहले से ही गायत्री साधना करते समय विश्वामित्र और वसिष्ठ के शाप विमोचन हेतु एक विशेष मन्त्र द्वारा विनियोग किया जाता रहा है। (वर्तमान में तो युग ऋषि द्वारा गायत्री साधना को शाप मुक्त कर देने के कारण इसकी आवश्यकता नहीं पड़ती)। कई उपनिषदों में किसी वस्तु या साधना प्रक्रिया के प्रयोग के अर्थ में विनियोग शब्द प्रयुक्त हुआ है। जैसे-जाबालदर्शनोपनिषद् में प्राणायाम के विभिन्न प्रकारों का विनियोग (प्रयोग) विभिन्न रोगों के निरसन हेतु निर्दिष्ट है-विनियोगान् प्रवक्ष्यामि प्राणायामस्य सुव्रत। ...........सर्वरोग विनिर्मुक्तो जीवेद्वर्षशतं नरः (जा०दर्शनो० ६.२१,२३)। २८३. विपर्यास ( विपर्यय ) — द्र०-अध्यारोप-अपवाद। २८४. विभु— कोश ग्रन्थों में विभु शब्द के कई अर्थ संप्राप्य हैं, यथा-प्रभु, स्वामी, शंकर, ब्रह्मा, भृत्य, विष्णु, आत्मा, जीवात्मा, ईश्वर, सर्वव्यापक, सर्वत्रगमनशील, रात, दिन, बहुत बड़ा, विस्तृत, महान् और ऐश्वर्ययुक्त आदि। वेद, पुराणों और उपनिषदों में इस जगत् में उस विराट् ब्रह्म की सर्वव्यापकता के प्रतिपादन में भी कई स्थलों पर विभु शब्द का प्रयोग मिलता है। पैङ्गलोपनिषद् में ईश्वर के ऐश्वर्य, महानता और स्वामित्व को प्रदर्शित करने के लिए ईश्वर के साथ विभु विशेषण प्रयुक्त हुआ है। पैङ्गल ऋषि ने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया कि समस्त लोकों की सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाला विभु ईश्वर किस प्रकार जीवत्व को प्राप्त हुआ-अथ पैङ्गलो याज्ञवल्क्यमुवाच सर्वलोकानां सृष्टिस्थित्यन्तकृद्विभुरीशः कथं जीवत्वमगमदिति (पैङ्गलो० २.१)। इसके उत्तर में याज्ञवल्क्य जी ने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की उत्पत्ति सहित विभु ईश्वर के स्वरूप का विवेचन किया। इस प्रकार सर्वव्यापकत्व, विराट्, महान् आदि अर्थों में विभु शब्द का प्रयोग अनेक स्थलों पर प्राप्त होता है। २८५. विरज— सामान्यतः रज (धूल) रहित वस्तु को विरज कहते हैं; किन्तु आध्यात्मिक सन्दर्भों में रज अर्थात् रजोगुण