१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र ३ ४५ तक यज्ञादि करते हुए आत्म-उपासना करते हैं। शालीनवृत्ति गृहस्थ वे होते हैं, जो स्वयं यज्ञ करते हैं; किन्तु अन्यों को कराते नहीं है। स्वयं अध्ययन करते हैं; किन्तु औरों को पढ़ाते नहीं हैं। दान देते तो हैं; किन्तु दूसरों से स्वयं नहीं लेते। इस प्रकार सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञादि करते हुए आत्म-उपासना करते हैं। यायावर गृहस्थ वे होते हैं, जो यज्ञ करते हैं और दूसरों को भी कराते हैं। स्वयं अध्ययन करते हैं तथा दूसरों को भी कराते हैं। दान देते हैं तथा लेते भी हैं। इस प्रकार सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञादि करते हुए आत्म-साधना करते हैं। घोर संन्यासिक गृहस्थ वे हैं, जो पवित्र जल स्वयं लाकर कार्य करते हुए उञ्छवृत्ति (खेत से फसल उठाने के बाद गिरे हुए अन्न को बीन कर जीविका चलाना) अपना कर जीवन निर्वाह करते हुए तपश्चर्या में निरत रहकर सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञादि करते हुए आत्म-साधना करते हैं ॥ २ ॥ वानप्रस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वैखानसा उदुम्बरा बालखिल्याः फेनपाश्चेति। तत्र वैखानसा अकृष्टपच्यौषधिवनस्पतिभिर्ग्रामबहिष्कृताभिरग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञ क्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। उदुम्बराः प्रातरुत्थाय यां दिशमभिप्रेक्षन्ते तदाहृतोदुम्बरबदरनी- वारश्यामाकैरग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। बालखिल्या जटाधराश्चीरचर्मवल्कलपरिवृताः कार्तिक्यां पौर्णमास्यां पुष्पफलमुत्सृजन्तः शेषानष्टौ मासान् वृत्त्युपार्जनं कृत्वाऽग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। फेनपा उन्मत्तकाः शीर्णपर्णफलभोजिनो यत्र यत्र वसन्तोऽग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते ॥ ३॥ वानप्रस्थ भी चार प्रकार के होते हैं, वे हैं- वैखानस, उदुम्बर, बालखिल्य और फेनप। इनमें वैखानस वानप्रस्थी वे हैं, जो स्वतः उत्पन्न तथा पक्व ओषधियों और वनस्पतियों, जो ग्रामीणों द्वारा बहिष्कृत कर दी जाती हैं, से अग्नि परिचरण करके पञ्चमहायज्ञ करते हुए आत्म-साधना करते हैं। उदुम्बर वानप्रस्थी वे हैं, जो प्रातःकाल उठकर जिस किसी दिशा में दृष्टिपात होने पर उधर ही जाकर गूलर, बेर, नीवार तथा साँवाँ से अग्निहोत्र करके पञ्चमहायज्ञ सम्पन्न करते हुए आत्म-साधना करते हैं। बालखिल्य वानप्रस्थी वे हैं-जो जटा धारण करते हैं, चीर, चर्म (मृगचर्मादि) और वृक्षों की छाल रूप वस्त्र धारण करते हैं तथा (चार मास तक पुष्प-फल आदि ग्रहण करके) कार्तिकी पूर्णिमा पर (संचित) पुष्प-फल आदि का परित्याग कर देते हैं और (अगले) शेष आठ मास अपना जीविकोपार्जन (स्वयं उपार्जित) करके, अग्नि परिचरण करके पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान करते हुए आत्म-साधना करते हैं। फेनप वानप्रस्थी वे हैं, जो विक्षिप्त के समान रहते हुए जीर्ण पत्ते तथा फल ग्रहण करते हुए जहाँ कहीं भी स्थान मिले, वहीं निवास करते हुए अग्नि परिचरण करके पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान करते हुए आत्म-साधना करते हैं ॥ ३ ॥ परिव्राजका अपि चतुर्विधा भवन्ति कुटीचरा बहूदका हंसाः परमहंसाश्चेति। तत्र कुटीचराः स्वपुत्रगृहेषु भिक्षाचर्यं चरन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। बहूदकास्त्रिदण्डकमण्डलु- शिक्यपक्षजलपवित्रपात्रपादुकासनशिखायज्ञोपवीतकौपीनकाषायवेषधारिणः साधुवृत्तेषु ब्राह्मणकुलेषु भैक्षाचर्यं चरन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। हंसा एकदण्डधराः शिखावर्जिता यज्ञोपवीतधारिणः शिक्यकमण्डलुहस्ता ग्रामैकरात्रवासिनो नगरे तीर्थेषु पञ्चरात्रं वसन्त एकरात्रद्विरात्रकृच्छ्रचान्द्रायणादि चरन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। परमहंसा नदण्डधरा मुण्डाः