१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट | ३७३ | पञ्च तत्त्व-पंच तन्मात्राएँ
है कि शरीर छूटने के उपरान्त पूर्व कर्मानुसार पुनर्जन्म होता है, पर किसी-किसी योगी के समस्त कर्मक्षय हो जाने पर मृत्यु के उपरान्त पुनर्जन्म नहीं होता, यही स्थिति निर्वाण अथवा मोक्ष अथवा मुक्ति कहलाती है; किन्तु दर्शन ग्रन्थों में तृष्णा की सम्यक् निवृत्ति को ही निर्वाण कहा गया है-तृष्णाया विप्रहाणेन निर्वाणमिति कथ्यते ( हि०वि०को० खं० १२) अर्थात् यह जगत् कल्पित और आधाररहित है। अतः इस मिथ्या संसार के साथ अपने को सम्बद्ध रखने की प्रबल आकांक्षा का नाम ही तृष्णा है। इस तृष्णा के विनष्ट हो जाने पर ही संसारोच्छेद, आत्माभिमान का विनाश और निर्वाण प्राप्त होता है। प्रज्ञापारमिता ग्रन्थ के अनुसार अपनेपन और संसार के अभाव का नाम ही निर्वाण है। जिस अवस्था में न संसार है, न मैं हूँ, वह स्थिति दुर्बोध और गम्भीर है, यही स्थिति निर्वाण है। बौद्ध दर्शन में निर्वाण शब्द का बहुत प्रयोग हुआ है। वहाँ सर्वत्र इसका अभिप्राय मुक्ति से ही लिया गया है। उनका मन्तव्य है कि जिस प्रकार ईंधन न होने पर अग्नि निर्वाण की प्राप्त हो जाती है (बुझ जाती है), ठीक उसी तरह काम, कोध, लोभ और मोह जनित संस्कार के समूल नष्ट हो जाने से सत्ता या अस्तित्व का विलोप हो जाता है। सत्ता का निरोध ही निर्वाण कहलाता है। अश्वघोष ने बुद्ध चरित में उल्लेख किया है- करुणायमाना न्यायस्यो मृत्युभयविमोहिताः। नैर्वाणे स्थापनीयास्तत् पुनर्जन्मनिवर्त्तके (हि०वि०को०खं० १२ पृ० ७१) अर्थात् निर्वाण द्वारा पुनर्जन्म से निवृत्ति हो जाती है। समस्त (अच्छे या बुरे) संस्कारों का क्षय हो जाने पर पुनर्जन्म से निवृत्ति हो जाती है (हि०वि०को०)। अस्तु, संस्कार समूह के क्षय हो जाने पर ही निर्वाण को प्राप्ति होती है। बोधिचर्यावतार ग्रन्थ में उल्लेख है कि सर्वत्याग (जगत्, सुख-दुःख और अभिमान आदि सभी का त्याग) का ही दूसरा नाम निर्वाण है-सर्वत्यागश्च निर्वाणं निर्वाणार्थि च मे मनः (हि०वि०को०खं० १२ पृ० ७२)। निरालम्ब उपनिषद् के अनुसार मुक्ति या मोक्ष (निर्वाण) नित्य और अनित्य वस्तुओं के विचार से नश्वर संसार के सुख-दुःख प्रदाता सम्पूर्ण विषयों से ममत्व रूप बन्धन को नष्ट कर देना है-मोक्ष इति च नित्यानित्यवस्तु विचारादनित्य संसारसुखदुःखविषयसमस्तक्षेत्रममताबन्धक्षयो मोक्षः (निरा० २९)। गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने ज्ञानाग्नि द्वारा समस्त कर्मों के क्षय का उपदेश दिया है-ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा (गी० ४.३७)। आत्मज्ञान हो जाने पर समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं। ब्रह्म की अनुभूति हो जाने पर साधक अपने को अजर, अव्यय, सूक्ष्म, अक्षर, अविकल, निर्मल और निर्वाण मूर्ति अनुभव करने लगता है। "एकोऽहम ...........निर्वाणमयसंविदम्" (मैत्रे० १.१४)। १५७. निर्विकल्प - द्र०-ज्ञानखण्ड -समाधि। १५८. निर्विकार - द्र०-चिद्घन। १५९. निष्कल - द्र०-चिद्घन। १६०. निष्काम कर्म - द्र०- ज्ञानखण्ड। १६१. पञ्चकोश-द्र०- ज्ञानखण्ड। १६२. पञ्चतत्त्व-पञ्च तन्मात्राएँ- सम्पूर्ण सृष्टि पञ्चतत्त्वों अथवा पञ्चमहाभूतों से निर्मित मानी जाती है। यह शरीर भी पञ्चतत्त्वों का ही बना हुआ है। ये पाँच तत्त्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। ये ही पाँचों तत्त्व समस्त पद के रूप में पंच तत्त्व कहलाते हैं। प्रख्यात कोशग्रन्थ वाचस्पत्यम् में उल्लेख है-पञ्चानां तत्त्वानां समाहारः। पञ्चसु भूतेषु स्वरोदयः। तंत्र ग्रन्थों में पञ्च मकार-मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन को पञ्च तत्त्व कहा गया है- "मद्यं मांसं तथा मत्स्यो मुद्रा मैथुनमेव च। पञ्चतत्त्वमिदं प्रोक्तं देवि! निर्वाणहेतवे। मकारपञ्चकं देवि! देवानामपि दुर्लभम्। पञ्चतत्त्वविहीनानां कलौ सिद्धिर्न जायते (वाच० पृ०-४१८४)" अर्थात् मद्य-मांसादि पञ्च तत्त्व देवों को भी दुर्लभ हैं। इनके बिना कलियुग में निर्वाण सिद्धि नहीं मिल पाती। यहाँ यह ध्यातव्य है कि यह आलङ्कारिक वर्णन है। प्रत्यक्षतः इनका सेवन करके सिद्धि प्राप्त होने की बात नहीं कही गई है। अन्य तन्त्रग्रन्थों में गुरुतत्त्व, मंत्र तत्त्व, मनस्तत्त्व, देवतत्त्व और ध्यान तत्त्व इन्हें पञ्चतत्त्व माना गया है- गुरुतत्त्वं मन्त्रतत्त्वं मनस्तत्त्वं सुरेश्वरि! देवतत्त्वं ध्यानतत्त्वं पञ्चतत्त्वं प्रकीर्तितम् (निर्वाण तंत्र)। सृष्टि में विद्यमान जिन पञ्चतत्त्वों का वर्णन है, वे पृथ्वी आदि पञ्चतत्त्व ही हैं। रामचरित मानस के किष्किन्धा काण्ड में एक चौपायी में इन तत्त्वों का उल्लेख इन शब्दों में हुआ है-क्षिति, जल, पावक, गगन समीरा। पञ्च रचित अति अधम सरीरा ।। त्रिशिख ब्राह्मणोपनिषद् में इस अखिल जगत् को उत्पत्ति के क्रम में भी पञ्च तत्त्वों का उल्लेख मिलता है-इन तत्त्वों का अनुपात इस प्रकार है-पृथ्वी १/२+जल १/८+अग्नि १/८+आकाश १/८+वायु १/८=पृथ्वीतत्त्व, इसी प्रकार अन्य चारों तत्त्वों के १/२ अंश में शेष चारों तत्त्वों का अनुपात १/८, १/८ होने पर ही वे