भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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५२ कठरुद्रोपानषद विदित्वा स्वात्मरूपेण न बिभेति कुतश्चन । एवं यस्तु विजानाति स्वगुरोरुपदेशतः ॥ ३९ ॥ स साध्वसाधुकर्मभ्यां सदा न तपति प्रभुः । तप्यतापकरूपेण विभातमखिलं जगत् ॥४० ॥ इसलिए परमात्म तत्त्व को प्राप्त करने में ये समस्त इन्द्रियाँ समर्थ नहीं हैं। जो पुरुष उस द्वन्द्वातीतः, निर्गुण, सत्यस्वरूप और विज्ञानघन ब्रह्मानन्द को 'यह मेरा ही स्वरूप है,' ऐसा जान लेता है, उसे कहीं पर भी भय नहीं व्याप्त होता। इस तरह से जो भी जितेन्द्रिय मनुष्य अपने गुरु के उपदेश द्वारा आत्म साक्षात्कार के माध्यम से ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर लेता है, वह सत्य-असत्य कर्मों के द्वारा कभी भी संतप्त नहीं होता। विषय- भोग तापक हैं और चित्त ताप्य है, चित्त एवं उसके विषयों से यह सम्पूर्ण विश्व विभासित हो रहा है ॥३८-४०॥ [ पदार्थ विज्ञान ने पदार्थ के स्पन्दनों के अनुभव करने वाले माध्यम (सैन्सर्स) खोजे हैं, भाव स्पन्दनों का अनुभव करने वाला माध्यम (सैन्सर) चित्त है। विषय-भोगों द्वारा स्पंदन उत्पन्न करने तथा चित्त द्वारा उनका अनुभव किए जाने की क्षमताओं का संयोग ही भासित होने वाले विश्व का मूल कारण है, अन्यथा कुछ नहीं है। जैसे पदार्थ द्वारा प्रकाश का परावर्तन तथा आँख द्वारा उसका अनुभव करने की क्षमता के संयोग से हर दृश्य-रूप बनता है। ] प्रत्यगात्मतया भाति ज्ञानाद्वेदान्तवाक्यजात् । शुद्धमीश्वरचैतन्यं जीवचैतन्यमेव च ॥ ४१ ॥ प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं च फलं तथा। इति सप्तविधं प्रोक्तं भिद्यते व्यवहारतः ॥ ४२ ॥ मायोपाधिविनिर्मुक्तं शुद्धमित्यभिधीयते । मायासंबन्ध्रेशो जीवोऽविद्यावशस्तथा ॥ ४३ ॥ अन्तःकरणसंबन्धात्प्रमातेत्यभिधीयते । तथा तद्वृत्तिसंबन्धात्प्रमाणमिति कथ्यते ॥ ४४ ॥ अज्ञातमपि चैतन्यं प्रमेयमिति कथ्यते। तथा ज्ञातं च चैतन्यं फलमित्यभिधीयते ॥ ४५ ॥ वेदान्त-शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि वह प्रत्येक आत्मा के रूप में है। सात तरह के जिन तत्त्वों का वर्णन किया गया है, वे ब्रह्म, ईश्वर, जीव, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल हैं, इसमें व्यावहारिक दृष्टि से भेद माना गया है। परब्रह्म परमात्मा तो शुद्ध-चैतन्य स्वरूप है, वह माया के द्वारा निर्मित उपाधियों से सदा-सर्वदा मुक्त रहता है। मायारूप होने से वह ईश्वर है एवं अविद्या (अज्ञान) के वश में होने के कारण वह जीव हो जाता है। उसका अन्तःकरण से सम्बन्ध होने से वही प्रमाता (ज्ञाता) कहा जाता है। उसके चित्त द्वारा अनुभूति के सम्बन्ध से वह प्रमाण संज्ञा को प्राप्त होता है। वह चैतन्य युक्त ब्रह्म जब तक खोजा जाता है, तब तक प्रमेय है और वही जब ज्ञात हो जाता है, तब फल संज्ञक हो जाता है ॥ ४१-४५ ॥ सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं स्वात्मानं भावयेत्सुधीः । एवं यो वेद तत्त्वेन ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ४६ ॥ सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारं वच्मि यथार्थतः । स्वयं मृत्वा स्वयं भूत्वा स्वयमेवावशिष्यते ॥ ४७ ॥ इसलिए बुद्धिमान् पुरुष, अपने आपको 'मैं सब उपाधियों से मुक्त हूँ'- ऐसा मानकर मुक्तावस्था का सतत चिंतन करे। इस प्रकार जो तत्त्वतः जानता है, वह ब्रह्मत्व को प्राप्त करने में सदा ही समर्थ होता है। मैंने वेदान्त के सर्वसिद्धान्तों का सार यथार्थरूप में कहा है। अपने कर्मों से जीव स्वयं ही उत्पन्न होता है, स्वयं ही मृत्यु को प्राप्त होता है और स्वयं ही अवशिष्ट रूप में बचा रहता है। यह सब आत्मा का ही खेल है, आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा तत्त्व नहीं है। यही इस उपनिषद् का रहस्य है ॥ ४६-४७ ॥ ॐ सह नाववतु ......................... इति शान्तिः ॥ ॥ इति कठरुद्रोपनिषत्समाप्ता ॥

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