भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३६५ तुर्यावस्था श्लोक की तरह ही कुछ पाठ भेद से जितेन्द्रिय की परिभाषा उल्लिखित है- श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च भुक्त्वा च ... जितेन्द्रियः। ११५. ज्ञान-वैराग्य-संन्यासी- द्र०-अवधूत। ११६. ज्ञान-संन्यासी-द्र०-अवधूत। ११७. ज्ञानाग्नि - ज्ञान और अग्नि दो शब्दों का समस्त पद ज्ञानाग्नि है, जिसका सामान्य अर्थ है-ज्ञान की अग्नि अथवा ज्ञानरूपी अग्नि। जिस प्रकार अग्नि का कार्य जलाकर भस्म कर देना है, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि अज्ञान जनित विकारों को जलाकर भस्म कर देती है। श्रीमद्भगवद्गीता में उल्लेख है कि जिसके सभी कार्य कामना और संकल्प से रहित हो जाते हैं, उसके सभी कर्म (प्रारब्ध कर्म) ज्ञानाग्नि से दग्ध हो जाते हैं। ऐसे उस पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं- यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः (गी० ४.१९)। वेदान्त दर्शन में जीवन्मुक्त की स्थिति के सन्दर्भ में विवेचन है कि ज्ञानरूप ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाने पर अज्ञान और अज्ञान द्वारा संचित कर्म-संशय, विपर्यय आदि बाधित हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति समस्त बन्धनों से रहित होकर जीवन्मुक्त हो जाता है-अथ जीवन्मुक्तलक्षणमुच्यते। जीवन्मुक्तो नाम स्वरूपाखण्ड ब्रह्मज्ञा- नेन.......साक्षात्कृतेऽज्ञानतत्कार्य सञ्चित कर्मसंशयविपर्ययादीनामपि बाधितत्वादखिल बन्धरहितो ब्रह्मनिष्ठः (वे०सा० खं०-३४)। मुण्डक उपनिषद में भी ब्रह्मज्ञानरूप ज्ञानाग्नि द्वारा कर्मों के विनष्ट होने तथा हृदयग्रन्थि के खुल जाने से समस्त संशयों के विनष्ट होने का वर्णन है-भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्व संशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे (मुण्डको० २.२.८)। ब्रह्मविद्योपनिषद में ज्ञानाग्नि को ध्रुवाग्नि भी कहा गया है; क्योंकि ध्रुव (स्थिर) ज्ञानरूपी अग्नि का प्राकट्य हो जाने के बाद अज्ञान जनित समस्त विकार विनष्ट हो जाते हैं। स्व अज्ञान एवं उसके कार्यरूप प्रपञ्च के रूई के समान पर्वत (अम्बर) को जला देने में ज्ञानाग्नि ही सक्षम है, इसलिए इसे ध्रुवाग्नि कहा गया है-स्वाज्ञान तत्कार्य स्वातिरिक्त प्रपञ्चतुलाचलभस्मीकरणपटुत्वात् ध्रुवाग्निः ...............प्रचक्षते (ब्रह्मविद्यो० १ ब्रह्म० भा०)। ११८. ज्ञानेन्द्रियाँ - द्र०-ज्ञानखण्ड-अन्तःकरण-चतुष्टय। ११९. तत्त्वमसि - द्र०-ज्ञानखण्ड - महावाक्य । १२०. तप- द्र०-ज्ञानखण्ड -नियम। १२१. तारक ब्रह्म-तारक मन्त्र - उपनिषदों में तारक ब्रह्म और तारक मंत्र की महत्ता प्रतिपादित को गई है। अथर्वशिखोपनिषद् में तारक को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है- .........सर्वेभ्यो दुःखभयेभ्यः संतारयतीति तारणात्तारः (अथर्वशिख० २.१) अर्थात् जो समस्त दुःखों और भयों से मुक्त कर दे, वही तारक है। इसी प्रकार अथर्वशिर उपनिषद् में तारक का अर्थ किया गया है कि जिसके (जिस तारक मंत्र के) उच्चारण करने से ही गर्भ, जन्म, जरा-मरण एवं संसार के महाभयों से मुक्ति मिल जाती है, वह तारक ब्रह्म या तारक मंत्र है- अथ कस्मादुच्यते तारं यस्मादुच्चार्यमाण एव गर्भजन्मजरामरणसंसारमहाभयात् संतारयति तस्मादुच्यते तारम् (अथर्वशिर० ४९)। अद्वयतारकोपनिषद् में तो तारक का विस्तार से वर्णन किया गया है। उसमें भी तारक ब्रह्म का स्वरूप इसी प्रकार विवेचित है-गर्भजन्मजरा- मरणसंसारमहद्भयात् संतारयति तस्मात्तारकमिति (अद्वयता० ३)। उपनिषद्कार ने तारक योग का स्वरूप इस प्रकार बताया है कि नेत्र बन्द अथवा अर्धोन्मीलित रखकर भ्रूमध्य के ऊपरी स्थान में अन्तर्दृष्टि से इस प्रकार का भाव करे कि मैं चैतन्य स्वरूप हूँ। इस प्रकार का ध्यान करते रहकर सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेने वाला तद्रूप (तारक रूप) हो जाता है-योगी स्वान्तः .........ब्रह्माहमस्मीत्यालोकयन् तद्रूपः तारकरूपो भवति (अद्वयता० २ ब्रह्म० भा०)। तारक ब्रह्म को प्रत्यगात्मा माना गया है- ......संसारतारकत्वात् तारकं प्रत्यगात्मेत्यर्थः (अद्वयता० ३ ब्रह्म० भा०) हिन्दी विश्वकोश में षडक्षर मंत्र को तारक मंत्र बताया गया है, जिसमें श्रीराम को इसका अधिष्ठाता माना गया है, यह षडक्षर मंत्र 'ॐ रामाय नमः' है। उपनिषदों (रामोत्तरतापनीयोपनिषद् २.३, अथर्वशिर० ४४ आदि) में 'ॐ कार' को भी तारक ब्रह्म-तारक मन्त्र कहा गया है। १२२. तुरीयातीत - द्र०-ज्ञानखण्ड - अवधूत । १२३. तुरीयावस्था - द्र०-ज्ञानखण्ड-तुरीय-तुरीयातीत । १२४. तुर्यावस्था - द्र०-ज्ञानखण्ड -तुरीय-तुरीयातीत ।