१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ कुण्डिकोपनिषद् गुह्यं प्रवेष्टुमिच्छामि परं पदमनामयमिति। संन्यस्याग्निमपुनरावर्तनं यन्मृत्युर्जय- मावहमिति। अथाध्यात्ममन्त्राञ्जपेत्। दीक्षामुपैयात्काषायवासाः। कक्षोपस्थलोमानि वर्जयेत्। ऊर्ध्वबाहुर्विमुक्तमार्गो भवति। अनिकेतश्चरेद्भिक्षाशी। निदिध्यासनं दध्यात्। पवित्रं धारयेज्जन्तुसंरक्षणार्थम्। तदपि श्लोका भवन्ति। कुण्डिकां चमसं शिक्यं त्रिविष्टपमुपानहौ। शीतोपघातिनीं कन्थां कौपीनाच्छादनं तथा ॥ ९॥ पवित्रं स्नानशाटीं च उत्तरासङ्गमेव च। अतोऽतिरिक्तं यत्किंचित्सर्वं तद्वर्जयेद्यतिः॥ १०॥ इस प्रकार के कृत्य करने का कारण यही है कि वह (संन्यासी) उस गूढ़ परमपद में प्रविष्ट होने की इच्छा रखता है। वह मृत्यु को जीत लेने वाले महाकाल का सतत स्मरण करता रहता है, वह सदा ही आध्यात्मिक मंत्रों का जप करता है तथा काषाय (भगवा) वस्त्रों को धारण करके दीक्षा ग्रहण कर लेता है। कुक्षि (कोख-काँख) और उपस्थ (जननेन्द्रिय) स्थान के बालों को छोड़कर अन्य सभी बालों का क्षौर करा लेता है। वह अपनी दोनों भुजाएँ ऊर्ध्व की ओर करके इच्छानुसार भ्रमण करता है। गृह विहीन वह भिक्षा ग्रहण करके जीवन-यापन करता है। उसे निदिध्यासन करते रहना चाहिए। जन्तुओं से संरक्षण के लिए पवित्री को धारण किये रहना चाहिए। कमण्डलु, चमस, छींका, त्रिविष्टप, जाड़े से रक्षा हेतु गुदड़ी, कौपीन (लँगोटी), स्नान करने के लिए धोती एवं अँगोछा पास में रखना चाहिए। इन वस्तुओं के अतिरिक्त और सभी कुछ संन्यासी को परित्याग कर देना चाहिए॥ ९-१०॥ नदीपुलिनशायी स्याद्देवागारेषु बाह्यतः। नात्यर्थं सुखदुःखाभ्यां शरीरमुपतापयेत् ॥ ११ ॥ (वह यदि) चाहे तो अपनी इच्छानुसार नदी के तट पर शयन करे। बिना कोई विशेष कारण के शरीर को सुख-दुःखादि द्वारा कष्ट नहीं देना चाहिए॥ ११॥ स्नानं पानं तथा शौचमद्भिः पूताभिराचरेत्। स्तूयमानो न तुष्येत निन्दितो न शपेत्परान् ॥ १२ ॥ स्नान के लिए, पीने के लिए तथा शौचादि के लिए शुद्ध जल का सेवन करना चाहिए। वह न तो स्तुति-प्रशंसा आदि से प्रसन्न हो और न ही निन्दा-अपमान होने पर किसी को शाप आदि ही दे॥ १२॥ भिक्षादिवैदलं पात्रं स्नानद्रव्यमवारितम्। एवं वृत्तिमुपासीनो यतेन्द्रियो जपेत्सदा ॥ १३ ॥ भिक्षा के लिए पात्र तथा स्नान आदि के लिए जल जिस किसी भी तरह से मिले, उसे प्राप्त करना चाहिए। इस प्रकार से अनुपम, श्रेष्ठ आचरण को स्वीकार करके यति को सदा ही जप करते रहना चाहिए॥१३॥ विश्वाय मनुसंयोगं मनसा भावयेत्सुधीः। आकाशाद्वायुर्वायोज्योतिर्ज्योतिष आपोऽद्भ्यः पृथिवी। एतेषां भूतानां ब्रह्म प्रपद्ये। अजरममरमक्षरमव्ययं प्रपद्ये। मय्यखण्डसुखाम्बोधौ बहुधा विश्ववीचयः। उत्पद्यन्ते विलीयन्ते मायामारुतविभ्रमात् ॥ १४॥ सुधीजनों को अपने मन में यह भावना करनी चाहिए कि यह विश्वरूप ब्रह्म और मनु अर्थात् प्रणव रूप अक्षर ब्रह्म दोनों एक ही हैं। आकाश से वायु, वायु से ज्योति (अग्नि), ज्योति से जल और जल से पृथ्वी इन सभी भूतों में जो अविनाशी ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, ऐसे उस (ब्रह्म) को मैं प्राप्त हुआ हूँ। अजर, अमर, अक्षर, अव्यय को (मैं) प्राप्त हुआ हूँ। मैं अखण्ड सुख-सागर रूप हूँ। मेरे मध्य में बहुत सी लहरें मायारूपी वायु के द्वारा प्रादुर्भूत एवं विलीन होती हैं॥ १३-१४॥ [यहाँ ब्राह्मी चेतना के सूक्ष्म से स्थूल में क्रमशः अवतरण का ध्यान बतलाया गया है। आगे इसी चेतना के स्थूल से सूक्ष्म में आरोहण की साधना पर भी प्रकाश डाला गया है।]