१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ कुण्डकापानषद् ॥ यह उपनिषद् सामवेद से सम्बद्ध है। इसमें मंत्र क्र० १ से १३ तक सद्गृहस्थ के दायित्व पूरे होने पर संन्यास आश्रम में प्रवेश तथा उसकी जीवनचर्या पर प्रकाश डाला गया है। उसके बाद संन्यासी की अन्तर्मुखी साधनाओं का उल्लेख किया गया है। कहा गया है कि पहले जप-ध्यान के माध्यम से उस ब्राह्मी चेतना की अवतरण-प्रक्रिया का बोध करे और सर्वत्र उसे आत्म-चेतना के रूप में संन्यास अनुभव करे। इसके बाद तन्मात्राओं के संयम के द्वारा अनाहत नाद के माध्यम से जीव चेतना के उन्नयन की साधना सम्पन्न करे-इसी विशिष्ट साधना क्रम का यहाँ स्पष्ट उल्लेख किया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ आप्यायन्तु ......................... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-आरुण्युपनिषद् ) ब्रह्मचर्याश्रमे क्षीणे गुरुशुश्रूषणे रतः। वेदानधीत्यानुज्ञात उच्यते गुरुणाश्रमी ॥ १ ॥ वेदों का अध्ययन करने के पश्चात् ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति पर गुरु की सेवा में लगे हुए जिस पुरुष को गुरु (अपने घर) जाने की आज्ञा प्रदान कर देते हैं, वह व्यक्ति आश्रमी कहा जाता है॥ १॥ दारमाहृत्य सदृशमग्निमाधाय शक्तितः। ब्राह्मीमिष्टिं यजेत्तासामहोरात्रेण निर्वपेत् ॥ २ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अनुकूल स्त्री को स्वीकार करके तथा अपनी शक्ति के अनुसार अग्नि को ग्रहण करके ब्रह्म यज्ञ में संलग्न रहकर अपना जीवन-यापन करे॥ २ ॥ संविभज्य सुतानर्थे ग्राम्यकामान्विसृज्य च। संचरन्वनमार्गेण शुचौ देशे परिभ्रमन् ॥ ३ ॥ तदनन्तर अपने पुत्रों में धन को बाँट करके, ग्राम (गाँव-घर) से सम्बन्धित सभी कार्यों को पुत्रों को सौंप करके, पवित्र देश (क्षेत्र) में भ्रमण करते हुए वन के लिए प्रस्थान करना चाहिए ॥ ३ ॥ वायुभक्षोऽम्बुभक्षो वा विहितैः कन्दमूलकैः। स्वशरीरे समाप्याथ पृथिव्यां नाश्रु पातयेत् ॥४ संन्यासी को वायु अथवा जल सेवन करके अथवा विहित (शास्त्रानुमोदित) कन्द-मूल आदि से सतत अपने शरीर की रक्षा करनी चाहिए। साथ ही (संसार को) शरीर तक सीमित मानकर (मोह-ममतावश) अश्रुपात नहीं करना चाहिए॥ ४॥ सह तेनैव पुरुषः कथं संन्यस्त उच्यते। सनामधेयो यस्मिंस्तु कथं संन्यस्त उच्यते ॥ ५ ॥ परन्तु इतने सामान्य से कर्म के करने मात्र से कोई भी व्यक्ति संन्यासी नहीं कहा जा सकता है। यह तो साधारण नियम का पालन है, संन्यासी के नियम इससे कहीं अधिक श्रेष्ठ कहे गये हैं ॥ ५॥ तस्मात्फलविशुद्धाङ्गी संन्यासं संहितातमनाम्। अग्निवर्णं विनिष्क्रम्य वानप्रस्थं प्रपद्यते ॥६॥ इसके लिए फल की इच्छा न रखते हुए संन्यास धर्म से मुक्ति प्राप्त करके वर्णाश्रम व्यवस्था एवं अग्नि का परित्याग करते हुए वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए ॥ ६ ॥ लोकवद्भार्ययाऽऽसक्तो वनं गच्छति संयतः। संत्यक्त्वा संसृतिसुखमनुतिष्ठति किं मुधा ॥७॥ किंवा दुःखमनुस्मृत्य भोगांस्त्यजति चोच्छ्रितान्। गर्भवासभयाद्भीतः शीतोष्णाभ्यां तथैव च ॥८॥ साधारण लोगों की तरह स्त्री एवं सांसारिक सुखों का परित्याग कर वन में गमन करके अनुष्ठान आदि करने से क्या लाभ है ? अथवा गर्भवास के भय से ठंडी-गर्मी, सुख-दुःख आदि से भयभीत हुआ मनुष्य सांसारिक भोगों का त्याग क्यों करता है ? ॥ ७-८॥