भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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निरञ्जन ३७२ परिशिष्ट पर उसे पवित्र किया जाए। अतः हे मुने ! जो ज्ञान रूप पवित्रता को छोड़कर बाह्य पवित्रता में ही रमा रहता है, वह स्वर्ण के स्थान पर मिट्टी के ढेलों का ही संग्रह करता है। दूसरा-नियम सन्तोष है। अपनी स्थिति के अनुरूप उचित प्रयास करने पर जो भी फल प्राप्त हो, उसी में प्रसन्न रहना सन्तोष है। सन्तोष को सुख का मूल और इसके विपरीत स्थिति को दुःख का मूल कहा गया है-सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्। सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः (मनु० ४.१२)। इसी तथ्य की पुष्टि जाबाल दर्शनोपनिषद् में भी मिलती है-यदृच्छालाभतो नित्यं प्रीतिर्या जायते नृणाम्। तत्सन्तोषं विदुः प्राज्ञाः परिज्ञानैक तत्पराः (जा०दर्शनो० २.५)। प्रभु इच्छा से जो कुछ प्राप्त हो जाए, उसी में सन्तुष्ट रहना विद्वानों ने सन्तोष कहा है। सर्वत्र अनासक्त भाव से रहकर ब्रह्मलोक तक के सुख से विरक्ति और हर स्थिति में प्रसन्नता यही सर्वश्रेष्ठ सन्तोष है। तीसरा-नियम तप है। अश्व विद्या के कुशल सारथी द्वारा चञ्चल घोड़ों को साधने के समान, साधक द्वारा शरीर, प्राण, इन्द्रियों और मन को समुचित प्रकार से वश में करना तप कहलाता है। जाबालदर्शन उपनिषदकार ने तप की परिभाषा इस प्रकार की है- वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः । शरीरशोषणं यत्तत्तप इत्युच्यते बुधैः (जा० दर्शनो० २.३) अर्थात् वेदोक्त कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रत करके शरीर को क्षीण करना ही तप है, ऐसा विद्वान् कहते हैं। वस्तुतः उच्च आदर्शों के लिए कष्ट सहन करने का नाम ही तप है। महर्षि पतञ्जलि ने तप तीन प्रकार के माने हैं- शरीर का तप, वाणी का तप और मन का तप। शारीरिक तप के अन्तर्गत युक्त आहार- उचित आहार, सादा-सात्त्विक, सुपाच्य और मिताहार तथा युक्त विहार के अन्तर्गत संतुलित यात्रा, चलना-फिरना आदि है। इसी प्रकार युक्त कर्मचेष्टा अर्थात् नियमित रूप से कर्तव्य पालन, न अधिक श्रम, न आलस्य-प्रमाद बरतना, युक्त स्वप्नावबोध अर्थात् न अधिक सोना, न अधिक जागना। इस सन्दर्भ में गीता का यह श्लोक-'युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु । युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा' (गी०६.१७)। वाणी के तप का अर्थ है-वाणी को संयमित रखना। हितकर, प्रिय, मधुर और मित बोले। मन का तप मन को संयमित रखना है। द्वेष, घृणा, ईर्ष्या आदि के भाव मन में न रखना मन का तप है। चौथा-नियम स्वाध्याय है। जिस प्रकार शरीर के लिए भोजन आदि को सतत आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार विचार संस्थान मन-मस्तिष्क को सुव्यवस्थित-सन्तुलित रखने के लिए स्वाध्याय की आवश्यकता अनिवार्य रूप से है। स्वाध्याय का शाब्दिक अर्थ है- स्व-अपना, अध्याय-अध्ययन। अपना अध्ययन अर्थात् आत्मावलोकन ही स्वाध्याय है। वाचस्पत्यम् में स्वाध्याय की व्युत्पत्ति इन शब्दों में दी है- स्वः स्वकीयत्वे विहित अध्यायः .......। स्वाध्यायोऽध्येतव्यः इति श्रुतिः । स्वाध्याय के द्वारा वेद, शास्त्र, उपनिषद्, गीता व अन्य आर्षग्रन्थों का अध्ययन करके उससे प्राप्त ज्ञान के दर्पण में साधक अपने को देखकर आत्म समीक्षा करता है, जिससे आत्म सुधार होता है व आध्यात्मिक उन्नति होती चली जाती है। पातञ्जल योग के अनुसार ओंकार सहित गायत्री मंत्र का जप ही स्वाध्याय है। पाँचवाँ-नियम ईश्वर प्रणिधान है। फल सहित समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देना ईश्वर प्रणिधान है। यह समस्त नियमों में प्रमुख है। पातञ्जल योग प्रदीप में साधन पाद सूत्र- ३२ को व्याख्या में ग्रन्थकार ने महर्षि वेदव्यास कृत भाष्य का उद्धरण देते हुए ईश्वर प्रणिधान का फल इस प्रकार विवेचित किया है-शय्यासनस्थोऽथ पथि व्रजन्वा स्वस्थः परिक्षीण वितर्कजालः । संसारबीजक्षयमीक्षमाणः स्यान्नित्ययुक्तोऽमृतभोगभागी ॥ जो योगी पुरुष शय्या और आसन पर विराजमान या पथ पर गमन करता हुआ अथवा एकान्तस्थ हो, हिंसा आदि वितर्कजाल को विनष्ट करके ईश्वर प्रणिधान करता है, वह अविद्या आदि क्लेशों का विनाश करता हुआ नित्य स्वरूप परमात्मा से युक्त हुआ जीवन्मुक्त का सुख प्राप्त करता है। अतः सभी यमों और नियमों को परब्रह्म में अर्पण करके ईश्वर प्रणिधान करे। जाबालदर्शनोपनिषद् ने ईश्वर प्रणिधान को ईश्वर पूजन कहा है, जिसकी परिभाषा इस प्रकार दी है- रागाद्यपेतं हृदयं वागदुष्टाऽनृतादिना । हिंसादिरहितं कर्म यत्तदीश्वर पूजनम् (जा० दर्शनो० २.८) अर्थात् अनृत भाषण आदि दोषों से रहित तथा हिंसा आदि क्रूरता से मुक्त कर्म ही ईश्वर पूजन है। १५३. निरञ्जन - द्र०-चिद्घन । १५४. निरहंकारिता - द्र०-अमानित्व गुण । १५५. निर्गुण - द्र०-ज्ञानखण्ड -निर्गुण-सगुण । १५६. निर्वाण - निर्+वा+क्त से निर्मित निर्वाण शब्द का प्रयोग प्रायः निवृत्ति, शान्ति, अस्तागमन, वाणशून्य, शून्य, विश्रान्ति और मुक्ति या मोक्ष के अर्थ में होता है। दर्शन में इसका मुक्ति के अर्थ में ही अधिक प्रयोग हुआ है। सामान्य धारणा यह