भारतकोश
संग्रह पर लौटें

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

अध्याय २ मंत्र ८ २०१

अध्याय २ मंत्र ८ २०१ किया। अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और उनकी वृत्तियाँ समाहित हैं। संकल्प, निश्चय, स्मरण, अभिमान तथा अनुसन्धान क्रमशः इनके विषय हैं। गला, मुख, नाभि, हृदय और भौंहों के मध्य का भाग इनके स्थान हैं। महाभूतों के सत्त्व अंश के चतुर्थ भाग से ज्ञानेन्द्रियों का सृजन किया गया। श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और घ्राण ये इनके (ज्ञानेन्द्रियों के) प्रकार हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इनके विषय हैं। दिशाएँ, वायु, अर्क (सूर्य), वरुण, अश्विनीकुमार, अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, मृत्यु के देवता यम, चन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा और शिव ये सभी देवगण इन इन्द्रियों के स्वामी हैं॥ ३॥ अथान्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमयाः पञ्च कोशाः। अन्नरसेनैव भूत्वाऽन्नर- सेनाभिवृद्धिं प्राप्यान्ररसमयपृथिव्यां यद्विलीयते सोऽन्नमयकोशः। तदेव स्थूलशरीरम्। कर्मेन्द्रि- यैः सह प्राणादिपञ्चकं प्राणमयकोशः। ज्ञानेन्द्रियैः सह मनो मनोमयकोशः। ज्ञानेन्द्रियैः सह बुद्धिविर्ज्ञानमयकोशः। एतत्कोशत्रयं लिङ्गशरीरम्। स्वरूपाज्ञानमानन्दमयकोशः। तत् कारणशरीरम् ॥ ४॥ इसके बाद अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय ये पंचकोश हैं। अन्नमय कोश वह है, जो अन्न से उत्पन्न होता है, उसी से प्रवृद्ध होता है और अन्ततः अन्न-रसमय पृथिवी में ही विलीन हो जाता है। यही स्थूल शरीर है। कर्मेन्द्रियों के साथ पंचप्राणों का समुच्चय प्राणमय कोश कहलाता है। ज्ञानेन्द्रियों सहित मन मनोमय कोश कहलाता है। ज्ञानेन्द्रियों के साथ बुद्धि का योग विज्ञानमय कोश कहलाता है। इन (प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय) तीनों कोशों का समुच्चय ही लिङ्ग शरीर है। जिसमें अपने स्वरूप का भान नहीं रहता है, वह आनन्दमय कोश है। इसे ही कारण शरीर कहते हैं॥४॥ अथ ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं कर्मेन्द्रियपञ्चकं प्राणादिपञ्चकं वियदादिपञ्चक मन्तःकरण- चतुष्टयं कामकर्मतमांस्यष्टपुरम् ॥ ५॥ इस प्रकार ज्ञानेन्द्रिय पञ्चक, कर्मेन्द्रिय पञ्चक, प्राणादि पञ्चक, वियदादिपञ्चक (पाँच महाभूत), अन्तःकरण चतुष्टय, काम, कर्म और अविद्या ये पुर्यष्टक (आठ पुरियों का समूह) कहलाता है॥ ५॥ ईशाज्ञया विराजो व्यष्टिदेहं प्रविश्य बुद्धिमधिष्ठाय विश्वत्वमगमत्। विज्ञानात्मा चिदाभासो विश्वो व्यावहारिको जाग्रत्स्थूलदेहाभिमानी कर्मभूरिति च विश्वस्य नाम भवति ॥ ६ ॥ ईश्वर की आज्ञा से विराट् ने व्यष्टि में प्रविष्ट होकर तथा बुद्धि में प्रतिष्ठित होकर विश्वत्व को प्राप्त किया अर्थात् विश्व की संज्ञा प्राप्त की। विज्ञानात्मा, चिदाभास, विश्व, व्यावहारिक, जाग्रत्, स्थूल देहाभिमानी और कर्मभू ये विश्व के विभिन्न नाम हैं॥ ६॥ ईशाज्ञया सूत्रात्मा व्यष्टिसूक्ष्मशरीरं प्रविश्य मन अधिष्ठाय तैजसत्वमगमत्। तैजसः प्रातिभासिकः स्वप्नकल्पित इति तैजसस्य नाम भवति ॥ ७॥ ईश्वर के आदेश से सूत्रात्मा, व्यष्टि के सूक्ष्म शरीर में प्रविष्ट होकर मन में अधिष्ठित होकर तैजसत्व को प्राप्त हुआ। तैजस, प्रातिभासिक और स्वकल्पित ये तैजस के नाम हैं॥७॥ ईशाज्ञया मायोपाधिरव्यक्तसमन्वितो व्यष्टिकारणशरीरं प्रविश्य प्राज्ञत्वमगमत्। प्राज्ञोऽविच्छिन्नः पारमार्थिकः सुषुप्त्यभिमानीति प्राज्ञस्य नाम भवति ॥ ८ ॥ ईश्वर की आज्ञा से माया की उपाधि से युक्त अव्यक्त, व्यष्टि के कारण शरीर में प्रविष्ट होकर प्राज्ञत्व को प्राप्त हुआ। प्राज्ञ, अविच्छिन्न, पारमार्थिक और सुषुप्ति-अभिमानी ये प्राज्ञ के नाम हैं॥८॥

२०२ पैङ्गलोपनिषद अव्यक्तलेशाज्ञानाच्छादितपारमार्थिकजीवस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यानि ब्रह्मणैकतां जगुर्नेतरयोर्व्यावहारिकप्रातिभासिकयोः ॥ ९ ॥ पारमार्थिक जीव के ऊपर अव्यक्त का अंश रूप अज्ञान आच्छादित है। वह भी ब्रह्म का ही अंश है। 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों से ब्रह्म की एकता प्रकट होती है, परन्तु व्यावहारिक और प्रातिभासिक अंश ब्रह्म से इस प्रकार की एकता नहीं रखते ॥ ९ ॥ अन्तःकरणप्रतिबिम्बितचैतन्यं यत्तदेवावस्थात्रयभागभवति। स जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्य- वस्थाः प्राप्य घटीयन्त्रवदुद्विग्नो जातो मृत इव स्थितो भवति ॥ १० ॥ अन्तःकरण में जो चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है, वही अवस्थात्रय (जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति) का भागी होता है। चैतन्य तत्त्व ही उपर्युक्त तीनों अवस्थाओं को प्राप्त होकर घटीयन्त्र के समान उद्विग्न (चंचल) होता है, जो निरन्तर जन्म-मरण को प्राप्त होता रहता है ॥ १० ॥ अथ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिमूर्च्छामरणाद्यवस्थाः पञ्च भवन्ति। तत्तद्देवताग्रहान्वितैः श्रोत्रादि- ज्ञानेन्द्रियैः शब्दाद्यर्थविषयग्रहणज्ञानं जाग्रदवस्था भवति। तत्र भ्रूमध्यं गतो जीव आपादमस्तकं व्याप्य कृषिश्रवणाद्यखिलक्रियाकर्ता भवति। तत्तत्फलभुक् च भवति। लोकान्तरगतः कर्मा- र्जितफलं स एव भुङ्क्ते। स सार्वभौमवद्व्यवहाराच्छ्रान्त अन्तर्भवनं प्रवेष्टुं मार्गमाश्रित्य तिष्ठति ॥ इस प्रकार जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा और मरण ये पाँच अवस्थाएँ होती हैं। जाग्रत् अवस्था उसे कहते हैं, जिसमें श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने देवता के अनुग्रह (शक्ति) से युक्त होकर शब्दादि विषयों को ग्रहण करती हैं। इस अवस्था में जीव भ्रूमध्य में निवास करते हुए पैरों से लेकर मस्तक पर्यन्त व्याप्त रहता है और कृषि से श्रवण तक (अर्थात् अपनी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के) समस्त कार्यों को सम्पादित करता हुआ उनके फल भी प्राप्त करता है। वह अपने इन अर्जित कर्मों का फल लोकान्तर (परलोक) में भी भोगता है। वह सार्वभौम के समान लौकिक कार्यों से थककर विश्रान्ति पाने हेतु अन्दर के विश्राम स्थल में जाने की इच्छा से मार्ग में ही आश्रय लेकर ठहरता है ॥ ११ ॥ करणोपरमे जाग्रत्संस्कारार्धप्रबोधवद्ग्राह्यग्राहकरूपस्फुरणं स्वप्नावस्था भवति। तत्र विश्व एव जाग्रद्व्यवहारलोपान्नाडीमध्यं चरंस्तैजसत्वमवाप्य वासनारूपकं जगद्वैचित्र्यं स्वभासा भासयन्यथेप्सितं स्वयं भुङ्क्ते ॥ १२ ॥ इन्द्रियों के अपने कार्यों से उपराम हो जाने पर, जाग्रत् अवस्था के संस्कारों से ग्राह्य-ग्राहक रूप जो अर्ध प्रबोधवत् स्फुरणा होती है, उसे स्वप्नावस्था कहते हैं। उस अवस्था में विश्व (स्थूल शरीर भी व्यष्टि- चेतना शक्ति) जाग्रत् अवस्था के व्यवहार के लोप हो जाने से नाड़ी के बीच में संचरित होता हुआ तैजसत्व को प्राप्त करता है। तत्पश्चात् अपनी वासना के अनुरूप अपने ही भासा (तेज) के द्वारा एक विचित्र जगत् की सृष्टि करता है और स्वयं ही अपनी इच्छानुसार उसका भोग करता है ॥ १२ ॥ चित्तैककरणा सुषुप्त्यवस्था भवति। भ्रमविश्रान्तशकुनिः पक्षौ संहृत्य नीडाभिमुखं यथा गच्छति तथा जीवोऽपि जाग्रत्स्वप्नप्रपञ्चे व्यवहृत्य श्रान्तोऽज्ञानं प्रविश्य स्वानन्दं भुङ्क्ते ॥ चित्त की एकीकरण (एकाग्रता से युक्त) अवस्था ही सुषुप्ति अवस्था होती है। जिस प्रकार भ्रमण से थककर पक्षी पंखों को समेट कर अपने नीड (घोंसले) की ओर गमन करता है, उसी प्रकार जीव भी जाग्रत् और स्वप्नावस्था के प्रपञ्चों से थक जाने पर अज्ञान में प्रविष्ट होकर आनन्द भोगता है ॥ १३ ॥

अध्याय २ मंत्र १८ २०३ अकस्मान्मुद्गरदण्डाद्यैस्ताडितवद्भयाज्ञानाभ्यामिन्द्रियसंघातैः कम्पन्निव मृततुल्या मूर्च्छा भवति ॥ १४॥ अकस्मात् मुद्गर और दण्ड आदि के द्वारा ताड़ित किये जाने पर जिस प्रकार व्यक्ति कम्पित होता है, उसी प्रकार मूर्च्छा की स्थिति में भी भय और अज्ञान के कारण समस्त इन्द्रियाँ कम्पित होती हैं। यह अवस्था (मूर्च्छा) मृत तुल्य होती है ॥ १४॥ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिमूर्च्छावस्थानामन्याब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं सर्वजीवभयप्रदा स्थूलदेहविस- र्जनी मरणावस्था भवति ॥ १५ ॥ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और मूर्च्छा अवस्थाओं से भिन्न एक अवस्था है, जो ब्रह्म (अत्यधिक महान्) से लेकर तिनका (अत्यधिक तुच्छ) पर्यन्त सभी जीवों के लिए भयप्रदा है, जिसके प्राप्त होने पर स्थूल शरीर का परित्याग करना पड़ता है, वह मरणावस्था होती है ॥ १५ ॥ कर्मेन्द्रियाणि ज्ञानेन्द्रियाणि तत्तद्विषयान्प्राणान्संहृत्य कामकर्मान्वित अविद्याभूतवे- ष्टितो जीवो देहान्तरं प्राप्य लोकान्तरं गच्छति। प्राक्कर्मफलपाकेनावर्त्तन्तरकीटवद्विश्रान्तिं नैव गच्छति ॥ १६ ॥ उस समय (मृत्यु हो जाने पर) कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों, उनके विषय (तन्मात्राओं), प्राणों को एकत्र करके काम और कर्म से समन्वित हुआ जीव अविद्या से आवेष्टित होकर अन्य शरीर को प्राप्त करके दूसरे लोक (परलोक) में गमन करता है। पूर्वकृत कर्मों के फलभोग में फँसे रहने के कारण वह (जीव), उसी प्रकार शान्ति प्राप्त नहीं कर पाता, जिस प्रकार भँवर में फँसा हुआ कीट ॥ १६ ॥ सत्कर्मपरिपाकतो बहूनां जन्मनामन्ते नृणां मोक्षेच्छा जायते । तदा सद्गुरुमाश्रित्य चिर- कालसेवया बन्धं मोक्षं कश्चित्प्रयाति ॥ १७॥ सत्कर्मों के परिपक्व हो जाने पर जब अनेक जन्मों के पश्चात् मनुष्य की मोक्ष प्राप्त करने की (बलवती) इच्छा उत्पन्न होती है, तब वह किसी सद्गुरु का अवलम्बन लेकर, लम्बे समय तक उनकी सेवा करके (ज्ञान प्राप्ति के पश्चात्) बन्धन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ १७॥ अविचारकृतो बन्धो विचारान्मोक्षो भवति । तस्मात्सदा विचारयेत्। अध्यारोपाप वादतः स्वरूपं निश्चयीकर्तुं शक्यते। तस्मात्सदा विचारयेज्जगज्जीवपरमात्मनो जीवभावजगद्भावबाधे प्रत्यगभिन्नं ब्रह्मैवावशिष्यत इति ॥ १८ ॥ अविचार करने से बन्धन और विचार (सद्विचार) करने से मोक्ष होता है। इसलिए सदैव विचार (सद्विचार) करना चाहिए। अध्यारोप और अपवाद से स्वरूप का निश्चय किया जा सकता है। इसलिए सदा जगत्, जीव और परमात्मा के विषय में ही विचार (चिन्तन) करना चाहिए। जीव भाव और जगद्भाव का निराकरण करने से अपने प्रत्यगात्मा (जीव) से अभिन्न केवल ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है ॥ १८ ॥

२०४ पगलापानषद ॥ तृतीयोऽध्यायः ॥ अथ हैन पैङ्गलः पप्रच्छ याज्ञवल्क्यं महावाक्यविवरणमनुब्रूहीति ॥ १ ॥ इसके पश्चात् पैङ्गल ऋषि ने याज्ञवल्क्य से कहा- 'मुझे महावाक्यों का विवरण समझाइये' ॥ १ ॥ स होवाच याज्ञवल्क्यस्तत्त्वमसि त्वं तदसि त्वं ब्रह्मास्यहं ब्रह्मास्मीत्यनुसंधानं कुर्यात् ॥२ याज्ञवल्क्य बोले-'वह तुम हो' (तत्त्वमसि), 'तुम वह हो' (त्वं तदसि), 'तुम ब्रह्म हो' (त्वं ब्रह्मासि), 'मैं ब्रह्म हूँ' (अहं ब्रह्मास्मि), ये महावाक्य हैं, जिन पर अनुसन्धान (विचार) करना चाहिए ॥ २ ॥ तत्र पारोक्ष्यशबलः सर्वज्ञत्वादिलक्षणो मायोपाधिः सच्चिदानन्दलक्षणो जगद्योनिस्तत्प- दवाच्यो भवति। स एवान्तःकरणसंभिन्नबोधोऽस्मत्प्रत्ययावलम्बनस्त्वंपदवाच्यो भवति। परजीवोपाधिमायाविद्ये विहाय तत्त्वंपदलक्ष्यं प्रत्यगभिन्नं ब्रह्म॥ ३ ॥ 'तत्त्वमसि' में 'तत्' पद सर्वज्ञत्व आदि लक्षण से युक्त, माया की उपाधि से युक्त, सच्चिदानन्द रूप, जगत् योनि (मूलकारण) रूप अव्यक्त ईश्वर का बोधक है। वही ईश्वर अन्तःकरण की उपाधि के कारण भिन्नता का बोध होने से 'त्वं' पद का आलम्बन लेकर प्रकट किया जाता है। ईश्वर की उपाधि माया और जीव की उपाधि अविद्या है, इनका परित्याग कर देने से 'तत्' और 'त्वं' पदों का लक्ष्य (आशय) उस ब्रह्म से है, जो प्रत्यगात्मा से अभिन्न है ॥ ३ ॥ तत्त्वमसीत्यहं ब्रह्मास्मीति वाक्यार्थविचारः श्रवणं भवति। एकान्तेन श्रवणार्थानुसंधानं मननं भवति। श्रवणमनननिर्विकिकित्स्येऽर्थे वस्तुन्येकतानवत्तया चेतःस्थापनं निदिध्यासनं भवति। ध्यातृध्याने विहाय निवातस्थितदीपकवद्धयेयैकगोचरं चित्तं समाधिर्भवति ॥ ४ ॥ 'तत्त्वमसि' और 'अहं ब्रह्मास्मि' इन महावाक्यों के अर्थ पर विचार करना श्रवण कहलाता है। श्रवण किए हुए विषय के अर्थों का एकान्त में अनुसन्धान करना मनन कहलाता है। श्रवण और मनन द्वारा निर्णीत अर्थ रूप वस्तु में एकाग्रतापूर्वक चित्त का स्थापन निदिध्यासन कहलाता है। जब ध्याता और ध्यान के भाव को छोड़कर चित्तवृत्ति वायु रहित स्थान में रखे दीपक की ज्योति के सदृश केवल ध्येय में स्थिर हो जाती है, तब उस अवस्था को समाधि कहते हैं ॥ ४ ॥ तदानीमात्मगोचरा वृत्तयः समुत्थिता अज्ञाता भवन्ति । ताः स्मरणादनुमीयन्ते । इहाना- दिसंसारे संचिताः कर्मकोटयोऽनेनैव विलयं यान्ति । ततोऽभ्यासपाटवात्सहस्रशः सदाऽमृ- तधारा वर्षन्ति। ततो योगवित्तमाः समाधिं धर्ममेघं प्राहुः। वासनाजाले निःशेषममुना प्रविलापिते कर्मसंचये पुण्यपापे समूलोन्मूलिते प्राक्परोक्षमपि करतलामलकवद्वाक्यमप्रतिबद्धापरोक्ष- साक्षात्कारां प्रसूयते। तदा जीवन्मुक्तो भवति ॥ ५ ॥ उसमें ( उस अवस्था में ) आत्मगोचर वृत्तियाँ उत्पन्न होकर अज्ञात हो जाती हैं, जो स्मरण के द्वारा अनुमानित होती हैं ( अर्थात् जिनका स्मरण के द्वारा अनुमान लगाया जाता है)। संसार में अनादिकाल से संचित करोड़ों कर्म इस अवस्था में ही विनष्ट हो जाते हैं। इसके पश्चात् अभ्यास पटुता (परिपक्वता) प्राप्त हो जाने पर सतत सहस्रों अमृत धाराओं की वर्षा होती रहती है। इसीलिए योगज्ञाता समाधि को धर्ममेघ कहते हैं। इसके माध्यम से सम्पूर्ण वासनाजाल निःशेष (समाप्त) हो जाता है तथा पाप और पुण्य दोनों प्रकार के संचित कर्म समूल विनष्ट हो जाते हैं। यह स्थिति प्राप्त होने पर, प्राक् (पहले) जो, 'तत्त्वमसि' महावाक्य का आशय

अध्याय ३ मंत्र ११ २०५

अध्याय ३ मंत्र ११ २०५ परोक्ष रूप से विदित होता था, वही अब हस्तामलकवत् अवरोध रहित स्पष्ट विदित होने लगता है और ब्रह्म का साक्षात्कार प्राप्त हो जाता है, तब योगी जीवन्मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥ ईशः पञ्चीकृतभूतानामपञ्चीकरणं कर्तुं सोऽकामयत। ब्रह्माण्डतद्गतलोकान्कार्य- रूपांश्च कारणत्वं प्रापयित्वा ततःसूक्ष्माङ्गं कर्मेन्द्रियाणि प्राणांश्च ज्ञानेन्द्रियाण्यन्तःकरण- चतुष्टयं चैकीकृत्य सर्वाणि भौतिकानि कारणे भूतपञ्चके संयोज्य भूमिं जले जलं वह्नौ वह्निं वायौ वायुमाकाशे चाकाशमहंकारे चाहंकारं महति महदव्यक्तेऽव्यक्तं पुरुषे क्रमेण विलीयते। विराड्ढिरण्मगर्भेश्वरा उपाधिविलयात्परमात्मनि लीयन्ते ॥ ६ ॥ ईश्वर ने पञ्चीकृत भूतों का पुनः अपञ्चीकरण करने की कामना की। अतः उसने ब्रह्माण्ड और उसके अन्तर्गत लोकों को कार्य रूप से पुनः कारण रूप प्राप्त करा दिया। इसके बाद उसने सूक्ष्म अङ्ग, कर्मेन्द्रियों, प्राणों, ज्ञानेन्द्रियों और अन्तःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को एकीकृत करके समस्त भौतिक पदार्थों को उनके कारणभूत पंचक में संयोजित करके भूमि को जल में, जल को अग्नि में, अग्नि को वायु में, वायु को आकाश में, आकाश को अहंकार में, अहंकार को महत् (विराट्) में, विराट् को अव्यक्त में और अव्यक्त को पुरुष में क्रमशः विलीन कर दिया। इस प्रकार विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर भी उपाधियों के विलीन हो जाने पर परमात्मा में ही विलीन हो जाते हैं ॥ ६ ॥ पञ्चीकृतमहाभूतसंभवकर्मसंचितस्थूलदेहः कर्मक्षयात्सत्कर्मपरिपाकातोऽपञ्चीकरणं प्राप्य सूक्ष्मेणैकीभूत्वा कारणरूपत्वमासाद्य तत्कारणं कूटस्थे प्रत्यगात्मनि विलीयते। विश्वतैजसप्राज्ञाः स्वस्वोपाधिलयात्प्रत्यगात्मनि लीयन्ते ॥ ७॥ पञ्चीकृत महाभूतों द्वारा निर्मित और संचित कर्मों से प्राप्त स्थूल देह, कर्मों के क्षय हो जाने तथा सत्कर्मों के परिपाक होने से अपञ्चीकृत हो जाती है। वह देह, सूक्ष्मरूप से एकीभूत होकर, कारण रूप को प्राप्त होकर अन्त में उस कारण के भी कारण कूटस्थ प्रत्यगात्मा में विलीन हो जाती है। फिर विश्व, तैजस और प्राज्ञ की भी अपनी-अपनी उपाधियों के लय हो जाने से ये सभी प्रत्यगात्मा में विलीन हो जाते हैं ॥ ७ ॥ अण्डं ज्ञानाग्निना दग्धं कारणैःसह परमात्मनि लीनं भवति। ततो ब्राह्मणः समाहितो भूत्वा तत्त्वंपदैक्यमेव सदा कुर्यात्। ततो मेघापायेंऽशुमानिवात्माऽऽविर्भवति ॥ ८ ॥ अण्ड (ब्रह्माण्ड) अपनी कारण सत्ता के साथ ज्ञानाग्नि में भस्म होकर परमात्मा में विलीन हो जाता है। इस प्रकार ब्राह्मण (ब्रह्म में रत) पुरुष को समाहित चित्त (ब्रह्म में चित्त को समाहित करके) होकर सदैव 'तत्' और 'त्वं' पदों के साथ ऐक्य करते रहना चाहिए। इस प्रक्रिया से उसी प्रकार आत्म साक्षात्कार होने लगता है, जिस प्रकार मेघों के छंट जाने से अंशुमान् (सूर्य) का प्रकाश प्रकट हो जाता है ॥ ८ ॥ ध्यात्वा मध्यस्थमात्मानं कलशान्तरदीपवत्। अङ्गुष्ठमात्रमात्मानमधूमज्योति रूपकम् ॥९॥ प्रकाशयन्तमन्तःस्थं ध्यायेत्कूटस्थमव्ययम्। ध्यायन्नास्ते मुनिश्चैव चासुप्तेरामृतेस्तु यः ॥१०॥ जीवन्मुक्तः स विज्ञेयः स धन्यः कृतकृत्यवान्। जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते। विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥ ११॥ कलश के अन्दर स्थित दीपक के सदृश, शरीर में स्थित (हृदय कमल के मध्यस्थित) धूम रहित ज्योति स्वरूप अङ्गुष्ठ परिमाण आत्मा का ध्यान करके जो मुनि अन्तःप्रान्त में स्थित प्रकाशयुक्त कूटस्थ, अव्यय आत्मा का ध्यान नित्य सोते समय तथा मृत्यु के समय भी करता है, वह जीवन्मुक्त है, धन्य है,

२०६ पैगलापनिषद् कृतकृत्य है, ऐसा मानना चाहिए। जीवन्मुक्तत्व (जीवन्मुक्त स्थिति) को छोड़कर वह इस शरीर का परित्याग करके अदेह और मुक्ति को उसी प्रकार प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार पवन स्पन्दन रहित हो जाता है अर्थात् पवन का प्रवाह बन्द हो जाता है ॥ ९-११ ॥ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं तदेव शिष्यत्यमलं निरामयम् ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् वह अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अरस और अगन्धवत् होकर अव्यय, अनादि, अनन्त, महत् से भी परे, ध्रुव, निर्मल तथा निरामय ब्रह्म ही शेष बचता है ॥ १२ ॥ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥ अथ हैन पैङ्गलः पप्रच्छ याज्ञवल्क्यं ज्ञानिनः किं कर्म का च स्थितिरिति ॥ १ ॥ इसके बाद पैङ्गल ऋषि ने याज्ञवल्क्य ऋषि से पुनः प्रश्न किया कि ज्ञानियों के कर्म कौन से हैं और उनकी स्थिति कैसी होती है? ॥ १ ॥ स होवाच याज्ञवल्क्यः। अमानित्वादिसंपन्नो मुमुक्षुरेकविंशतिकुलं तारयति। ब्रह्मविन्मा- त्रेण कुलमेकोत्तरशतं तारयति ॥ २ ॥ याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि जो मुमुक्षु अमानित्व आदि गुणों से सम्पन्न होता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियों को तार देता है और ब्रह्मविद् हो जाने मात्र से वह अपने कुल की एक सौ एक पीढ़ियाँ तार देता है ॥२॥ आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ अपनी आत्मा को रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथि तथा मन को ही लगाम जानना चाहिए ॥ ३ ॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। जङ्गमानि विमानानि हृदयानि मनीषिणः ॥ ४ ॥ इन्द्रियों को अश्व कहा गया है, जो अपने विषय रूपी मार्ग पर गमन करते हैं, परन्तु मनीषियों का हृदय विमान के समान इन सबसे ऊपर उठा हुआ होता है ॥ ४ ॥ आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्महर्षयः। ततो नारायणः साक्षाद्धृदये सुप्रतिष्ठितः ॥ ५ ॥ महान् ऋषियों का कथन है कि यह आत्मा, इन्द्रिय और मन से युक्त होकर भोक्ता बनता है, इसके बाद हृदय में साक्षात् नारायण प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ५ ॥ प्रारब्धकर्मपर्यन्तमहिनिर्मोकवद्व्यवहरति। चन्द्रवच्चरते देही स मुक्तश्चानिकेतनः ॥ ६ ॥ प्रारब्ध कर्मों के क्षय होने तक जीव, सर्प के केंचुल बदलते रहने की तरह अन्य शरीर धारण करता रहता है; किन्तु अनिकेतन (एक ग्राम में एक रात्रि ही निवास करने वाला परिव्राजक) और मुक्त पुरुष आकाश में चन्द्रमा के समान सर्वत्र सञ्चरित होता रहता है ॥ ६ ॥ तीर्थे श्वपचगृहे वा तनुं विहाय याति कैवल्यम्। प्राणानवकीर्य याति कैवल्यम् ॥ ७ ॥ ज्ञानी पुरुष तीर्थ में शरीर त्याग करे अथवा चाण्डाल के घर में, प्राणों को छोड़कर वह सदा कैवल्य को ही प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ तं पश्चाद्दिग्बलिं कुर्यादथवा खननं चरेत्। पुंसः प्रव्रजनं प्रोक्तं नेतराय कदाचन ॥ ८ ॥ शरीर त्याग के पश्चात् उसके शरीर की चाहे दिशाओं को बलि दे दी जाए अर्थात् खुले में डाल दिया

अध्याय ४ मंत्र १६ २०७

अध्याय ४ मंत्र १६ २०७

जाए अथवा खोदकर जमीन में गाड़ दिया जाए (वह कैवल्य को ही प्राप्त करता है)। यह विधि परिव्राजक (संन्यासी) के लिए है, इतर (अन्य) किसी के लिए कभी नहीं ॥ ८ ॥ नाशौचं नाग्निकार्यं च न पिण्डं नोदकक्रिया। न कुर्यात्पार्वणादीनि ब्रह्मभूताय भिक्षवे ॥ ९ ॥ जो संन्यासी ब्रह्मलीन हो गया है, उसके निमित्त अशौच (सूतक) नहीं रहता। उसकी आत्म शान्ति के लिए न अग्नि कार्य, न पिण्ड, न तर्पण और न ही पर्व पर किये जाने वाले श्राद्ध (पार्वण) आदि की ही आवश्यकता है ॥ ९ ॥ दग्धस्य दहनं नास्ति पक्वस्य पचनं यथा। ज्ञानाग्निदग्धदेहस्य न च श्राद्धं न च क्रिया ॥ १० ॥ जिस प्रकार जले हुए को जलाया नहीं जाता और पके हुए को पुनः पकाया नहीं जाता, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि से दग्ध (संन्यासी) के लिए न कोई श्राद्ध आवश्यक है और न ही कोई क्रिया-कर्म ॥ १० ॥ यावच्चोपाधिपर्यन्तं तावच्छुश्रूषयेद्गुरुम्। गुरुवद्गुरुभार्यायां तत्पुत्रेषु च वर्तनम् ॥ ११ ॥ जब तक सांसारिक उपाधियाँ हैं, तब तक गुरु की शुश्रूषा (सेवा) करनी चाहिए। गुरु के समान ही गुरु पत्नी और गुरु सन्तानों के प्रति भी सम्मान पूर्ण व्यवहार करना चाहिए ॥ ११ ॥ शुद्धमानसः शुद्धचिद्रूपः सहिष्णुः सोऽहमस्मि सहिष्णुः सोऽहमस्मीति प्राप्ते ज्ञानेन विज्ञाने ज्ञेये परमात्मनि हृदि संस्थिते देहे लब्धशान्तिपदं गते तदा प्रभामनोबुद्धिशून्यं भवति ॥ १२ ॥ मैं शुद्ध मानस, शुद्ध चैतन्य रूप, सहिष्णु, वह सहिष्णु मैं ही हूँ, इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त हो जाने से, ज्ञान के अनुभव से और ज्ञेय परमात्मा के हृदय में भली प्रकार प्रतिष्ठित हो जाने से जब देह को शान्ति पद की प्राप्ति हो जाए, तब साधक मन-बुद्धि शून्य होकर चैतन्य रूप हो जाता है ॥ १२ ॥ अमृतेन तृप्तस्य पयसा किं प्रयोजनम्। एवं स्वात्मानं ज्ञात्वा वेदैः प्रयोजनं किं भवति। ज्ञानामृततृप्तयोगिनो न किंचित्कर्तव्यमस्ति। तदस्ति चेन्न स तत्त्वविद्भवति। दूरस्थोऽपि न दूरस्थः पिण्डवर्जितः पिण्डस्थोऽपि प्रत्यगात्मा सर्वव्यापी भवति ॥ १३ ॥ अमृत का पान कर लेने पर दूध से क्या प्रयोजन ? इसी प्रकार अपने आपका ज्ञान (आत्मज्ञान) प्राप्त कर लेने पर वेदों से क्या प्रयोजन (सिद्ध) होता है ? ज्ञानामृत से तृप्त योगी के लिए कोई कर्त्तव्य शेष नहीं रहता। यदि कोई कर्त्तव्य शेष रहता है, तो इसका अभिप्राय है कि वह तत्त्वविद् नहीं है। वह दूर स्थित होने पर भी दूर नहीं और पिण्ड में स्थित होने पर भी पिण्ड से पृथक् प्रत्यगात्मा है, जो सर्वव्यापी होता है ॥१३॥ हृदयं निर्मलं कृत्वा चिन्तयित्वाप्यनामयम्। अहमेव परं सर्वमिति पश्येत्परं सुखम् ॥ १४ ॥ हृदय को निर्मल करके और अपने को 'मैं अनामय ब्रह्म हूँ', ऐसा चिन्तन करके मैं ही सब कुछ हूँ, ऐसा सोचने व देखने से परम सुख प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ यथा जले जलं क्षिप्तं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम्। अविशेषो भवेत्तद्वज्जीवात्मपरमात्मनोः ॥ १५ ॥ जिस प्रकार जल में जल, दुग्ध में दुग्ध और घृत में घृत डाल देने से, वे एकरूप हो जाते हैं, उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा दोनों मिलकर अविशेष अर्थात् अभिन्न (एक) हो जाते हैं ॥ १५ ॥ देहे ज्ञानेन दीपिते बुद्धिरखण्डाकाररूपा यदा भवति तदा विद्वान्ब्रह्मज्ञानाग्निना कर्मबन्धं निर्दहेत् ॥ १६ ॥ जब ज्ञान के द्वारा देह में स्थित अभिमान विनष्ट हो जाता है तथा बुद्धि अखण्डाकार हो जाती है, तब विद्वान् पुरुष ब्रह्मज्ञान रूपी अग्नि से कर्म बन्धनों को भस्म कर देता है ॥ १६ ॥

२०८ पैंगलोपनिषद् ततः पवित्रं परमेश्वराख्यमद्वैतरूपं विमलाम्बराभम्। यथोदके तोयमनुप्रविष्टं तथात्मरूपो निरुपाधिसंस्थितः ॥ १७॥ इसके पश्चात् वह विमल वस्त्र के समान पवित्र और अद्वैतरूप परमेश्वर को प्राप्त करके उसी प्रकार अपने आत्म रूप (सत्य स्वरूप) में प्रतिष्ठित हो जाता है, जिस प्रकार जल दूसरे जल में प्रविष्ट होकर (मिलकर) एकरूप हो जाता है ॥ १७॥ आकाशवत्सूक्ष्मशरीर आत्मा न दृश्यते वायुवदन्तरात्मा। स बाह्यमभ्यन्तरनिश्चलात्मा ज्ञानोल्कया पश्यति चान्तरात्मा ॥ १८॥ आत्मा आकाश के सदृश सूक्ष्म और वायु के सदृश दिखाई न पड़ने वाली है। वह बाह्य और अन्दर से भी निश्चल है, जिसे मात्र ज्ञान रूपी उल्का (विद्युत् या मशाल) से ही देखा जा सकता है॥ १८ ॥ यत्र यत्र मृतो ज्ञानी येन वा केन मृत्युना । यथा सर्वगतं व्योम तत्र तत्र लयं गतः ॥ १९ ॥ ज्ञानी कहीं भी और कैसे भी मृत्यु को प्राप्त करे, वह हर स्थिति में ब्रह्म में ही लय हो जाता है, क्योंकि आकाश के समान ही ब्रह्म भी सर्वव्यापी है ॥ १९ ॥ घटाकाशमिवात्मानं विलयं वेत्ति तत्त्वतः । स गच्छति निरालम्बं ज्ञानालोकं समन्ततः ॥ २० जिस प्रकार घटाकाश आकाश में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार जो योगी अपने को तत्त्वतः जान लेता है, वह सभी ओर से निरालम्ब और ज्ञानालोक स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥ तपेद्वर्षसहस्त्राणि एकपादस्थितो नरः । एतस्य ध्यानयोगस्य कलां नार्हति षोडशीम् ॥ २१ ॥ यदि कोई एक पैर पर खड़े होकर एक सहस्र वर्ष तक तप करे, तो भी वह ध्यान योग की षोडश कलाओं में से एक के बराबर भी नहीं हो सकता ॥ २१ ॥ इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयं तत्सर्वं ज्ञातुमिच्छति । अपि वर्षसहस्रायुः शास्त्रान्तं नाधिगच्छति ॥ २२ ॥ ज्ञान और ज्ञेय को यदि कोई सम्पूर्णरूप से जानना चाहे, तो सहस्र वर्ष की आयु पर्यन्त शास्त्राध्ययन करने पर भी उसका पार नहीं पा सकता ॥ २२ ॥ विज्ञेयोऽक्षरन्मात्रो जीवितं वापि चञ्चलम् । विहाय शास्त्रजालानि यत्सत्यं तदुपास्यताम् ॥ २३ मनुष्य को जानना चाहिए कि मात्र अक्षर ब्रह्म ही सत्य है। मनुष्य का जीवन चञ्चल है; इसलिए शास्त्र-जाल को छोड़कर जो सत्य है, उसी की उपासना करे ॥ २३ ॥ अनन्तकर्म शौचं च जपो यज्ञस्तथैव च । तीर्थयात्राभिगमनं यावत्तत्त्वं न विन्दति ॥ २४॥ विभिन्न कर्म-शौच, जप, यज्ञ, तीर्थयात्रा आदि की सार्थकता तभी तक है, जब तक तत्त्व की प्राप्ति न हो ॥ अहं ब्रह्मेति नियतं मोक्षहेतुर्महात्मनाम् । द्वे पदे बन्धमोक्षाय न ममेति ममेति च ॥ २५ ॥ 'मैं ब्रह्म हूँ' यही भाव महात्मा पुरुषों के मोक्ष का आधार होता है। बन्धन और मोक्ष के कारण रूप ये ही दो पद हैं, 'यह मेरा है' (बन्धन), 'यह मेरा नहीं है' (मोक्ष) ॥ २५ ॥ ममेति बध्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्यते । मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥ २६ ॥ मेरा है, यह भाव बन्धन में डालता है और मेरा नहीं है, यह भाव मोक्ष प्रदान करता है। जब मन उन्मनी अवस्था (भाव) को प्राप्त हो जाता है, तब द्वैत भाव समाप्त हो जाता है ॥ २६ ॥ यदा यात्युन्मनीभावस्तदा तत्परमं पदम् । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परं पदम् ॥ २७ ॥

अध्याय ४ मंत्र ३१ २०९

अध्याय ४ मंत्र ३१ २०९ जब उन्मनी भाव प्राप्त हो जाता है, तभी परम पद प्राप्त होता है। उस अवस्था में जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहीं-वहीं परम पद है॥ २७॥ तत्र तत्र परं ब्रह्म सर्वत्र समवस्थितम्। हन्यान्मुष्टिभिराकाशं क्षुधार्तः खण्डयेत्तुषम्। नाहंब्रह्मेति जानाति तस्य मुक्तिर्न जायते ॥ २८ ॥ परब्रह्म यत्र-तत्र-सर्वत्र अवस्थित है, पर जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि 'मैं ब्रह्म हूँ' उसकी मुक्ति उसी प्रकार नहीं होती (अथवा मुक्ति के लिए किया गया प्रयास निष्फलं जाता है), जिस प्रकार कोई आकाश में मुष्टि प्रहार करे या भूखा व्यक्ति चावल प्राप्त करने के लिए भूसी को कूटे॥ २८॥ य एतदुपनिषदं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति। स वायुपूतो भवति। स आदित्यपूतो भवति। स ब्रह्मपूतो भवति। स विष्णुपूतो भवति। स रुद्रपूतो भवति। स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति। स सर्वेषु वेदेष्वधीतो भवति। स सर्ववेदव्रतचर्यासु चरितो भवति। तेनेतिहासपुराणानां रुद्राणां शतसहस्राणि जप्तानि फलानि भवन्ति। प्रणवानामयुतं जप्तं भवति। दश पूर्वान्दशोत्त- रान्पुनाति। स पङ्क्तिपावनो भवति। स महान्भवति। ब्रह्महत्यासुरापानस्वर्णस्तेयगुरु- तल्पगमनतत्संयोगिपातकेभ्यः पूतो भवति॥ २९॥ जो इस उपनिषद् का नित्य पाठ करता है (अध्ययन करता है), वह अग्नि के समान, वायु के समान, आदित्य के समान, ब्रह्म के समान, विष्णु के समान और रुद्र के समान पवित्र होता है। वह समस्त तीर्थों में स्नान किए हुए के समान होता है, समस्त वेदों का ज्ञाता होता है, समस्त वेदों में वर्णित व्रतों का पालन करने वाला होता है। उसे इतिहास-पुराण आदि के अध्ययन तथा एक लक्ष रुद्रमन्त्र के जप का फल प्राप्त होता है। उसे दस सहस्र 'प्रणव' नाम के जप का फल मिलता है। उसके पूर्व की दस और बाद की दस पीढ़ियाँ पवित्र हो जाती हैं। वह साथ में बैठने वालों को पवित्र करता है, जिसके कारण 'पंक्ति पावन' हो जाता है। वह महान् होता है। वह ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण की चोरी, गुरुपत्नी-गमन तथा ऐसे महापातक करने वालों की संगति से उत्पन्न पातकों से मुक्त (पवित्र) हो जाता है॥ २९॥ तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम् ॥ ३० ॥ ज्ञानीजन विश्वव्यापी भगवान् विष्णु के परमपद को द्युलोक में व्याप्त दिव्य प्रकाश की भाँति देखते हैं॥ तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते। विष्णोर्यत्परमं पदम्। ॐ सत्यमित्युपनिषद् ॥ ३१ ॥ वे विप्र (ब्रह्मनिष्ठ जीवनयापन करने वाले) आलस्य प्रमादादि से रहित, सदैव श्रेष्ठ कर्म करने वाले साधक विष्णु (अन्तर्यामी परमेश्वर) के परम पद को प्राप्त करते हैं। यह बात सत्य है-ऐसी यह उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है॥ ३१॥ ॐ पूर्णमदः..................... इति शान्तिः ॥ ॥ इति पैङ्गलोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ ब्रह्मबिन्दूपनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसका दूसरा नाम 'अमृतबिन्दूपनिषद्' भी है। इसमें कुल २२ मन्त्र हैं, जिसमें ब्रह्म के अनुसन्धान (साक्षात्कार) का क्रमिक स्वरूप वर्णित हुआ है। 'मन ही मनुष्य के बन्धन एवं मोक्ष का कारणभूत है' - इस शाश्वत तथ्य के उद्घाटन के साथ उपनिषद् का शुभारम्भ हुआ है। 'मन' को निर्विषय बनाकर मुक्ति की प्राप्ति, निर्विषय बनाने की विधि, स्वर (प्रणव) तथा अस्वर द्वारा व्यक्त एवं अव्यक्त 'ब्रह्म' का अनुसन्धान, तीनों अवस्थाओं (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) में एक ही आत्मतत्त्व की स्थिति, आत्मा का शाश्वत-स्वरूप, माया से जीवात्मा का आवृत होना, अज्ञानान्धकार के विनष्ट होने पर जीवात्मा-परमात्मा के एकत्व का बोध, दूध में विद्यमान घृत की तरह चिन्तन-मनन रूप मन्थन द्वारा परमात्मतत्त्व की प्राप्ति और अन्ततः स्वयं के रूप में उस (परमात्मतत्त्व) की अनुभूति-यही सब वर्ण्य विषय हैं, इस ब्रह्मबिन्दूपनिषद् के ये सभी विषय बड़े सरल ढंग से इस उपनिषद् में प्रतिपादित हुए हैं। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु...........इति शान्तिः ॥ ( द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद ) मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च। अशुद्धं कामसंकल्पं शुद्धं कामविवर्जितम् ॥ १ ॥ मन के दो प्रकार कहे गये हैं, शुद्ध मन और अशुद्ध मन। जिसमें इच्छाओं, कामनाओं के संकल्प उत्पन्न होते हैं, वह अशुद्ध मन है और जिसमें इन समस्त इच्छाओं का सर्वथा अभाव हो गया है, वही शुद्ध मन है ॥ १ ॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥ २ ॥ मन ही सभी मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का प्रमुख कारण है। विषयों में आसक्त मन बन्धन का और कामना-संकल्प से रहित मन ही मोक्ष (मुक्ति) का कारण कहा गया है ॥ २ ॥ यतो निर्विषयस्यास्य मनसो मुक्तिरिष्यते । अतो निर्विषयं नित्यं मनः कार्यं मुमुक्षुणा ॥ ३ ॥ निरस्तविषयासङ्गं संनिरुद्धं मनो हृदि। यदा यात्युन्मनीभावं तदा तत्परमं पदम् ॥ ४ ॥ विषय-भोगों के संकल्प से रहित होने पर ही इस मन का विलय होता है। अतः मुक्ति की इच्छा रखने वाला साधक अपने मन को सदा ही विषयों से दूर रखे। इसके अनन्तर जब मन से विषयों की आसक्ति निकल जाती है तथा वह हृदय में स्थिर होकर उन्मनी भाव को प्राप्त हो जाता है, तब वह उस परमपद को प्राप्त कर लेता है ॥ ३-४ ॥ तावदेव निरोद्धव्यं यावद्धृदि गतं क्षयम् । एतज्ज्ञानं च मोक्षं च अतोऽन्यो ग्रन्थविस्तरः ॥ ५ ॥ मनुष्य को अपना मन तभी तक रोकने का प्रयास करना चाहिए, जब तक कि वह हृदय में विलीन नहीं हो जाता। मन का हृदय में लीन हो जाना ही ज्ञान और मुक्ति है, इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी है, वह सब ग्रन्थ का मात्र विस्तार ही है ॥ ५ ॥ नैव चिन्त्यं न चाचिन्त्यमचिन्त्यं चिन्त्यमेव च। पक्षपातविनिर्मुक्तं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ६ ॥ जब चिन्तनीय और अचिन्तनीय का उस (साधक) के समक्ष कोई अन्तर न रह जाए तथा दोनों में से किसी के प्रति भी मन का पक्षपात भी न रह जाए, तब साधक ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥ ६ ॥

२१२ ब्रह्माबिन्दूपनिषद् स्वरेण संधयेद्योगमस्वरं भावयेत्परम् । अस्वरेण हि भावेन भावो नाभाव इष्यते ॥ ७॥ (साधक को) स्वर अर्थात् प्रणव के द्वारा व्यक्त ब्रह्म की अनुभूति करनी चाहिए तथा इसके पश्चात् अस्वर द्वारा (प्रणव से अतीत) अव्यक्त ब्रह्म का चिन्तन करे। प्रणवातीत उस श्रेष्ठ परब्रह्म की प्राप्ति भावना के माध्यम से भाव-रूप में होती है, अभाव रूप में नहीं॥ ७॥ तदेव निष्कलं ब्रह्म निर्विकल्पं निरञ्जनम् । तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा ब्रह्म संपद्यते ध्रुवम् ॥ ८ ॥ वह ब्रह्म कलाओं से रहित (एक रस-प्राणादि कलाओं से ऊपर), निर्विकल्प एवं निरञ्जन अर्थात् माया और मल से रहित है। 'वह ब्रह्म मैं ही हूँ', इस प्रकार जान करके मनुष्य निश्चित ही ब्रह्ममय हो जाता है॥ निर्विकल्पमनन्तं च हेतुदृष्टान्तवर्जितम् । अप्रमेयमनादिं च यत् ज्ञात्वा मुच्यते बुधः ॥ ९ ॥ निर्विकल्प, अन्तरहित (अनन्त), हेतु और दृष्टान्त से शून्य, प्रपञ्च से रहित, अनादि, परम कल्याणमय परब्रह्म को जानकर विद्वान् पुरुष स्वयमेव मुक्त हो जाता है॥ ९॥ न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षा न मुक्तिश्च इत्येषा परमार्थता ॥ १० ॥ न निरोध (प्रलय) है, न उत्पत्ति है, न बन्धन है और न ही (मोक्ष) साधकता है, न मुक्ति की इच्छा है और न ही मुक्ति है। इस तरह का निश्चय होना ही परमार्थ बोध अर्थात् वास्तविक ज्ञान है॥ १०॥ एक एवात्मा मन्तव्यो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । स्थानत्रयव्यतीतस्य पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ११ ॥ शरीर की इन तीनों जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में एक ही आत्मतत्त्व का सम्बन्ध मानना चाहिए। जो भी व्यक्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो गया है, उस व्यक्ति का दूसरा जन्म फिर नहीं होता ॥११॥ एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ १२॥ समस्त भूत प्राणियों का एक ही अन्तर्यामी हर एक प्राणी के अन्तःकरण में विद्यमान है। अलग-अलग जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा की तरह वही एक, अनेक रूपों में दिखाई देता है॥ १२॥ घटसंवृतमाकाशं लीयमाने घटे यथा । घटो लीयेत नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपमः ॥ १३॥ घट (घड़े) में आकाश तत्त्व पूर्णरूप से विद्यमान है; किन्तु जिस प्रकार घड़े के क्षत-विक्षत होने पर मात्र घड़े का ही विनाश होता है, उसमें भरे हुए आकाश तत्त्व का नहीं, उसी प्रकार शरीर धारण करने वाला जीव भी आकाश के ही सदृश है। शरीर के विनष्ट होने से आत्मा का विनाश नहीं होता, वह शाश्वत है ॥ १३ ॥ घटवद्विविधाकारं भिद्यमानं पुनः पुनः। तद्गग्रं न च जानाति स जानाति च नित्यशः ॥ १४ ॥ समस्त जीव-प्राणियों का भिन्न-भिन्न शरीर, घट के ही समान है, जो बार-बार टूटता-फूटता या विनाश को प्राप्त होता रहता है। यह विनाश को प्राप्त होने वाला जड़ शरीर अपने अन्तःकरण में विद्यमान चिन्मय परब्रह्म को नहीं जानता; किन्तु वह सभी का साक्षी परमात्मा, सभी शरीरों को सदा से जानता रहता है॥ १४॥ शब्दमायावृतो यावत्तावत्तिष्ठति पुष्करे। भिन्ने तमसि चैकत्वमेकमेवानुपश्यति ॥ १५ ॥ जब तक नाम-रूपात्मक अस्तित्व रखने वाली माया के द्वारा (यह) जीवात्मा आवृत रहता है, तब तक बँधे हुए की भाँति हृदय-कमल में स्थित रहता है, जब अज्ञान रूपी अन्धकार का विनाश हो जाता है, तब ज्ञान रूपी प्रकाश में विद्वान् पुरुष जीवात्मा एवं परमात्मा के एकत्व का दर्शन प्राप्त कर लेता है॥ १५॥ शब्दाक्षरं परं ब्रह्म तस्मिन्क्षीणे यदक्षरम्। तद्विद्वानक्षरं ध्यायेद्यदीच्छेच्छान्तिमात्मनः ॥ १६ ॥ शब्द ब्रह्म (प्रणव) और परब्रह्म दोनों ही अक्षर हैं। इन दोनों में से जिस किसी एक के क्षीण होने पर ण्यग जो अक्षय की स्थिति में बना रहता है, वह (परब्रह्म) ही वास्तविक अक्षर (अविनाशी) है। विद्वान्

मन्त्र २२ २१२ पुरुष यदि शान्ति चाहते हों, तो उन्हें उस अक्षर रूप परब्रह्म का ही चिन्तन करना चाहिए ॥ १६ ॥ द्वे विद्ये वेदितव्ये तु शब्दब्रह्म परं च यत्। शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ १७॥ दो विद्याएँ जानने योग्य हैं, प्रथम विद्या को 'शब्द ब्रह्म' और दूसरी विद्या को 'परब्रह्म' के नाम से जाना जाता है। 'शब्द ब्रह्म' अर्थात् वेद-शास्त्रों के ज्ञान में निष्णात होने पर विद्वान् मनुष्य परब्रह्म को जानने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है ॥ १७॥ ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञानतत्त्वतः। पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद्ग्रन्थमशेषतः ॥ १८॥ ज्ञानी मनुष्य को चाहिए कि ग्रन्थ का अभ्यास करने के पश्चात् उसमें निहित ज्ञान-विज्ञान को (मूलतत्त्व को) ग्रहण कर ले, तदनन्तर ग्रन्थ को त्याग देना चाहिए। ठीक उसी भाँति, जैसे कि धान्य (अन्न) को प्राप्त करने वाला व्यक्ति अन्न तो प्राप्त कर लेता है और पुआल को खलिहान में ही छोड़ देता है ॥ १८॥ गवामनेकवर्णानां क्षीरस्याप्येकवर्णता। क्षीरवत्पश्यते ज्ञानं लिङ्गिनस्तु गवां यथा ॥१९॥ अनेक रूप-रंगों वाली गौओं का दुग्ध एक ही रंग का होता है। ठीक वैसे ही बुद्धिमान् व्यक्ति अनेक साम्प्रदायिक चिह्नों को धारण करने वाले मनुष्यों के विवेक को भी गौओं के दूध की तरह ही देखता है। बाहर के चिह्न-भेद से ज्ञान में किसी भी तरह का अन्तर नहीं आने पाता ॥ १९ ॥ घृतमिव पयसि निगूढं भूते भूते च वसति विज्ञानम्। सततं मन्थयितव्यं मनसा मन्थानभूतेन ॥ २०॥ जिस प्रकार दूध में घृत (घी) मूल रूप से छिपा रहता है, उसी तरह ही प्रत्येक प्राणी के अन्तः-करण में विज्ञान (चिन्मय ब्रह्म) स्थित रहता है। जैसे घृत प्राप्ति के लिए दूध का मंथन किया जाता है, वैसे ही विज्ञान स्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति के लिए मन को मथानी रूप में परिणत करके सतत मन्थन (ध्यान एवं विचार) करते रहना चाहिए ॥ २० ॥ ज्ञाननेत्रं समादाय चोद्धरेद्वह्निवत् परम्। निष्कलं निश्चलं शान्तं तद्ब्रह्माहमिति स्मृतम् ॥ २१॥ इसके पश्चात् ज्ञान दृष्टि प्राप्त करके अग्नि के सदृश तेजःस्वरूप परमात्मा का इस भाँति अनुभव करें कि वह कला शून्य, निश्चल एवं अतिशान्त परब्रह्म मैं स्वयं ही हूँ। यही विज्ञान कहा गया है ॥ २१ ॥ सर्वभूताधिवासं च यद्भूतेषु वसत्यपि। सर्वानुग्राहकत्वेन तदस्म्यहं वासुदेवः तदस्म्यहं वासुदेव इति ॥ २२ ॥ जिसमें समस्त भूत प्राणियों का निवास है, जो स्वयं भी सभी भूत प्राणियों के हृदय में स्थित है एवं सभी पर अहैतुकी कृपा करने के कारण प्रसिद्ध है। वह सभी आत्माओं में स्थित वासुदेव मैं ही हूँ, वह सर्वात्मा वासुदेव मैं स्वयं ही हूँ। इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥ २२ ॥ ॐ सह नाववतु............. इति शान्तिः ॥ ॥ इति ब्रह्मबिन्दूपनिषत्समाप्ता ॥

॥ ब्रह्मविद्योपनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें ब्रह्म की प्राप्ति के उपाय और उसके स्वरूप का विशद विवेचन किया गया है। सर्वप्रथम ब्रह्मविद्या के रहस्यभूत प्रणव ब्रह्म का उल्लेख करते हुए प्रणव की चार मात्राओं की विवेचना है। जीव का स्वरूप, बन्ध-मोक्ष का कारण, हंस विद्या द्वारा परमेश्वर की प्राप्ति, सकल और निष्कल ब्रह्म का स्वरूप, केवल शास्त्रीय ज्ञान एवं आचरण से पाप-पुण्य की प्राप्ति, प्रणव-हंस का अनुसन्धान ही प्रत्यक्ष यजन, हंस-मंत्र के अभ्यास से समाधि की प्राप्ति, हंस योग का अभ्यास क्रम तथा हंस योगी द्वारा आत्मा के स्वरूप का चिन्तन इत्यादि विषयों का क्रमशः विवेचन किया गया है। ये सभी विषय 'ब्रह्म' के तात्त्विक स्वरूप को स्पष्ट करते हैं, इसलिए इस उपनिषद् की 'ब्रह्मविद्या' यह संज्ञा सार्थक ही है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु ............ इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य अवधूतोपनिषद् ) अथ ब्रह्मविद्योपनिषदुच्यते । प्रसादाद्ब्रह्मणस्तस्य विष्णोरद्भुतकर्मणः। रहस्यं ब्रह्मविद्याया ध्रुवाग्निं संप्रचक्षते ॥ १ ॥ अब 'ब्रह्मविद्या' नामक उपनिषद् का वर्णन करते हैं-अद्भुत एवं श्रेष्ठ कर्म करने वाले विष्णु रूप परब्रह्म की कृपा से ध्रुवाग्नि (अटल अग्नि या ज्ञान) के स्वरूप वाली ब्रह्मविद्या का रहस्य बताया जाता है ॥१ ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म यदुक्तं ब्रह्मवादिभिः। शरीरं तस्य वक्ष्यामि स्थानं कालत्रयं तथा ॥ २ ॥ जिस प्रकार ब्रह्म को प्रणव के एक अक्षर (ॐ) के रूप में ब्रह्मज्ञानियों ने कहा है। उसी प्रकार उस (ब्रह्मविद्या) के शरीर, स्थान एवं तीन काल का वर्णन करता हूँ॥ २ ॥ [ ब्रह्म की अक्षरात्मक अभिव्यक्ति ॐ से की जाती है, इसलिए ऋषि यहाँ उसको स्पष्ट कर रहे हैं।] तत्र देवास्त्रयः प्रोक्ता लोका वेदास्त्रयोऽग्नयः। तिस्रो मात्रार्धमात्रा च त्र्यक्षरस्य शिवस्य तु ॥३॥ उस ओंकार में तीन देवता, तीन लोक, तीन वेद (ऋक्, यजुः, साम) और तीन अग्नयाँ हैं। शिव स्वरूप इस त्र्यक्षर की तीन और आधी मात्राएँ (अकार, उकार, मकार और अनुस्वार) हैं॥ ३ ॥ ऋग्वेदो गार्हपत्यं च पृथिवी ब्रह्म एव च। अकारस्य शरीरं तु व्याख्यातं ब्रह्मवादिभिः ॥ ४ ॥ ब्रह्मज्ञानियों ने 'अ' कार का शरीर ऋग्वेद, गार्हपत्य अग्नि, पृथिवी तत्त्व और ब्रह्मा को बतलाया है ॥४॥ यजुर्वेदोऽन्तरिक्षं च दक्षिणाग्निस्तथैव च। विष्णुश्च भगवान्देव उकारः परिकीर्तितः ॥ ५ ॥ 'उ' कार का शरीर यजुर्वेद, दक्षिणाग्नि, आकाशतत्त्व तथा भगवान् विष्णु को बताया है॥ ५॥ सामवेदस्तथा द्यौश्चाहवनीयस्तथैव च। ईश्वरः परमो देवो मकारः परिकीर्तितः ॥ ६ ॥ 'म' कार का शरीर सामवेद, आहवनीय अग्नि, द्युलोक, ईश्वर और परमदेव को कहा गया है॥ ६ ॥ सूर्यमण्डलमध्येऽथ ह्यकारः शङ्खमध्यगः। उकारश्चन्द्रसंकाशस्तस्य मध्ये व्यवस्थितः ॥ ७ ॥ मकारस्त्वग्निसंकाशो विधूमो विद्युतोपमः। तिस्रो मात्रास्तथा ज्ञेयाः सोमसूर्याग्निरूपिणः ॥८ ॥ शंख के मध्य भाग की तरह 'अ' कार सूर्य मण्डल के मध्य में प्रतिष्ठित है और चन्द्रमा के सदृश 'उ' कार उसी चन्द्र मण्डल में स्थित है। निर्धूम (धूम रहित) अग्नि और विद्युत् में अग्नि सदृश 'म'कार प्रतिष्ठित है। इस तरह से तीन मात्राओं को सूर्य, चन्द्र, अग्नि के रूप में जानना चाहिए ॥ ७-८ ॥

२१४ ब्रह्मविद्योपनिषद् शिखा तु दीपसंकाशा तस्मिन्नुपरि वर्तते। अर्धमात्रा तथा ज्ञेया प्रणवस्योपरि स्थिता ॥ ९ ॥ जिस तरह से दीपक की शिखा (लौ) ऊपर की ओर रहती है, इसी तरह से प्रणव के ऊपर की अर्द्धमात्रा की स्थिति को जानना चाहिए॥ ९॥ [दीपक की लौ सदा ऊर्ध्वमुखी होती है। अनुस्वार नासिका मूल-मस्तिष्क के उच्च भाग में गुंजरित होता है। इस मात्रा के कारण अ, उ, म् का संयुक्त स्वर ऊर्ध्वोन्मुख हो उठता है, इसलिए इसे ज्योति के अनुरूप कहा गया है।] पद्मसूत्रनिभा सूक्ष्मा शिखा सा दृश्यते परा। सा नाडी सूर्यसंकाशा सूर्य भित्त्वा तथा परा ॥ १० द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाडीं भित्त्वा च मूर्धनि। वरदः सर्वभूतानां सर्व व्याप्येव तिष्ठति ॥ ११ ॥ वह शिखा (लौ) पद्म सूत्र के सदृश दृष्टिगोचर होती है। सूर्य सदृश वह नाड़ी सूर्य का भेदन करके तथा बहत्तर हजार नाड़ियों का भेदन करके मूर्धा में प्रतिष्ठित होने वाली, सभी प्राणियों को वरदान प्रदान करने वाली एवं सबको व्याप्त करके स्थित रहने वाली है॥ १०-११॥ कांस्यघण्टानिनादस्तु यथा लीयति शान्तये। ओङ्कारस्तु तथा योज्यः शान्तये सर्वमिच्छता ॥१२ काँस्य (ताँबा तथा टीन से मिलकर बनी) धातु निर्मित घण्टे का शब्द जिस प्रकार शान्ति प्रदान करता हुआ विलीन हो जाता है, उसी प्रकार ॐ कार की साधना द्वारा सभी तरह की इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं ॥१२॥ यस्मिन्विलीयते शब्दस्तत्परं ब्रह्म गीयते। धियं हि लीयते ब्रह्म सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १३॥ जिस (तत्त्व) में शब्द विलीन हो जाता है, उसे परब्रह्म कहा गया है। जो बुद्धि ब्रह्म में विलीन हो जाती है, वह अमृत स्वरूप-ब्रह्म स्वरूप कही गई है॥ १३॥ वायुस्तेजस्तथाकाशस्त्रिविधो जीवसंज्ञकः। स जीवः प्राण इत्युक्तो वालाग्रशतकल्पितः ॥१४॥ वायु, तेज तथा आकाश इन तीनों में जीव की उपमा दी जाती है। इस जीव का प्रमाण (आकार) बाल की नोक का सौवाँ भाग (अति सूक्ष्म) कल्पित किया गया है॥ १४॥ नाभिस्थाने स्थितं विश्वं शुद्धतत्त्वं सुनिर्मलम्। आदित्यमिव दीप्यन्तं रश्मिभिश्चाखिलं शिवम्॥ वह (जीव) विश्व (संज्ञक), शुद्ध तत्त्व, निर्मल स्वरूप नाभि प्रदेश (नाभिक-न्यूक्लियस) में प्रतिष्ठित है। वह सूर्य के सदृश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करने वाला और कल्याणकारी है॥ १५॥ सकारं च हकारं च जीवो जपति सर्वदा। नाभिरन्ध्राद्विनिष्क्रान्तं विषयव्याप्तिवर्जितम् ॥ १६ ॥ जीव (श्वासोच्छ्वास के रूप में) 'स' कार और 'ह' कार (सोऽहं का जप) सर्वदा करता है, इस के प्रभाव से वह जीव नाभिरंध्र से उत्क्रमण करता रहता है और उसे किसी प्रकार के विषय व्याप्त नहीं करते॥ तेनेदं निष्कलं विद्यात्क्षीरात्सर्पिर्यथा तथा। कारणेनात्मना युक्तः प्राणायामैश्च पञ्चभिः ॥१७॥ दुग्ध से (मथकर निकाले गये) घृत की भाँति उस निष्कल (कला रहित), सबके कारण रूप आत्म तत्त्व को प्राण के पाँच आयामों द्वारा जाना जाता है। (देह के पाँचों तत्त्वों में प्राण तत्त्व प्रवाहित होते हैं। इन पाँचों में प्रवाहित प्राण के पाँच आयाम माने गये हैं) ॥ १७॥ चतुष्कलासमायुक्तो भ्राम्यते च हृदि स्थितः। गोलकस्तु यथा देहे क्षीरदण्डेन वाऽहतः ॥१८॥ जिस प्रकार मथने वाले दण्ड से दुग्ध को मथा जाता है, उसी प्रकार चार कलाओं से युक्त हृदय में स्थित प्राण तत्त्व को (श्वास-प्रश्वास को) शरीर में भ्रमण कराया जाता है॥ १८॥ एतस्मिन्वसते शीघ्रंमविश्रान्तं महाखगः। यावन्निःश्वसितो जीवस्तावन्निष्कलतं गतः॥१९॥ इस (शरीर) में शीघ्रगामी महापक्षी (खग रूपी जीव) विश्राम न करता हुआ निवास करता है। जब श्वास रुक जाता है, तब जीव निष्कल (कला रहित) हो जाता है॥ १९॥

मन्त्र ३२ २१५ [ ऋषि ने हृदय को चार कलाओं-विभागों वाला कहा है। वर्तमान शरीर विज्ञानी भी इसे बायें एवं दायें ऑरिकल तथा बायें एवं दायें वेन्ट्रिक इन चार भागों में ही बँटा हुआ मानते हैं। ] नभस्थं निष्कलं ध्यात्वा मुच्यते भवबन्धनात्। अनाहतध्वनियुतं हंसं यो वेद हृद्गतम् ॥ २० ॥ स्वप्रकाशचिदानन्दं स हंस इति गीयते। रेचकं पूरकं मुक्त्वा कुम्भकेन स्थितः सुधीः ॥ २१ ॥ नाभिकन्दे समौ कृत्वा प्राणापानौ समाहितः। मस्तकस्थामृतास्वादं पीत्वा ध्यानेन सादरम्॥२२ दीपाकारं महादेवं ज्वलन्तं नाभिमध्यमे। अभिषिच्यामृतेनैव हंसहंसेति यो जपेत्॥ २३॥ जरामरणरोगादि न तस्य भुवि विद्यते। एवं दिने दिने कुर्यादणिमादिविभूतये ॥ २४ ॥ आकाश में स्थित निष्कल तत्त्व का चिन्तन करता हुआ, वह भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। जो पुरुष हृदय में स्थित इस अनाहत ध्वनि युक्त, प्रकाशयुक्त, चिदानन्द 'हंस' को जानता है, वह हंस कहा जाता है। जो ज्ञानी पुरुष रेचक और पूरक को त्याग करके कुम्भक में स्थित होकर प्राण एवं अपान को एक करके मस्तक में प्रतिष्ठित अमृत को ध्यानपूर्वक आदर सहित पीता है तथा जो नाभि के मध्य में दीपक की तरह सुप्रकाशित महादेव पर अमृत का सिंचन करता हुआ 'हंस-हंस' का जप करता है, उसे पृथ्‍वी पर निवास करते हुए जरा, मरण, रोग आदि विकार नहीं होते तथा वह अणिमादि सिद्धियों-विभूतियों का अधिकारी हो जाता है ॥२०-२४ [ सोऽहं को उलटने पर हंसः बनता है। हंस उस प्राण रूप जीव को कहा गया है। वह हंस इस परमात्म तत्त्व को लक्ष्य करके 'सोऽहं' मैं वही हूँ यह भाव करता है, तो वह पदार्थगत विकारों से प्रभावित नहीं होता ] ईश्वरत्वमवाप्नोति सदाभ्यासरतः पुमान्। बहवो नैकमार्गेण प्राप्ता नित्यत्वमागताः ॥ २५ ॥ जो ज्ञानी पुरुष सदा ही इस (ब्रह्मविद्या) के अभ्यास में लगा रहता है, उसे ईश्वरत्व की प्राप्ति हो जाती है। अनेक पुरुष इसी एक ही पथ के द्वारा नित्य पद को प्राप्त कर चुके हैं ॥ २५ ॥ हंसविद्यामृते लोके नास्ति नित्यत्वसाधनम्। यो ददाति महाविद्यां हंसाख्यां पारमेश्वरीम्॥२६॥ तस्य दास्यं सदा कुर्यात्प्रज्ञया परया सह। शुभं वाऽशुभमन्यद्वा यदुक्तं गुरुणा भुवि ॥ २७॥ तत्कुर्यादविचारेण शिष्यः संतोषसंयुतः। हंसविद्यामिमां लब्ध्वा गुरुशुश्रूषया नरः ॥ २८॥ हंस रूपी विद्यामृत के सदृश नित्यत्व का इस जगत् में और कोई साधन नहीं है। जो ज्ञानी मनुष्य इस हंस नाम की परम पावन परमेश्वरी महाविद्या को प्रदान करता है, उसकी सर्वदा ज्ञानपूर्वक प्रजा के सहित सेवा करनी चाहिए। गुरु जो कुछ शुभ या अशुभ आदेश दे,उसका पालन शिष्य को बिना कुछ विचार किये सन्तोष वृत्ति से सतत करना चाहिए। इस हंस विद्या को गुरु से प्राप्त करके मनुष्य सदा ही गुरु की शुश्रूषा करे ॥ आत्मानमात्मना साक्षाद्ब्रह्म बुद्ध्वा सुनिश्चलम्। देहजात्यादिसंबन्धान्वर्णाश्रमसमन्वितान् ॥२९ वेदशास्त्राणि चान्यानि पदपांसुमिव त्यजेत्। गुरुभक्तिं सदा कुर्याच्छ्रेयसे भूयसे नरः ॥ ३०॥ गुरु की सहायता से आत्मा द्वारा आत्मा का साक्षात्कार करके तथा ब्रह्म को निश्चयपूर्वक बुद्धि द्वारा जान करके वर्णाश्रम, जाति आदि के सम्बन्ध एवं वेद तथा शास्त्रों की बातों को निःसंकोच भाव से त्याग कर, गुरु की सदा ही सेवा-शुश्रूषा करे। इसी से मनुष्य का सच्चा कल्याण होता है ॥ २९-३० ॥ गुरुरेव हरिः साक्षान्नान्य इत्यब्रवीच्छ्रुतिः ॥ ३१ ॥ गुरु ही स्वयं साक्षात् हरि हैं, कोई और अन्य नहीं, ऐसा श्रुति का कथन है ॥ ३१ ॥ श्रुत्या यदुक्तं परमार्थमेव तत्संशयो नात्र ततः समस्तम्। श्रुत्या विरोधे न भवेत्प्रमाणं भवेदनर्थाय विना प्रमाणम् ॥ ३२ ॥

२१६ ब्रह्मविद्योपनिषद् श्रुति का कथन संशयरहित परमार्थ रूप ही है। श्रुति का विरोध होने पर अन्य और कुछ भी प्रमाण नहीं है। जो बिना प्रमाण होगा, वह अनर्थकारी अर्थात् हानिकारक होगा ॥ ३२ ॥ देहस्थः सकलो ज्ञेयो निष्कलो देहवर्जितः । आप्तोपदेशगम्योऽसौ सर्वतः समवस्थितः ॥ ३३ ॥ देह में स्थित (चेतना) को सकल (कला या विभागयुक्त) तथा देहरहित (परम चेतना) को 'निष्कल' (कलारहित) जानना चाहिए। आप्त गुरु के उपदेश से ज्ञात होने वाला यह तत्त्व सर्वत्र समभाव से प्रतिष्ठित है ॥ हंसहंसेति यो ब्रूयाद्धंसो ब्रह्मा हरिः शिवः। गुरुवक्त्रात्तु लभ्येत प्रत्यक्षं सर्वतोमुखम् ॥ ३४ ॥ जो ज्ञानी पुरुष हंस-हंस बोलता (सोऽहं साधनारत रहता) है, वह ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव का कल्याणकारी रूप है। वह गुरु के उपदेश से सर्वतोमुख वाले (सर्वत्र व्याप्त) ब्रह्म को जानने में समर्थ हो सकता है ॥ ३४ ॥ तिलेषु च यथा तैलं पुष्पे गन्ध इवाश्रितः । पुरुषस्य शरीरेऽस्मिन्स बाह्याभ्यन्तरे तथा ॥ ३५ ॥ जिस प्रकार तिलों में तैल एवं पुष्पों में गंध विद्यमान रहता है, उसी प्रकार पुरुष के इस शरीर में बाहर- भीतर वही ब्रह्म विद्यमान रहता है ॥ ३५ ॥ उल्काहस्तो यथालोके द्रव्यमालोक्य तां त्यजेत् । ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य पश्चाज्ज्ञानं परित्यजेत् ॥३६ जिस प्रकार मशाल के प्रकाश से द्रव्य (वस्तु) को देख करके मशाल का परित्याग कर दिया जाता है, उसी प्रकार ज्ञान के माध्यम से ज्ञातव्य विषय की प्राप्ति हो जाने पर ज्ञान का परित्याग कर दिया जाता है ॥ ३६ ॥ पुष्पवत्सकलं विद्याद्गन्धस्तस्य तु निष्कलः। वृक्षस्तु सकलं विद्याच्छाया तस्य तु निष्कला ॥३७ 'सकल' अर्थात् कलायुक्त को पुष्प की भाँति एवं उसकी गंध को 'निष्कल' (कलारहित) की भाँति माने अथवा 'सकल' वृक्ष के सदृश है और उसकी छाया निष्कल (कलारहित) है ॥ ३७ ॥ निष्कलः सकलो भावः सर्वत्रैव व्यवस्थितः । उपायः सकलस्तद्वदुपेयश्चैव निष्कलः ॥ ३८ ॥ (ऊपर कहे अनुसार) निष्कल एवं सकल भाव सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। कला सम्पन्न वस्तु उपाय या साधन है तथा उपेय या साध्य (ब्रह्म) कलारहित है ॥ ३८ ॥ सकले सकलो भावो निष्कले निष्कलस्तथा । एकमात्रो द्विमात्रश्च त्रिमात्रश्चैव भेदतः ॥३९ ॥ अर्धमात्रा परा ज्ञेया तत ऊर्ध्वं परत्परम्। पञ्चधा पञ्चदैवत्यं सकलं परिपठ्यते ॥ ४० ॥ सकल में कलायुक्त भाव तथा निष्कल (अखण्ड-निर्विकार) में निष्कल भाव रहता है। (वह सकल) एक मात्रा, दो मात्रा एवं तीन मात्रा के भेद वाला अर्धमात्रा को पर मानना चाहिए, उसके ऊपर परात्पर है। (इस प्रकार) सकल पाँच दैवत वाला पाँच प्रकार का (पंच प्राण एवं पंचभूतात्मक) जानना चाहिए ॥ ३९-४० ॥ ब्रह्मणो हृदयस्थानं कण्ठे विष्णुः समाश्रितः । तालुमध्ये स्थितो रुद्रो ललाटस्थो महेश्वरः ॥४१ ब्रह्मा का स्थान हृदय में है, विष्णु कण्ठ में निवास करते हैं, तालु में भगवान् रुद्र तथा ललाट (मस्तक) में महेश्वर स्थित हैं ॥ ४१ ॥ नासाग्रे अच्युतं विद्यात्तस्यान्ते तु परं पदम् । परत्वान्तु परं नास्तीत्येवं शास्त्रस्य निर्णयः ॥४२ ॥ नासिका के अग्रभाग में अच्युत (सदाशिव) तथा उसके अन्तिम भाग (भ्रूमध्य) में परम पद को प्रतिष्ठित जानना चाहिए। (उस) पर (श्रेष्ठ) से पर (श्रेष्ठ) और कुछ भी नहीं है, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है ॥ देहातीतं तु तं विद्यान्नासाग्रे द्वादशाङ्गुलम् । तदन्तं तं विजानीयात्तत्रस्थो व्यापयेत्प्रभुः ॥ ४३ ॥ उस देहातीत को नासिका के अग्र भाग से बारह अंगुल ऊपर जानना चाहिए तथा उसके अन्तिम भाग (सहस्रार चक्र) में व्यापक प्रभु को स्थित जानना चाहिए ॥ ४३ ॥

मन्त्र ५६ २१७ मनोऽप्यन्यत्र निक्षिप्तं चक्षुरन्यत्र पातितम्। तथापि योगिनां योगो ह्यविच्छिन्नः प्रवर्तते ॥४४॥ मन चाहे इधर-उधर चला जाये और चाहे नेत्र अन्यत्र ही देखते रहें, तब भी योगियों का योग अविच्छिन्न भाव से चलता रहता है ॥४४॥ एतत्तु परमं गुह्यमेतत्तु परमं शुभम्। नातः परतरं किंचिन्नातः परतरं शुभम् ॥४५॥ यह सबसे गूढ़ रहस्य है, यही सर्वाधिक श्रेष्ठ है, इससे बढ़कर तथा इससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है ॥४५ शुद्धज्ञानामृतं प्राप्य परमाक्षरनिर्णयम्। गुह्याद्गुह्यतमं गोप्यं ग्रहणीयं प्रयत्नतः ॥४६॥ शुद्ध ज्ञानामृत को प्राप्त करके परम अक्षर तत्त्व का निर्णय करना चाहिए। यह गुह्य से गुह्य एवं गोपनीय है, जो प्रयत्नपूर्वक ग्रहण करने योग्य है ॥४६॥ नापुत्राय प्रदातव्यं नाशिष्याय कदाचन । गुरुदेवाय भक्ताय नित्यं भक्तिपराय च ॥४७॥ प्रदातव्यमिदं शास्त्रं नेतरेभ्यः प्रदापयेत् । दाताऽस्य नरकं याति सिध्यते न कदाचन ॥४८॥ यह ब्रह्मविद्या न तो अपुत्र को देनी चाहिए और न ही अशिष्य को कभी देनी चाहिए। यह विद्या उसी को देनी चाहिए, जो गुरु का सच्चा भक्त हो। सदा नित्य भक्ति परायण रहे, इस शास्त्र विद्या को किसी अन्य को नहीं देना चाहिए। यदि कोई देगा भी, तो वह देने वाला नरक को जायेगा और सिद्धि भी नहीं प्राप्त होगी ॥ गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । यत्र तत्र स्थितो ज्ञानी परमाक्षरवित्सदा ॥ ४९ ॥ ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी कोई भी हो एवं कहीं भी निवास करता हो, परम अक्षर तत्त्व को जानने वाला सर्वदा ज्ञानी ही होता है ॥४९॥ विषयी विषयासक्तो याति देहान्तरे शुभम् । ज्ञानादेवाश्य शास्त्रस्य सर्वावस्थोऽपि मानवः ॥५० यदि कोई मनुष्य विषय-भोगी, विषयों में आसक्त रहने वाला हो, तब भी वह इस शास्त्र के ज्ञान से देहान्तर (मृत्यु) के पश्चात् शुभ गति को प्राप्त हो जाता है ॥ ५० ॥ ब्रह्महत्याश्वमेधाद्यैः पुण्यपापैनं लिप्यते। चोदको बोधकश्चैव मोक्षदश्च परः स्मृतः ॥ ५१ ॥ इत्येषां त्रिविधो ज्ञेय आचार्यस्तु महीतले । चोदको दर्शयेन्मार्गं बोधकः स्थानमाचरेत् ॥५२॥ मोक्षदस्तु परं तत्त्वं यज्ज्ञात्वा परमश्रुते। प्रत्यक्षयजनं देहे संक्षेपाच्छृणु गौतम ॥५३॥ जो ब्रह्महत्या के पाप तथा अश्वमेधादि के पुण्य में लिप्त नहीं रहते हैं, ऐसे श्रेष्ठ ज्ञानी प्रेरक, बोधक एवं मोक्षदाता माने गये हैं। संसार में आचार्य इन्हीं तीन श्रेणियों के कहे गये हैं। प्रेरक मार्ग दिखलाता है, बोधक- यथार्थ बोध (ज्ञान का आचरण) कराता है, मोक्षप्रदाता-परम श्रेष्ठ तत्त्व प्रदान करता है, जिसे जानकर परमात्मा की प्राप्ति की जा सकती है। हे गौतम! अब तुम शरीर में यजन के सन्दर्भ में श्रवण करो ॥५१-५३॥ तेनेष्ट्वा स नरो याति शाश्वतं पदमव्ययम् । स्वयमेव तु संपश्येद्देहे बिन्दुं च निष्कलम् ॥ ५४ ॥ इस (कृत्य) के करने से मनुष्य शाश्वत, अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है तथा स्वयं अपने शरीर (देह) के अन्दर ही निष्कल (कलारहित) और बिन्दु को देख लेता है ॥५४॥ अयने द्वे च विषुवे सदा पश्यति मार्गवित् । कृत्वा यामं पुरा वत्स रेचपूरककुम्भकान् ॥ ५५ ॥ दोनों अयनों के सदृश दिन-रात्रि के एक-एक प्रहर तक रेचक, पूरक तथा कुम्भक प्राणायाम करे ॥५५॥ पूर्वं चोभयमुच्चार्य अर्चयेत्तु यथाक्रमम् । नमस्कारेण योगेन मुद्रयारभ्य चार्चयेत् ॥ ५६ ॥ सर्वप्रथम दोनों (ॐ तथा हंस) का उच्चारण करके यथाक्रमानुसार पूजन सम्पन्न करे। (हंसः, सोऽहम्- इस) नमस्कार योग के द्वारा तथा (शाम्भवी, खेचरी आदि) मुद्राओं के माध्यम से अर्चन-पूजन करे ॥ ५६ ॥

२१८ ब्रह्मविद्योपनिषद् सूर्यस्य ग्रहणं वत्स प्रत्यक्षयजनं स्मृतम्। ज्ञानात्सायुज्यमेवोक्तं तोये तोयं यथा तथा ॥५७॥ हे वत्स ! सूर्य का (पूजन हेतु) ग्रहण प्रत्यक्ष यजन (सोऽहम् साधना रूप में) कहा गया है। जिस प्रकार जल में जल होता है, उसी प्रकार से सायुज्यपद सद्ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त होता है॥५७॥ एते गुणाः प्रवर्तन्ते योगाभ्यासकृतश्रमैः। तस्माद्योगं समादाय सर्वदुःखबहिष्कृतः ॥५८॥ योग के अभ्यास में जो श्रम किया जाता है, उसमें इतने गुण हैं कि इस क्रिया द्वारा उद्योगपूर्वक सभी दुःखों को दूर करने की सतत चेष्टा करनी चाहिए॥५८॥ योगध्यानं सदा कृत्वा ज्ञानं तन्मयतां व्रजेत्। ज्ञानात्स्वरूपं परमं हंसमन्त्रं समुच्चरेत् ॥५९॥ सदा ही इस (ब्रह्मविद्या) के मन्त्र का जप करते हुए योग रूपी चिन्तन के द्वारा तन्मयता को प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान के माध्यम से ही (ब्रह्म का) परम स्वरूप (हंस मन्त्र) प्राप्त किया जाता है॥५९॥ प्राणिनां देहमध्ये तु स्थितो हंसः सदाऽच्युतः। हंस एव परं सत्यं हंस एव तु शक्तिकम्॥६०॥ प्राणियों के शरीर में अच्युतरूपी हंस (चेतन जीव) सदा ही प्रतिष्ठित रहता है। हंस ही परम सत्य है तथा हंस ही शक्ति का स्वरूप है॥६०॥ हंस एव परं वाक्यं हंस एव तु वैदिकम्। हंस एव परो रुद्रो हंस एव परात्परम्॥६१॥ हंस ही परम वाक्य है, हंस ही वेदों का सार है। हंस ही परम रुद्र है और हंस ही परमात्मा है॥६१॥ सर्वदेवस्य मध्यस्थो हंस एव महेश्वरः। पृथिव्यादिशिवान्तं तु अकाराद्याश्च वर्णकाः ॥६२॥ कूटान्ता हंस एव स्यान्मातृकेति व्यवस्थिताः। मातृकारहितं मन्त्रमादिशन्ते न कुत्रचित् ॥६३॥ सभी देवताओं के मध्य में हंस ही परमेश्वर है। पृथिवी से लेकर भगवान् शिव तक तथा 'अकार' से लेकर 'क्ष' तक हंस ही वर्ण-मात्राओं की तरह से स्थित है। मातृका (वर्ण) विहीन मन्त्र का उपदेश कहीं भी नहीं दिया जाता है॥६२-६३॥ हंसज्योतिरनूपम्यं देव मध्ये व्यवस्थितम्। दक्षिणामुखमाश्रित्य ज्ञानमुद्रां प्रकल्पयेत् ॥६४॥ सदा समाधिं कुर्वीत हंसमन्त्रमनुस्मरन्। निर्मलस्फटिकाकारं दिव्यरूपमनुत्तमम् ॥६५॥ हंस की अनुपम ज्योति देवताओं के मध्य में प्रतिष्ठित है। दक्षिणामुख (भगवान् शिव) का आश्रय लेकर ज्ञान मुद्रा करे तथा सर्वदा समाधि अवस्था में हंस का चिन्तन करता रहे और निर्मल स्फटिक के समान उत्तम दिव्य रूप का ध्यान करे॥६४-६५॥ मध्यदेशे परं हंसं ज्ञानमुद्रात्मरूपकम्। प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च वायवः ॥६६॥ पञ्चकर्मेन्द्रियैर्युक्ताः क्रियाशक्तिबलोद्यताः। नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनंजयः ॥६७॥ पञ्चज्ञानेन्द्रियैर्युक्ता ज्ञानशक्तिबलोद्यताः। पावकः शक्तिमध्ये तु नाभिचक्रे रविः स्थितः॥६८ मध्य देश में ज्ञान-मुद्रा के स्वरूप वाले परम हंस का सदैव ध्यान करना चाहिए। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान-ये पाँच वायु (प्राण) तथा पञ्च कर्मेन्द्रियों से सम्पन्न क्रियाशक्ति अधिक बलवती होती है। नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय और पञ्च ज्ञानेन्द्रियों से सम्पन्न ज्ञानशक्ति अत्यन्त बलवती होती है। (कुण्डलिनी) शक्ति के बीच में अग्नि और नाभिचक्र में रवि प्रतिष्ठित रहता है॥६६-६८॥ बन्धमुद्रा कृता येन नासाग्रे तु स्वलोचने। अकारे वह्निरित्याहुरुकारे हृदि संस्थितः॥६९॥ मकारे च ध्रुवोर्मध्ये प्राणशक्त्या प्रबोधयेत्। ब्रह्मग्रन्थिरकारे च विष्णुग्रन्थिर्हृदि स्थितः ॥७०

मन्त्र ८१ २१९ सर्वप्रथम बन्ध एवं मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए। नासाग्र एवं अपने दोनों नेत्रों में 'अ' कार अग्नि, हृदय में 'उ' कार अग्नि और भृकुटियों के मध्य में 'म' कार अग्नि प्रतिष्ठित कही गयी है। इनमें प्राणशक्ति को संयुक्त करे। ब्रह्मग्रन्थि ॐकार (नासाग्र एवं नेत्र) में और विष्णुग्रन्थि हृदय में स्थित कही गयी है ॥६९-७०॥ रुद्रग्रन्थिर्भ्रुवोर्मध्ये भिद्यतेऽक्षरवायुना। अकारे संस्थितो ब्रह्मा उकारे विष्णुरास्थितः ॥७१॥ मकारे संस्थितो रुद्रस्ततोऽस्यान्तः परात्परः। कण्ठं संकुच्य नाड्यादौ स्तम्भिते येन शक्तितः॥ रसना पीड्यमानेयं षोडशी वोर्ध्वगामिनी। त्रिकूटं त्रिविधा चैव गोलाखं निखरं तथा ॥७३॥ त्रिशङ्खवज्रमोङ्कारमूर्ध्वनालं भ्रुवोर्मुखम्। कुण्डलीं चालयन्प्राणान्भेदयन्शशिमण्डलम् ॥७४॥ रुद्र ग्रन्थि भृकुटियों के मध्य में स्थित है। यह (तीनों) ग्रन्थि अक्षर वायु (हंस ज्ञान) से भेदन की जाती है। 'अ' कार में ब्रह्मा का, 'उकार' में विष्णु का तथा 'म' कार में रुद्र का स्थान बताया गया है, उसके अन्त में परात्पर ब्रह्म है। कण्ठ का संकोचन (जालन्धरबन्ध) करके आदि शक्ति (कुण्डलिनी शक्ति) को स्तम्भित करे,तत्पश्चात् जिह्वा को दबाकर सोलह आधार वाली, ऊर्ध्वगामिनी, त्रिकूट (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना तीनों के मिलन स्थल) वाली, तीन प्रकार वाली, ब्रह्मरन्ध्र को जानने वाली अति सूक्ष्म सुषुम्ना नाड़ी को एवं त्रिशंख (सुख, दुःख, सुख-दुःख तीनों को खाने वाले), वज्र (अयोगी द्वारा दुर्भेद्य), ओंकार युक्त, ऊर्ध्वनाल, भृकुटियों की ओर गमन करने वाली कुण्डली शक्ति तथा प्राणों को चालित करके शशि मण्डल का भेदन करे ॥७४॥ साधयन्वज्रकुम्भानि नव द्वाराणि बन्धयेत्। सुमनः पवनारूढः सरागो निर्गुणस्तथा ॥ ७५ ॥ नव द्वारों को बन्द करके वज्र कुम्भक (उज्जायी, शीतली आदि प्राणायाम) का साधन करना चाहिए। मन को प्रसन्न रखकर, सहज स्थिति में निर्गुण होकर पवन पर आरूढ़ (प्राणायाम परायण) होना चाहिए ॥७५॥ ब्रह्मस्थाने तु नादः स्याच्छंखिन्यमृतवर्षिणी। षट्चक्रमण्डलोद्धारं ज्ञानदीपं प्रकाशयेत् ॥ ७६ ॥ इस (ध्यान) से ब्रह्मस्थान में नाद सुनाई पड़ने लगता है तथा शंखिनी नाड़ी से अमृत की वर्षा होने लगती है और षट्चक्र मण्डल का भेदन होने से ज्ञानरूपी दीपक प्रकाश से युक्त हो जाता है ॥ ७६ ॥ सर्वभूतस्थितं देवं सर्वेशं नित्यमर्चयेत्। आत्मरूपं तमालोक्य ज्ञानरूपं निरामयम् ॥ ७७ ॥ समस्त भूत-प्राणियों में प्रतिष्ठित परम देव का सदा ही पूजन करना चाहिए। वे आत्मस्वरूप, ज्ञानस्वरूप तथा व्याधि से रहित हैं ॥ ७७ ॥ दृश्यन्तं दिव्यरूपेण सर्वव्यापी निरञ्जनः । हंस हंस वदेद्वाक्यं प्राणिनां देहमाश्रितः । स प्राणापानयोर्ग्रन्थिर्जपत्यभिधीयते ॥ ७८ ॥ सहस्रमेकं द्वययुतं षट्शतं चैव सर्वदा । उच्चरन्थितो हंसः सोऽहमित्यभिधीयते ॥ ७९ ॥ उन सर्वव्यापी निरञ्जन के दिव्य रूप का दर्शन करके हंस-हंस का निरन्तर जप करते रहना चाहिए। प्राणियों की देह (शरीर) में स्थित प्राण और अपान की ग्रन्थि को अजपा जप कहा जाता है, इससे नित्य प्रति इक्कीस हजार छः सौ बार जप करता हुआ हंस 'सोऽहम्' के रूप में परिणत हो जाता है ॥ ७८-७९ ॥ पूर्वभागे ह्यधोलिङ्गं शिखिन्यां चैव पश्चिमम्। ज्योतिर्लिङ्गं भ्रुवोर्मध्ये नित्यं ध्यायेत्सदा यतिः ॥ साधक को सदा ही कुण्डलिनी के पूर्व में अधोलिङ्ग का, शिखा स्थान में पश्चिमलिङ्ग का, भृकुटियों के मध्य में ज्योतिर्लिङ्ग का ध्यान करना चाहिए ॥ ८० ॥ अच्युतोऽहमचिन्त्योऽहमतर्क्योऽहमजोऽस्म्यहम्। अव्रणोऽहमकायोऽहमनङ्गोऽस्म्यभयोऽस्म्यहम् ॥ मैं अच्युत हूँ, मैं अचिन्त्य अर्थात् चिन्तन से परे हूँ, मैं तर्क की सीमा से बाहर हूँ, मैं अजन्मा हूँ, मैं

२२० ब्रह्मविद्योपनिषद् व्रणरहित (स्वस्थ) हूँ, मैं काया से विहीन हूँ, मैं अनङ्ग (अंगरहित) एवं भय से रहित हूँ॥ ८१ ॥ अशब्दोऽहमरूपोऽहमस्पर्शोऽस्म्यहमद्वयः। अरसोऽहमगन्धोऽहमनादिरमृतोऽस्म्यहम् ॥८२॥ मैं शब्दरहित हूँ, रूप रहित (आकाररहित), स्पर्श से परे एवं अद्वय हूँ। मैं रस से विहीन (रसरहित) हूँ, गन्ध से रहित तथा अनादि अमृत का रूप हूँ॥ ८२ ॥ अक्षयोऽहमलिङ्गोऽहमजरोऽस्म्यकलोऽस्म्यहम्। अप्राणोऽहममूकोऽहमचिन्त्योऽस्म्यकृतोऽस्म्यहम् ॥ ८३ ॥ मैं अक्षय (क्षयरहित) हूँ, लिङ्गरहित हूँ, अजर एवं निष्कल अर्थात् कलारहित हूँ। मैं अमूक (वाक् शक्तियुक्त) एवं प्राणरहित हूँ, अचिन्त्य (चिन्तन से परे) तथा मैं ही क्रियारहित हूँ॥ ८३ ॥ अन्तर्याम्यहमग्राह्योऽनिर्देश्योऽहमलक्षणः। अगोत्रोऽहमगात्रोऽहमचक्षुष्कोऽस्म्यवागहम् ॥ ८४ ॥ मैं अन्तर्यामी हूँ, अग्राह्य अर्थात् पकड़ने में न आने वाला हूँ, मैं निर्देशरहित एवं लक्षणरहित हूँ। मैं कुल, गोत्र एवं शरीररहित हूँ, मैं नेत्रेन्द्रिय रहित हूँ तथा वागिन्द्रिय रहित भी हूँ॥ ८४ ॥ अदृश्योऽहमवर्णोऽहमखण्डोऽस्म्यहमद्भुतः। अश्रुतोऽहमदृष्टोऽहमन्वेष्योऽमरोऽस्म्यहम्॥८५॥ मैं अदृश्य हूँ, अवर्ण हूँ, अखण्ड एवं अद्भुत हूँ। मैं अश्रुत हूँ, अदृष्ट हूँ, अन्वेषण योग्य एवं अमर हूँ॥ अवायुरप्यनाकाशोऽतेजस्कोऽव्यभिचार्यहम्। अमतोऽहमजातोऽहमतिसूक्ष्मोऽविकार्यहम् ॥८६ मैं वायुरहित, आकाश तत्त्व से रहित, तेजो विहीन, व्यभिचार (नियमोल्लंघन) से रहित, अज्ञेय, अजन्मा (जन्मरहित), सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अविकारी (विकार रहित) हूँ॥ ८६ ॥ अरजस्कोऽतमस्कोऽहमसत्त्वोऽस्म्यगुणोऽस्म्यहम्। अमायोऽनुभवात्माहमन्योऽविषयोऽस्म्यहम् ॥ ८७॥ मैं सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से रहित हूँ। गुणों से अतीत हूँ, मायारहित, अनुभव स्वरूप हूँ, अनन्य तथा अविषय अर्थात् विषयरहित हूँ॥ ८७ ॥ अद्वैतोऽहमपूर्णोऽहमबाह्योऽहमनन्तरः। अश्रोत्रोऽहमदीर्घोऽहमव्यक्तोऽहमनामयः ॥८८॥ मैं अद्वैत हूँ, पूर्ण हूँ। मैं न बाहर हूँ और न ही भीतर हूँ, मैं श्रोत्ररहित हूँ, अदीर्घ हूँ, अव्यक्त हूँ और मैं व्याधिरहित भी हूँ ॥ ८८ ॥ अद्वयानन्दविज्ञानघनोऽस्म्यहमविक्रियः। अनिच्छोऽहमलेपोऽहमकर्तास्म्यहमद्वयः ॥८९॥ मैं अद्वय, आनन्दरूप, विज्ञानघन एवं अविकारी अर्थात् विकार रहित हूँ। मैं इच्छा रहित हूँ, अलेप (लिप्त न रहने वाला) हूँ। मैं ही अकर्ता तथा अद्वैत भी मैं ही हूँ॥ ८९ ॥ अविद्याकार्यहीनोऽहमवाङ्मनसगोचरः। अनल्पोऽहमशोकोऽहमविकल्पोऽस्म्यविज्वलन् ॥ ९० मैं अविद्यायुक्त कार्य से रहित हूँ, मैं मन एवं वाणी से अगोचर अर्थात् परे हूँ। मैं अनल्प (अल्परहित) हूँ, शोकरहित हूँ, विकल्परहित एवं विशिष्ट अग्नि से रहित हूँ॥ ९० ॥ आदिमध्यान्तहीनोऽहमाकाशसदृशोऽस्म्यहम्। आत्मचैतन्यरूपोऽहमहमानन्दचिद्धनः ॥ ९१ ॥ मैं आदि, मध्य एवं अन्त से विहीन हूँ। मैं आकाश के समान हूँ। मैं आत्म चैतन्य रूप हूँ तथा आनन्द चेतन घन के सदृश हूँ॥ ९१ ॥ आनन्दामृतरूपोऽहमात्मसंस्थोऽहमान्तरः। आत्मकामोऽहमकाशात्परमात्मेश्वरोऽस्म्यहम् ॥ ९२ ॥