भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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वार्त्ताक वृत्ति ३१० परिशिष्ट

बालखिल्य वानप्रस्थी वे कहलाते हैं, जो जटाधारण करके फटे वस्त्र और वृक्ष की छालों को शरीर का आवरण बनाते हुए, आठ मास (मार्गशीर्ष मास से आषाढ़ मास) तक उपार्जित पुष्प-फल आदि (शाक-कन्दमूलादि फल और अन्नों) को ग्रहण करते हुए (उन आठ मासों के अतिरिक्त आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिकी पूर्णिमा के चार महीने-चातुर्मास्य तक भी वही आठ मास में उपार्जित पदार्थ ग्रहण करते हुए) कार्तिकी पूर्णिमा को सभी संचित भक्ष्य पदार्थ त्याग देते हैं अर्थात् कार्तिकी पूर्णिमा के बाद फिर नया उपार्जन करके ही ग्रहण करते हैं। इस तरह वे इन संचित भोज्य पदार्थों में अग्नि संचरण करते हुए पञ्चमहायज्ञों को सम्पन्न करते हुए आत्मा को प्रार्थना (साधना) करते हैं। आश्रम उपनिषदकार ने यह तथ्य इन शब्दों में प्रतिपादित किया है-वालखिल्य जटाधराश्चीरचर्मवल्कल-परिवृताः कार्त्तिक्यां पौर्णमास्यां पुष्पफलमुत्सृजन्तः शेषानष्टौ...प्रार्थयन्ते (आश्रामो० ३)। उल्लेखनीय है कि कुछ ग्रन्थों में वालखिल्य के स्थान पर बालखिल्य और बालिखिल्य पाठ भी मिलते हैं। फेनप वानप्रस्थी के लक्षण यह हैं कि वे विक्षिप्तवत् रहते हुए, शीर्ण पर्ण-फल (अपने आप गिरे हुए पत्ते और फल) ग्रहण कर उनमें अग्नि परिचरण करते हुए, जहाँ कहीं भी स्थान मिल जाये, वहीं निवास करते हुए, नियमित पञ्च महायज्ञादि क्रियाएँ सम्पन्न करते हुए आत्म साधना में निरत रहते हैं- फेनपा उन्मत्तकाः शीर्णपर्णफलभोजिनो यत्र तत्र वसन्तोऽग्निपरिचरणं कृत्वा आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो०३)। इन वानप्रस्थियों का नाम फेनप पड़ने का कारण अड्यार प्रकाशित माइनर उपनिषद् में आश्रमो०की टिप्पणी में लिखा है- फेनपाः स्वयं पतित पर्णफलादिकं फेनो नामेति केचित् अर्थात् कुछ विद्वानों का मानना है कि स्वयं गिरने वाले पत्ते और फलों को फेन कहते हैं। अतः इन्हें ग्रहण करने के कारण इन वानप्रस्थियों का नाम भी फेनप पड़ गया है। श्रीमद्भागवत के ३.१२. ४३ वें श्लोक की व्याख्या में फेनप उन्हें बताया गया है, जो (दूध पीते समय) बछड़े के मुख से गिरने वाले दूध के फेन से जीवनयापन करते हैं-फेनपा ........वत्समुखगलितपयःफेनपानेन जीवन्त इति। २७४. वार्त्ताक वृत्ति — द्र०-गृहस्थ। २७५. वालखिल्य — द्र०-वानप्रस्थ। २७६. वासनात्रय- वासना शब्द का उपयोग सामान्यतः आसक्ति अथवा विषम लिङ्गियों (स्त्री-पुरुषों) में परस्पर काम वासना को प्रगाढ़ता के अर्थ में किया जाता है; किन्तु कोश ग्रन्थों में इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार प्रतिपादित है-वासयति कर्मणा योजयति जीवमनांसीति वस-णिच्-युच्-टाप् (हि० वि० को० खं० २१ पृ० २३०) जिसके अनेक अर्थ है, जैसे-प्रत्याशा, ज्ञान, संस्कार, स्मृति, हेतु, भावना, इच्छा, कामना आदि। किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति अत्यधिक स्नेह या मोह के कारण उससे सम्बन्धित कोई प्रसङ्ग उपस्थित होते ही उसका संस्कार अथवा वासना जाग पड़ती है, जिससे वह तत्सम्बन्धित कार्य करने को समुद्यत हो उठता है। जैसे कोई लेखक या कवि जो नदी, सरोवर, बगीचे आदि के निकट लेख या कविता लिखने का अभ्यासी है। यदि वह कहीं बाहर गया हुआ है और वहाँ भी उसे ऐसा ही वातावरण मिल जाए, तो उसके अन्दर कुछ लिखने के भाव जाग्रत् होने लगते हैं; इसे ही उसका संस्कार या वासना का जागना कहेंगे। वासनाएँ तीन प्रकार को मानी गयी है, जिन्हें उपनिषदों में वासनात्रय के नाम से जाना जाता है। ये हैं-देह सम्बन्धी वासना, मन सम्बन्धी वासना और बुद्धि सम्बन्धी वासना। संन्यासोपनिषद् (२-२०) के वासनात्रय के अन्तर्गत देह वासना, शास्त्र वासना तथा लोक वासना का भी उल्लेख किया गया है। परमहंस परिव्राजकोपनिषद् में मुमुक्षु को निर्देश दिया गया है कि वह सद्गुरु से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर इहलोक और परलोक के सुखों के वास्तविक स्वरूप को समझकर एषणात्रय, वासनात्रय, ममता और अहंकारादि को वमन किए (उल्टी किए) हुए अन्न के समतुल्य समझकर मोक्ष के एक मात्र साधन ब्रह्मचर्याश्रम को पूरा करके गृहस्थ बने, तदुपरान्त वानप्रस्थी और इसके पश्चात् संन्यास आश्रम ग्रहण कर प्रव्रज्या करे-सद्गुरु समीपे ....... ज्ञात्वैषणात्रय वासनात्रय ममत्वाहंकारादिकं वमनान्नमिव ......प्रव्रजेत् (परम० प० २)। इस मंत्र को टीका में ब्रह्मयोगी ने वासनात्रय को देहादि वासनात्रय कहकर वासना के तीनों रूपों की ओर संकेत किया है- न कदापि संसारमण्डले ..........देहादि वासनात्रय .... ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। इस प्रकार क्रमशः ब्रह्मचर्याश्रम से गृहस्थ, गृहस्थ से वानप्रस्थ और इसके पश्चात् संन्यास धारण करने के अतिरिक्त एक पथ और है कि जब कभी भी पूर्ण वैराग्य उत्पन्न हो जाये (वासनात्रय, एषणात्रय, आदि दोषों से मुक्त हो जाये), तभी प्रव्रज्या आश्रम अर्थात् संन्यास आश्रम ग्रहण किया जा सकता है। इस स्थिति में संन्यास ग्रहण करने के लिए क्रमशः आश्रम ग्रहण करना, व्रती (व्रतधारण करने वाला), पुनर्ब्रती, स्नातक, अस्नातक, अग्निहोत्री अथवा उससे रहित होना आवश्यक नहीं है।