१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ आश्रमोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् बड़ी ही महत्त्वपूर्ण है। यह अथर्ववेद से सम्बद्ध है। इसमें आश्रम व्यवस्था-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास, इन चारों आश्रमों के विभिन्न पक्षों एवं उनके अनुशासनों का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। चार कण्डिकाएँ चारों आश्रमों से सम्बन्धित हैं। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः .............इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिर उपनिषद् ) अथातश्चत्वार आश्रमाः षोडशभेदा भवन्ति । तत्र ब्रह्मचारिणश्चतुर्विधा भवन्ति गायत्रो ब्राह्मणः प्राजापत्यो बृहन्निति । य उपनयनादूर्ध्वं त्रिरात्रमक्षारलवणाशी गायत्रीमन्त्रे स गायत्रः । योऽष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि वेदब्रह्मचर्यं चरेत्प्रतिवेदं द्वादश वा यावद्ग्रहणान्तं वा वेदस्य स ब्राह्मणः । स्वदारनिरत ऋतुकालाभिगामी सदा परदारवर्जी प्राजापत्यः । अथवा चतुर्विंशति- वर्षाणि गुरुकुलवासी ब्राह्मणोऽष्टाचत्वारिंशद्वर्षवासी च प्राजापत्यः । आ प्रायणाद्गुरो- रपरित्यागी नैष्ठिको बृहन्निति ॥ १ ॥ चार आश्रम होते हैं, जिनके सोलह प्रकार होते हैं। ब्रह्मचारी चार प्रकार के होते हैं-गायत्र, ब्राह्मण, प्राजापत्य और बृहन् । जो उपनयन संस्कार के पश्चात् तीन रात्रि तक लवणरहित भोजन ग्रहण कर गायत्री जप करता है, उसे गायत्र कहते हैं। जो अड़तालीस वर्ष ब्रह्मचर्य धारण करते हुए वेदाध्ययन करता है तथा प्रत्येक बारह वर्ष का समय नियोजित करता है अथवा जब तक वेद का सम्यक् ज्ञान न हो जाए, तब तक वह ब्रह्मचर्य धारण करता है अर्थात् ब्रह्म (ज्ञान) प्राप्ति हेतु नियमों का पालन करता है, उसे 'ब्राह्मण' कहते हैं। अपनी स्त्री (धर्म पत्नी) से ऋतुकाल में ही समागम करने वाला तथा पर-स्त्री के प्रति वासनात्मक सम्बन्ध न रखने वाला 'प्राजापत्य' होता है अथवा जो चौबीस वर्ष तक गुरुकुल में वास करे, वह ब्राह्मण और जो अड़तालीस वर्ष तक वास करे, वह प्राजापत्य कहलाता है। जो नैष्ठिक (ब्रह्मचारी) जीवन पर्यन्त गुरु का परित्याग न करे, वह बृहन् कहलाता है ॥ १ ॥ गृहस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वार्त्ताकवृत्तयः शालीनवृत्तयो यायावरा घोरसंन्या - सिकाश्चेति। तत्र वार्त्ताकवृत्तयः कृषिगोरक्षवाणिज्यमगर्हितमुपयुञ्जानाः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते । शालीनवृत्तयो यजन्तो न याजयन्तोऽधीयाना नाध्यापयन्तो ददतो न प्रतिगृह्णन्तः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। यायावरा यजन्तो याजयन्तोऽधीयाना अध्यापयन्तो ददतः प्रतिगृह्णन्तः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। घोरसंन्यासिका उद्धृतपरिपूताभिरद्भिः कार्यं कुर्वन्तः प्रतिदिवसमाहृतोञ्छवृत्ति - मुपयुञ्जानाः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ गृहस्थ भी चार प्रकार के होते हैं-वार्त्ताकवृत्ति, शालीनवृत्ति, यायावर और घोर संन्यासिक । वार्त्ताकवृत्ति गृहस्थ वे हैं; जो कृषि, गोरक्षा (पशुपालन) व व्यापार आदि अनिन्दित कर्म करते हुए सौ वर्ष (पूर्ण आयु)