१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचान्द्रायण व्रत ३६४ परिशिष्ट १०४. चान्द्रायण व्रत- द्र०- कृच्छ्र चान्द्रायण। १०५. चित्त शुद्धि- द्र०-ज्ञानखण्ड -चित्त। १०६. चिदात्मा- द्र०-चिद्घन। १०७. चिदानन्द- द्र०-चिद्घन। १०८. चिद्घन-परमात्मा को सत्, चित् और आनन्दस्वरूप कहते हैं। तीन तत्त्वों सत् (सत्य), चित् (चैतन्यता) और आनन्द (परम सुख-आन्तरिक सुख) की सघनता के कारण ही उसे सद्घन, चिद्घन और आनन्दघन कहते हैं। इसीलिए उपर्युक्त गुणों से युक्त ईश्वर को समस्तपद के रूप में सच्चिदानन्दघन कहते हैं। अध्यात्मोपनिषद में इसी तथ्य का उल्लेख इन शब्दों में है-परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेय........... विक्रियम्। सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमव्ययम् (अध्यात्मो० ६१) अर्थात् उस परब्रह्म को परिपूर्ण, आदि और अन्त से रहित, परिमाप रहित, विकार शून्य, सन्मय (सद्घन,) चिन्मय (चिद्घन), नित्य आनन्दमय (नित्य और आनन्दघन) तथा अविनाशी कहा गया है। कई अन्य विशेषताओं के कारण उस परमात्मा के और भी कई नाम हैं। जैसे- चैतन्य स्वरूप होने के कारण उसे चिदात्मा कहते हैं, जिसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- चित् चैतन्यमात्मा स्वरूपमस्य (हि०वि०को०ख०६, पृ० ३९१) अर्थात् चैतन्य स्वरूप परब्रह्म ही चिदात्मा है। चैतन्य रूप होने से ही उसे चैतन्य व चिद्रूप भी कहते हैं। चैतन्य और आनन्द स्वरूप होने से उसे ही चिदानन्द कहते हैं। चित् शब्द में मयट् प्रत्यय लगने से उस परमेश्वर को चिन्मय अर्थात् ज्ञानमय कहते हैं। निर्दोष, माया से रहित और विकाररहित होने के कारण उस ब्रह्म को ही निरञ्जन तथा निर्विकार कहते हैं- निरञ्जनो निर्विकारः ............नास्ति (आत्मो० १-घ)। कलाओं से रहित अथवा कलातीत होने के कारण उस ईश्वर को ही निष्कल कहते हैं- तेनेदं निष्कलं ......पञ्चभिः (ब्रह्मविद्यो० १७)। श्रेष्ठ (परम) पुरुष होने के कारण उस ब्रह्म को ही परम अथवा पुरुषोत्तम भी कहते हैं। ज्योतिस्वरूप होने के कारण उसे ही परम-ज्योति कहते हैं। प्राचीनतम होने के कारण उस ईश्वर को ही पुराण पुरुष तथा सम्पूर्ण सृष्टि का मूल तत्त्व होने से उसे ही परम तत्त्व कहते हैं। इसी तरह सबसे परे अथवा परे से भी परे होने के कारण उस परब्रह्म का एक नाम 'परात्पर' भी है। परमात्मा के उपर्युक्त गुणों का निरन्तर चिन्तन करते रहकर सतत आनन्दित रहने वाले परमात्म भाव में स्थित रहते हैं। इस प्रकार उस एक ही परब्रह्म के ये अनेक नाम हैं। १०९. चिन्मय- द्र०-चिद्घन। ११०. चैतन्य- द्र०-चिद्घन। १११. जगत्- द्र०-ज्ञानखण्ड। ११२. जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति- द्र०-ज्ञानखण्ड। ११३. जालन्धर बन्ध- द्र०-बन्ध। ११४. जितेन्द्रिय - धर्म पथगामी मुमुक्षु के लिए जितेन्द्रिय होना आवश्यक है। जितेन्द्रिय का सामान्य अर्थ है-इन्द्रियों को जीत लेने वाला अथवा इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने वाला। प्रख्यात संस्कृत कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में जितेन्द्रिय इन शब्दों में परिभाषित है-जितानि वशीकृतानीन्द्रियाणि येन अर्थात् जिसके द्वारा समस्त इन्द्रियाँ वश में कर ली गई या जीत ली गई हैं, वह जितेन्द्रिय है। महाराज मनु ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है-श्रुत्वा स्पृष्ट्वाथ दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः। न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः (वाच०पृ० ३१२०)। इसका अभिप्राय है, किसी भी प्रकार का विषय सुनकर, कुछ भी स्पर्श करके, कुछ भी देखकर, कुछ भी भक्षण करके तथा कुछ भी सूंघ कर जो व्यक्ति न तो हर्षित होता है और न ही ग्लानि अनुभव करता है, उसे ही जितेन्द्रिय जानना चाहिए। महर्षि पतञ्जलि के योग दर्शन में इस विषय में उल्लेख है कि आत्म शुद्धि हो जाने पर सत्त्वगुण प्रकट होता है, तब रजोगुण और तमोगुण नहीं आ सकते। कारण-कार्य न्याय से चित्त शुद्धि हो जाने पर रज और तम सत्त्वगुण से प्रभावित हो जाते हैं, जिससे वे चित्त में चञ्चलता उत्पन्न करने रूप कार्य को नहीं कर पाते; वरन् सत्त्वगुण को सहायता करके हर विषय में अनासक्ति पैदा कर देते हैं, जिससे न किसी से राग होता है, न द्वेष या क्षोभ। निश्चित विषय (ईश्वर) में चित्त अनुरक्त होने के कारण अन्य विषयों (श्रोत्रादि इन्द्रियों के विषयों) में मन नहीं रमता, जिससे इन्द्रियाँ पराजित हो जाती हैं। इस जितेन्द्रिय स्थिति के प्राप्त हो जाने पर आत्म दर्शन और मोक्ष का पथ प्रशस्त होता है। नारद परिव्राजकोपनिषद् (३.३८) में भी उपर्युक्त मनु कथित